दुनिया को हम जिस नक्शे पर देखते आए हैं, वह धरती के वास्तविक आकार की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता. स्कूलों की किताबों, ग्लोब के साथ इस्तेमाल होने वाले चार्ट, दफ्तरों और कई डिजिटल मैप्स में लंबे समय से जिस विश्व मानचित्र का इस्तेमाल होता रहा है, उसमें कुछ देशों और महाद्वीपों का आकार वास्तविकता से काफी अलग नजर आता है। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी एक नई मैप पहल ने एक बार फिर दुनिया के नक्शे को लेकर बहस छेड़ दी है।
इस चर्चा का केंद्र है इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन, जिसे धरती के अलग-अलग हिस्सों के वास्तविक क्षेत्रफल को अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से दिखाने वाला प्रक्षेपण माना जाता है। इसके समर्थकों का कहना है कि दुनिया को देखने के लिए इस्तेमाल होने वाले नक्शे में केवल दिशा और स्थान ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि जमीन का वास्तविक अनुपात भी लोगों के सामने सही तरीके से आना चाहिए।
रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में ‘करेक्ट द मैप’ के नाम से सामने आए प्रस्ताव को 164 देशों का समर्थन मिला। इनमें भारत, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देश भी शामिल बताए गए हैं। वहीं अमेरिका ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया, जबकि छह देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। हालांकि इस पूरे मुद्दे को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि आखिर वह पुराना नक्शा आया कहां से, जिसका इस्तेमाल दुनिया दशकों से करती आ रही है।
धरती गोल है, लेकिन नक्शा सपाट क्यों?
विश्व मानचित्र को लेकर सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हमारी धरती तीन आयामों वाली है, जबकि कागज या स्क्रीन पर नक्शा दो आयामों में दिखाना पड़ता है। जब गोलाकार पृथ्वी को सपाट सतह पर उतारा जाता है तो किसी न किसी चीज में बदलाव या विकृति आना स्वाभाविक है।
यही कारण है कि दुनिया का कोई भी सपाट नक्शा पृथ्वी की हर चीज को एक साथ पूरी तरह सही नहीं दिखा सकता। किसी प्रोजेक्शन में दिशा ज्यादा सटीक हो सकती है, तो किसी दूसरे में क्षेत्रफल को बेहतर ढंग से दिखाया जा सकता है। कुछ नक्शे दूरी को प्राथमिकता देते हैं, जबकि कुछ आकार और क्षेत्रफल को।
मर्केटर प्रोजेक्शन भी इसी समस्या का एक समाधान था, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया के देशों का वास्तविक क्षेत्रफल दिखाना नहीं था। इसे खास तौर पर समुद्री यात्राओं और नेविगेशन को आसान बनाने के लिए तैयार किया गया था।
मर्केटर प्रोजेक्शन ने दुनिया को कैसे दिखाया?
आज जिस पारंपरिक विश्व मानचित्र की सबसे ज्यादा चर्चा होती है, उसे जेरार्डस मर्केटर ने 1569 में विकसित किया था. वह फ्लेमिश मानचित्रकार और भूगोलवेत्ता थे और यूरोपीय मानचित्रकला के इतिहास में उनका महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।
मर्केटर द्वारा बनाया प्रोजेक्शन उस दौर की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था। 16वीं सदी में समुद्री यात्राएं बढ़ रही थीं और यूरोपीय नाविक लंबी दूरी के सफर पर निकल रहे थे। ऐसे समय में ऐसा नक्शा जरूरी था, जिससे समुद्र में दिशा बनाए रखना आसान हो।
मर्केटर प्रोजेक्शन की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि इसने दिशा और कोणों को इस तरह संरक्षित किया कि नाविकों के लिए समुद्री रास्तों की योजना बनाना ज्यादा व्यावहारिक हो गया। नक्शे पर एक खास तरह की सीधी रेखा का इस्तेमाल करके दिशा बनाए रखना आसान था।
यानी मर्केटर का मकसद यह साबित करना नहीं था कि दुनिया के सभी देशों का क्षेत्रफल एक-दूसरे के मुकाबले बिल्कुल सही अनुपात में दिखाई दे। इसका प्राथमिक लक्ष्य नेविगेशन था। इसी वजह से इस प्रोजेक्शन में ऊंचे अक्षांशों पर स्थित क्षेत्रों का आकार बढ़ता चला जाता है।
फिर अफ्रीका छोटा क्यों नज़र आता है?
मर्केटर प्रोजेक्शन को लेकर आज सबसे ज्यादा उदाहरण अफ्रीका और ग्रीनलैंड का दिया जाता है। वास्तविक क्षेत्रफल की बात करें तो अफ्रीका ग्रीनलैंड से लगभग 14 गुना बड़ा है। लेकिन मार्केटर प्रोजेक्शन वाले नक्शे को देखकर अक्सर दोनों के आकार बहुत ज्यादा करीब नज़र आ सकते हैं।
इसका कारण यह नहीं है कि अफ्रीका का वास्तविक आकार कम है. समस्या नक्शे के प्रोजेक्शन की है।
जैसे-जैसे कोई क्षेत्र भूमध्य रेखा से दूर ध्रुवों की तरफ जाता है, मर्केटर प्रोजेक्शन में उसकी दृश्य चौड़ाई और ऊंचाई बढ़ती जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों में मौजूद भूभाग वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना में काफी बड़ा दिखाई देने लगता है।
ग्रीनलैंड उत्तरी ध्रुव के करीब है, जबकि अफ्रीका का बड़ा हिस्सा भूमध्य रेखा के आसपास और उसके करीब स्थित है। इसलिए दोनों को एक ही सपाट नक्शे पर देखने पर उनके आकार को लेकर गलत धारणा बन सकती है।
इसी तरह यूरोप, कनाडा और रूस जैसे ऊंचे अक्षांश वाले क्षेत्र भी नक्शे पर अपने वास्तविक क्षेत्रफल से बड़े नजर आ सकते हैं। दूसरी तरफ भूमध्य रेखा के आसपास स्थित अफ्रीकी और दक्षिण अमेरिकी क्षेत्रों का आकार तुलनात्मक रूप से कम दिखाई देता है।
नया प्रोजेक्शन क्या बदलना चाहता है?
‘करेक्ट द मैप’ पहल से जुड़ी बहस का एक बड़ा हिस्सा इसी असमान दृश्य प्रस्तुति पर केंद्रित है। समर्थक चाहते हैं कि विश्व मानचित्र में देशों और महाद्वीपों का क्षेत्रफल एक-दूसरे के मुकाबले ज्यादा वास्तविक अनुपात में नजर आए।
इक्वल अर्थ यानी समान क्षेत्रफल वाले प्रोजेक्शन का उद्देश्य यह है कि नक्शे पर किसी इलाके को जितनी जमीन घेरनी चाहिए, वह उसके वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब हो। इसका मतलब यह नहीं कि हर देश का आकार हर दिशा से बिल्कुल वैसा ही दिखाई देगा जैसा ग्लोब पर दिखाई देता है। बल्कि प्राथमिकता क्षेत्रफल के अनुपात को दी जाती है।
इस तरह के नक्शे को देखने पर अफ्रीका का विशाल आकार ज्यादा स्पष्ट दिखाई देता है। इसके साथ ही ग्रीनलैंड और दूसरे उत्तरी क्षेत्रों का वह बढ़ा हुआ आकार कम हो जाता है, जो मर्केटर प्रोजेक्शन में दिखाई देता है।
क्या यह सिर्फ नक्शे की तकनीकी बहस है?
इस प्रस्ताव के समर्थक इसे केवल कार्टोग्राफी यानी मानचित्र बनाने की तकनीक का मामला नहीं मानते। उनके अनुसार नक्शे लोगों की सोच को भी प्रभावित करते हैं।
बचपन से ही जब विद्यार्थी किसी विश्व मानचित्र को देखते हैं तो वही तस्वीर उनके दिमाग में दुनिया की भौगोलिक संरचना के रूप में बैठ जाती है। अगर किसी क्षेत्र को लगातार वास्तविकता से बड़ा या छोटा दिखाया जाए तो उसके आकार को लेकर हमारी धारणा भी उसी के अनुसार विकसित हो सकती है।
यही वजह है कि अफ्रीकी देशों और अफ्रीकी संघ की तरफ से इस विषय को विशेष महत्व दिया जा रहा है। तर्क यह है कि लंबे समय तक इस्तेमाल किए गए पारंपरिक नक्शे ने अफ्रीका के वास्तविक भौगोलिक विस्तार को लोगों के सामने कम प्रभावशाली तरीके से पेश किया।
अफ्रीका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है और इसका क्षेत्रफल बहुत विशाल है। लेकिन मार्केटर प्रोजेक्शन पर नजर डालने से पहली नजर में इसकी विशालता का सही अंदाजा नहीं लगता। नए प्रक्षेपण के समर्थक मानते हैं कि क्षेत्रफल-आधारित नक्शे से यह अंतर ज्यादा स्पष्ट हो सकता है।
क्या मार्केटर प्रोजेक्शन गलत था?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। मर्केटर प्रोजेक्शन को सिर्फ इसलिए गलत कहना उचित नहीं होगा क्योंकि उसमें क्षेत्रफल की विकृति होती है।
जिस उद्देश्य के लिए इसे बनाया गया था, उसके लिहाज से यह बेहद उपयोगी प्रोजेक्शन था। समुद्री नेविगेशन में दिशा और कोणों को बनाए रखना उस समय बेहद महत्वपूर्ण आवश्यकता थी। इसलिए मर्केटर प्रोजेक्शन ने सदियों तक नाविकों और मानचित्रकारों की मदद की।
समस्या तब शुरू होती है जब किसी खास उद्देश्य के लिए बनाए गए प्रोजेक्शन को दुनिया की वास्तविक भूमि के आकार की तुलना करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। क्षेत्रफल की तुलना के लिए ऐसे प्रोजेक्शन बेहतर माने जाते हैं जो जमीन के अनुपात को ज्यादा सही रखते हैं।
यानी बहस ‘पुराना नक्शा सही था या गलत’ से ज्यादा इस सवाल पर है कि किस काम के लिए कौन सा नक्शा इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
मर्केटर से आगे क्यों बढ़ना चाहती है दुनिया?
आज डिजिटल तकनीक के दौर में दुनिया को देखने के लिए हमारे पास कई तरह के मैप प्रोजेक्शन उपलब्ध हैं। नेविगेशन, मौसम, जनसंख्या, पर्यावरण, कृषि और भौगोलिक अध्ययन जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में जरूरत के हिसाब से अलग-अलग प्रोजेक्शन इस्तेमाल किए जाते हैं।
इसी संदर्भ में ‘करेक्ट द मैप’ की बहस यह सवाल उठा रही है कि आम लोगों और खासकर छात्रों को दुनिया दिखाने के लिए किस तरह के नक्शे को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
अगर उद्देश्य देशों और महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना करना है, तो इक्वल एरिया प्रोजेक्शन ज्यादा उपयोगी हो सकता है। वहीं समुद्री दिशा और नेविगेशन जैसे कार्यों में मर्केटर प्रोजेक्शन की अपनी उपयोगिता बनी रहती है।
इसलिए यह बदलाव किसी पुराने नक्शे को पूरी तरह खत्म करने से ज्यादा दुनिया को देखने के नजरिए में बदलाव की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
करीब 500 साल पुरानी विरासत पर नई बहस
जेरार्डस मर्केटर का प्रोजेक्शन उस समय की एक बड़ी तकनीकी जरूरत का जवाब था। 1569 में तैयार किया गया यह नक्शा समुद्री यात्राओं के युग में बेहद प्रभावशाली साबित हुआ। बाद के वर्षों में इसका इस्तेमाल इतना व्यापक हुआ कि यह दुनिया को देखने वाले सबसे पहचाने जाने वाले नक्शों में शामिल हो गया।
लेकिन समय के साथ दुनिया की जरूरतें भी बदलीं. आज नक्शे सिर्फ नाविकों के लिए रास्ता बताने का साधन नहीं हैं। वे स्कूलों में शिक्षा, मीडिया में जानकारी, भूगोल की समझ और वैश्विक मुद्दों को प्रस्तुत करने का माध्यम भी हैं।
यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी ‘करेक्ट द मैप’ पहल ने पुराने मर्केटर प्रोजेक्शन की भूमिका पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। समर्थक चाहते हैं कि दुनिया का दृश्य प्रतिनिधित्व ऐसा हो जिसमें अफ्रीका और भूमध्यरेखा के आसपास स्थित दूसरे क्षेत्रों का वास्तविक विस्तार ज्यादा साफ नजर आए।
आखिरकार नक्शा सिर्फ रेखाओं और सीमाओं का चित्र नहीं होता। वह दुनिया को समझने का एक तरीका भी बन जाता है। मर्केटर प्रोजेक्शन ने अपने समय में नेविगेशन को आसान बनाने में बड़ी भूमिका निभाई, लेकिन आज क्षेत्रफल और भौगोलिक अनुपात को लेकर बढ़ती जागरूकता एक अलग तरह के विश्व मानचित्र की मांग कर रही है। यही वजह है कि करीब पांच शताब्दी पुराने मर्केटर नक्शे और उसके विकल्प पर एक बार फिर वैश्विक चर्चा तेज हो गई है।




