हरियाणा कांग्रेस में संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर पार्टी हाईकमान अब पुराने तौर-तरीकों से हटकर अधिक व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाने की तैयारी में है। जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में नेताओं की सिफारिश, व्यक्तिगत प्रभाव और गुटीय राजनीति की भूमिका को सीमित करने के लिए नई व्यवस्था लागू की जा रही है। इसके तहत पद के दावेदारों को अब केवल वरिष्ठ नेताओं के समर्थन के आधार पर अपनी दावेदारी मजबूत करने के बजाय पार्टी संगठन में अपने योगदान, राजनीतिक अनुभव और सक्रियता का विस्तृत ब्योरा देना होगा।
इस नई प्रक्रिया की शुरुआत हिसार जिले से की जाने की तैयारी है। हिसार के जिलाध्यक्ष के चयन में प्रयोग सफल रहने के बाद इसे प्रदेश के दूसरे जिलों में भी लागू किया जा सकता है। पार्टी की ओर से जिलाध्यक्ष पद के इच्छुक नेताओं को तीन पन्नों का एक निर्धारित प्रोफार्मा दिया जाएगा। इसमें 20 से अधिक सवाल शामिल होंगे। इन सवालों के जरिए दावेदार की राजनीतिक पृष्ठभूमि, संगठन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता और अब तक निभाई गई जिम्मेदारियों का आकलन किया जाएगा।
नई व्यवस्था के तहत दावेदारों से सबसे पहले यह जानकारी मांगी जाएगी कि उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता कब ग्रहण की। इसके अलावा यह भी पूछा जाएगा कि क्या उन्होंने कभी कांग्रेस छोड़कर किसी अन्य राजनीतिक दल का रुख किया है। पार्टी यह जानने की कोशिश करेगी कि संबंधित नेता का कांग्रेस के साथ कितना पुराना जुड़ाव रहा है और मुश्किल राजनीतिक परिस्थितियों में उसकी पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता कैसी रही है।
प्रोफार्मा में दावेदारों से उनके अब तक के राजनीतिक और संगठनात्मक सफर की पूरी जानकारी भी मांगी जाएगी। इसमें पार्टी संगठन या चुनावी राजनीति में उनके द्वारा संभाले गए पदों, जिम्मेदारियों और विभिन्न स्तरों पर किए गए काम का उल्लेख करना होगा। इससे पार्टी नेतृत्व को यह समझने में मदद मिलेगी कि किसी नेता का संगठन के भीतर वास्तविक अनुभव कितना है और उसने पार्टी को मजबूत करने के लिए किस स्तर पर काम किया है।
नई प्रक्रिया का एक अहम पहलू सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों से जुड़ी जानकारी भी है। दावेदारों से उनकी जाति और उपजाति के बारे में भी जानकारी मांगी जाएगी। हरियाणा की राजनीति में सामाजिक समीकरणों की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए पार्टी नेतृत्व जिलाध्यक्षों के चयन में क्षेत्रीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व का संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर सकता है।
इसके अलावा इंटरनेट मीडिया पर दावेदार की सक्रियता और दक्षता से संबंधित जानकारी भी प्रोफार्मा में शामिल की गई है। मौजूदा दौर में राजनीतिक संवाद का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया के माध्यम से होता है। ऐसे में पार्टी यह देखना चाहती है कि संभावित जिलाध्यक्ष डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कितना सक्रिय है, संगठन के संदेश को जनता तक पहुंचाने में कितना सक्षम है और पार्टी की गतिविधियों को आधुनिक माध्यमों के जरिए किस तरह आगे बढ़ा सकता है।
बताया जा रहा है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य केवल संभावित नामों की सूची तैयार करना नहीं है। पार्टी हाईकमान दावेदारों की राजनीतिक पृष्ठभूमि, संगठनात्मक अनुभव, सक्रियता और स्थानीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता का तुलनात्मक मूल्यांकन करना चाहता है। इससे जिलाध्यक्ष के चयन में व्यक्तिगत पसंद या किसी गुट विशेष के प्रभाव को कम करने की कोशिश की जा सकती है।
हिसार में जिलाध्यक्ष पद को लेकर यह प्रक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां पहले से संगठनात्मक बदलाव की स्थिति बनी हुई है। हिसार के जिलाध्यक्ष बजरंग दास गर्ग पद से हटाए जाने से पहले ही अपना पद छोड़ चुके हैं। इसके बाद नए जिलाध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। पार्टी ने इस जिम्मेदारी के लिए केंद्रीय स्तर से पर्यवेक्षक नियुक्त किया है।
हिसार में जिलाध्यक्ष चयन की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय पर्यवेक्षक अजय कुमार लल्लू को सौंपी गई है। वह संभावित दावेदारों से संबंधित जानकारी जुटाने और उनके राजनीतिक एवं संगठनात्मक रिकॉर्ड का आकलन करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएंगे। इसके बाद योग्य दावेदारों के नामों का पैनल तैयार कर पार्टी हाईकमान के समक्ष भेजा जाएगा।
नई व्यवस्था के तहत स्थानीय स्तर से कुल छह नामों का पैनल तैयार किए जाने की जानकारी है। केंद्रीय पर्यवेक्षक दावेदारों की जानकारी और प्रोफार्मा के आधार पर छह संभावित नामों को चयन के लिए आगे भेजेंगे। अंतिम निर्णय कांग्रेस हाईकमान की ओर से लिया जाएगा। इस व्यवस्था से स्थानीय नेताओं की सिफारिशों के बजाय एक निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर उम्मीदवारों का मूल्यांकन करने का प्रयास किया जा रहा है।
हरियाणा के अन्य जिलों में भी संगठनात्मक बदलाव की प्रक्रिया चल रही है। पंचकूला और फरीदाबाद में शहरी तथा ग्रामीण दोनों स्तरों पर जिलाध्यक्षों की नियुक्तियां की जानी हैं। हांसी में भी जिलाध्यक्ष का चयन अभी बाकी है। ऐसे में हिसार में अपनाई जा रही प्रक्रिया आने वाले समय में प्रदेश के अन्य संगठनात्मक क्षेत्रों के लिए एक मॉडल बन सकती है।
फरीदाबाद में संगठनात्मक बदलाव पहले ही सामने आ चुका है। वहां के जिला कांग्रेस अध्यक्ष बलजीत कौशिक को केंद्रीय पर्यवेक्षक की ओर से पद से हटाने की घोषणा की गई है। इसके बाद नए नेतृत्व के चयन को लेकर पार्टी के भीतर गतिविधियां तेज होने की संभावना है। यहां भी हाईकमान की नई प्रक्रिया के तहत दावेदारों का आकलन किए जाने की संभावना है।
इसके साथ ही कांग्रेस संगठन ने ऐसे पांच जिलाध्यक्षों की भी पहचान की है, जिनका प्रदर्शन पार्टी की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं माना गया है। इन जिलाध्यक्षों को बदलने की तैयारी चल रही है। प्रदेश प्रभारी संजय सतीशचंद्र दत्त की ओर से संबंधित जिलाध्यक्षों की रिपोर्ट केंद्रीय चयन समिति को भेजे जाने की जानकारी है। रिपोर्ट के साथ उनकी ओर से अपनी संस्तुति भी दी गई है।
इसका मतलब है कि पार्टी केवल खाली पदों पर नई नियुक्तियां करने तक सीमित नहीं है, बल्कि मौजूदा जिलाध्यक्षों के कामकाज की भी समीक्षा कर रही है। संगठनात्मक प्रदर्शन, सक्रियता और पार्टी के कार्यक्रमों को जमीन पर लागू करने की क्षमता जैसे पहलुओं को आने वाले समय में नियुक्तियों और बदलावों का आधार बनाया जा सकता है।
हरियाणा कांग्रेस में संगठन को मजबूत करने के लिए पार्टी ने जिला स्तर की समीक्षा और अध्यक्षों के चयन की प्रक्रिया के लिए चार केंद्रीय पर्यवेक्षक नियुक्त किए हैं। इनमें आंध्र प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष डा. एन. रघुवीरा रेड्डी, महाराष्ट्र की पूर्व मंत्री यशोमति ठाकुर, मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और उत्तर प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू शामिल हैं।
इन केंद्रीय पर्यवेक्षकों को अलग-अलग जिलों में संगठन की स्थिति का आकलन करने और स्थानीय नेताओं से फीडबैक लेने की जिम्मेदारी दी गई है। उनका काम केवल संभावित जिलाध्यक्षों के नाम जुटाना नहीं, बल्कि संगठन की जमीनी स्थिति को समझना भी माना जा रहा है।
पार्टी के भीतर लंबे समय से यह चर्चा रही है कि संगठनात्मक पदों पर नियुक्तियों में गुटीय राजनीति और प्रभावशाली नेताओं की सिफारिशों की भूमिका अधिक रहती है। नई प्रक्रिया के जरिए हाईकमान इस धारणा को बदलने की कोशिश कर रहा है। यदि दावेदारों का मूल्यांकन निर्धारित प्रोफार्मा और केंद्रीय पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के आधार पर किया जाता है तो इससे चयन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और तुलनात्मक बनाने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, जातीय समीकरण और स्थानीय राजनीतिक प्रभाव को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी किसी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होगा। हरियाणा में चुनावी राजनीति में क्षेत्र, जाति, सामाजिक समूह और स्थानीय प्रभाव का महत्व है। ऐसे में पार्टी को संगठनात्मक क्षमता के साथ-साथ सामाजिक संतुलन को भी ध्यान में रखना होगा। प्रोफार्मा में जाति और उपजाति की जानकारी शामिल किए जाने को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
सोशल मीडिया को चयन प्रक्रिया में शामिल करना भी कांग्रेस की बदलती संगठनात्मक रणनीति का संकेत माना जा रहा है। अब जिलाध्यक्ष के लिए केवल परंपरागत संगठनात्मक अनुभव पर्याप्त नहीं माना जा रहा, बल्कि डिजिटल माध्यमों पर पार्टी की विचारधारा और कार्यक्रमों को प्रभावी तरीके से जनता तक पहुंचाने की क्षमता भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
नई प्रक्रिया से यह भी पता चलेगा कि पार्टी किस तरह के नेताओं को जिला संगठन की जिम्मेदारी सौंपना चाहती है। लंबे समय से पार्टी से जुड़े नेताओं के साथ-साथ सक्रिय और प्रभावी संगठनकर्ताओं को भी अवसर मिल सकता है। वहीं, केवल किसी वरिष्ठ नेता की सिफारिश के आधार पर पद पाने की कोशिश करने वाले नेताओं के लिए यह प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
हिसार में इस प्रयोग के परिणामों पर कांग्रेस के भीतर खास नजर रहेगी। यदि पार्टी छह नामों के पैनल से ऐसा अध्यक्ष चुनने में सफल रहती है जिसे संगठनात्मक अनुभव, स्थानीय स्वीकार्यता और सक्रियता के आधार पर मजबूत माना जाए, तो यही मॉडल अन्य जिलों में भी अपनाया जा सकता है। दूसरी ओर, यदि प्रक्रिया के बावजूद गुटीय असहमति सामने आती है तो पार्टी के लिए संगठनात्मक संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
कुल मिलाकर, हरियाणा कांग्रेस ने जिला स्तर पर संगठन को नए तरीके से व्यवस्थित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। जिलाध्यक्षों के चयन के लिए प्रोफार्मा, केंद्रीय पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट और छह नामों के पैनल की व्यवस्था पार्टी के पुराने चयन तंत्र से अलग दिखाई देती है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस प्रक्रिया से पार्टी को कितना मजबूत स्थानीय नेतृत्व मिलता है और क्या इससे गुटबाजी तथा सिफारिश आधारित नियुक्तियों के प्रभाव को वास्तव में सीमित किया जा सकेगा।




