विसलिंग वुड्स रिसॉर्ट में पांच दिवसीय आयोजन का समापन, गोपी भाव का अर्थ समझाते हुए महाराजश्री ने युवाओं को संस्कार और सादगी अपनाने का दिया संदेश
लुधियाना। फिरोजपुर रोड स्थित विसलिंग वुड्स रिसॉर्ट में रविवार को पांच दिवसीय श्री हरि कथा का भावपूर्ण समापन हुआ। अंतिम दिन आयोजन स्थल पर श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का ऐसा संगम देखने को मिला कि पूरा वातावरण वृंदावन की भक्ति नगरी जैसा प्रतीत हो रहा था। हजारों की संख्या में श्रद्धालु कथा व्यास पूज्य इंद्रेश उपाध्याय महाराज के दर्शन और प्रवचन सुनने के लिए पंडाल में मौजूद रहे। जैसे ही महाराजश्री व्यासपीठ पर पहुंचे, श्रद्धालुओं ने जयकारों के साथ उनका स्वागत किया। शंखनाद और तालियों की गूंज से पूरा पंडाल भक्तिमय हो उठा।
अबरोल और गर्ग परिवार की ओर से आयोजित इस पांच दिवसीय धार्मिक कार्यक्रम के अंतिम दिन श्रद्धालुओं की भीड़ विशेष रूप से देखने को मिली। आयोजन स्थल पर सुबह से ही भक्तों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। बड़ी संख्या में महिला, पुरुष और युवा श्रद्धालु कथा सुनने के लिए पहुंचे। व्यासपीठ पर महाराजश्री के विराजमान होते ही वातावरण में भक्ति की लहर दौड़ गई और श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से भगवान के जयकारे लगाए।
कार्यक्रम के मुख्य आयोजक सुरिन्द्र गर्ग बिहारी, हितेश अबरोल, सविनय गर्ग डिम्पी और संजय गर्ग ने परिवार के सदस्यों के साथ व्यासपीठ का विधिवत पूजन किया। उन्होंने कथा व्यास का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद भजन-कीर्तन और आध्यात्मिक प्रवचनों का दौर शुरू हुआ। श्रद्धालु भजनों पर भाव-विभोर होकर झूमते नजर आए और पूरा पंडाल हरि नाम के जयघोष से गूंजता रहा।
कथा के समापन अवसर पर इंद्रेश उपाध्याय महाराज ने श्रद्धालुओं को भगवान की कथा और भक्ति के वास्तविक स्वरूप को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि संसार की वस्तुओं और घटनाओं का एक समय पर अंत हो सकता है, लेकिन भगवान की कथा के लिए ‘समाप्ति’ शब्द उपयुक्त नहीं है। प्रभु की कथा कभी खत्म नहीं होती, वह केवल कुछ समय के लिए विश्राम लेती है। उन्होंने कहा कि कथा से मिलने वाला भाव और आध्यात्मिक ऊर्जा श्रद्धालुओं के जीवन में लगातार बनी रहनी चाहिए।
महाराजश्री ने आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं से जुड़ाव का उल्लेख करते हुए कहा कि इस बार उनका यहां पांच दिनों के लिए आना हुआ है, लेकिन अगली बार वह सात दिन की कथा के लिए आएंगे। उन्होंने कहा कि अगले आयोजन में वह बीच में कहीं नहीं जाएंगे, ताकि कथा के दौरान भक्तों और ठाकुर जी के बीच बनने वाले आध्यात्मिक संबंध में कोई व्यवधान न आए।
उन्होंने कहा कि धार्मिक कथा केवल सुनने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के भीतर बदलाव लाने का अवसर है। यदि कथा सुनने के बाद मन में सकारात्मकता, करुणा, संयम और भगवान के प्रति प्रेम बढ़ता है तो कथा का उद्देश्य पूरा होता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे कथा में सुनी बातों को केवल आयोजन स्थल तक सीमित न रखें, बल्कि अपने व्यवहार और जीवनशैली में भी उतारें।
युवाओं को भक्ति और संस्कार से जोड़ने पर जोर
इंद्रेश उपाध्याय महाराज ने विशेष रूप से पंजाब के युवाओं को संबोधित करते हुए उन्हें भक्ति, अच्छे संस्कार और सादगी को जीवन का हिस्सा बनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि युवा किसी भी समाज की सबसे बड़ी शक्ति होते हैं। उनकी सोच और दिशा ही आने वाले समय के समाज का स्वरूप तय करती है। इसलिए युवाओं को अपनी ऊर्जा सकारात्मक कार्यों, सेवा, परिवार और समाज के कल्याण में लगानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवन की भागदौड़ में व्यक्ति बाहरी उपलब्धियों को ही सफलता मानने लगता है, जबकि वास्तविक शांति भीतर के संतुलन से मिलती है। भक्ति व्यक्ति को अपनी जड़ों से जोड़ती है और उसे यह समझने में मदद करती है कि जीवन में परिस्थितियां चाहे जैसी हों, मन को स्थिर कैसे रखा जाए।
महाराजश्री ने युवाओं से सादगी अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि दिखावे की बजाय अच्छे संस्कार और अच्छे आचरण को महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके पहनावे, धन या बाहरी प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, विचार और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता से होती है।
गोपी भाव शरीर नहीं, ईश्वर के प्रति मन की अवस्था
कथा के दौरान इंद्रेश उपाध्याय महाराज ने गोपी भाव की भी विस्तृत व्याख्या की। उन्होंने कहा कि गोपी भाव को केवल किसी व्यक्ति या शरीर के रूप में समझना सही नहीं है। यह मन की एक ऐसी अवस्था है, जिसमें मनुष्य की इंद्रियां पूरी तरह भगवान के दर्शन, स्मरण और सेवा के लिए समर्पित हो जाती हैं।
उन्होंने समझाया कि जब मनुष्य का मन सांसारिक आकर्षणों से ऊपर उठकर ईश्वर के प्रति सच्चे प्रेम और समर्पण में स्थिर हो जाता है, तब उसके भीतर गोपी भाव उत्पन्न होता है। इसमें किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं होता। यह केवल भगवान के प्रति प्रेम, विश्वास और समर्पण की भावना है।
महाराजश्री ने श्रद्धालुओं को यह भी समझाया कि भक्ति का अर्थ केवल पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यदि व्यक्ति के व्यवहार में प्रेम, सेवा, करुणा और विनम्रता नहीं आती तो उसकी भक्ति अधूरी है। भगवान का स्मरण मन को शांत करने के साथ-साथ व्यक्ति के व्यवहार को भी बेहतर बनाना चाहिए।
दुख और धोखे को भी ठाकुर जी का संकेत मानें
प्रवचन के दौरान महाराजश्री ने जीवन में मिलने वाले दुख, निराशा और धोखे को लेकर भी श्रद्धालुओं को सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की सीख दी। उन्होंने कहा कि यदि दुनिया में कोई व्यक्ति आपका दिल दुखाता है, आपके साथ विश्वासघात करता है या आपको किसी कारण से अकेला महसूस होता है तो उसे लेकर टूटने की जरूरत नहीं है।
उन्होंने कहा कि ऐसे समय में यह भावना रखनी चाहिए कि ठाकुर जी ने आपको संसार के किसी बंधन से दूर करके अपने और करीब बुलाया है। हर घटना के पीछे मनुष्य को ईश्वर की इच्छा और संकेत को देखने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि परिस्थितियां चाहे कितनी कठिन क्यों न हों, भगवान पर विश्वास बनाए रखने वाला व्यक्ति भीतर से मजबूत बना रहता है।
महाराजश्री ने कहा कि मनुष्य अक्सर उन रिश्तों और परिस्थितियों को पकड़े रहता है जो उसके लिए पीड़ा का कारण बन जाते हैं। ऐसे समय में भक्ति उसे स्वीकार करना सिखाती है। उन्होंने श्रद्धालुओं को भरोसा दिलाया कि ईश्वर से जुड़ने के बाद जीवन की कठिनाइयों को देखने का नजरिया बदल जाता है।
पांच दिवसीय कथा के अंतिम दिन भजन और प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। पूरे पंडाल में भगवान के नाम का संकीर्तन होता रहा। श्रद्धालु कथा के प्रत्येक प्रसंग और महाराजश्री के संदेश को ध्यानपूर्वक सुनते रहे। कई अवसरों पर भक्त भाव-विभोर होकर भजनों में शामिल हुए।
आयोजक परिवार की ओर से भी कथा के सफल आयोजन के लिए श्रद्धालुओं का आभार व्यक्त किया गया। अबरोल और गर्ग परिवार की ओर से आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम ने पांच दिनों तक शहर में आध्यात्मिक वातावरण बनाए रखा। समापन के अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने कथा से मिले संदेश को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।
समापन समारोह के दौरान महाराजश्री ने श्रद्धालुओं को यही संदेश दिया कि धार्मिक आयोजन भले ही कुछ दिनों के लिए होते हैं, लेकिन उनसे मिलने वाली सीख और प्रभु के प्रति विश्वास जीवनभर साथ रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि कथा का वास्तविक लाभ तभी है जब मनुष्य अपने भीतर प्रेम, विश्वास, सेवा और समर्पण को मजबूत करे।
इस तरह पांच दिनों तक चले श्री हरि कथा आयोजन का रविवार को विधिवत समापन हुआ, लेकिन श्रद्धालुओं के लिए भक्ति और ठाकुर जी के प्रति समर्पण की भावना के साथ यह आध्यात्मिक यात्रा आगे भी जारी रहने का संदेश छोड़ गई।




