अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव अब केवल मिसाइलों, युद्धपोतों और सैन्य ताकत तक सीमित नहीं रह गया है। लंबे समय से चल रहे इस संघर्ष में जब सैन्य दबाव से निर्णायक नतीजा हासिल करना मुश्किल साबित हुआ, तो अब आर्थिक मोर्चे को हथियार बनाने की कोशिश तेज होती दिखाई दे रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ खड़े देशों को कड़े आर्थिक परिणाम भुगतने की चेतावनी देकर संकेत दिया है कि आगे की लड़ाई व्यापार, तेल, बैंकिंग और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था के जरिए लड़ी जा सकती है।
ईरान ने भी अमेरिका के इस रुख को चुनौती देते हुए साफ कर दिया है कि वह दबाव में झुकने वाला नहीं है। ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहसिन रेजाई ने उन देशों को चेतावनी दी है जो अमेरिकी आर्थिक अभियान में शामिल होंगे। उनका कहना है कि ऐसे देशों को ईरान अपने विरोधी के तौर पर देखेगा।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल यही है कि आखिर आर्थिक युद्ध होता क्या है और कोई देश बिना सीधे सैन्य हमला किए दूसरे देश की अर्थव्यवस्था को किस तरह कमजोर कर सकता है?
बंदूक के बजाय अर्थव्यवस्था बन जाती है हथियार
सैन्य युद्ध में किसी देश पर दबाव बनाने के लिए सेना, मिसाइल, लड़ाकू विमान, युद्धपोत और दूसरे हथियार इस्तेमाल किए जाते हैं। इसके विपरीत आर्थिक युद्ध में वित्तीय और व्यापारिक ताकत को हथियार बनाया जाता है।
किसी देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के लिए उसके व्यापार को सीमित करना, विदेशी मुद्रा के स्रोतों पर रोक लगाना, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग व्यवस्था तक पहुंच मुश्किल करना, सरकारी संपत्तियों को फ्रीज करना और दूसरी अर्थव्यवस्थाओं को उससे दूरी बनाने के लिए मजबूर करना आर्थिक युद्ध की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
इसका उद्देश्य अक्सर किसी देश को सीधे युद्धभूमि पर हराना नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक क्षमता को इतना कमजोर करना होता है कि सरकार के सामने अपने फैसलों में बदलाव करने का दबाव पैदा हो जाए।
अगर किसी देश की आय का बड़ा हिस्सा तेल बेचने से आता है और उसके तेल के खरीदारों को ही डराया जाए कि व्यापार जारी रखने पर उन पर भी प्रतिबंध लगाए जाएंगे, तो उस देश की कमाई पर सीधा असर पड़ सकता है। यही वजह है कि ऊर्जा संसाधन आर्थिक युद्ध में बेहद महत्वपूर्ण हथियार बन जाते हैं।
आर्थिक युद्ध में इस्तेमाल होते हैं कौन-कौन से हथियार?
आर्थिक दबाव कई स्तरों पर लगाया जा सकता है। सबसे आम तरीका प्रतिबंध है। किसी देश से कुछ विशेष वस्तुओं का आयात रोकना या उसके निर्यात पर पाबंदी लगाना उसकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
दूसरा बड़ा हथियार विदेशी संपत्तियों को फ्रीज करना है। अगर किसी देश की सरकार, कंपनियों या उससे जुड़े लोगों की संपत्ति दूसरे देशों में मौजूद है, तो प्रतिबंध लगाने वाला देश उसे इस्तेमाल करने से रोक सकता है।
इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग व्यवस्था से दूरी बनाना भी बेहद प्रभावी कदम माना जाता है। वैश्विक वित्तीय नेटवर्क से जुड़ाव कम होने पर किसी देश के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान करना कठिन हो सकता है।
टैरिफ यानी आयात शुल्क भी आर्थिक दबाव का माध्यम बन सकते हैं। किसी देश के उत्पादों पर बहुत ज्यादा शुल्क लगा देने से वे दूसरे बाजारों में महंगे हो जाते हैं और उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कम हो सकती है।
सबसे ज्यादा चर्चा सेकेंडरी सैंक्शंस की होती है। इसमें केवल उस देश को निशाना नहीं बनाया जाता जिसके खिलाफ प्रतिबंध लगाए गए हैं, बल्कि उसके साथ व्यापार करने वाली विदेशी कंपनियों या देशों को भी कार्रवाई की चेतावनी दी जाती है। यही रणनीति ईरान के मामले में अमेरिका की मौजूदा नीति को खास बनाती है।
ईरान के खिलाफ अमेरिका की रणनीति क्या है?
ईरान की अर्थव्यवस्था में तेल का महत्व बहुत ज्यादा है। ऐसे में अगर उसके तेल निर्यात को सीमित कर दिया जाए, तो सरकार की विदेशी मुद्रा आय पर बड़ा असर पड़ सकता है।
अमेरिका की रणनीति का एक अहम हिस्सा ईरान के ऊर्जा कारोबार पर दबाव बढ़ाना और उसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था से अधिक से अधिक अलग करना हो सकता है। इसके लिए केवल ईरान पर प्रतिबंध लगाना पर्याप्त नहीं है। अमेरिका उन कंपनियों और देशों पर भी दबाव बना सकता है जो ईरान से कारोबार जारी रखते हैं।
यही कारण है कि ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों के लिए अमेरिकी चेतावनी महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर कोई देश ईरान से तेल खरीदता है या उसके साथ वित्तीय लेनदेन करता है, तो उसे अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करने का जोखिम हो सकता है।
इस तरह अमेरिका बिना सीधे किसी दूसरे देश की सेना से भिड़े उसकी कमाई और व्यापारिक नेटवर्क पर असर डालने की कोशिश कर सकता है।
ट्रंप की धमकी ने बढ़ाई चिंता
डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ’ पर ईरान के साथ खड़े देशों को लेकर कड़ा संदेश दिया। उन्होंने संकेत दिया कि ईरान का समर्थन करने वाले देशों को बेहद कठोर आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
ट्रंप की चेतावनी का असर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान के साथ आर्थिक संबंध रखने वाले कई देश वैश्विक ऊर्जा बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अगर ईरानी तेल के कारोबार पर व्यापक रोक लगाने की कोशिश होती है, तो उसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रह सकता।
तेल की सप्लाई, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री परिवहन से जुड़े जोखिम बढ़ने पर दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी कीमतों और बाजारों पर असर पड़ सकता है।
ईरान ने भी दी सीधी चेतावनी
अमेरिकी दबाव के जवाब में मोहसिन रेजाई ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। उनका कहना है कि जो देश ईरान के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक अभियान में शामिल होंगे, उन्हें ईरान दुश्मन की नजर से देखेगा।
रेजाई ने हॉर्मुज स्ट्रेट का भी उल्लेख किया। यह समुद्री मार्ग दुनिया के ऊर्जा कारोबार के लिए बेहद अहम है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले तेल और गैस के बड़े हिस्से के परिवहन के लिए इसका महत्व है।
ईरान की ओर से हॉर्मुज स्ट्रेट को लेकर चेतावनी इसलिए गंभीर मानी जाती है क्योंकि इस मार्ग में किसी भी तरह का बड़ा व्यवधान वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है।
रेजाई के मुताबिक ईरान ने वर्षों तक अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करते हुए उनसे बचने और तेल बेचने के तरीके विकसित किए हैं। उनका दावा है कि केवल आर्थिक प्रतिबंध लगाकर ईरान को आसानी से झुकाया नहीं जा सकता।
उन्होंने यह भी कहा कि हॉर्मुज स्ट्रेट तब तक बंद रहने की स्थिति में रह सकता है जब तक अमेरिका जून में हुए ईरान-अमेरिका समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं करता।
ईरान के विदेश मंत्री ने भी ट्रंप पर साधा निशाना
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने अमेरिकी नीति पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आर्थिक दबाव की नई कोशिश भी पहले की रणनीतियों जैसी ही नाकाम हो सकती है।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अमेरिका की पिछली नीतियों का जिक्र किया। अराघची के मुताबिक पहले ‘इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध’ लगाए गए, लेकिन वे सफल नहीं हुए। इसके बाद ‘अधिकतम दबाव’ की नीति आई और वह भी अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर सकी।
ईरानी विदेश मंत्री ने यह भी याद दिलाया कि कुछ महीने पहले अमेरिका की ओर से ‘बिना शर्त आत्मसमर्पण’ की मांग सामने आई थी, लेकिन ईरान ने उसे भी स्वीकार नहीं किया।
अब उन्होंने ट्रंप की नई आर्थिक मुहिम पर तंज कसते हुए संकेत दिया कि इसे भी ईरान झेल जाएगा।
क्या आर्थिक युद्ध से ईरान वास्तव में झुक सकता है?
यही इस पूरे संघर्ष का सबसे बड़ा सवाल है। आर्थिक प्रतिबंध किसी भी देश के लिए गंभीर मुश्किलें पैदा कर सकते हैं। विदेशी मुद्रा की कमी, व्यापार में गिरावट, निवेश में कमी, महंगाई और मुद्रा पर दबाव जैसे परिणाम सामने आ सकते हैं।
लेकिन प्रतिबंध हमेशा तुरंत राजनीतिक लक्ष्य हासिल कर दें, ऐसा जरूरी नहीं है। जिन देशों पर लंबे समय तक प्रतिबंध लगे हैं, उन्होंने कई बार वैकल्पिक व्यापारिक नेटवर्क और भुगतान के दूसरे रास्ते विकसित किए हैं।
ईरान भी लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करता रहा है। ऐसे में उसने वैकल्पिक व्यापार व्यवस्था और अलग-अलग देशों के साथ ऊर्जा कारोबार बनाए रखने के तरीके खोजे हैं।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रतिबंधों का कोई असर नहीं होता। लंबे समय तक आर्थिक दबाव किसी देश की विकास क्षमता और आम लोगों की आर्थिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
भारत, चीन और दुनिया पर भी पड़ सकता है असर
ईरान के खिलाफ व्यापक आर्थिक अभियान का असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। ईरान से ऊर्जा खरीदने वाले या उसके साथ कारोबार करने वाले देशों के सामने भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
अगर अमेरिकी सेकेंडरी सैंक्शंस का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होता है, तो विदेशी कंपनियों को यह तय करना पड़ सकता है कि वे ईरान के साथ कारोबार जारी रखें या अमेरिकी बाजार और वित्तीय प्रणाली तक अपनी पहुंच को प्राथमिकता दें।
चीन, भारत और रूस जैसे देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि इनके ईरान के साथ अलग-अलग स्तर पर आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं।
इसके अलावा अगर हॉर्मुज स्ट्रेट में तनाव बढ़ता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ने का खतरा रहेगा। ऐसी स्थिति में ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है और इसका असर आयात करने वाले देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है।
असली लड़ाई अब आर्थिक ताकत की
अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष अब इस बात की परीक्षा बनता जा रहा है कि किसके पास दबाव सहने की ज्यादा क्षमता है। अमेरिका के पास दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने के साथ-साथ वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में मजबूत प्रभाव है। दूसरी तरफ ईरान के पास लंबे समय तक प्रतिबंधों के बावजूद अपने आर्थिक नेटवर्क को बनाए रखने का अनुभव है।
इसलिए आने वाले समय में लड़ाई के बड़े मैदान तेल, बैंकिंग, व्यापार और समुद्री मार्ग बन सकते हैं।
ट्रंप की धमकी और ईरान की जवाबी चेतावनी से साफ है कि दोनों पक्ष पीछे हटने के बजाय अपने-अपने दबाव के साधनों को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए ईरान की कमर कमजोर करना चाहता है, जबकि ईरान यह संदेश दे रहा है कि वह दबाव के आगे झुकने के बजाय ऊर्जा आपूर्ति और रणनीतिक समुद्री मार्गों को अपने जवाबी हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है।
यानी अब इस संघर्ष में हर लड़ाई मिसाइलों से नहीं लड़ी जाएगी। कई मोर्चों पर बैंक, तेल बाजार, व्यापारिक समझौते, विदेशी मुद्रा और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क ही असली हथियार बन सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिका की आर्थिक घेराबंदी कितनी प्रभावी होती है और ईरान प्रतिबंधों के दबाव से निपटने के लिए किस हद तक अपने वैकल्पिक रास्तों को सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर पाता है।
(Photo: AI Generated)




