बांग्लादेश में 35 साल बाद राष्ट्रपति चुनाव में मुकाबला, BNP के मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने दर्ज की जीत

बांग्लादेश में 35 साल बाद राष्ट्रपति चुनाव में मुकाबला, BNP के मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने दर्ज की जीत

बांग्लादेश की राजनीति में लंबे अंतराल के बाद राष्ट्रपति चुनाव एक बार फिर मुकाबले वाला रहा। संसद में हुए मतदान में सत्तारूढ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के उम्मीदवार मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने विपक्षी गठबंधन के प्रत्याशी कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद को हराकर राष्ट्रपति पद अपने नाम कर लिया। फखरुल को 255 सांसदों का समर्थन मिला, जबकि ओली अहमद के पक्ष में 88 वोट पड़े।

राष्ट्रपति चुनाव का परिणाम सामने आने के बाद प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति को लाल गुलाब भेंट कर शुभकामनाएं दीं। इसके बाद दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को गले लगाकर अभिवादन किया। चुनाव परिणाम के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति में राष्ट्रपति पद को लेकर एक नया अध्याय शुरू हो गया है।

गुरुवार को राजधानी ढाका स्थित संसद भवन में राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान कराया गया। मतदान की प्रक्रिया दोपहर 2 बजे शुरू हुई और शाम 5 बजे तक चली। संसद में मौजूद कुल 349 सांसदों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। चटगांव-4 सीट खाली होने के कारण सदन की कुल 350 सीटों में से एक सीट पर मतदान नहीं हुआ।

फखरुल के सामने था 11 दलों का उम्मीदवार

इस बार राष्ट्रपति चुनाव इसलिए भी खास रहा क्योंकि लंबे समय बाद विपक्ष ने सत्ता पक्ष के उम्मीदवार के सामने अपना प्रत्याशी उतारा। 11 राजनीतिक दलों के गठबंधन ने कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद को मैदान में उतारा था। हालांकि संख्या के लिहाज से विपक्ष पहले से ही कमजोर स्थिति में था, क्योंकि संसद में BNP के पास 247 सांसद हैं, जबकि जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन के पास करीब 81 सांसद हैं।

मतदान के आंकड़ों ने भी संसद में दोनों पक्षों की ताकत को स्पष्ट कर दिया। फखरुल को 255 वोट मिले, जबकि ओली अहमद को 88 मत हासिल हुए। इस तरह दोनों उम्मीदवारों के बीच 167 वोटों का अंतर रहा।

राष्ट्रपति पद के लिए फखरुल की जीत को BNP के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी के मुख्य सचेतक नुरुल इस्लाम मोनी के अनुसार, मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर 21 अगस्त की शाम बंगभवन में राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे।

ओली अहमद ने चुनाव प्रक्रिया पर उठाए सवाल

चुनाव हारने के बाद विपक्षी उम्मीदवार ओली अहमद ने नतीजे को स्वीकार करने के साथ-साथ चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए। ढाका में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव का परिणाम पहले से ही तय था और सांसदों को स्वतंत्र रूप से मतदान करने का अधिकार नहीं है।

ओली अहमद ने बांग्लादेश के संविधान के आर्टिकल 70 का उल्लेख करते हुए कहा कि सांसदों के लिए पार्टी के निर्देश से अलग जाकर मतदान करना आसान नहीं है। उनके मुताबिक, यदि कोई सांसद अपनी पार्टी के निर्णय के खिलाफ वोट करता है, तो उसकी संसद सदस्यता पर खतरा पैदा हो सकता है।

उनका तर्क था कि ऐसी व्यवस्था में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान सांसदों की व्यक्तिगत पसंद की भूमिका सीमित हो जाती है। पार्टी जिस उम्मीदवार के समर्थन में फैसला करती है, सांसदों पर उसी दिशा में मतदान करने का दबाव रहता है।

ओली अहमद ने इसी आधार पर दावा किया कि बांग्लादेश में लोकतांत्रिक व्यवस्था पर राजनीतिक दलों का मजबूत नियंत्रण है। उनके मुताबिक, विपक्ष का चुनाव लड़ना जरूरी था, लेकिन मौजूदा राजनीतिक ढांचे में सत्ता पक्ष के उम्मीदवार को हराना बेहद कठिन था।

राष्ट्रपति चुनाव में इतना लंबा अंतराल क्यों?

बांग्लादेश में राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं किया जाता। देश की संसदीय व्यवस्था के तहत सांसद राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं। ऐसे में जिस दल के पास संसद में स्पष्ट बहुमत होता है, उसके उम्मीदवार की स्थिति स्वाभाविक रूप से मजबूत रहती है।

यही वजह है कि पिछले कई दशकों में राष्ट्रपति चुनाव अक्सर औपचारिक प्रक्रिया तक सीमित रहा। विपक्षी दलों के सामने व्यावहारिक चुनौती यह थी कि वे चुनाव में उतरें तो भी सत्ता पक्ष के बहुमत के कारण जीत की संभावना बेहद कम रहेगी। इसके चलते कई मौकों पर विपक्ष ने प्रत्याशी खड़ा नहीं किया और सत्ताधारी दल का उम्मीदवार निर्विरोध चुना जाता रहा।

1991 में संसदीय प्रणाली दोबारा लागू होने के बाद राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया फिर सांसदों के हाथ में आ गई। उसी वर्ष राष्ट्रपति पद के लिए दो उम्मीदवार आमने-सामने आए थे। इसके बाद लंबे समय तक राष्ट्रपति चुनाव में मुकाबला देखने को नहीं मिला।

2023 तक हुए चुनावों में विपक्षी दलों ने कई बार उम्मीदवार नहीं उतारा। परिणामस्वरूप सत्ता पक्ष के उम्मीदवार निर्विरोध चुने जाते रहे। इस तरह 1991 के बाद करीब 35 साल के अंतराल के बाद बांग्लादेश में राष्ट्रपति पद के लिए वास्तविक चुनावी मुकाबला देखने को मिला।

राष्ट्रपति पद की चुनावी परंपरा भी रही है अलग

बांग्लादेश में राष्ट्रपति चुनाव की व्यवस्था समय के साथ बदलती रही है। संविधान लागू होने के बाद 1974 में पहली बार राष्ट्रपति चुनाव हुआ था। उस समय सांसदों ने मतदान करके मोहम्मद मोहम्मदुल्लाह को राष्ट्रपति चुना था।

इसके बाद 1975 में संविधान में बदलाव किया गया और राष्ट्रपति के चुनाव की व्यवस्था सीधे जनता के माध्यम से करने का प्रावधान आया। इसी व्यवस्था के तहत 1978, 1981 और 1986 में राष्ट्रपति पद के लिए जनता ने मतदान किया।

हालांकि 1991 में देश की संसदीय व्यवस्था फिर से बहाल होने के बाद राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया दोबारा संसद के जरिए होने लगी। इसके बाद राष्ट्रपति पद का चुनाव मुख्य रूप से सदन में मौजूद राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर रहने लगा।

यही कारण है कि राष्ट्रपति चुनाव में सत्ता पक्ष की स्थिति लंबे समय तक निर्णायक रही। संसद में बहुमत होने के कारण उसके उम्मीदवार की जीत लगभग सुनिश्चित मानी जाती थी।

इस बार विपक्ष के लिए चुनाव का मतलब सिर्फ जीत नहीं

ओली अहमद की उम्मीदवारी को केवल राष्ट्रपति चुनाव की सामान्य प्रक्रिया के तौर पर नहीं देखा गया। 11 दलों के गठबंधन के लिए यह चुनाव अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने का अवसर भी था।

विपक्ष जानता था कि संसद में संख्या बल उसके पक्ष में नहीं है। इसके बावजूद उम्मीदवार उतारने का फैसला राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया। इससे गठबंधन के दलों को एक मंच पर आने और अपनी राजनीतिक पहचान को मजबूत करने का मौका मिला।

राष्ट्रपति चुनाव में हार के बावजूद विपक्ष यह संदेश देना चाहता था कि वह चुनावी प्रक्रिया से बाहर नहीं रहेगा। उसके लिए यह मुकाबला सरकार के सामने अपनी राजनीतिक ताकत और संगठनात्मक एकजुटता दिखाने का माध्यम भी था।

दूसरी तरफ BNP के लिए यह चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण रहा क्योंकि उसके उम्मीदवार को संसद में स्पष्ट बहुमत हासिल हुआ और फखरुल की जीत पार्टी के राजनीतिक प्रभाव को दिखाती है।

पूर्व राष्ट्रपति के इस्तीफे के बाद बनी स्थिति

इस चुनाव की पृष्ठभूमि में पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन का इस्तीफा भी महत्वपूर्ण रहा। 76 वर्षीय शहाबुद्दीन ने 24 जुलाई को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला देते हुए राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया था।

शहाबुद्दीन को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का करीबी माना जाता था। उन्होंने अप्रैल 2023 में राष्ट्रपति पद संभाला था और सामान्य परिस्थितियों में उनका कार्यकाल 2028 तक जारी रहना था। लेकिन कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उनके पद छोड़ने के कारण राष्ट्रपति पद खाली हो गया और नए चुनाव की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी।

इस घटनाक्रम ने बांग्लादेश की राजनीति में राष्ट्रपति पद को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया। इसके बाद संसद के जरिए नए राष्ट्रपति के चुनाव की तैयारी शुरू हुई और पहली बार लंबे समय के बाद विपक्षी उम्मीदवार के मैदान में आने से मुकाबले की तस्वीर बनी।

संसद के मौजूदा समीकरण ने तय की दिशा

बांग्लादेश की 350 सदस्यीय संसद में BNP के पास 247 सांसद हैं। वहीं मुख्य विपक्षी धड़े में शामिल जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन के पास लगभग 81 सांसद हैं। एक सीट खाली होने के कारण इस चुनाव में 349 सांसदों ने मतदान किया।

संख्या बल पहले से ही BNP के पक्ष में था। मतदान के बाद सामने आए परिणाम ने इसी राजनीतिक समीकरण को प्रतिबिंबित किया। फखरुल को 255 वोट हासिल हुए, जबकि विपक्षी उम्मीदवार ओली अहमद को 88 वोट मिले।

इस परिणाम के साथ मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर का राष्ट्रपति पद तक पहुंचने का रास्ता साफ हो गया। अब निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार बंगभवन में शपथ ग्रहण के बाद वह औपचारिक रूप से राष्ट्रपति का पद संभालेंगे।

बांग्लादेश में राष्ट्रपति का पद मुख्य रूप से संवैधानिक और औपचारिक भूमिका से जुड़ा है, जबकि सरकार चलाने में प्रधानमंत्री और संसद की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है। इसके बावजूद राष्ट्रपति पद देश की संवैधानिक व्यवस्था में अहम स्थान रखता है।

35 साल बाद हुए इस चुनावी मुकाबले ने यह जरूर दिखाया कि बांग्लादेश में राष्ट्रपति चुनाव अब केवल निर्विरोध चयन तक सीमित नहीं रहा। विपक्ष ने उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को राजनीतिक रूप दिया और सत्ता पक्ष ने अपने बहुमत के दम पर जीत हासिल की। हालांकि विपक्ष ने चुनाव की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, लेकिन परिणाम के साथ BNP के मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर के नए राष्ट्रपति बनने की प्रक्रिया अब अंतिम चरण में पहुंच गई है।