अमेरिका में 3 नवंबर 2026 को होने वाले मध्यावधि चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। इस चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सामने अपनी नीतियों के समर्थन को बनाए रखने की चुनौती होगी। खास तौर पर भारतीय मूल के अमेरिकी मतदाताओं के रुख पर नजर रखी जा रही है, क्योंकि 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में इस समुदाय के एक हिस्से ने ट्रंप का समर्थन किया था। अब सवाल यह है कि क्या दो साल पहले रिपब्लिकन पार्टी के साथ खड़े होने वाले भारतीय-अमेरिकी मतदाता इस बार भी उसी राजनीतिक पसंद पर कायम रहेंगे या उनकी प्राथमिकताओं में बदलाव देखने को मिलेगा। सर्वेक्षणों और राजनीतिक विशेषज्ञों की टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि इस समुदाय के भीतर राजनीतिक सोच पहले की तरह एक जैसी नहीं है। आव्रजन नीतियों, एच-1बी वीजा से जुड़े प्रतिबंधों, महंगाई और भारत-अमेरिका संबंधों जैसे मुद्दों ने मतदाताओं की बहस को नया आयाम दिया है। हालांकि, इन संकेतों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि नवंबर में भारतीय-अमेरिकी मतदाता किस पार्टी के पक्ष में मतदान करेंगे।
भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर क्यों उठ रहे सवाल?
2024 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान कुछ भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं को उम्मीद थी कि ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच अच्छे संबंधों से दोनों देशों की साझेदारी को फायदा मिलेगा। उस समय ट्रंप के समर्थन में आने वाले मतदाताओं के लिए विदेश नीति और भारत के साथ अमेरिका के रिश्ते भी अहम विचारों में शामिल थे। लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में व्यापार शुल्क और आव्रजन संबंधी नियमों को लेकर उठे सवालों ने इस उम्मीद पर चर्चा शुरू कर दी है।
ट्रंप प्रशासन की ओर से भारत पर लगाए गए टैरिफ और एच-1बी वीजा कार्यक्रम को लेकर सख्त रुख भारतीय मूल के उन लोगों के लिए चिंता का विषय बना है, जिनकी नौकरी, कारोबार या पारिवारिक योजनाएं इन नीतियों से प्रभावित हो सकती हैं। एच-1बी वीजा अमेरिकी कंपनियों को कुछ विशेष क्षेत्रों में विदेशी पेशेवरों को रोजगार देने की अनुमति देता है। भारतीय पेशेवर इस कार्यक्रम का एक बड़ा हिस्सा रहे हैं। इसलिए इसके नियमों में बदलाव का असर तकनीकी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों और उन्हें नियुक्त करने वाली कंपनियों पर पड़ सकता है।
साउथ एशियंस फॉर अमेरिका से जुड़ी नेहा दीवान के मुताबिक, 2024 में कुछ भारतीय-अमेरिकियों ने इस उम्मीद के साथ ट्रंप को वोट दिया था कि मोदी के साथ उनके संबंध भारत और अमेरिका के बीच बेहतर तालमेल बनाने में मददगार साबित होंगे। अब उनमें से कुछ लोग अपनी पसंद पर दोबारा विचार कर रहे हैं। हालांकि, किसी मतदाता की नाराजगी का अर्थ यह नहीं है कि वह अनिवार्य रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी को ही वोट देगा। कुछ लोग दूसरी पार्टी का समर्थन कर सकते हैं, जबकि दूसरे मतदाता किसी भी पार्टी से दूरी बनाकर निर्दलीय बने रहना पसंद कर सकते हैं।
सर्वे में सामने आई भारतीय-अमेरिकी समुदाय की राजनीतिक तस्वीर
कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के फरवरी 2026 के सर्वेक्षण का हवाला देते हुए फर्स्टपोस्ट ने भारतीय-अमेरिकी समुदाय की राजनीतिक संबद्धता में आए बदलावों को रेखांकित किया। सर्वे के मुताबिक, डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ अपनी पहचान जोड़ने वाले भारतीय-अमेरिकियों का अनुपात 2020 में 52 प्रतिशत था, जो 2026 में घटकर 46 प्रतिशत रह गया। दूसरी ओर, 19 प्रतिशत लोगों ने रिपब्लिकन पार्टी से जुड़ाव बताया, जबकि 29 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने खुद को निर्दलीय कहा।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि भारतीय-अमेरिकी समुदाय में डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन अब भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक आधार बना हुआ है, लेकिन पार्टी से जुड़ाव के स्तर में बदलाव आया है। साथ ही, निर्दलीय मतदाताओं का हिस्सा यह भी दिखाता है कि समुदाय के सभी सदस्य खुद को किसी एक पार्टी से जोड़कर नहीं देखते। चुनाव के दौरान उनकी प्राथमिकताएं अर्थव्यवस्था, रोजगार, आव्रजन, विदेश नीति और दूसरे स्थानीय मुद्दों के आधार पर बदल सकती हैं।
सर्वेक्षण में उम्र और लिंग के आधार पर भी राजनीतिक पसंद में अंतर सामने आया। 40 साल से कम उम्र के भारतीय-अमेरिकी पुरुषों में ट्रंप के समर्थन का स्तर 2024 में 40 प्रतिशत बताया गया था, जो 2026 की शुरुआत में घटकर 24 प्रतिशत रह गया। यह आंकड़ा एक खास आयु और लिंग समूह से संबंधित है। इसलिए इसे पूरे भारतीय-अमेरिकी समुदाय की राय नहीं माना जा सकता। फिर भी, इससे यह समझने में मदद मिलती है कि 2024 में ट्रंप के पक्ष में दिखाई दिया समर्थन हर वर्ग में समान रूप से कायम नहीं है।
इन निष्कर्षों की व्याख्या करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि सर्वेक्षण किसी खास समय पर लोगों की राय दर्ज करते हैं। चुनाव तक राजनीतिक घटनाक्रम, उम्मीदवारों के बयान और नीतिगत फैसले मतदाताओं की प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए मौजूदा आंकड़े समुदाय के भीतर चल रहे बदलावों को समझने का आधार तो देते हैं, लेकिन नवंबर के मतदान का निश्चित परिणाम नहीं बताते।
आव्रजन नीति और एच-1बी वीजा क्यों बने अहम मुद्दे?
भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं के बीच आव्रजन नीति एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में उभरी है। अमेरिका में भारतीय मूल के कई परिवारों के सदस्य अलग-अलग आव्रजन श्रेणियों, रोजगार वीजा और स्थायी निवास की प्रक्रियाओं से जुड़े हैं। ऐसे में वीजा नियमों में बदलाव, आवेदनों की प्रक्रिया और आव्रजन कानूनों को लागू करने के तरीके उनके व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन पर प्रभाव डाल सकते हैं।
ट्रंप प्रशासन की सख्त आव्रजन नीति को लेकर आलोचकों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि इस तरह की कार्रवाई का असर केवल उन लोगों तक सीमित नहीं रहता जिनकी आव्रजन स्थिति विवाद में है, बल्कि परिवारों और व्यापक समुदाय में भी अनिश्चितता पैदा हो सकती है। नेहा दीवान ने भी आव्रजन एवं सीमा शुल्क प्रवर्तन एजेंसी यानी ICE की हिरासत संबंधी कार्रवाइयों को लेकर समुदाय में चिंता का उल्लेख किया है। उनके अनुसार, ऐसी घटनाओं से अमेरिकी नागरिकता प्राप्त कर चुके लोगों के बीच भी अपने परिवारों की सुरक्षा को लेकर सवाल पैदा हो सकते हैं।
इसके अलावा, रोजमर्रा के खर्च में बढ़ोतरी और परिवारों पर पड़ने वाला आर्थिक दबाव भी मतदाताओं की सोच को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, यह मानना सही नहीं होगा कि आव्रजन नीति से असहमति रखने वाला हर भारतीय-अमेरिकी मतदाता ट्रंप या रिपब्लिकन पार्टी के खिलाफ मतदान करेगा। किसी मतदाता के फैसले में कई मुद्दों की भूमिका होती है और अलग-अलग लोग एक ही नीति को अलग नजरिए से देख सकते हैं।
शुरुआती वोटिंग के आंकड़े क्या कहानी बता रहे हैं?
मिडटर्म चुनाव से पहले कई राज्यों में शुरुआती मतदान से जुड़ी गतिविधियां भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बनी हुई हैं। फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, पेन्सिल्वेनिया में डेमोक्रेट्स की ओर से बैलेट की मांग का हिस्सा 66 प्रतिशत बताया गया है। आयोवा में यह अनुपात पिछले चुनाव के 54 प्रतिशत से बढ़कर 67 प्रतिशत हो गया, जबकि नॉर्थ कैरोलिना में डेमोक्रेट्स की बैलेट मांग 36 प्रतिशत से बढ़कर 42 प्रतिशत बताई गई है।
इन आंकड़ों को लेकर सावधानी बरतना जरूरी है। बैलेट की मांग, पार्टी में पंजीकरण और मतदान के प्रति उत्साह से मतदाताओं की सक्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन इनसे यह पता नहीं चलता कि मतदाता आखिरकार किस उम्मीदवार या पार्टी को वोट देंगे। शुरुआती मतदान की आदतें भी अलग-अलग राज्यों और राजनीतिक समूहों में भिन्न हो सकती हैं। इसलिए इन आंकड़ों को किसी पार्टी की निश्चित चुनावी बढ़त के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं के मामले में भी यही बात लागू होती है। अगर कोई मतदाता ट्रंप की नीतियों से असहमत है, तो यह जरूरी नहीं कि वह डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ पूरी तरह जुड़ जाए। इसी तरह, डेमोक्रेटिक पार्टी से निराश मतदाता रिपब्लिकन पार्टी में जाने के बजाय निर्दलीय रह सकता है। चुनावी नतीजों को समझने के लिए वास्तविक मतदान, मतदाताओं की पसंद और अलग-अलग क्षेत्रों के परिणामों को देखना होगा।
विशेषज्ञों ने क्या कहा, क्यों आसान नहीं है वोटरों का रुख समझना?
पॉलिटिकल कंसल्टिंग फर्म जेडी एडवाइजरी ग्रुप के मैनेजिंग पार्टनर अमित जानी के अनुसार, मौजूदा राजनीतिक माहौल और मध्यावधि चुनावों में मतदान के पुराने पैटर्न को देखते हुए डेमोक्रेटिक पार्टी के पास उम्मीद बनाए रखने के कारण हैं। हालांकि, उनका जोर इस बात पर भी है कि शुरुआती मतदान से जुड़े आंकड़ों को अंतिम वोटिंग पसंद के बराबर नहीं माना जा सकता।
पार्टी रजिस्ट्रेशन, बैलेट के लिए किए गए अनुरोध और शुरुआती मतदान के आंकड़े यह दिखा सकते हैं कि कौन-से मतदाता चुनाव में भाग लेने के लिए सक्रिय हैं। लेकिन इनसे मतदाताओं की वास्तविक पसंद का पूरा विवरण नहीं मिलता। इसीलिए किसी एक आंकड़े के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि भारतीय-अमेरिकी समुदाय का बड़ा हिस्सा किसी एक पार्टी की ओर लौट रहा है।
नेहा दीवान ने भी इस विषय पर संतुलित नजरिया रखने की जरूरत बताई है। उनके मुताबिक, डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक अक्सर जल्दी मतदान करते हैं और 2024 में भी ऐसा देखने को मिला था। उन्होंने यह भी कहा कि चुनावी सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठने के कारण अलग-अलग संकेतों का सावधानी से विश्लेषण करना चाहिए।
दीवान भारतीय-अमेरिकी समुदाय में बढ़ती राजनीतिक दिलचस्पी को महत्वपूर्ण मानती हैं, लेकिन इस सक्रियता का लाभ किस पार्टी को मिलेगा, इसे लेकर स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। मतदाताओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ने का मतलब यह भी हो सकता है कि वे अपनी चिंताओं को चुनाव के माध्यम से सामने रखना चाहते हैं। जरूरी नहीं कि उनकी पसंद केवल दो प्रमुख पार्टियों तक सीमित हो।
भारतीय-अमेरिकी मतदाता अब एक ही दिशा में नहीं सोचते
अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों को लंबे समय से डेमोक्रेटिक पार्टी का महत्वपूर्ण समर्थक वर्ग माना जाता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में इस समुदाय की राजनीतिक प्राथमिकताओं में विविधता दिखाई दी है। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप को मिला समर्थन इस बदलाव का एक उदाहरण था। अब 2026 के सर्वेक्षण में निर्दलीय मतदाताओं का बढ़ा हिस्सा बताता है कि पार्टी से जुड़ाव के मामले में समुदाय के भीतर कई तरह की प्रवृत्तियां मौजूद हैं।
उम्र, लिंग, शिक्षा, आमदनी और अमेरिका में जन्म लेने या विदेश से आकर बसने जैसे कारक राजनीतिक पसंद को प्रभावित कर सकते हैं। युवा पेशेवरों के लिए रोजगार और वीजा के नियम अहम हो सकते हैं, जबकि दूसरे परिवारों के लिए महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़े सवाल अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं। अलग-अलग मतदाताओं के अनुभव और प्राथमिकताएं भी एक-दूसरे से काफी भिन्न हो सकती हैं।
कार्नेगी एंडोमेंट के सर्वेक्षण में भी भारतीय-अमेरिकियों की राजनीतिक संबद्धता में बदलाव और निर्दलीय पहचान के बढ़ते महत्व की ओर इशारा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, समुदाय अब भी डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर अधिक झुकाव रखता है, लेकिन पार्टी के प्रति जुड़ाव पहले जितना मजबूत नहीं रह गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी असंतुष्ट मतदाता रिपब्लिकन पार्टी की तरफ जा रहे हैं। राजनीतिक दूरी बढ़ने और किसी दूसरी पार्टी को समर्थन देने के बीच अंतर है।
3 नवंबर के चुनाव में किन बातों पर रहेगी नजर?
मध्यावधि चुनाव में भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं का रुख समझने के लिए कई पहलुओं पर ध्यान देना होगा। सबसे पहले यह देखना होगा कि एच-1बी वीजा और दूसरी आव्रजन नीतियों को लेकर उनकी चिंताएं मतदान के फैसले में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके साथ ही महंगाई, रोजगार, परिवारों के खर्च और अमेरिका की अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों की राय भी मायने रखेगी।
दूसरा पहलू यह होगा कि 2024 में ट्रंप का समर्थन करने वाले मतदाता इस बार अपनी पसंद बरकरार रखते हैं या उनमें बदलाव आता है। तीसरा सवाल यह है कि डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़ाव कम होने के बावजूद क्या उसके पुराने समर्थक दोबारा सक्रिय रूप से उसके साथ खड़े होते हैं, या निर्दलीय मतदाताओं का हिस्सा और महत्वपूर्ण बनता है।
भारत-अमेरिका संबंधों पर ट्रंप प्रशासन की नीतियों को लेकर असंतोष भी चर्चा में बना रह सकता है, लेकिन सर्वेक्षणों के आधार पर यह मानना सही नहीं होगा कि विदेश नीति ही मतदान का सबसे बड़ा कारण होगी। मतदाता अपने व्यक्तिगत अनुभवों और घरेलू मुद्दों को भी प्राथमिकता दे सकते हैं।
कुल मिलाकर, 2026 के मिडटर्म चुनाव से पहले भारतीय-अमेरिकी समुदाय की राजनीतिक पसंद में बदलाव के संकेत जरूर दिखाई दे रहे हैं, लेकिन तस्वीर अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ पारंपरिक जुड़ाव बना हुआ है, रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक भी मौजूद हैं और बड़ी संख्या में लोग खुद को निर्दलीय मानते हैं। ऐसे में 3 नवंबर का मतदान यह समझने का अवसर देगा कि पिछले दो वर्षों की नीतियों और राजनीतिक घटनाक्रम ने इस विविध समुदाय की प्राथमिकताओं को किस तरह प्रभावित किया है। फिलहाल, किसी एक पार्टी के पक्ष में व्यापक बदलाव का दावा करने के बजाय सर्वेक्षणों, वास्तविक मतदान और मतदाताओं की अलग-अलग चिंताओं को साथ रखकर देखना अधिक उचित होगा।




