संघ लोक सेवा आयोग यानी UPSC ने अपनी स्थापना के 100 साल पूरे कर लिए हैं। 1 अक्टूबर 1926 को अस्तित्व में आए इस संवैधानिक संस्थान की शताब्दी के मौके पर दिल्ली के भारत मंडपम में दो दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया गया। 30 सितंबर से शुरू हुए इस आयोजन के अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिरकत की और आयोग की शताब्दी को देश के युवाओं की आकांक्षाओं और सार्वजनिक सेवा से जोड़ते हुए संबोधित किया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने UPSC के 100 साल के सफर पर आधारित ‘100 Landmark Judgements- Shaping the Policies of UPSC and Public Service Commissions in India’ नामक पुस्तक जारी की। इसके साथ ही शताब्दी स्मारक सिक्का और विशेष डाक टिकट भी जारी किया गया। कार्यक्रम में राज्य लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष एवं सदस्य, केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, शिक्षाविद और UPSC से जुड़े अधिकारी शामिल हुए।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि विकसित भारत के निर्माण के लिए जिस प्रकार की प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत है, उसमें UPSC की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक आयोग के जरिए देश की प्रशासनिक व्यवस्था में आने वाले युवाओं को केवल परीक्षा पास करने वाले उम्मीदवार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उनसे व्यापक राष्ट्रीय जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा होनी चाहिए। उन्होंने इसके लिए दो प्रमुख कसौटियों का उल्लेख किया- ‘नेशन फर्स्ट’ और ‘सिटिजन्स फर्स्ट’। प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रशासन में आने वाले युवाओं के लिए देशहित और नागरिक हित को प्राथमिकता देना महत्वपूर्ण होना चाहिए। उनके अनुसार आने वाले वर्षों में इन्हीं मूल भावनाओं के साथ सार्वजनिक सेवा को आगे बढ़ाने की जरूरत होगी।
मोदी ने UPSC की ऐतिहासिक यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि एक सदी के दौरान देश की सरकारें बदलीं, पीढ़ियां बदलीं, तकनीक बदली और परीक्षा तथा पाठ्यक्रम में भी परिवर्तन आया, लेकिन आयोग के प्रति लोगों का भरोसा बना रहा। उन्होंने UPSC से जुड़े एक प्रदर्शनी स्थल का जिक्र करते हुए नेताजी सुभाष चंद्र बोस की परीक्षा यात्रा का उदाहरण दिया। प्रधानमंत्री के अनुसार जब सुभाष चंद्र बोस ब्रिटिश दौर में इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा प्रक्रिया से गुजरे थे, तब परीक्षा में संस्कृत का पेपर भी होता था और उन्होंने संस्कृत में परीक्षा दी थी। मोदी ने कहा कि UPSC का इतिहास केवल एक परीक्षा संस्था का इतिहास नहीं, बल्कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था में आए बदलावों का भी हिस्सा है।
UPSC की शुरुआत आज के रूप में नहीं हुई थी। आयोग का पहला स्वरूप 1 अक्टूबर 1926 को स्थापित Public Service Commission था। UPSC के आधिकारिक ऐतिहासिक रिकॉर्ड के मुताबिक इसके पहले अध्यक्ष सर रॉस बार्कर थे, जिन्होंने अक्टूबर 1926 से अगस्त 1932 तक पद संभाला। आयोग की स्थापना ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी और शुरुआती दौर में इसकी संरचना ब्रिटिश सिविल सर्विस कमीशन की परंपराओं से प्रभावित थी। बाद के संवैधानिक और प्रशासनिक बदलावों के साथ आयोग का स्वरूप भी बदलता गया।
आज का UPSC संविधान के अनुच्छेद 315 के तहत स्थापित संवैधानिक संस्था है और इसका काम केंद्र सरकार की विभिन्न सेवाओं के लिए भर्ती प्रक्रिया आयोजित करना तथा कई मामलों में नियुक्ति से जुड़े मामलों पर सलाह देना है। आयोग का काम सिर्फ सिविल सर्विस परीक्षा तक सीमित नहीं है। UPSC इंजीनियरिंग, मेडिकल, डिफेंस और अन्य क्षेत्रों से संबंधित कई भर्ती परीक्षाएं और चयन प्रक्रियाएं संचालित करता है। शताब्दी समारोह में UPSC अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने बताया कि आयोग हर साल लगभग 250 अलग-अलग भर्ती प्रक्रियाएं संचालित करता है। उन्होंने यह भी बताया कि परीक्षा कैलेंडर करीब 18 महीने पहले तैयार किया जाता है, जिससे इतने बड़े स्तर पर भर्ती प्रक्रिया की योजना बनाई जा सके।
समय पर परीक्षा आयोजित करने को लेकर भी प्रधानमंत्री ने आयोगों को संदेश दिया। उन्होंने कहा कि प्रतियोगी परीक्षा किसी सामान्य आयोजन की तरह नहीं है, क्योंकि इसका सीधा संबंध युवाओं के भविष्य से होता है। यदि परीक्षा या भर्ती प्रक्रिया में कई महीनों की देरी होती है तो उसका असर उम्मीदवारों की पढ़ाई, उम्र सीमा, करियर योजना और आगे की नियुक्ति प्रक्रिया पर पड़ सकता है। मोदी ने कहा कि बदलती परिस्थितियों के साथ परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं को भी लगातार सुधार करते रहना चाहिए और समयबद्धता को परीक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने प्रशासनिक व्यवस्था में ‘प्रो पीपल’, ‘प्रो एक्टिव’ और ‘गुड गवर्नेंस’ की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रशासन का उद्देश्य केवल नियम लागू करना नहीं बल्कि नागरिकों के लिए व्यवस्था को अधिक प्रभावी और सुगम बनाना होना चाहिए। उनके मुताबिक सरकार को समस्या आने के बाद प्रतिक्रिया देने की बजाय कई मामलों में पहले से संभावित चुनौतियों की पहचान कर समाधान तैयार करना चाहिए। इसी तरह गुड गवर्नेंस का मतलब ऐसी व्यवस्था से है जिसमें नागरिकों को अनावश्यक परेशानी न हो और सरकारी प्रक्रियाएं उनके लिए सरल तथा प्रभावी बनें।
मोदी ने यह भी कहा कि UPSC और राज्य लोक सेवा आयोगों की संस्थागत क्षमता को लगातार मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने मिशन कर्मयोगी के तहत विकसित iGOT प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल आयोगों की आंतरिक कार्यप्रणाली, कर्मचारियों की ट्रेनिंग और क्षमता निर्माण के लिए किए जाने की बात कही। उनका कहना था कि भर्ती आयोगों की जिम्मेदारी केवल उम्मीदवारों का चयन करने तक सीमित नहीं है, क्योंकि इन संस्थाओं के फैसले सीधे लाखों युवाओं के भविष्य को प्रभावित करते हैं। इसलिए तकनीक, प्रशिक्षण और बेहतर प्रक्रियाओं के जरिए आयोगों की कार्यक्षमता बढ़ाना जरूरी है।
UPSC के शताब्दी समारोह में संस्था के अगले चरण को लेकर भी चर्चा हुई। आयोग के अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने भविष्य के लिए ‘Trust, Transparency and Technology’ यानी भरोसा, पारदर्शिता और तकनीक को प्रमुख आधार बताया। उन्होंने कहा कि तकनीक और परीक्षा के तरीके समय के साथ बदल सकते हैं, लेकिन मेरिट, निष्पक्षता और समान अवसर जैसे संवैधानिक सिद्धांतों को कायम रखना जरूरी है। आयोग ने राज्य लोक सेवा आयोगों के साथ बेहतर समन्वय और अनुभव साझा करने के लिए Centre of Excellence जैसी पहल की दिशा में भी बात रखी है।
UPSC की परीक्षा प्रक्रिया का पैमाना भी काफी बड़ा है। उदाहरण के तौर पर 2026 की सिविल सर्विसेज प्रीलिम्स परीक्षा के लिए 8,19,732 उम्मीदवारों ने आवेदन किया था, जबकि करीब 5.49 लाख उम्मीदवार परीक्षा में शामिल हुए। परीक्षा देशभर के 83 शहरों में 2,072 केंद्रों पर आयोजित की गई थी। आयोग ने इस परीक्षा में पहली बार रियल-टाइम फेस ऑथेंटिकेशन जैसी तकनीकी व्यवस्था भी लागू की थी। इससे साफ है कि इतने बड़े स्तर पर परीक्षा आयोजित करना अपने आप में एक जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया है।
हालांकि UPSC की शताब्दी के बीच आयोग की परीक्षा और भर्ती व्यवस्था से जुड़े पुराने विवाद भी चर्चा में हैं। सबसे प्रमुख मामलों में पूजा खेडकर प्रकरण शामिल रहा। 2024 में खेडकर की उम्मीदवारी से जुड़े दस्तावेजों और आरक्षण संबंधी दावों को लेकर विवाद हुआ था। केंद्र सरकार ने उनके दस्तावेजों की जांच के लिए समिति गठित की थी। बाद में यह मामला UPSC की दस्तावेज सत्यापन और उम्मीदवारों की ओर से दिए जाने वाले प्रमाणपत्रों की जांच व्यवस्था पर बहस का कारण बना। 2026 में आयोग ने उम्मीदवारों की पहचान और प्रयासों से जुड़ी गड़बड़ियों को शुरुआती स्तर पर पकड़ने के लिए AI आधारित जांच का इस्तेमाल भी किया और 569 आवेदन खारिज किए गए।
दूसरा बड़ा मुद्दा CSAT को लेकर रहा है। 2011 में सिविल सर्विसेज प्रीलिम्स में लागू किए गए CSAT को लेकर समय-समय पर उम्मीदवारों और विभिन्न समूहों ने सवाल उठाए हैं। आलोचकों का कहना रहा है कि पेपर में गणित, तर्क और भाषा से जुड़े हिस्से कुछ पृष्ठभूमि वाले छात्रों को अपेक्षाकृत फायदा पहुंचा सकते हैं और हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषा के उम्मीदवारों के लिए अनुवाद एवं अध्ययन सामग्री से जुड़ी समस्याएं भी सामने आती रही हैं। हालांकि UPSC का पक्ष यह है कि CSAT केवल क्वालिफाइंग पेपर है और इसमें न्यूनतम 33 प्रतिशत अंक आवश्यक हैं; इसके अंक अंतिम मेरिट में नहीं जोड़े जाते।
पारदर्शिता और लेटरल एंट्री भी UPSC से जुड़ी बहस का हिस्सा रहे हैं। परीक्षा की आंसर-की और कटऑफ जैसे विवरण कब सार्वजनिक किए जाएं, इसको लेकर उम्मीदवारों के बीच लंबे समय से चर्चा होती रही है। वहीं लेटरल एंट्री के जरिए कुछ वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर विशेषज्ञों की सीधी नियुक्ति को लेकर भी मेरिट, आरक्षण और चयन प्रक्रिया पर राजनीतिक तथा सार्वजनिक बहस हुई है। 2024 में केंद्र सरकार ने 45 पदों के लिए जारी लेटरल एंट्री विज्ञापन वापस लेने का निर्णय लिया था। इस मामले में सरकार की ओर से सामाजिक न्याय और आरक्षण से जुड़े पहलुओं का उल्लेख किया गया था।
इस तरह UPSC की 100 साल की यात्रा में एक तरफ संस्था की संवैधानिक भूमिका, व्यापक भर्ती जिम्मेदारी और करोड़ों युवाओं की आकांक्षाओं से उसका जुड़ाव सामने आता है, तो दूसरी तरफ परीक्षा प्रणाली को और अधिक पारदर्शी, समयबद्ध और तकनीकी रूप से मजबूत बनाने की जरूरत पर बहस जारी है। शताब्दी समारोह में सामने आए संदेशों का केंद्र यही रहा कि आने वाले वर्षों में सिविल सेवा की भर्ती व्यवस्था बदलती तकनीक और नई प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप विकसित हो, लेकिन निष्पक्षता, समान अवसर और संवैधानिक मूल्यों को उसकी बुनियाद में बनाए रखा जाए।



