भारत और नेपाल के रिश्ते सिर्फ दो पड़ोसी देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सदियों से लोगों का आना-जाना, व्यापार, धार्मिक यात्राएं और पारिवारिक संबंध कायम रहे हैं। यही वजह है कि भारत और नेपाल की सीमा दुनिया की उन अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में शामिल है, जहां सामान्य परिस्थितियों में दोनों देशों के नागरिकों को एक-दूसरे के यहां जाने के लिए वीजा और पासपोर्ट की जरूरत नहीं पड़ती।
यह व्यवस्था पहली नजर में भले ही असामान्य लगे, लेकिन इसके पीछे इतिहास, भूगोल, सामाजिक रिश्तों और दोनों देशों के बीच हुए समझौतों की लंबी कहानी है। सीमा के आसपास रहने वाले लोगों के लिए एक देश से दूसरे देश जाना कई बार रोजमर्रा की जरूरत जैसा है। कोई रोजगार के लिए सीमा पार करता है तो कोई इलाज, पढ़ाई, कारोबार या रिश्तेदारों से मिलने के लिए।
नेपाल में हाल में आई आपदा के संदर्भ में एक बार फिर भारत-नेपाल सीमा और दोनों देशों के संबंध चर्चा में हैं। ऐसे में समझना जरूरी है कि आखिर भारत और नेपाल के बीच यह खुली आवाजाही शुरू कैसे हुई और आज तक क्यों कायम है।
खुली सीमा का मतलब यह नहीं कि सीमा खत्म हो गई
भारत और नेपाल दो अलग-अलग संप्रभु राष्ट्र हैं। दोनों के पास अपनी सरकार, कानून, नागरिकता व्यवस्था और सुरक्षा तंत्र है। इसलिए भारत-नेपाल की ‘ओपन बॉर्डर’ व्यवस्था का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि दोनों देशों के बीच कोई सीमा या नियम मौजूद नहीं हैं।
इसका सीधा अर्थ यह है कि दोनों देशों के नागरिकों को आम परिस्थितियों में सीमा पार करने के लिए वीजा या पासपोर्ट की अनिवार्यता नहीं होती। लोग रोजगार, कारोबार, शिक्षा, इलाज, धार्मिक यात्रा और पारिवारिक कारणों से आसानी से एक-दूसरे के देश में आ-जा सकते हैं।
सीमावर्ती इलाकों में यह व्यवस्था और भी स्पष्ट दिखाई देती है। कई जगह सड़कें सीधे दूसरे देश के कस्बों और बाजारों तक पहुंचती हैं। दोनों तरफ रहने वाले परिवारों के रिश्ते इतने पुराने हैं कि उनके लिए सीमा पार करना किसी लंबी विदेशी यात्रा जैसा नहीं होता।
हालांकि इसका अर्थ यह भी नहीं है कि हर व्यक्ति को हर गतिविधि की पूरी छूट है। दोनों देशों के घरेलू कानून अलग-अलग हैं। संपत्ति, नागरिकता, रोजगार, व्यापार और अन्य मामलों में स्थानीय नियमों का पालन करना पड़ता है।
इस व्यवस्था के पीछे सिर्फ 1950 की संधि नहीं
भारत और नेपाल के बीच खुली आवाजाही को समझने के लिए केवल आधुनिक राजनीतिक समझौतों को देखना पर्याप्त नहीं है। दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क 1950 से काफी पहले से मौजूद रहा है।
भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और सिक्किम से लगते नेपाली क्षेत्रों के साथ लंबे समय से सामाजिक और आर्थिक संपर्क रहा है। सीमा के दोनों ओर रहने वाले समुदायों के बीच भाषा, खान-पान और परंपराओं में भी कई समानताएं देखने को मिलती हैं।
विवाह संबंधों ने इन रिश्तों को और मजबूत किया है। भारत और नेपाल के समाजों के बीच ‘रोटी-बेटी’ का रिश्ता अक्सर इसी गहरे जुड़ाव को बताने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
ऐसे में 1950 की संधि ने अचानक कोई नई सामाजिक व्यवस्था पैदा नहीं की, बल्कि पहले से चले आ रहे संपर्क को एक औपचारिक राजनीतिक आधार प्रदान किया।
सुगौली संधि ने तय की सीमा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत-नेपाल सीमा के इतिहास में 1816 की सुगौली संधि का विशेष महत्व है। यह समझौता तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद हुआ था। इस संधि के तहत नेपाल की सीमाओं में महत्वपूर्ण बदलाव हुए और कई क्षेत्रों को लेकर नई सीमा व्यवस्था सामने आई। पश्चिमी दिशा में काली नदी का उल्लेख सीमा निर्धारण के संदर्भ में खास महत्व रखता है।
बाद के वर्षों में काली नदी के वास्तविक उद्गम और उसकी धारा को लेकर भारत और नेपाल के बीच मतभेद सामने आए। कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे क्षेत्र इसी व्यापक सीमा विवाद से जुड़े हैं। सुस्ता का मुद्दा भी दोनों देशों के बीच सीमा संबंधी चर्चा का हिस्सा रहा है।
हालांकि यह समझना जरूरी है कि सीमा विवाद और दोनों देशों के बीच नागरिकों की सामान्य आवाजाही दो अलग-अलग विषय हैं।
1950 की भारत-नेपाल मैत्री संधि ने रिश्तों को दिया नया आधार
31 जुलाई 1950 को भारत और नेपाल ने काठमांडू में शांति और मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करना और पारस्परिक सहयोग के लिए आधार तैयार करना था।
संधि में दोनों देशों की संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान की बात कही गई। इसके अलावा आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा संबंधों से जुड़े कई प्रावधान भी इसमें शामिल थे। भारत और नेपाल के बीच लोगों की आवाजाही की मौजूदा व्यवस्था को समझने में इस संधि के अनुच्छेद 6 और 7 को विशेष महत्व दिया जाता है।
अनुच्छेद 6 और 7 में क्या है?
अनुच्छेद 6 में दोनों देशों के नागरिकों को आर्थिक और औद्योगिक विकास के संदर्भ में पारस्परिक आधार पर सुविधाएं देने की बात कही गई है। वहीं अनुच्छेद 7 में दोनों देशों के नागरिकों को दूसरे देश में निवास, संपत्ति से जुड़े अधिकारों, व्यापार, वाणिज्य और आवागमन जैसी सुविधाओं में पारस्परिक व्यवहार देने का प्रावधान है।
यही वजह है कि 1950 की संधि को भारत-नेपाल के बीच लोगों की सहज आवाजाही की व्यवस्था के प्रमुख कानूनी आधारों में गिना जाता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय नागरिक नेपाल में या नेपाली नागरिक भारत में हर अधिकार का स्वतः इस्तेमाल कर सकते हैं। किसी देश में स्थायी नागरिकता हासिल करना, कुछ प्रकार की संपत्ति खरीदना या विशेष क्षेत्रों में रोजगार करना वहां के कानूनों के अधीन होता है।
सीमा खुली रखने से दोनों देशों को क्या फायदा?
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा सीमावर्ती आबादी को मिलता है। भारत और नेपाल के सीमा क्षेत्रों में छोटे कारोबार, मजदूरी, परिवहन और स्थानीय बाजार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। कई नेपाली नागरिक भारत में रोजगार और शिक्षा के अवसर तलाशते हैं। इसी तरह भारतीय नागरिक नेपाल में व्यापार, पर्यटन और धार्मिक यात्राओं के लिए जाते हैं।
इलाज भी इस आवाजाही का एक महत्वपूर्ण कारण है। सीमावर्ती इलाकों में रहने वाला व्यक्ति कई बार अपने घर के पास उपलब्ध बेहतर चिकित्सा सुविधा के लिए दूसरे देश के शहर का रुख कर सकता है। इसी प्रकार विद्यार्थी शिक्षा के लिए सीमा पार जा सकते हैं और कारोबारी स्थानीय बाजारों में सामान खरीदने-बेचने के लिए आवागमन कर सकते हैं।
धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध भी इस व्यवस्था को मजबूत करते हैं। नेपाल के जनकपुर, पशुपतिनाथ, मुक्तिनाथ और लुंबिनी जैसे स्थान भारतीय श्रद्धालुओं के बीच लोकप्रिय हैं। दूसरी तरफ नेपाल से भी बड़ी संख्या में लोग भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों की यात्रा करते हैं।
‘रोटी-बेटी’ का रिश्ता क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
भारत और नेपाल के संबंधों की सबसे खास बात दोनों देशों के समाजों के बीच मौजूद पारिवारिक जुड़ाव है। सीमा के आसपास रहने वाले समुदायों में लंबे समय से वैवाहिक संबंध होते रहे हैं।
एक परिवार का सदस्य भारत में और दूसरा नेपाल में रह सकता है। ऐसे मामलों में त्योहार, शादी, पारिवारिक समारोह और अन्य अवसरों पर सीमा पार आना-जाना स्वाभाविक गतिविधि बन जाता है।
यही कारण है कि भारत-नेपाल सीमा को केवल सुरक्षा और प्रशासन की दृष्टि से देखना अधूरा होगा। यह लाखों लोगों के सामाजिक जीवन और आर्थिक गतिविधियों से सीधे जुड़ी हुई है।
खुली सीमा के साथ सुरक्षा की चुनौतियां भी
जहां खुली सीमा से लोगों को सुविधा मिलती है, वहीं सुरक्षा से जुड़ी कुछ चुनौतियां भी पैदा होती हैं। दोनों देशों को समय-समय पर तस्करी, मानव तस्करी, नकली मुद्रा, अवैध व्यापार और अन्य आपराधिक गतिविधियों से निपटना पड़ता है।
इसलिए खुली सीमा का मतलब बिना किसी निगरानी के सीमा पार करना नहीं है। दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियां और प्रशासन अपने-अपने स्तर पर सीमा प्रबंधन करते हैं।
सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करते हुए आम नागरिकों की वैध आवाजाही पर अनावश्यक असर न पड़े। खासकर सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोगों के लिए सीमा पार आना-जाना उनकी रोजमर्रा की जरूरतों का हिस्सा है।
क्या 1950 की संधि कभी बदली जा सकती है?
नेपाल में समय-समय पर 1950 की शांति और मैत्री संधि की समीक्षा या उसमें बदलाव की मांग उठती रही है। इसके पीछे यह तर्क दिया जाता है कि संधि जिस समय हुई थी, उस समय भारत और नेपाल की परिस्थितियां आज से अलग थीं।
कुछ लोग चाहते हैं कि दोनों देशों के बदलते राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा हितों को देखते हुए संधि के प्रावधानों की समीक्षा की जाए। दूसरी ओर, यह भी माना जाता है कि संधि से आम नागरिकों को मिलने वाली सुविधाओं को किसी भी बदलाव में सुरक्षित रखना जरूरी होगा।
संधि के अनुच्छेद 10 में इसके समाप्त किए जाने से जुड़ा प्रावधान है, जिसके तहत कोई भी पक्ष एक वर्ष का नोटिस देकर संधि को समाप्त कर सकता है। लेकिन व्यवहार में ऐसा कदम दोनों देशों के संबंधों और करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की गतिविधियों पर व्यापक असर डाल सकता है।
आखिर भारत-नेपाल सीमा आज भी खुली क्यों है?
इसका जवाब किसी एक कारण में नहीं मिलता। इसके पीछे सदियों पुराने सामाजिक रिश्ते, भौगोलिक निकटता, आर्थिक जरूरतें, धार्मिक संपर्क और 1950 की शांति एवं मैत्री संधि जैसे कई कारक एक साथ काम करते हैं।
भारत और नेपाल के बीच यह व्यवस्था दोनों देशों के लोगों के लिए रोजमर्रा की सुविधा बन चुकी है। सीमा के दोनों तरफ रहने वाले समुदायों की जिंदगी आपस में इतनी जुड़ी हुई है कि अचानक कठोर सीमा व्यवस्था लागू करना केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं होगा, बल्कि इसका असर रोजगार, कारोबार, परिवार और सामाजिक संबंधों पर भी पड़ेगा।
यही वजह है कि भारत-नेपाल की खुली सीमा दुनिया की अनोखी अंतरराष्ट्रीय सीमा व्यवस्थाओं में गिनी जाती है। यहां सीमा मौजूद है, दोनों देश पूरी तरह स्वतंत्र हैं और उनके कानून भी अलग हैं, लेकिन लोगों के बीच आवाजाही पर वैसी वीजा-पासपोर्ट बाध्यता नहीं है जैसी दुनिया की अधिकांश अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर देखने को मिलती है।
इसी संतुलन, राष्ट्रीय संप्रभुता के साथ लोगों की सहज आवाजाही ने भारत और नेपाल के रिश्तों को एक अलग पहचान दी है।
(Photo : AI Generated)




