भारत की ओर से ऑस्कर 2027 के लिए आधिकारिक फिल्म का चयन हो चुका है। फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की 14 सदस्यीय जूरी ने मराठी फिल्म ‘गोंधल’ को 99वें अकैडमी अवॉर्ड्स के लिए देश की आधिकारिक एंट्री के रूप में चुना है। इस चयन के बाद सबसे ज्यादा चर्चा उन फिल्मों की हो रही है, जिन्हें लेकर ऑस्कर की रेस में मजबूत दावेदारी मानी जा रही थी। इनमें रणवीर सिंह स्टारर ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर: द रिवेंज’ के नाम भी शामिल थे।
हालांकि, ‘धुरंधर’ को भारत की आधिकारिक एंट्री नहीं मिल सकी। फिल्म को लेकर दर्शकों के बीच काफी उत्साह और इसकी लोकप्रियता को देखते हुए कई लोगों को उम्मीद थी कि जूरी इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुन सकती है। लेकिन जूरी ने अंतिम फैसला अलग आधार पर लिया। अब जूरी सदस्य विवेक वासवानी ने बताया है कि चयन के दौरान किन बातों को प्राथमिकता दी गई और ‘धुरंधर’ उस कसौटी पर क्यों आगे नहीं बढ़ सकी।
लोकप्रियता और बॉक्स ऑफिस नहीं था मुख्य आधार
ऑस्कर के लिए भारतीय फिल्म चुनने की प्रक्रिया केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि किसी फिल्म ने घरेलू स्तर पर कितना कारोबार किया या दर्शकों के बीच उसे कितनी लोकप्रियता मिली। जूरी को यह देखना होता है कि चुनी गई फिल्म अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने भारत की कहानी, संस्कृति और विशिष्ट पहचान को किस तरह प्रस्तुत कर सकती है।
विवेक वासवानी के मुताबिक, जूरी ने फिल्मों का मूल्यांकन उनकी लोकप्रियता के आधार पर नहीं किया। यानी किसी फिल्म की व्यावसायिक सफलता अपने आप में उसे ऑस्कर की आधिकारिक एंट्री बनाने की वजह नहीं बनती। इसी प्रक्रिया के दौरान ‘धुरंधर’ भी जूरी की अंतिम पसंद नहीं बन सकी।
‘धुरंधर’ को लेकर जूरी का फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि फिल्म ने दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई थी। इसके बावजूद वोटिंग के दौरान उसे 14 सदस्यीय जूरी में से केवल चार सदस्यों का समर्थन मिला।
जूरी के सामने क्या थी सबसे बड़ी कसौटी?
जूरी के सामने इस साल अलग-अलग भाषाओं और अलग-अलग विषयों पर बनी फिल्मों का बड़ा विकल्प था। ऐसे में अंतिम चयन के लिए केवल मनोरंजन या लोकप्रियता को आधार नहीं बनाया गया। जूरी ऐसी फिल्म की तलाश में थी, जिसके जरिए भारत की सांस्कृतिक विविधता और देश की विशिष्ट पहचान को वैश्विक दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया जा सके।
इसी दृष्टिकोण से फिल्मों का मूल्यांकन किया गया। ‘धुरंधर’ इस चयन प्रक्रिया में पर्याप्त समर्थन हासिल नहीं कर पाई। चार वोट मिलने के बाद वह उस मुकाबले में आगे नहीं जा सकी।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि जूरी का फैसला किसी फिल्म की व्यावसायिक सफलता को खारिज करने के अर्थ में नहीं देखा जाना चाहिए। ऑस्कर की आधिकारिक एंट्री के लिए चुने जाने की प्रक्रिया और किसी फिल्म की लोकप्रियता दो अलग-अलग बातें हैं।
30 से ज्यादा फिल्मों ने पेश की थी दावेदारी
इस बार भारत की तरफ से ऑस्कर की आधिकारिक एंट्री के लिए कई भाषाओं की फिल्मों के बीच मुकाबला हुआ। जूरी के सामने 30 से ज्यादा फिल्मों के विकल्प थे। इन फिल्मों में हिंदी के अलावा मराठी, तेलुगु, गुजराती, तमिल, मलयालम और नेपाली भाषा की फिल्में शामिल थीं। नागालैंड से भी एक फिल्म इस प्रक्रिया का हिस्सा बनी।
भाषा के लिहाज से देखें तो इस सूची में 14 हिंदी फिल्में थीं। इसके अलावा चार मराठी, चार तेलुगु, तीन गुजराती और तीन तमिल फिल्मों ने भी अपनी दावेदारी पेश की। मलयालम और नेपाली की एक-एक फिल्म तथा नागालैंड की एक फिल्म भी चयन प्रक्रिया में शामिल थीं।
कई फिल्मों के बीच विचार-विमर्श और मूल्यांकन के बाद मुकाबला अंतिम चरण तक पहुंचा। इस दौर में जूरी के सामने ‘गोंधल’, ‘अंग’ और ‘मैं वापस आऊंगा’ तीन प्रमुख विकल्प रह गए थे। अंत में ‘गोंधल’ को सबसे ज्यादा समर्थन मिला और इसे भारत की ओर से ऑस्कर 2027 के लिए आधिकारिक एंट्री घोषित कर दिया गया।
आखिर ‘गोंधल’ में ऐसा क्या खास है?
संतोष डावखर के निर्देशन में बनी ‘गोंधल’ महाराष्ट्र की लोक परंपरा और धार्मिक अनुष्ठान से जुड़े विषय को कहानी के केंद्र में रखती है। फिल्म का आधार महाराष्ट्र की पारंपरिक लोक कला गोंधल है, जो वहां की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हुई है।
फिल्म की कहानी और निर्देशन संतोष डावखर ने किए हैं। इसमें किशोर कदम, इशिता देशमुख, योगेश सोहोनी, निषाद भोईर और अनुज प्रभु जैसे कलाकार महत्वपूर्ण भूमिकाओं में दिखाई देते हैं। फिल्म के संगीत की जिम्मेदारी भारतीय सिनेमा के जाने-माने संगीतकार इलैयाराजा ने संभाली है।
यही सांस्कृतिक पृष्ठभूमि ‘गोंधल’ को बाकी फिल्मों से अलग पहचान देती है। जूरी के चयन को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारतीय परंपरा और क्षेत्रीय संस्कृति से जुड़े विषय ने इस बार चयन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मराठी सिनेमा के लिए एक और बड़ी उपलब्धि
‘गोंधल’ का ऑस्कर के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री बनना केवल इस फिल्म के लिए ही नहीं, बल्कि मराठी फिल्म इंडस्ट्री के लिए भी उल्लेखनीय है। इससे पहले भी कई मराठी फिल्मों ने भारत की तरफ से अकैडमी अवॉर्ड्स में आधिकारिक प्रतिनिधित्व किया है।
मराठी सिनेमा की जिन फिल्मों को पहले भारत की आधिकारिक ऑस्कर एंट्री बनने का अवसर मिला, उनमें ‘श्वास’, ‘हरिश्चंद्राची फैक्ट्री’ और ‘कोर्ट’ शामिल हैं। ‘श्वास’ को 2004 में, ‘हरिश्चंद्राची फैक्ट्री’ को 2009 में और ‘कोर्ट’ को 2015 में भारत की ओर से भेजा गया था।
इस लिहाज से ‘गोंधल’ का चयन मराठी भाषा की फिल्मों की उस परंपरा को आगे बढ़ाता है, जिसमें स्थानीय कहानियों और क्षेत्रीय संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने की कोशिश दिखाई देती है।
क्या ‘धुरंधर’ अब पूरी तरह ऑस्कर से बाहर है?
भारत की आधिकारिक एंट्री के तौर पर ‘गोंधल’ चुने जाने के बाद भी ‘धुरंधर’ के लिए ऑस्कर की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती। आधिकारिक भारतीय एंट्री और स्वतंत्र रूप से ऑस्कर के लिए फिल्म का आवेदन करना अलग प्रक्रियाएं हैं।
‘धुरंधर’ के निर्माता चाहें तो फिल्म को संबंधित नियमों के तहत स्वतंत्र रूप से ऑस्कर की रेस में प्रस्तुत करने का विकल्प तलाश सकते हैं। यही रास्ता पहले कुछ भारतीय फिल्मों के निर्माताओं ने भी अपनाया है।
इसी संदर्भ में ‘RRR’ का उदाहरण अक्सर दिया जाता है। एसएस राजामौली की फिल्म को भारत की आधिकारिक ऑस्कर एंट्री के रूप में नहीं चुना गया था, लेकिन फिल्म ने अलग श्रेणियों में अकैडमी अवॉर्ड्स के लिए अभियान और आवेदन की प्रक्रिया जारी रखी। आखिरकार फिल्म के गीत ‘नाटू नाटू’ को 2023 में 95वें अकैडमी अवॉर्ड्स में बेस्ट ओरिजिनल सॉन्ग का पुरस्कार मिला।
इसलिए भारत की आधिकारिक एंट्री न बन पाना और ऑस्कर के सभी संभावित रास्ते बंद हो जाना एक ही बात नहीं है।
अब ‘धुरंधर’ के निर्माताओं के सामने क्या विकल्प है?
अब सबसे अहम सवाल यही है कि ‘धुरंधर’ के निर्माता आगे क्या कदम उठाते हैं। आधिकारिक चयन में फिल्म को पर्याप्त समर्थन नहीं मिला, लेकिन फिल्म के पास स्वतंत्र रूप से अकैडमी की पात्रता और संबंधित नियमों के अनुसार आवेदन करने का विकल्प मौजूद हो सकता है।
हालांकि, किसी फिल्म का स्वतंत्र रूप से आवेदन करना अपने आप में ऑस्कर नामांकन की गारंटी नहीं देता। अकैडमी की अलग-अलग श्रेणियों के लिए पात्रता, स्क्रीनिंग, अभियान और चयन की अपनी प्रक्रियाएं होती हैं। इसलिए ‘धुरंधर’ के लिए आगे की राह इस बात पर निर्भर करेगी कि निर्माता किस श्रेणी में और किस तरीके से फिल्म को प्रस्तुत करते हैं।
दूसरी ओर, ‘गोंधल’ अब भारत की आधिकारिक एंट्री के तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करेगी। इसका मतलब है कि भारतीय चयन प्रक्रिया में इस फिल्म ने बाकी दावेदारों के बीच सबसे अधिक समर्थन हासिल किया है।
रणवीर सिंह की फिल्म को लेकर क्यों बढ़ी चर्चा?
‘धुरंधर’ की चर्चा केवल इसके कलाकारों और कहानी की वजह से नहीं थी। फिल्म को लेकर दर्शकों और इंडस्ट्री में पहले से ही काफी उम्मीदें थीं। इसी वजह से जब आधिकारिक एंट्री के लिए ‘गोंधल’ का नाम सामने आया, तो ‘धुरंधर’ के चयन न होने को लेकर सवाल उठने लगे।
जूरी सदस्य विवेक वासवानी की ओर से दी गई जानकारी ने इन सवालों का जवाब दिया है। उनके अनुसार चयन का आधार फिल्म की लोकप्रियता या बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन नहीं था, बल्कि जूरी यह देख रही थी कि कौन-सी फिल्म अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने भारत की सांस्कृतिक पहचान को बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर सकती है।
इस तरह ऑस्कर 2027 के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री का मामला अब साफ हो गया है। ‘गोंधल’ भारत की तरफ से चुनी गई फिल्म है, जबकि ‘धुरंधर’ और अन्य दावेदार फिल्मों के निर्माताओं के लिए स्वतंत्र रूप से ऑस्कर की प्रक्रिया में जाने का विकल्प अलग से मौजूद है। अब आगे नजर इस बात पर रहेगी कि ‘धुरंधर’ के निर्माता इस विकल्प का इस्तेमाल करते हैं या नहीं और अगर करते हैं, तो फिल्म किस श्रेणी के लिए अपनी दावेदारी पेश करती है।




