नोबेल शांति पुरस्कार पर दुनिया की नजरें, ट्रम्प से लेकर मार्क कार्नी तक के नाम चर्चा में; ISS की दावेदारी ने बढ़ाई दिलचस्पी

नोबेल शांति पुरस्कार पर दुनिया की नजरें, ट्रम्प से लेकर मार्क कार्नी तक के नाम चर्चा में; ISS की दावेदारी ने बढ़ाई दिलचस्पी

2026 के नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्सुकता बढ़ गई है। शुक्रवार, 9 अक्टूबर को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में पुरस्कार विजेता के नाम की घोषणा की जाएगी। इस बार चर्चा केवल बड़े राजनीतिक नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग, युद्ध प्रभावित लोगों की सहायता और अंतरिक्ष में वैज्ञानिक साझेदारी जैसे विषय भी केंद्र में हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का नाम एक बार फिर सुर्खियों में है। ट्रम्प लंबे समय से इस प्रतिष्ठित सम्मान को पाने की इच्छा जाहिर करते रहे हैं। उनके अलावा कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, पोप लियो XIV और सूडान में आम नागरिकों की मदद करने वाले इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम्स जैसे नामों को लेकर भी चर्चा हो रही है। इस संभावित दावेदारी में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) का जिक्र सबसे अनोखा माना जा रहा है, क्योंकि यह अलग-अलग देशों के वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष यात्रियों के साझा प्रयास का प्रतीक है। हालांकि, विजेता का आधिकारिक नाम सामने आने तक इन नामों को संभावित दावेदारों और चर्चाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

सूडान में नागरिकों की पहल ने खींचा अंतरराष्ट्रीय ध्यान

नोबेल शांति पुरस्कार की चर्चा में सूडान के इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम्स (ERR) का नाम भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह नेटवर्क उन स्थानीय नागरिकों के प्रयासों से जुड़ा है, जिन्होंने युद्ध और मानवीय संकट के बीच जरूरतमंद लोगों तक मदद पहुंचाने का काम किया। सूडान में वर्ष 2023 में गृहयुद्ध शुरू होने के बाद हालात तेजी से बिगड़े। हिंसा, असुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी ने आम लोगों की जिंदगी को मुश्किल बना दिया। संघर्ष के कारण कई विदेशी सहायता संगठनों के कर्मचारियों को देश छोड़ना पड़ा या उनके लिए राहत अभियान चलाना कठिन हो गया। ऐसे समय में स्थानीय समुदायों ने अपने स्तर पर लोगों की सहायता करने की जिम्मेदारी उठाई।

इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम्स से जुड़े स्वयंसेवकों ने जरूरतमंद परिवारों को भोजन उपलब्ध कराने, सामुदायिक रसोई चलाने और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए क्लिनिक संचालित करने जैसे काम किए। इन प्रयासों का उद्देश्य उन लोगों तक पहुंचना था, जिनके लिए सामान्य परिस्थितियों में मिलने वाली सहायता भी मुश्किल हो गई थी। विदेशों में रहने वाले सूडानी नागरिकों ने भी आर्थिक सहयोग देकर इन अभियानों को जारी रखने में मदद की। सीमित संसाधनों और लगातार बनी रहने वाली असुरक्षा के बावजूद स्थानीय लोगों का यह नेटवर्क राहत कार्यों में सक्रिय रहा।

इस पहल को लेकर चर्चा इसलिए भी अहम है, क्योंकि यह दिखाती है कि शांति का मतलब केवल देशों के बीच युद्ध रोकना नहीं होता। संघर्ष के दौरान आम नागरिकों की रक्षा करना, भूख और बीमारी से जूझ रहे लोगों की मदद करना और समुदायों को टूटने से बचाना भी शांति से जुड़े महत्वपूर्ण पहलू हैं। यदि ऐसे किसी संगठन को सम्मान मिलता है, तो इससे युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय नागरिकों की भूमिका और मानवीय सहायता के महत्व को वैश्विक पहचान मिल सकती है।

ट्रम्प को नोबेल मिलने की चर्चा कई साल से जारी

डोनाल्ड ट्रम्प का नोबेल शांति पुरस्कार से जुड़ा दावा नया नहीं है। वर्ष 2019 में उत्तर कोरिया के तत्कालीन नेता किम जोंग उन के साथ उनकी बातचीत के बाद उन्हें इस सम्मान के संभावित दावेदार के तौर पर पेश किया जाने लगा था। उस समय अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच परमाणु कार्यक्रम तथा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर तनाव बना हुआ था। दोनों नेताओं की मुलाकातों को कूटनीतिक बातचीत आगे बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा गया। ट्रम्प के समर्थकों का मानना था कि उत्तर कोरिया के साथ बातचीत के रास्ते खोलने के प्रयासों के लिए उन्हें शांति पुरस्कार मिलना चाहिए।

उस दौर में जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे द्वारा ट्रम्प को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किए जाने की खबरें भी सामने आई थीं। इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पुरस्कार को लेकर बहस तेज कर दी थी। हालांकि, किसी नेता का नामांकन या उसके समर्थन में दिया गया बयान अपने आप में पुरस्कार मिलने की गारंटी नहीं होता। नोबेल शांति पुरस्कार का फैसला स्वतंत्र समिति करती है, जो नामांकन और संबंधित प्रयासों का मूल्यांकन अपने निर्धारित नियमों के तहत करती है।

इसके बाद भी ट्रम्प कई मौकों पर यह दावा करते रहे कि उन्होंने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को समाप्त कराने या देशों के बीच तनाव कम करने में भूमिका निभाई है। उन्होंने भारत और पाकिस्तान समेत आठ संघर्षों को रुकवाने का श्रेय भी खुद को दिया था। उनके इन दावों को लेकर समर्थकों और आलोचकों के बीच मतभेद रहे हैं। जहां समर्थक उनकी कूटनीतिक पहलों को शांति स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण बताते हैं, वहीं आलोचक किसी भी संघर्ष के समाधान में शामिल दूसरे पक्षों, पुराने प्रयासों और वास्तविक परिणामों को भी ध्यान में रखने की जरूरत पर जोर देते हैं।

इस बार भी ट्रम्प का नाम चर्चा में बने रहने की एक वजह यही है कि वह लंबे समय से इस पुरस्कार की सार्वजनिक रूप से इच्छा जाहिर करते आए हैं। लेकिन अंतिम निर्णय नोबेल समिति को ही करना है और किसी भी संभावित दावेदार के बारे में चल रही अटकलों को आधिकारिक घोषणा से अलग समझना जरूरी है।

पिछले साल मारिया मचाडो को मिला था सम्मान, ट्रम्प को सौंपा मेडल

नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर ट्रम्प की दिलचस्पी वर्ष 2025 में भी चर्चा का विषय बनी रही थी। उस साल वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो को यह सम्मान दिया गया था। मचाडो वेनेजुएला में लोकतंत्र और राजनीतिक अधिकारों के लिए अपने अभियान को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखती हैं। पुरस्कार मिलने के बाद उन्होंने ट्रम्प को अपना नोबेल मेडल सौंपा था। उन्होंने इस कदम को वेनेजुएला की स्वतंत्रता और वहां के लोगों के समर्थन में ट्रम्प की भूमिका के प्रति सम्मान के रूप में पेश किया।

इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में काफी ध्यान आकर्षित किया। एक ओर इसे ट्रम्प के प्रति राजनीतिक समर्थन के संकेत के तौर पर देखा गया, वहीं दूसरी ओर इसने नोबेल पुरस्कार की प्रतिष्ठा और उसके प्रतीकात्मक महत्व पर भी चर्चा को जन्म दिया। पुरस्कार किसी व्यक्ति या संस्था को दिया जाता है, इसलिए मेडल किसी दूसरे व्यक्ति को सौंपने से आधिकारिक विजेता का दर्जा नहीं बदलता। मचाडो ही 2025 की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता हैं।

ट्रम्प के समर्थक इस घटना को उनके अंतरराष्ट्रीय प्रभाव और शांति से जुड़े प्रयासों की मान्यता के तौर पर देखते हैं। हालांकि, इस बार पुरस्कार की घोषणा से पहले उनके नाम को लेकर होने वाली चर्चा का अंतिम नतीजे से सीधा संबंध नहीं माना जा सकता। नोबेल समिति का निर्णय ही यह तय करेगा कि 2026 का सम्मान किसे मिलेगा।

अंतरिक्ष में सहयोग के प्रतीक के रूप में ISS की चर्चा

इस साल संभावित दावेदारों के बीच इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का नाम खास ध्यान खींच रहा है। पृथ्वी की सतह से लगभग 400 किलोमीटर ऊपर स्थित यह अंतरिक्ष स्टेशन कई देशों के वैज्ञानिक सहयोग का एक प्रमुख उदाहरण है। यहां अलग-अलग देशों के अंतरिक्ष यात्री वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं और अंतरिक्ष में मानव जीवन तथा पृथ्वी से संबंधित कई विषयों पर शोध करते हैं। यह स्टेशन लगभग 28,000 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से पृथ्वी की परिक्रमा करता है।

ISS की विशेषता यह है कि इसमें शामिल देशों के बीच राजनीतिक मतभेद होने के बावजूद वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग जारी रह सकता है। अमेरिका, रूस, कनाडा, जापान और यूरोपीय देशों की अंतरिक्ष एजेंसियां इस परियोजना में अलग-अलग भूमिकाएं निभाती हैं। अंतरिक्ष स्टेशन का संचालन लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय साझेदारी, साझा संसाधनों और तकनीकी तालमेल पर निर्भर रहा है।

ओस्लो पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक हाकोन जेरलोव ने भी अंतरिक्ष स्टेशन को अंतरराष्ट्रीय सहयोग के उदाहरण के रूप में देखा है। इसकी चर्चा इस विचार से जुड़ी है कि शांति केवल औपचारिक समझौतों या युद्धविराम से नहीं आती, बल्कि ऐसे संस्थानों और परियोजनाओं से भी मजबूत हो सकती है, जहां अलग-अलग देशों के लोग साझा उद्देश्यों के लिए काम करते हैं।

हालांकि, ISS का नाम चर्चा में होना और उसका वास्तव में पुरस्कार के लिए चुना जाना दो अलग बातें हैं। नोबेल शांति पुरस्कार के नियमों और समिति की प्रक्रिया के तहत ही अंतिम फैसला लिया जाएगा। इसके बावजूद, इस उदाहरण ने पुरस्कार से जुड़ी बहस को एक अलग दिशा दी है। इससे यह सवाल सामने आता है कि क्या अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग को भी वैश्विक शांति को मजबूत करने वाले प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।

मार्क कार्नी और पोप लियो XIV पर भी नजर

2026 के संभावित दावेदारों में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और पोप लियो XIV के नाम भी चर्चा में हैं। कार्नी का नाम अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और देशों के बीच सहयोग से जुड़ी चर्चाओं में सामने आया है। वहीं, पोप लियो XIV के संदर्भ में धार्मिक नेतृत्व, संवाद और शांति के संदेश जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया जा रहा है। हालांकि, किसी नाम का चर्चा में होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि संबंधित व्यक्ति को पुरस्कार मिलने वाला है। नोबेल समिति की ओर से विजेता घोषित किए जाने तक ऐसे सभी नामों को संभावनाओं के दायरे में ही रखा जाना चाहिए।

शांति का नोबेल स्वीडन नहीं, नॉर्वे में क्यों दिया जाता है?

नोबेल पुरस्कारों की परंपरा में एक ऐतिहासिक अंतर यह भी है कि भौतिकी, रसायन विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य और अर्थशास्त्र से जुड़े पुरस्कार स्वीडन में दिए जाते हैं, जबकि नोबेल शांति पुरस्कार का फैसला नॉर्वे की समिति करती है और इसकी घोषणा ओस्लो में होती है। इस व्यवस्था की जड़ें अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत में हैं।

अल्फ्रेड नोबेल ने वर्ष 1895 में अपनी वसीयत तैयार की थी। इसमें उन्होंने शांति पुरस्कार के लिए ऐसी समिति निर्धारित की, जिसके सदस्यों का चयन नॉर्वे की संसद करती है। उस समय स्वीडन और नॉर्वे एक ही राजा के अधीन थे, लेकिन दोनों की अपनी संसद और अलग राजनीतिक व्यवस्थाएं थीं। नोबेल ने अपनी वसीयत में शांति पुरस्कार के लिए नॉर्वे को चुनने का स्पष्ट कारण नहीं बताया था।

नोबेल का निधन 1896 में हुआ और वर्ष 1901 में पहली बार उनके नाम पर पुरस्कार दिए गए। इसके बाद 1905 में स्वीडन और नॉर्वे का संघ समाप्त हो गया। दोनों देश अलग-अलग राष्ट्र बन गए, लेकिन शांति पुरस्कार से संबंधित जिम्मेदारी नॉर्वे के पास ही रही। यही वजह है कि आज भी इस पुरस्कार की घोषणा ओस्लो में होती है।

इस ऐतिहासिक व्यवस्था के कारण नोबेल शांति पुरस्कार का चयन बाकी पुरस्कारों से अलग प्रक्रिया के तहत होता है। इसका उद्देश्य उन व्यक्तियों और संगठनों को पहचान देना है, जिनके प्रयास शांति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और संघर्षों के समाधान से जुड़े हों।

घोषणा से पहले दुनिया की निगाहें ओस्लो पर

2026 के नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा से पहले अलग-अलग नामों और पहलों पर चर्चा इस सम्मान के व्यापक दायरे को सामने ला रही है। ट्रम्प की कूटनीतिक महत्वाकांक्षाओं से लेकर सूडान के स्वयंसेवकों की मानवीय सहायता और अंतरिक्ष स्टेशन के साझा वैज्ञानिक प्रयासों तक, संभावित दावेदार शांति के अलग-अलग पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। मार्क कार्नी और पोप लियो XIV के नाम भी इस चर्चा का हिस्सा हैं।

अब सबकी नजरें नॉर्वे की नोबेल समिति की आधिकारिक घोषणा पर टिकी हैं। अंतिम फैसला आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि इस वर्ष सम्मान किसी राजनीतिक नेता, मानवीय सहायता नेटवर्क या किसी अन्य शांति प्रयास से जुड़े व्यक्ति अथवा संगठन को दिया जाएगा। तब तक संभावित दावेदारों के नामों को लेकर जारी चर्चाओं और आधिकारिक निर्णय के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।