यह परियोजना भारत के मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। BAS के जरिए भारत माइक्रोग्रैविटी, अंतरिक्ष चिकित्सा, जैव-विज्ञान और भविष्य की अंतरिक्ष तकनीकों से जुड़े प्रयोगों के लिए अपना एक अलग प्लेटफॉर्म तैयार करेगा। इतना ही नहीं, भविष्य में चंद्रमा तक मानव मिशन भेजने की भारत की महत्वाकांक्षी योजना में भी इस स्टेशन की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
पहले जानिए क्या है BAS
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन को आसान भाषा में समझें तो यह अंतरिक्ष में भारत की अपनी प्रयोगशाला होगी। यह पृथ्वी की सतह पर किसी स्पेस सेंटर की तरह स्थिर नहीं रहेगा, बल्कि पृथ्वी की निचली कक्षा यानी Low Earth Orbit (LEO) में चक्कर लगाता रहेगा। इस स्टेशन का इस्तेमाल सिर्फ अंतरिक्ष यात्रियों को कुछ समय के लिए ठहराने के लिए नहीं किया जाएगा। यहां वैज्ञानिक लंबे समय तक शोध कर सकेंगे और ऐसे प्रयोग किए जा सकेंगे जिन्हें पृथ्वी पर मौजूद गुरुत्वाकर्षण के कारण उसी तरह करना मुश्किल होता है।
माइक्रोग्रैविटी में पदार्थों, जीवित कोशिकाओं, पौधों और मानव शरीर का व्यवहार पृथ्वी से अलग हो सकता है। इसी वजह से BAS पर होने वाले प्रयोग चिकित्सा विज्ञान से लेकर नई तकनीक विकसित करने तक कई क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकते हैं।
भारत के लिए इसका एक और बड़ा महत्व है। देश वर्ष 2040 तक भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा की सतह पर भेजने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। ऐसे लंबे और जटिल मानव मिशनों के लिए अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने, काम करने और जीवन-समर्थन प्रणाली को संचालित करने का अनुभव जरूरी होगा। BAS इस दिशा में भारत को महत्वपूर्ण तकनीकी और व्यावहारिक अनुभव दे सकता है।
पांच हिस्सों में तैयार होगा पूरा स्टेशन
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन को एक ही बार में अंतरिक्ष में पहुंचाने की योजना नहीं है। ISRO ने इसके लिए मॉड्यूलर डिजाइन अपनाया है। यानी स्टेशन को कई अलग-अलग हिस्सों में तैयार किया जाएगा और उन्हें अलग-अलग लॉन्च के जरिए अंतरिक्ष तक पहुंचाया जाएगा। अब तक उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार BAS की कुल संरचना पांच मॉड्यूल पर आधारित होगी। इनमें पहला मॉड्यूल BAS-01 होगा। इसे वर्ष 2028 तक लॉन्च करने का लक्ष्य रखा गया है।
इसके बाद बाकी मॉड्यूल्स को चरणबद्ध तरीके से कक्षा में भेजने और वहां आपस में जोड़ने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। सरकार ने संसद में भी इस योजना से संबंधित जानकारी साझा की है। दिसंबर 2025 में अंतरिक्ष विभाग ने बताया था कि ISRO ने पांच मॉड्यूल वाले भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की समग्र कॉन्फिगरेशन तैयार कर ली है और राष्ट्रीय स्तर की समीक्षा समिति द्वारा इसकी समीक्षा भी की जा चुकी है।
हालांकि, स्टेशन के प्रत्येक मॉड्यूल के नाम, अंदरूनी संरचना और उनकी अंतिम जिम्मेदारियों से जुड़ी पूरी तकनीकी जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की गई है।
अंतरिक्ष में ही जुड़ेंगे स्टेशन के हिस्से
अब सवाल उठता है कि अगर BAS के पांच हिस्से अलग-अलग रॉकेट से अंतरिक्ष में जाएंगे, तो वे एक-दूसरे से जुड़ेंगे कैसे?
इसके लिए सबसे अहम तकनीक होगी स्पेस डॉकिंग। इसका मतलब है कि अंतरिक्ष में मौजूद दो अलग-अलग यानों या मॉड्यूल्स को बेहद सटीक तरीके से एक-दूसरे के पास लाकर जोड़ा जाए।
इसे एक आसान उदाहरण से समझ सकते हैं। जैसे किसी बड़े फर्नीचर को एक ही टुकड़े में घर तक पहुंचाना मुश्किल होता है, इसलिए उसके अलग-अलग हिस्से भेजे जाते हैं और फिर उन्हें जोड़कर पूरा ढांचा तैयार किया जाता है। BAS के मामले में भी कुछ ऐसा ही मॉडल अपनाया जाएगा।
मॉड्यूल्स को पहले पृथ्वी पर तैयार किया जाएगा। इसके बाद उन्हें अलग-अलग मिशनों के जरिए ऑर्बिट में भेजा जाएगा। वहां डॉकिंग तकनीक की मदद से इन हिस्सों को जोड़ा जाएगा और धीरे-धीरे एक बड़ा अंतरिक्ष स्टेशन तैयार होगा।
भारत के लिए यह तकनीक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भविष्य के मानव अंतरिक्ष अभियानों में अलग-अलग अंतरिक्ष यानों को कक्षा में जोड़ने और उनके बीच सुरक्षित आवागमन की क्षमता बेहद जरूरी होगी।
गगनयान से आगे बढ़ेगा भारत का मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम
भारत का मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम फिलहाल गगनयान मिशन के जरिए एक महत्वपूर्ण चरण में पहुंच चुका है। गगनयान का मूल उद्देश्य भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने और सुरक्षित वापस पृथ्वी पर लाने की क्षमता विकसित करना है। लेकिन अंतरिक्ष यात्री को कुछ समय के लिए अंतरिक्ष में भेजना और किसी ऑर्बिटल स्टेशन पर लंबे समय तक इंसानों के रहने की व्यवस्था करना दो अलग-अलग स्तर की चुनौतियां हैं।
यहीं BAS की भूमिका सामने आती है। गगनयान जहां मानव को अंतरिक्ष तक पहुंचाने और वापस लाने की क्षमता विकसित करने पर केंद्रित है, वहीं BAS लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने, वहां वैज्ञानिक प्रयोग करने और जटिल जीवन-समर्थन प्रणालियों को संचालित करने का आधार तैयार करेगा। इस तरह दोनों परियोजनाएं भारत के व्यापक मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के अलग-अलग लेकिन आपस में जुड़े चरण मानी जा सकती हैं।
इंसान लंबे समय तक कैसे रहेंगे?
अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की सबसे बड़ी चुनौती केवल उसका ढांचा तैयार करना नहीं होती। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि इंसान वहां सुरक्षित तरीके से लंबे समय तक रह सकें। BAS में इसी उद्देश्य से एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट सिस्टम जैसी तकनीकों को शामिल किया जाना है। ऐसी प्रणालियां अंतरिक्ष यात्रियों के लिए आवश्यक वातावरण बनाए रखने में मदद करती हैं।
अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने के दौरान इंसानी शरीर में कई तरह के बदलाव देखे जा सकते हैं। माइक्रोग्रैविटी का असर मांसपेशियों, हड्डियों, शरीर में तरल पदार्थों के वितरण और दूसरे जैविक तंत्रों पर पड़ सकता है। इसलिए अंतरिक्ष स्टेशन पर मानव शरीर से संबंधित अध्ययन भविष्य के लंबे अंतरिक्ष अभियानों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होंगे।
इन शोधों से यह समझने में मदद मिल सकती है कि इंसान लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने के दौरान किन चुनौतियों का सामना करता है और उनसे निपटने के लिए किस तरह की तकनीक या चिकित्सा व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
पौधों और जीवन विज्ञान पर भी होगा रिसर्च
BAS का संभावित उपयोग केवल मानव शरीर से जुड़े प्रयोगों तक सीमित नहीं होगा। माइक्रोग्रैविटी में पौधों, बीजों, कोशिकाओं और दूसरी जैविक प्रक्रियाओं का अध्ययन भी किया जा सकता है। अंतरिक्ष में पौधों को उगाने से जुड़े प्रयोग भविष्य के लंबे मानव मिशनों के लिए खास महत्व रखते हैं। यदि भविष्य में इंसानों को लंबे समय तक चंद्रमा या किसी अन्य अंतरिक्ष गंतव्य पर रहना है, तो वहां भोजन और ऑक्सीजन से संबंधित आत्मनिर्भर प्रणालियां विकसित करना महत्वपूर्ण होगा।
ISRO पहले से ही अंतरिक्ष में बीजों से जुड़े प्रयोग कर चुका है। ऐसे प्रयोगों से यह समझने में मदद मिलती है कि अंतरिक्ष वातावरण पौधों के विकास और उनके जीवन चक्र को किस तरह प्रभावित करता है।
पृथ्वी पर संभव नहीं, ऐसे प्रयोगों का मौका
अंतरिक्ष स्टेशन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि वहां वैज्ञानिकों को ऐसी परिस्थितियां मिलती हैं जो पृथ्वी पर लंबे समय तक और उसी तरीके से उपलब्ध नहीं होतीं। माइक्रोग्रैविटी में पदार्थों और जैविक प्रणालियों का व्यवहार बदल सकता है। इसका इस्तेमाल नई दवाओं, चिकित्सा तकनीकों, सामग्री विज्ञान और उन्नत विनिर्माण से जुड़े प्रयोगों में किया जा सकता है।
BAS भविष्य में भारत के वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष आधारित प्रयोगों के लिए अपना प्लेटफॉर्म देगा। इससे भारत को विदेशी अंतरिक्ष स्टेशनों पर उपलब्ध सीमित अवसरों पर निर्भर रहने की जरूरत भी कम हो सकती है।
2028 से शुरू होगा सफर, 2035 तक पूरा करने का लक्ष्य
सरकार के रोडमैप के मुताबिक BAS का पहला मॉड्यूल BAS-01 वर्ष 2028 तक लॉन्च करने का लक्ष्य है। इसके बाद अलग-अलग मॉड्यूल्स को चरणबद्ध तरीके से अंतरिक्ष में भेजा जाएगा।
वर्ष 2035 तक स्टेशन को पूरा करने की योजना है। इसका अर्थ यह है कि आने वाले वर्षों में भारत को लॉन्च व्हीकल, डॉकिंग सिस्टम, लाइफ सपोर्ट, स्पेस हैबिटेशन और मानव अंतरिक्ष उड़ान से जुड़ी कई तकनीकों को एक साथ विकसित करना होगा। ISRO की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट में भी भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन से जुड़े इस रोडमैप का उल्लेख किया गया है।
ISRO का निजीकरण नहीं, बल्कि बड़ा स्पेस इकोसिस्टम
BAS की योजना ऐसे समय में सामने आ रही है जब भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका भी लगातार बढ़ रही है। इसी वजह से कुछ रिपोर्टों के बाद ISRO के निजीकरण को लेकर भ्रम पैदा हुआ था।
हालांकि, ISRO ने स्पष्ट किया है कि उसका निजीकरण नहीं किया जा रहा है। सरकार का फोकस ISRO-led National Space Ecosystem विकसित करने पर है। इसका मतलब यह है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों और दूसरे संस्थानों की भागीदारी बढ़ेगी, जबकि ISRO देश के प्रमुख अंतरिक्ष अभियानों और तकनीकी नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहेगा।
भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन इसी व्यापक अंतरिक्ष कार्यक्रम का एक बड़ा हिस्सा है।
चंद्रमा तक पहुंचने की तैयारी में बनेगा अहम आधार
भारत के लिए BAS केवल एक अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की परियोजना नहीं है। इसे देश के भविष्य के मानव अंतरिक्ष अभियानों की तैयारी के रूप में भी देखा जा रहा है।
2040 तक भारतीय अंतरिक्ष यात्री को चंद्रमा पर उतारने का लक्ष्य बेहद जटिल तकनीकी क्षमताओं की मांग करेगा। लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहना, अंतरिक्ष यान की डॉकिंग, जीवन-समर्थन व्यवस्था, अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य की निगरानी और माइक्रोग्रैविटी में काम करना—ये सभी अनुभव BAS जैसे स्टेशन से हासिल किए जा सकते हैं।
यानी आने वाले वर्षों में भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम रॉकेट और सैटेलाइट से आगे बढ़कर मानव को लंबे समय तक अंतरिक्ष में रखने की दिशा में प्रवेश करेगा। 2028 में BAS-01 के संभावित लॉन्च से शुरू होने वाली यह यात्रा 2035 तक भारत को अपने अंतरिक्ष स्टेशन के साथ खड़ा करने का लक्ष्य रखती है। अगर यह योजना तय समय के अनुसार आगे बढ़ती है, तो भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन देश की वैज्ञानिक क्षमता, मानव अंतरिक्ष उड़ान और चंद्र मिशनों के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।




