H-1B पर ट्रंप प्रशासन की नई सख्ती, कंपनियों की होगी कड़ी जांच; भारतीय प्रोफेशनल्स पर क्या पड़ेगा असर?

H-1B पर ट्रंप प्रशासन की नई सख्ती, कंपनियों की होगी कड़ी जांच; भारतीय प्रोफेशनल्स पर क्या पड़ेगा असर?

अमेरिका में काम करने का सपना देख रहे विदेशी प्रोफेशनल्स, खासकर भारतीय टेक कर्मचारियों के लिए H-1B वीजा को लेकर एक बार फिर अहम बदलाव सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B नॉन-इमिग्रेंट वीजा प्रोग्राम की निगरानी और जांच को और सख्त करने वाले एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके साथ ही प्रशासन ने कुछ H-1B आवेदनों के लिए 1 लाख डॉलर के भुगतान की शर्त को अगले 12 महीनों तक जारी रखने का फैसला भी किया है।

नई व्यवस्था का सीधा फोकस उन कंपनियों पर है जिन पर अमेरिकी कर्मचारियों की जगह कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों को रखने या H-1B व्यवस्था का गलत इस्तेमाल करने के आरोप लगाए गए हैं। व्हाइट हाउस के मुताबिक, अब वीजा आवेदन की जांच करते समय यह भी देखा जाएगा कि संबंधित कंपनी ने हाल के समय में अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की है या भविष्य में ऐसी छंटनी की योजना बना रही है या नहीं।

इस फैसले की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि H-1B कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभार्थी लंबे समय से भारत रहा है। USCIS के उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024 में मंजूर H-1B याचिकाओं में करीब 71 फीसदी लाभार्थी भारत में जन्मे थे, जबकि चीन का हिस्सा लगभग 12 फीसदी था।

सिर्फ फीस नहीं, अब कंपनियों की भी होगी पड़ताल

ट्रंप प्रशासन के ताजा कदम को केवल वीजा फीस से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। 18 सितंबर 2026 को जारी एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में अलग-अलग अमेरिकी सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल और H-1B आवेदनों की ज्यादा गहराई से जांच करने की व्यवस्था की गई है।

अब विदेश विभाग, श्रम विभाग और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग को वाणिज्य विभाग, शिक्षा विभाग और स्मॉल बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन से भी संबंधित जानकारी लेने के लिए कहा गया है। इसमें वेतन, रोजगार, उद्योग और शैक्षणिक योग्यता से जुड़ा डेटा शामिल हो सकता है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि किसी कंपनी की ओर से दाखिल किया गया H-1B आवेदन नियमों के मुताबिक है या नहीं।

यानी आने वाले समय में सिर्फ कर्मचारी की योग्यता ही नहीं, बल्कि उसे नियुक्त करने वाली कंपनी की रोजगार संबंधी गतिविधियां भी जांच के दायरे में आ सकती हैं।

छंटनी करने वाली कंपनियों पर बढ़ेगी नजर

नए आदेश में अमेरिकी प्रशासन ने कंपनियों की छंटनी और H-1B नियुक्तियों के बीच संबंध को खास तौर पर महत्वपूर्ण माना है। आदेश के अनुसार, संबंधित एजेंसियों को H-1B आवेदन, लेबर कंडीशन एप्लीकेशन और वीजा प्रक्रिया के दौरान यह ध्यान रखना होगा कि प्रायोजक कंपनी ने पिछले एक साल में समान पदों पर काम कर रहे अमेरिकी कर्मचारियों को हटाया है या नहीं। भविष्य में छंटनी की योजना भी जांच का हिस्सा बन सकती है।

इसके अलावा अमेरिकी श्रम विभाग को पहले से दाखिल लेबर कंडीशन एप्लीकेशनों से जुड़े डेटा की समीक्षा शुरू करने का निर्देश दिया गया है। आदेश के मुताबिक यह प्रक्रिया 30 दिनों के भीतर शुरू की जानी है। यदि किसी नियोक्ता के खिलाफ नियमों के उल्लंघन के संकेत मिलते हैं तो आगे कार्रवाई की जा सकती है।

इससे H-1B कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियों के लिए वीजा प्रक्रिया पहले की तुलना में ज्यादा जांच वाली हो सकती है।

1 लाख डॉलर की शर्त भी जारी

H-1B को लेकर दूसरा बड़ा बदलाव $100,000 यानी करीब 1 लाख अमेरिकी डॉलर के भुगतान से संबंधित है। यह शर्त पहली बार सितंबर 2025 में लागू की गई थी और अब 18 सितंबर 2026 की नई राष्ट्रपति घोषणा के जरिए इसे अगले 12 महीनों के लिए आगे बढ़ाया गया है। नई अवधि 21 सितंबर 2026 से प्रभावी होनी है।

हालांकि यह समझना जरूरी है कि यह भुगतान हर H-1B कर्मचारी के लिए सामान्य वीजा फीस के रूप में लागू नहीं बताया गया है। मौजूदा घोषणा के अनुसार यह खास तौर पर उन H-1B कर्मचारियों के प्रवेश पर लागू प्रतिबंध से जुड़ा है जो अमेरिका से बाहर हैं और जिनकी याचिका के साथ $100,000 का भुगतान नहीं किया गया है। राष्ट्रीय हित में कुछ मामलों को अपवाद मिल सकता है।

इसलिए भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए असर समझते समय यह देखना जरूरी होगा कि वे किस स्थिति में हैं, उनका H-1B आवेदन किस श्रेणी में आता है और वे अमेरिका के अंदर हैं या बाहर।

ट्रंप प्रशासन का क्या तर्क है?

व्हाइट हाउस का कहना है कि H-1B कार्यक्रम मूल रूप से ऐसे विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका लाने के लिए बनाया गया था जिनके पास विशेष कौशल और विशेषज्ञता है। प्रशासन का आरोप है कि कुछ कंपनियां, थर्ड-पार्टी प्लेसमेंट संगठन और आउटसोर्सिंग कंपनियां इस व्यवस्था का इस्तेमाल कम लागत वाले विदेशी श्रम को नियुक्त करने के लिए करती रही हैं।

अमेरिकी प्रशासन ने दावा किया है कि कुछ H-1B कर्मचारियों को समान काम करने वाले अमेरिकी कर्मचारियों की तुलना में कम वेतन मिलता है। व्हाइट हाउस के आदेश में कुछ H-1B-निर्भर उद्योगों के संदर्भ में वेतन अंतर का अनुमान $9,000 से $20,000 तक बताया गया है। यह आंकड़ा प्रशासन के दस्तावेज में दिया गया दावा है, न कि सभी H-1B कर्मचारियों पर लागू होने वाला सार्वभौमिक आंकड़ा।

प्रशासन ने यह भी आरोप लगाया है कि कुछ कंपनियों ने अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी के बाद H-1B कर्मचारियों को नियुक्त किया और कुछ मामलों में हटाए गए कर्मचारियों से ही अपने स्थान पर आने वाले विदेशी कर्मचारियों को ट्रेनिंग देने को कहा गया।

टेक सेक्टर पर खास नजर

अमेरिका का टेक्नोलॉजी सेक्टर H-1B कार्यक्रम के सबसे महत्वपूर्ण उपयोगकर्ताओं में शामिल है। नई नीति में इसी क्षेत्र से जुड़ी आउटसोर्सिंग और स्टाफिंग कंपनियों की गतिविधियों को लेकर विशेष चिंता व्यक्त की गई है।

व्हाइट हाउस के अनुसार, 2022 से 2026 के बीच टेक सेक्टर के नियोक्ताओं ने बड़ी संख्या में अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की, जबकि इसी अवधि में H-1B कर्मचारियों के लिए भी बड़ी संख्या में आवेदन किए गए। प्रशासन ने ऐसे मामलों को कार्यक्रम के संभावित दुरुपयोग के उदाहरण के रूप में पेश किया है।

हालांकि, किसी पूरे सेक्टर की सभी कंपनियों या सभी H-1B कर्मचारियों को इस दावे के आधार पर एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा। H-1B कार्यक्रम में अलग-अलग क्षेत्रों और अलग-अलग तरह के नियोक्ता शामिल होते हैं।

भारतीयों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है मामला?

H-1B की नई सख्ती का भारत पर असर इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अमेरिकी H-1B सिस्टम में भारतीय प्रोफेशनल्स की हिस्सेदारी काफी बड़ी है। USCIS की FY2024 रिपोर्ट के अनुसार, मंजूर H-1B याचिकाओं में 71 फीसदी लाभार्थी भारत में जन्मे थे। चीन करीब 12 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर था।

H-1B वीजा के जरिए अमेरिका में टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, रिसर्च, शिक्षा और दूसरे विशेष कौशल वाले क्षेत्रों में काम करने का रास्ता मिलता है। इसलिए यदि कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की प्रक्रिया महंगी या अधिक जांच वाली होती है तो इसका प्रभाव नई नियुक्तियों, ट्रांसफर और अमेरिका के बाहर मौजूद उम्मीदवारों पर पड़ सकता है।

खास तौर पर वे भारतीय उम्मीदवार प्रभावित हो सकते हैं जिन्हें किसी अमेरिकी कंपनी की ओर से नया H-1B प्रायोजन मिलने की उम्मीद है। हालांकि वास्तविक असर व्यक्ति और आवेदन की स्थिति के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।

H-1B का मूल ढांचा क्या है?

H-1B एक नॉन-इमिग्रेंट वीजा श्रेणी है जिसका इस्तेमाल अमेरिकी कंपनियां विशेष कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए करती हैं। सामान्य वार्षिक सीमा 65,000 H-1B वीजा की है, जबकि अमेरिकी उच्च शिक्षा संस्थान से एडवांस्ड डिग्री हासिल करने वाले पात्र उम्मीदवारों के लिए अतिरिक्त 20,000 की मास्टर्स कैप होती है।

हाल के वर्षों में इस कार्यक्रम में चयन और वेतन से जुड़े नियमों में भी बदलाव हुए हैं। ट्रंप प्रशासन के अनुसार FY2027 से H-1B चयन प्रक्रिया में वेतन स्तर को महत्व देने वाली वेटेड प्रणाली लागू की गई है। व्हाइट हाउस ने कहा है कि इससे उच्च वेतन और उच्च कौशल वाले पदों को प्राथमिकता देने का उद्देश्य है।

कंपनियों और कर्मचारियों के लिए आगे क्या?

नई व्यवस्था के बाद H-1B प्रायोजित करने वाली कंपनियों को अपने आवेदन और रोजगार रिकॉर्ड को लेकर ज्यादा सावधानी बरतनी पड़ सकती है। विशेष रूप से छंटनी, वेतन, नौकरी की वास्तविक प्रकृति और कर्मचारी की योग्यता से जुड़े दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है।

दूसरी तरफ, अमेरिका से बाहर मौजूद H-1B उम्मीदवारों के लिए $100,000 भुगतान से जुड़ा नियम महत्वपूर्ण रहेगा, क्योंकि मौजूदा घोषणा में ऐसे कर्मचारियों के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध की व्यवस्था की गई है जिनकी याचिकाओं के साथ निर्धारित भुगतान नहीं किया गया है। राष्ट्रीय हित के आधार पर अपवाद का प्रावधान भी रखा गया है।

इस तरह ट्रंप प्रशासन की नई नीति को केवल H-1B वीजा की फीस बढ़ने के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसमें कंपनियों की छंटनी, वेतन, नियुक्ति प्रक्रिया, आवेदन की जानकारी और सरकारी एजेंसियों के बीच डेटा साझा करने जैसे कई पहलू शामिल हैं।

भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि H-1B से जुड़े नियमों में निगरानी और अनुपालन की सख्ती बढ़ रही है। चूंकि इस कार्यक्रम में भारत की हिस्सेदारी बड़ी है, इसलिए अमेरिकी कंपनियों की नई भर्ती रणनीति और आने वाले प्रशासनिक नियम भारतीय IT और अन्य कुशल पेशेवरों के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे।