जापानी कंपनियों के लिए भारत में हाईटेक फैक्टरी लगाना होगा आसान, BIS नियमों में छूट की तैयारी

जापानी कंपनियों के लिए भारत में हाईटेक फैक्टरी लगाना होगा आसान, BIS नियमों में छूट की तैयारी

भारत में सेमीकंडक्टर और दूसरी हाईटेक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने की योजना बना रही जापानी कंपनियों के लिए आने वाले समय में कारोबार करना आसान हो सकता है। केंद्र सरकार ऐसे नियमों पर काम कर रही है, जिनके जरिए विदेश से आयात होने वाली विशेष मशीनरी और तकनीकी उपकरणों के लिए जरूरी भारतीय मानक ब्यूरो यानी BIS प्रमाणन की प्रक्रिया को तेज किया जा सके। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जापान यात्रा के दौरान उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के सामने इस दिशा में सरकार की योजना साझा की।

सरकार का उद्देश्य यह है कि जिन मशीनों और उपकरणों के लिए भारतीय मानकों का पालन जरूरी है, उनकी मंजूरी में अनावश्यक देरी न हो। इसके लिए अलग-अलग परिस्थितियों के हिसाब से उद्योग, कंपनी, उत्पाद या किसी विशेष परियोजना को प्रमाणन संबंधी राहत देने का विकल्प तैयार किया जा रहा है। गोयल के मुताबिक, इस व्यवस्था पर काम शुरू करने के निर्देश BIS और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय को दिए जा चुके हैं।

सेमीकंडक्टर प्लांट में छोटी देरी भी बढ़ा सकती है लागत

सेमीकंडक्टर निर्माण सामान्य फैक्ट्री लगाने जैसा काम नहीं है। एक चिप निर्माण संयंत्र तैयार करने में भारी निवेश के साथ अत्याधुनिक मशीनों और उपकरणों की लंबी श्रृंखला की जरूरत होती है। इन उपकरणों की स्थापना एक निश्चित क्रम में की जाती है। ऐसे में किसी एक महत्वपूर्ण मशीन की मंजूरी, आयात या इंस्टॉलेशन में देरी होने पर पूरी परियोजना की समयसीमा प्रभावित हो सकती है।

सरकार द्वारा प्रस्तावित आसान व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ इसी स्तर पर मिलने की उम्मीद है। अगर जरूरी मशीनों को समय पर भारत लाया जा सके और प्रमाणन की प्रक्रिया कम समय में पूरी हो, तो कंपनियां अपने उत्पादन संयंत्र जल्दी शुरू कर सकती हैं। इससे परियोजना की लागत पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है, क्योंकि लंबे समय तक निर्माणाधीन संयंत्र पर खर्च जारी रखना कंपनियों के लिए महंगा होता है।

समय पर फैक्टरी शुरू होने से केवल निवेश ही नहीं बढ़ेगा, बल्कि रोजगार के अवसर भी जल्दी पैदा होंगे। निर्माण के दौरान इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों और दूसरे कर्मचारियों की जरूरत होगी। उत्पादन शुरू होने के बाद भी बड़ी संख्या में कुशल और अर्ध-कुशल कर्मचारियों की आवश्यकता होगी।

भारत में चिप की मांग तेजी से बढ़ने की उम्मीद

सेमीकंडक्टर क्षेत्र को लेकर भारत की रणनीति के पीछे घरेलू बाजार की बढ़ती जरूरत भी एक बड़ा कारण है। अनुमान है कि वर्ष 2032 तक देश में सेमीकंडक्टर की मांग करीब 150 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, मोबाइल फोन, दूरसंचार, रक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े उपकरणों में चिप की जरूरत लगातार बढ़ रही है।

ऐसे में सरकार चाहती है कि भारत केवल सेमीकंडक्टर का बड़ा उपभोक्ता बनकर न रहे, बल्कि उत्पादन और सप्लाई चेन का भी महत्वपूर्ण केंद्र बने। घरेलू स्तर पर निर्माण क्षमता बढ़ने से भविष्य में विदेशों से चिप और उससे जुड़े उत्पादों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

जापान इस रणनीति में महत्वपूर्ण भागीदार माना जा रहा है। जापानी कंपनियों के पास इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, मशीनरी और उन्नत तकनीक के क्षेत्र में लंबा अनुभव है। भारत इस तकनीकी क्षमता और अपने बड़े बाजार को जोड़कर दोनों देशों के बीच औद्योगिक सहयोग को नई दिशा देना चाहता है।

सेमीकॉन मिशन के तहत निवेश बढ़ाने पर जोर

भारत ने सेमीकंडक्टर निर्माण को बढ़ावा देने के लिए सेमीकॉन मिशन के तहत कई कदम उठाए हैं। सेमीकॉन 1.0 के अंतर्गत अब तक 12 विनिर्माण इकाइयों को मंजूरी दी गई है। इन परियोजनाओं में कुल 1.64 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का प्रस्ताव है।

इनमें माइक्रोन, कायन्स और सीजी सेमी जैसी कंपनियां शामिल हैं और इनके जरिए भारत में चिप निर्माण से जुड़े इकोसिस्टम को विकसित करने की कोशिश की जा रही है। कुछ इकाइयों ने व्यावसायिक उत्पादन की दिशा में भी कदम बढ़ाया है।

इसके बाद सरकार ने सेमीकॉन 2.0 की तैयारी की है। इसके लिए लगभग 1.275 लाख करोड़ रुपये का परिव्यय रखा गया है। इसका उद्देश्य केवल कुछ बड़ी फैक्टरियां स्थापित करना नहीं, बल्कि सेमीकंडक्टर से जुड़ी पूरी वैल्यू चेन को भारत में विकसित करना है।

अगर मशीनरी, उपकरण, सामग्री और जरूरी कंपोनेंट्स से जुड़े उद्योग भी देश में बढ़ते हैं, तो इसका फायदा लंबे समय में ज्यादा व्यापक हो सकता है। इससे एक ऐसा औद्योगिक नेटवर्क तैयार हो सकता है, जिसमें उत्पादन के अलग-अलग चरणों के लिए भारत को हर बार विदेशों पर निर्भर न रहना पड़े।

जापानी कर्मचारियों के लिए भारत में बेहतर सुविधाओं का भरोसा

पीयूष गोयल ने जापानी उद्योगपतियों के साथ बातचीत में केवल कारोबारी नियमों और निवेश की बात नहीं की। उन्होंने भारत में काम करने वाले जापानी कर्मचारियों के लिए बेहतर सामाजिक और जीवन सुविधाएं उपलब्ध कराने का भी भरोसा दिलाया।

विशेष रूप से गुजरात के धोलेरा और साणंद जैसे औद्योगिक क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहां जापानी कर्मचारियों के लिए ऐसा वातावरण तैयार करने की कोशिश की जाएगी, जहां उन्हें अपने देश से दूर होने की परेशानी कम महसूस हो। इन इलाकों में स्कूल, आवास और स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास पर जोर देने की बात कही गई।

गोयल ने जापानी कर्मचारियों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए गोल्फ कोर्स जैसी सुविधाओं का भी जिक्र किया। इस घोषणा को जापानी कारोबारी प्रतिनिधियों की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। सरकार का मानना है कि किसी विदेशी कंपनी के लिए निवेश का फैसला केवल टैक्स, जमीन और उत्पादन लागत से तय नहीं होता। कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए जीवन की सुविधाएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

भारत-जापान की साझेदारी अब अफ्रीका तक पहुंचाने की तैयारी

दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को केवल भारत और जापान के बाजार तक सीमित रखने के बजाय अब इसे तीसरे क्षेत्रों तक ले जाने की योजना भी सामने आई है। भारत और जापान अफ्रीकी देशों में संयुक्त निवेश और कारोबार के अवसर तलाश सकते हैं।

दक्षिण अफ्रीका समेत अफ्रीका के दूसरे बाजारों में दोनों देशों की कंपनियां मिलकर काम कर सकती हैं। इससे जापान की तकनीकी और वित्तीय क्षमता तथा भारत की विनिर्माण और कारोबारी क्षमता को एक साथ इस्तेमाल करने का अवसर मिलेगा।

फिक्की अध्यक्ष अनंत गोयनका ने जापानी उद्योग जगत के साथ हुई बातचीत के बाद महत्वपूर्ण खनिजों को संभावित सहयोग का अहम क्षेत्र बताया। आधुनिक उद्योगों के लिए जरूरी कई खनिजों की उपलब्धता कुछ सीमित देशों तक केंद्रित है। इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, रक्षा उपकरण और उन्नत तकनीक के लिए इन खनिजों की अहमियत लगातार बढ़ रही है।

ऐसे में भारत और जापान अगर अफ्रीकी देशों में खनिज संसाधनों से जुड़े प्रोजेक्ट्स में साझेदारी करते हैं, तो दोनों देशों की सप्लाई चेन को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

चीन से जुड़े निवेश पर भी सतर्क नजर

भारत-जापान औद्योगिक सहयोग के बीच चीन से आने वाले निवेश का मुद्दा भी चर्चा में रहा। अनंत गोयनका ने कहा कि दुनिया के कई देशों में चीनी उत्पादों की बड़ी मौजूदगी का अनुभव सामने आया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अलग-अलग देशों में निवेश से जुड़े नियम और सरकारों की ओर से दी जाने वाली सब्सिडी एक जैसी नहीं होती।

इसी वजह से विदेशी निवेश की निगरानी जरूरी मानी जा रही है। उनका कहना था कि व्यापक आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए चीन से आने वाले निवेश के मामले में भारत को उचित सुरक्षा व्यवस्था रखनी चाहिए।

भारत के लिए चुनौती यह है कि वह विदेशी पूंजी और तकनीक को आकर्षित करते हुए अपने घरेलू उद्योगों के हितों का भी संतुलन बनाए रखे। खासकर रणनीतिक क्षेत्रों में निवेश और सप्लाई चेन की सुरक्षा महत्वपूर्ण हैं।

लक्ष्य सिर्फ फैक्टरी नहीं, पूरा औद्योगिक इकोसिस्टम बनाना

सरकार की मौजूदा रणनीति से संकेत मिलता है कि भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में केवल असेंबली या सीमित निर्माण तक नहीं रुकना चाहता। मशीनरी, उपकरण, कच्चा माल, तकनीकी सेवाएं और कुशल मानव संसाधन—इन सभी क्षेत्रों को साथ विकसित करने की कोशिश की जा रही है।

BIS प्रमाणन में प्रस्तावित राहत इसी व्यापक रणनीति का एक हिस्सा है। यदि कंपनियों को जरूरी तकनीकी उपकरणों की मंजूरी तेजी से मिलती है, तो बड़े निवेश की परियोजनाओं में देरी कम हो सकती है। साथ ही विदेशी कंपनियों के बीच यह संदेश भी जाएगा कि भारत हाईटेक मैन्युफैक्चरिंग के लिए अपनी प्रक्रियाओं को अधिक व्यावहारिक बनाने की दिशा में काम कर रहा है।

भारत और जापान के बीच बढ़ता सहयोग आने वाले वर्षों में सेमीकंडक्टर के अलावा महत्वपूर्ण खनिज, इलेक्ट्रॉनिक्स, उन्नत तकनीक और अफ्रीकी बाजारों में संयुक्त कारोबार तक फैल सकता है। सरकार की कोशिश यही है कि जापान की तकनीकी विशेषज्ञता, भारत के बड़े बाजार और दोनों देशों की औद्योगिक जरूरतों को एक साझा आर्थिक साझेदारी में बदला जाए। अगर प्रस्तावित नियामकीय सुधार समय पर लागू होते हैं, तो इससे भारत में हाईटेक विनिर्माण परियोजनाओं की गति बढ़ने और देश को वैश्विक सप्लाई चेन में मजबूत जगह दिलाने में मदद मिल सकती है।