पेरिस में साकार हुआ 56 साल पुराना सपना, भव्य हिंदू मंदिर में हुई प्राण प्रतिष्ठा

पेरिस में साकार हुआ 56 साल पुराना सपना, भव्य हिंदू मंदिर में हुई प्राण प्रतिष्ठा

फ्रांस की राजधानी पेरिस में भारतीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का एक नया अध्याय शुरू हुआ है। यहां देश के पहले पारंपरिक हिंदू मंदिर में रविवार को विधि-विधान के साथ प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियों की प्रतिष्ठा की गई। इसके साथ ही मंदिर अब श्रद्धालुओं और दर्शनार्थियों के लिए खोल दिया गया है। इस ऐतिहासिक अवसर पर दुनिया के कई हिस्सों से संत, भक्त और गणमान्य अतिथि पेरिस पहुंचे।

इस मंदिर के निर्माण के पीछे करीब पांच दशक से भी अधिक पुराना संकल्प जुड़ा है। BAPS अक्षरधाम संस्था के गुरु योगीजी महाराज ने वर्ष 1970 में पेरिस में एक भव्य हिंदू मंदिर स्थापित करने की इच्छा व्यक्त की थी। लंबे समय तक चले प्रयासों के बाद अब उनका वह संकल्प साकार रूप ले चुका है। मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के साथ भारतीय आध्यात्मिक विरासत ने फ्रांस की धरती पर एक स्थायी स्वरूप हासिल किया है।

महंतस्वामी महाराज ने पूरी कराई प्रतिष्ठा की विधि

प्राण प्रतिष्ठा समारोह की शुरुआत सुबह धार्मिक अनुष्ठानों और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुई। BAPS के वर्तमान गुरु परम पूज्य महंतस्वामी महाराज के करकमलों से प्रतिष्ठा की मुख्य विधि संपन्न कराई गई। वरिष्ठ संतों ने महापूजा के माध्यम से धार्मिक कार्यक्रमों का शुभारंभ किया।

मंदिर में केवल एक देवी या देवता की मूर्ति नहीं, बल्कि विभिन्न हिंदू परंपराओं से जुड़े आराध्य स्वरूपों की विधिवत स्थापना की गई। इनमें श्री अक्षरपुरुषोत्तम महाराज और श्री घनश्याम महाराज के साथ श्री राधा-कृष्ण भगवान, श्री सीता-राम भगवान, श्री लक्ष्मण जी और श्री हनुमान जी की मूर्तियां शामिल हैं।

इसके अलावा श्री पार्वती-शंकर भगवान के साथ श्री कार्तिकेय जी और श्री गणेश जी, श्री पद्मावती वेंकटेश्वर भगवान, श्री अय्यप्पा स्वामी तथा श्री नीलकंठवर्णी महाराज के स्वरूप की भी प्रतिष्ठा की गई। गुरु परंपरा से जुड़ी मूर्तियों को भी मंदिर में स्थापित किया गया।

प्राण प्रतिष्ठा के बाद महंतस्वामी महाराज ने मंदिर में पहली प्रार्थना की। इस दौरान दुनिया में शांति, सभी धर्मों के बीच आपसी प्रेम और सद्भाव तथा समस्त मानव समाज के कल्याण की कामना की गई। समारोह में आध्यात्मिकता के साथ वैश्विक एकता और भाईचारे का संदेश भी प्रमुखता से सामने आया।

40 से अधिक देशों से पहुंचे संत और श्रद्धालु

मंदिर का उद्घाटन समारोह केवल पेरिस तक सीमित नहीं रहा। 13 दिनों तक चलने वाले मंदिर महोत्सव में शामिल होने के लिए भारत सहित अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और इंग्लैंड समेत 40 से अधिक देशों से लोग पहुंचे। बड़ी संख्या में संतों और श्रद्धालुओं की मौजूदगी ने पूरे आयोजन को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।

मंदिर परिसर में आयोजित विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भारतीय परंपराओं की विविधता देखने को मिली। विदेशी धरती पर भारतीय संस्कृति की ऐसी व्यापक प्रस्तुति ने आयोजन को खास बना दिया।

एफिल टावर के सामने निकली भव्य नगर यात्रा

प्राण प्रतिष्ठा से पहले पेरिस में एक विशेष नगर यात्रा भी आयोजित की गई। इस यात्रा में भारतीय संस्कृति, संगीत, नृत्य और आध्यात्मिक परंपराओं का शानदार प्रदर्शन किया गया। पारंपरिक परिधानों में सजे कलाकारों ने अलग-अलग सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के जरिए भारतीय विरासत की झलक दिखाई।

नगर यात्रा में 14 आकर्षक और सुसज्जित रथ शामिल किए गए। इन रथों पर हिंदू देवी-देवताओं के स्वरूपों को विशेष रूप से सजाया गया था। यात्रा के दौरान भक्तिमय संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक रंग में रंग दिया।

यह यात्रा पेरिस के प्रमुख स्थलों से होकर गुजरी। विश्व प्रसिद्ध एफिल टावर और एकोल मिलिटेर के मार्ग से होते हुए नगर यात्रा प्लास द ला कॉनकॉर्ड पहुंची, जहां इसका समापन हुआ। इस आयोजन के जरिए भारतीय परंपराओं और फ्रांसीसी राजधानी के सांस्कृतिक परिवेश के बीच एक अनोखा मेल दिखाई दिया।

1970 में देखा गया सपना, 2026 में हुआ पूरा

पेरिस में मंदिर बनाने का विचार आज से लगभग 56 वर्ष पहले सामने आया था। वर्ष 1970 में गुरु योगीजी महाराज ने फ्रांस की राजधानी में एक भव्य हिंदू मंदिर स्थापित करने का संकल्प लिया था। उस समय यह एक दूर की कल्पना जैसा था, लेकिन आने वाले दशकों में BAPS से जुड़े संतों और भक्तों ने इसे साकार करने के लिए लगातार प्रयास किए।

योगीजी महाराज के बाद प्रमुख स्वामी महाराज ने भी इस संकल्प को आगे बढ़ाया। अपनी विदेश यात्राओं के दौरान उन्होंने फ्रांस में कई बार आध्यात्मिक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया और यहां सत्संग की नींव को मजबूत करने में योगदान दिया। समय के साथ फ्रांस में भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ा समुदाय विकसित होता गया।

मंदिर निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण औपचारिक कदम वर्ष 2021 में उठाया गया, जब वरिष्ठ संतों की उपस्थिति में भूमि पूजन किया गया। इसके अगले वर्ष यानी 2022 में शिलान्यास की विधि पूरी हुई। इसके बाद निर्माण कार्य ने गति पकड़ी और वर्ष 2026 में मंदिर का निर्माण पूरा हो गया।

इस तरह करीब साढ़े पांच दशक पहले लिया गया संकल्प अब एक भव्य मंदिर के रूप में सामने है।

भारतीय शिल्प और आधुनिक फ्रांसीसी तकनीक का संगम

मंदिर की वास्तुकला इसकी सबसे खास विशेषताओं में से एक है। इसके निर्माण में प्राचीन भारतीय वास्तुकला और वैदिक शिल्पशास्त्र की परंपराओं को आधार बनाया गया है। साथ ही आधुनिक फ्रांसीसी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए पारंपरिक डिजाइन को वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अनुरूप आकार दिया गया है।

करीब 5000 वर्गमीटर क्षेत्र में बने इस परिसर को दो प्रमुख हिस्सों में विकसित किया गया है। ऊपरी हिस्से में पारंपरिक हिंदू मंदिर है, जबकि नीचे के भाग में सांस्कृतिक केंद्र के रूप में एक खूबसूरत हवेली का निर्माण किया गया है।

निर्माण में इस्तेमाल सामग्री भी इस परियोजना की अंतरराष्ट्रीय प्रकृति को दर्शाती है। मंदिर के लिए भारत के साथ इटली, ग्रीस और वियतनाम से संगमरमर मंगाया गया। इसके अलावा ग्वालियर के बलुआ पत्थर का भी इस्तेमाल किया गया है। अलग-अलग देशों से आई सामग्री को भारतीय शिल्प परंपरा के अनुरूप तराशकर मंदिर की संरचना में शामिल किया गया।

पांच शिखर और दस गुंबद बढ़ाते हैं भव्यता

मंदिर की संरचना में पांच शिखर और 10 विशाल गुंबद बनाए गए हैं। इसके अलावा 20 नक्काशीदार स्तंभ, 120 गवाक्ष, 49 चरित्र शिल्प प्रतिमाएं और चार आकर्षक छतरियां इसकी स्थापत्य सुंदरता को और बढ़ाती हैं।

हर हिस्से में भारतीय कला और धार्मिक प्रतीकों को जगह दी गई है। पत्थरों पर की गई नक्काशी मंदिर को पारंपरिक भारतीय मंदिरों जैसा स्वरूप देती है, जबकि इसकी इंजीनियरिंग आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को दर्शाती है।

मंदिर परिसर को केवल पूजा स्थल के रूप में विकसित नहीं किया गया है। यहां सभागृह, कक्षाएं, खेलकक्ष, प्रदर्शनी स्थल और कार्यालय जैसी सुविधाएं भी बनाई गई हैं। इसका उद्देश्य धार्मिक गतिविधियों के साथ सांस्कृतिक और सामुदायिक कार्यक्रमों के लिए भी एक व्यापक स्थान उपलब्ध कराना है।

भारतीय संस्कृति का बनेगा अंतरराष्ट्रीय केंद्र

पेरिस में स्थापित यह मंदिर भारतीय समुदाय के लिए धार्मिक आस्था का केंद्र बनने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति को दुनिया तक पहुंचाने के माध्यम के रूप में भी देखा जा रहा है। यहां आने वाले लोगों को भारतीय दर्शन, वास्तुकला, परंपराओं और आध्यात्मिक मूल्यों को करीब से समझने का अवसर मिलेगा।

मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के मौके पर जिस तरह विभिन्न देशों से श्रद्धालु और संत पहुंचे, उससे इसके अंतरराष्ट्रीय महत्व का भी अंदाजा लगाया जा सकता है। आयोजन में भारतीय परंपराओं के साथ शांति, प्रेम, सद्भाव और मानव कल्याण का संदेश प्रमुख रहा।

फ्रांस में यह मंदिर भारतीय संस्कृति और हिंदू आध्यात्मिक परंपरा का एक स्थायी प्रतीक बनकर उभर रहा है। इसकी वास्तुकला में जहां भारत की प्राचीन विरासत दिखाई देती है, वहीं निर्माण तकनीक में आधुनिक यूरोप की झलक मिलती है। यही संयोजन इसे खास बनाता है।

कई दशक पहले लिए गए एक संकल्प से शुरू हुई यह यात्रा अब पेरिस में भव्य मंदिर के रूप में पूरी हो गई है। प्राण प्रतिष्ठा के बाद खुले इस मंदिर से आने वाले समय में धार्मिक आयोजनों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। यह स्थान भारतीय परंपरा, विविधता, आपसी सम्मान और विश्व कल्याण की भावना को आगे बढ़ाने वाले केंद्र के रूप में अपनी पहचान बना सकता है।