SCO समिट में जुटेंगे मोदी, पुतिन और जिनपिंग, 25 साल के सफर पर होगा मंथन; भारत के लिए कई मुद्दे अहम

SCO समिट में जुटेंगे मोदी, पुतिन और जिनपिंग, 25 साल के सफर पर होगा मंथन; भारत के लिए कई मुद्दे अहम

शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) का 26वां शिखर सम्मेलन सोमवार यानी 31 अगस्त से किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शुरू हो रहा है। दो दिनों तक चलने वाले इस सम्मेलन में यूरेशिया के कई प्रमुख देशों के राष्ट्राध्यक्ष एक मंच पर दिखाई देंगे। सम्मेलन का आयोजन ऐसे समय में हो रहा है, जब SCO अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर चुका है। इसलिए इस बार का समिट संगठन के भविष्य की दिशा तय करने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

किर्गिस्तान इस वर्ष SCO की अध्यक्षता कर रहा है और राष्ट्रपति सादिर जापारोव सम्मेलन की अध्यक्षता करेंगे। बैठक में भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान और ईरान सहित संगठन के सभी 10 सदस्य देशों के नेता हिस्सा लेंगे। भारत की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मेलन में शामिल हो रहे हैं।

मोदी इससे पहले उज्बेकिस्तान के दो दिवसीय दौरे पर थे। वहां का दौरा पूरा करने के बाद रविवार शाम वह किर्गिस्तान के लिए रवाना हुए। बिश्केक में होने वाली बैठकों के दौरान भारत की ओर से क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, ऊर्जा, व्यापार और कनेक्टिविटी जैसे विषयों को प्राथमिकता दिए जाने की उम्मीद है।

जिनपिंग और पुतिन से मोदी की अहम मुलाकात

इस सम्मेलन की सबसे ज्यादा चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ संभावित मुलाकात को लेकर है। मोदी की दोनों नेताओं के साथ एक साल के भीतर यह दूसरी मुलाकात होगी।

चीन के साथ भारत के संबंध पिछले कुछ वर्षों में कई महत्वपूर्ण दौर से गुजरे हैं। ऐसे में दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत पर कूटनीतिक नजरें टिकी रहेंगी। सीमा से जुड़े मुद्दों के अलावा दोनों देश क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रमों पर भी चर्चा कर सकते हैं।

दूसरी ओर रूस भारत का लंबे समय से रणनीतिक साझेदार रहा है। ऊर्जा, रक्षा और व्यापार समेत कई क्षेत्रों में दोनों देशों के रिश्ते महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में पुतिन के साथ प्रधानमंत्री मोदी की बातचीत भी भारत की विदेश नीति के लिहाज से अहम होगी।

SCO का मंच दोनों नेताओं के साथ संवाद के लिए एक बहुपक्षीय अवसर भी उपलब्ध कराता है। भारत इस मंच का इस्तेमाल अपने राष्ट्रीय हितों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से रखने के लिए कर सकता है।

आतंकवाद और अफगानिस्तान पर भारत की नजर

भारत के लिए SCO की बैठकों में सुरक्षा से जुड़े मुद्दे हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। आतंकवाद, कट्टरपंथ और अफगानिस्तान की स्थिति को लेकर भारत इस मंच पर अपनी चिंताएं लगातार जाहिर करता रहा है।

अफगानिस्तान की परिस्थितियों का असर पूरे मध्य एशिया पर पड़ता है। वहां अस्थिरता बढ़ने की स्थिति में आतंकवादी संगठनों और कट्टरपंथी नेटवर्क को बढ़ावा मिलने का खतरा रहता है। ऐसे में SCO के सदस्य देशों के बीच सुरक्षा सहयोग बढ़ाना भारत की प्राथमिकताओं में शामिल है।

भारत आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक और प्रभावी कार्रवाई पर जोर देता है। नई दिल्ली का मानना रहा है कि आतंकवाद को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता और इसके पीछे मौजूद नेटवर्क, मददगारों तथा वित्तीय स्रोतों पर कार्रवाई जरूरी है।

पिछले SCO सम्मेलन के दौरान भी आतंकवाद से संबंधित मुद्दे चर्चा के केंद्र में रहे थे। तियानजिन घोषणा-पत्र में 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की गई थी। घोषणा में हमले में जान गंवाने वाले लोगों और घायलों के परिवारों के प्रति संवेदना जताई गई थी। साथ ही हमले के दोषियों, आयोजकों और प्रायोजकों को न्याय के दायरे में लाने की बात कही गई थी।

मध्य एशिया भारत के लिए क्यों खास?

भारत की विदेश नीति में मध्य एशिया का महत्व लगातार बढ़ा है। कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे देश प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध हैं। इस पूरे क्षेत्र में तेल, गैस, यूरेनियम और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के पर्याप्त भंडार हैं।

भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की जरूरतों को देखते हुए ऊर्जा और कच्चे माल की अपनी आपूर्ति को अलग-अलग स्रोतों से मजबूत करना चाहता है। ऐसे में मध्य एशियाई देशों के साथ रिश्ते भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं।

SCO भारत को इस क्षेत्र के देशों के साथ नियमित उच्चस्तरीय संवाद का मंच देता है। इसके जरिए नई दिल्ली आर्थिक, ऊर्जा और सुरक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने की संभावनाएं तलाश सकती है।

ऊर्जा सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा

भारत की आबादी और अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ ऊर्जा की मांग भी बढ़ रही है। तेल और गैस की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों के साथ साझेदारी बढ़ानी पड़ती है।

मध्य एशिया ऊर्जा संसाधनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यदि भारत और इन देशों के बीच बेहतर संपर्क और कारोबारी ढांचा विकसित होता है, तो ऊर्जा सहयोग के नए रास्ते खुल सकते हैं।

SCO सम्मेलन के दौरान ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े विषयों पर व्यापक क्षेत्रीय सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा हो सकती है। भारत के लिए यह अपनी दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति को मजबूत करने का एक अवसर भी है।

व्यापार बढ़ाने के लिए कनेक्टिविटी पर जोर

मध्य एशिया के साथ भारत का व्यापार अभी उस स्तर पर नहीं है, जितना दोनों पक्षों की क्षमता को देखते हुए हो सकता है। इसकी एक बड़ी वजह भौगोलिक दूरी और सीधी कनेक्टिविटी की चुनौती है।

भारत इस क्षेत्र के देशों के साथ व्यापार और परिवहन संपर्क को बेहतर बनाने के लिए नए मार्गों पर जोर देता रहा है। बेहतर कनेक्टिविटी से माल की आवाजाही आसान और तेज हो सकती है। इससे भारतीय कंपनियों के लिए मध्य एशियाई बाजारों में संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

भारत के लिए व्यापारिक मार्ग केवल आर्थिक मुद्दा नहीं हैं, बल्कि इनका रणनीतिक महत्व भी है। ऐसे रास्ते भारत को यूरेशिया के बड़े बाजारों से जोड़ सकते हैं और क्षेत्रीय आर्थिक भागीदारी को मजबूत कर सकते हैं।

SCO में भारत कब शामिल हुआ?

SCO की स्थापना 15 जून 2001 को चीन के शंघाई शहर में हुई थी। उस समय संगठन में छह देश शामिल थे। चीन, रूस, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान इसके शुरुआती सदस्य थे।

बाद में संगठन का विस्तार हुआ और भारत तथा पाकिस्तान को 2017 में पूर्ण सदस्य बनाया गया। इसके बाद 2023 में ईरान SCO का पूर्ण सदस्य बना, जबकि 2024 में बेलारूस के शामिल होने के साथ संगठन में पूर्ण सदस्यों की संख्या 10 हो गई।

आज SCO का दायरा सुरक्षा सहयोग तक सीमित नहीं है। संगठन के एजेंडे में आर्थिक सहयोग, व्यापार, परिवहन संपर्क, सांस्कृतिक संबंध और आतंकवाद विरोधी प्रयास जैसे कई क्षेत्र शामिल हैं।

25 साल में बदला SCO का स्वरूप

स्थापना के बाद से पिछले 25 वर्षों में SCO का प्रभाव काफी बढ़ा है। शुरुआती दौर में संगठन का प्रमुख फोकस क्षेत्रीय सुरक्षा और सदस्य देशों के बीच सहयोग पर था, लेकिन समय के साथ इसका एजेंडा विस्तृत होता गया।

अब ऊर्जा, व्यापार, परिवहन और आर्थिक विकास जैसे विषय भी इसकी बैठकों में प्रमुखता से उठते हैं। सदस्य देशों के विशाल भौगोलिक क्षेत्र और संसाधनों के कारण SCO को यूरेशिया के महत्वपूर्ण बहुपक्षीय संगठनों में गिना जाता है।

इस बार का सम्मेलन इसलिए भी खास है क्योंकि संगठन अपनी स्थापना की रजत जयंती के दौर में पहुंच चुका है। ऐसे में सदस्य देश पिछले 25 वर्षों की उपलब्धियों के साथ-साथ भविष्य की प्राथमिकताओं पर भी विचार कर सकते हैं।

बिश्केक में वर्ल्ड नोमैड गेम्स के उद्घाटन में भी शामिल होंगे मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किर्गिस्तान यात्रा सिर्फ SCO सम्मेलन तक सीमित नहीं रहेगी। वह बिश्केक में आयोजित होने वाले 6वें वर्ल्ड नोमैड गेम्स के उद्घाटन समारोह में भी हिस्सा लेंगे।

यह कार्यक्रम मध्य एशिया की पारंपरिक संस्कृति और खेलों से जुड़ा महत्वपूर्ण आयोजन है। प्रधानमंत्री की इसमें मौजूदगी भारत और किर्गिस्तान के बीच सांस्कृतिक तथा जनसंपर्क संबंधों को मजबूत करने का संदेश भी देती है।

भारत और किर्गिस्तान के संबंधों में सुरक्षा, शिक्षा, संस्कृति और आर्थिक सहयोग जैसे कई क्षेत्र शामिल हैं। प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान दोनों देशों के संबंधों को और विस्तार देने की संभावनाएं भी तलाशी जा सकती हैं।

अब पाकिस्तान की बारी, 2027 में हो सकता है सम्मेलन

किर्गिस्तान की अध्यक्षता खत्म होने के बाद SCO की अगली अध्यक्षता 2026-27 के लिए पाकिस्तान को मिलने की उम्मीद है। वर्ष 2027 का शिखर सम्मेलन पाकिस्तान में प्रस्तावित है।

भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय रिश्ते लंबे समय से चुनौतीपूर्ण रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान की मेजबानी में होने वाला SCO सम्मेलन क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से खास महत्व रखेगा।

हालांकि SCO एक बहुपक्षीय संगठन है और इसके मंच पर सदस्य देशों के बीच सहयोग को प्राथमिकता दी जाती है। भारत के लिए भी यह मंच उन देशों के साथ संवाद बनाए रखने का अवसर है, जिनके साथ उसके रणनीतिक और आर्थिक हित जुड़े हुए हैं।

भारत के लिए इस समिट का बड़ा संदेश

बिश्केक में होने वाला 26वां SCO शिखर सम्मेलन भारत के लिए कई मोर्चों पर महत्वपूर्ण है। एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी को चीन और रूस के शीर्ष नेताओं से बातचीत का अवसर मिलेगा, तो दूसरी ओर मध्य एशिया के देशों के साथ भारत अपने संबंधों को और मजबूत कर सकता है।

ऊर्जा और खनिज संसाधन, व्यापारिक संपर्क, आतंकवाद के खिलाफ सहयोग और अफगानिस्तान की स्थिति जैसे मुद्दे भारत की प्राथमिकताओं में रह सकते हैं। इसके अलावा SCO के अगले 25 वर्षों की दिशा पर होने वाली चर्चा भी भारत के लिए महत्वपूर्ण होगी।

यह सम्मेलन भारत के लिए केवल एक बहुपक्षीय बैठक नहीं है। यह मध्य एशिया में अपनी रणनीतिक मौजूदगी मजबूत करने, आर्थिक अवसर तलाशने और प्रमुख शक्तियों के साथ उच्चस्तरीय संवाद आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण मंच है। मोदी की पुतिन और जिनपिंग से प्रस्तावित मुलाकातें इस सम्मेलन के कूटनीतिक महत्व को और बढ़ा रही हैं।