नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर चीन की मीडिया और वहां के रणनीतिक विशेषज्ञों का रुख इस बार खास तौर पर सकारात्मक नजर आ रहा है। भारत की मेजबानी में हो रहे इस सम्मेलन को सिर्फ ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग बढ़ाने वाले मंच के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे भारत और चीन के रिश्तों में आगे बढ़ने की संभावनाओं से भी जोड़कर देखा जा रहा है। खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात को लेकर चीन में काफी उम्मीद जताई जा रही है।
चीनी विश्लेषकों के मुताबिक दोनों नेताओं की लगातार तीसरे साल हो रही मुलाकात इस बात का संकेत है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत और चीन के संबंधों में जो तनाव था, उसमें धीरे-धीरे कमी आई है। उनका मानना है कि नई दिल्ली में हुई बातचीत दोनों देशों के बीच राजनीतिक विश्वास को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन की चीन में खूब चर्चा
भारत में हो रहे ब्रिक्स सम्मेलन की चीन में जिस तरह की कवरेज देखने को मिल रही है, वह भी ध्यान खींच रही है। चीनी मीडिया संस्थानों के कई पत्रकार इस महत्वपूर्ण आयोजन को कवर करने के लिए दिल्ली पहुंचे हैं। सम्मेलन की खबरों के साथ-साथ चीन के पत्रकार भारत की राजधानी और यहां की अलग-अलग गतिविधियों को भी सकारात्मक नजरिए से पेश कर रहे हैं।
चीनी सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ब्रिक्स को लेकर दिए गए बयान को प्रमुखता से प्रकाशित किया। शी ने कहा कि पिछले दो दशकों में ब्रिक्स सहयोग व्यवस्था ने तेजी से विस्तार किया है और अब यह उभरती अर्थव्यवस्थाओं तथा विकासशील देशों के बीच सहयोग के लिए बेहद प्रभावशाली मंच बन चुका है।
शी जिनपिंग के मुताबिक ब्रिक्स ने पिछले 20 वर्षों में सिर्फ सदस्य देशों की संख्या नहीं बढ़ाई, बल्कि सहयोग का एक व्यापक और कई स्तरों वाला ढांचा भी तैयार किया है। उनके अनुसार अब संगठन के सामने विकास और सहयोग को अगले चरण में ले जाने का अवसर है।
‘ब्रिक्स के तीसरे स्वर्ण दशक’ पर चीन का जोर
चीनी राष्ट्रपति ने ब्रिक्स के भविष्य को लेकर भी बड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि चीन सभी सदस्य देशों के साथ मिलकर साझा सहमति तैयार करने और बेहतर भविष्य के निर्माण के लिए काम करने को तैयार है। शी ने ब्रिक्स के अगले चरण को तीसरे ‘स्वर्ण दशक’ की शुरुआत के रूप में पेश किया।
चीनी विशेषज्ञों के अनुसार शी का यह संदेश ऐसे समय आया है जब दुनिया में भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितता और अलग-अलग देशों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। ऐसे माहौल में ब्रिक्स को ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने वाले मंच के तौर पर देखा जा रहा है।
सिंघुआ यूनिवर्सिटी के नेशनल स्ट्रैटेजी इंस्टीट्यूट के रिसर्च डिपार्टमेंट के डायरेक्टर कियान फेंग ने चीनी मीडिया से बातचीत में कहा कि ब्रिक्स सहयोग अब गुणवत्ता और प्रभाव दोनों के लिहाज से नए स्तर पर पहुंच सकता है। उनके मुताबिक संगठन का विस्तार और इसके सदस्य देशों के बीच बढ़ता तालमेल वैश्विक व्यवस्था में इसकी भूमिका को और महत्वपूर्ण बना रहा है।
मोदी-शी की मुलाकात को क्यों अहम मान रहा चीन?
भारत और चीन के रिश्तों के लिहाज से इस बार ब्रिक्स सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक रही। चीनी विशेषज्ञों ने इस मुलाकात को सामान्य द्विपक्षीय बातचीत से आगे बढ़कर देखा है।
गौर करने वाली बात यह है कि दोनों नेताओं के बीच लगातार तीसरे साल आमने-सामने बातचीत हुई है। इससे पहले 2024 में रूस के कजान में और 2025 में चीन के तियानजिन में दोनों नेताओं की मुलाकात हुई थी। अब 2026 में नई दिल्ली में हुई बातचीत को इस सिलसिले की अगली कड़ी माना जा रहा है।
चीन के रणनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इन बैठकों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय भारत-चीन संबंधों में धीरे-धीरे हो रहे बदलाव की पूरी प्रक्रिया के तौर पर देखना चाहिए। उनके अनुसार कजान में हुई बातचीत ने रिश्तों में सुधार की शुरुआत का संकेत दिया था, जबकि तियानजिन की बैठक ने दोनों देशों के बीच संपर्क को दोबारा मजबूत करने में मदद की। अब नई दिल्ली की मुलाकात भरोसे को और गहरा करने के अगले चरण के रूप में देखी जा रही है।
चीनी विशेषज्ञ बोले- अब सहमति को जमीन पर उतारना जरूरी
पेकिंग यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर साउथ एशियन स्टडीज के एग्जीक्यूटिव डिप्टी डायरेक्टर वांग जू ने भारत-चीन संबंधों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि शीर्ष नेतृत्व के बीच बातचीत का उद्देश्य केवल राजनीतिक संदेश देना नहीं होना चाहिए, बल्कि रणनीतिक सहमति को वास्तविक कदमों और ठोस परिणामों में बदलना भी जरूरी है।
वांग के मुताबिक भारत और चीन जैसे बड़े पड़ोसी देशों के बीच मतभेद पूरी तरह खत्म होना आसान नहीं है। इसलिए प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि मौजूद मतभेदों को प्रभावी तरीके से संभाला जाए और गलतफहमी या गलत आकलन की वजह से रिश्तों में दोबारा तनाव पैदा न हो।
उन्होंने कहा कि दोनों देशों के नेताओं के बीच संवाद का एक बड़ा उद्देश्य व्यापक द्विपक्षीय संबंधों को सही दिशा में बनाए रखना है। इसके लिए लगातार संपर्क और संवाद की जरूरत होगी।
सीमा विवाद को लेकर संस्थागत व्यवस्था मजबूत करने की सलाह
वांग जू ने यह भी कहा कि भारत और चीन के बीच राजनीतिक विश्वास सिर्फ बैठकों से नहीं बनेगा। इसके लिए जमीन पर ठोस कदम उठाने होंगे। उन्होंने सुझाव दिया कि सीमा से जुड़े मामलों के प्रबंधन के लिए मौजूदा संस्थागत तंत्र को और मजबूत किया जा सकता है।
उनके मुताबिक दोनों देशों को ऐसे रास्ते तलाशने चाहिए जिनसे सीमा से संबंधित किसी भी समस्या को समय रहते बातचीत के जरिए नियंत्रित किया जा सके। इससे बड़े विवाद की स्थिति बनने से पहले ही तनाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
चीनी विशेषज्ञ ने दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर भी जोर दिया। उनका मानना है कि सिर्फ सरकारों और नेताओं के बीच बातचीत पर्याप्त नहीं है। छात्र, कारोबारी, पर्यटक और अन्य स्तरों पर लोगों का आपसी संपर्क बढ़ना भी रिश्तों में विश्वास कायम करने के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
व्यापार और निवेश को लेकर भी दिया संदेश
भारत-चीन संबंधों में आर्थिक सहयोग भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। वांग जू ने सुझाव दिया कि दोनों देशों को व्यापार और निवेश के क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी चिंताओं को जरूरत से ज्यादा हावी नहीं होने देना चाहिए।
उनका कहना है कि दोनों बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यावहारिक आर्थिक सहयोग के लिए जगह मौजूद है। यदि व्यापार और निवेश को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाया जाए तो इससे द्विपक्षीय संबंधों को स्थिरता मिल सकती है।
इसके साथ ही दोनों देशों के बीच व्यावहारिक आदान-प्रदान बढ़ाने की भी जरूरत बताई गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक आर्थिक और सामाजिक स्तर पर संपर्क बढ़ने से राजनीतिक संबंधों को भी मजबूती मिल सकती है।
BRICS, SCO और G20 में साथ आने की गुंजाइश
चीनी विशेषज्ञों की नजर सिर्फ भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों पर नहीं है। उनका मानना है कि दोनों देशों के पास बहुपक्षीय मंचों के जरिए भी एक-दूसरे के साथ सहयोग बढ़ाने के कई अवसर हैं।
भारत और चीन दोनों ब्रिक्स के सदस्य हैं। इसके अलावा दोनों शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO और G20 जैसे महत्वपूर्ण मंचों में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। ऐसे में वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, विकासशील देशों की जरूरतों और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों पर दोनों देशों के बीच तालमेल बढ़ाया जा सकता है।
वांग जू के अनुसार विकासशील देशों के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने और विकास की चुनौतियों से निपटने जैसे मुद्दों पर भी भारत और चीन मिलकर काम करने के रास्ते तलाश सकते हैं। इससे न केवल दोनों देशों के संबंधों को फायदा होगा, बल्कि ग्लोबल साउथ की सामूहिक भूमिका भी मजबूत हो सकती है।
चीन की नजर में बढ़ती बहुध्रुवीय दुनिया
चीनी विश्लेषकों ने शी जिनपिंग के ब्रिक्स संबंधी बयान को मौजूदा वैश्विक व्यवस्था से भी जोड़कर देखा है। उनका मानना है कि दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है और इसमें विकासशील देशों की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
ब्रिक्स को चीन इसी बदलती व्यवस्था के एक प्रमुख मंच के रूप में देखता है। चीनी विशेषज्ञों का कहना है कि संगठन का विस्तार और इसमें शामिल देशों की बढ़ती आर्थिक तथा राजनीतिक ताकत इसे वैश्विक मुद्दों पर प्रभाव डालने में सक्षम बना रही है।
ऐसे समय में भारत की मेजबानी में दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन चीन के लिए भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। खासतौर पर भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच लगातार बढ़ते संवाद को चीन के विशेषज्ञ दोनों देशों के रिश्तों में स्थिरता की उम्मीद के तौर पर देख रहे हैं।
दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन ने भारत-चीन संबंधों को लेकर चीन में एक नई बहस को जन्म दिया है। चीनी विशेषज्ञों का मानना है कि मोदी और शी जिनपिंग के बीच लगातार संवाद रिश्तों को आगे ले जाने का आधार बन सकता है। हालांकि इसके लिए सीमा विवाद, व्यापार, निवेश और आपसी विश्वास जैसे मुद्दों पर ठोस प्रगति जरूरी होगी। अगर दोनों देश इन क्षेत्रों में व्यावहारिक कदम उठाने में सफल रहते हैं, तो नई दिल्ली की यह मुलाकात भारत-चीन संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत साबित हो सकती है।



