जंतर-मंतर पहुंचने से पहले ही रोके गए प्रदर्शनकारी, दिल्ली में सुरक्षा का घेरा; ममता के मुंह पर बैंडेज, सड़कों पर उतरी पुलिस

जंतर-मंतर पहुंचने से पहले ही रोके गए प्रदर्शनकारी, दिल्ली में सुरक्षा का घेरा; ममता के मुंह पर बैंडेज, सड़कों पर उतरी पुलिस

दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन ने राजनीतिक माहौल गरमा दिया। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की अगुवाई में आयोजित इस प्रदर्शन में तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, वामपंथी संगठनों और दूसरे विपक्षी समूहों के नेताओं ने हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों की योजना जंतर-मंतर पर इकट्ठा होकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सवाल उठाने की थी। हालांकि, पुलिस ने प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी और अलग-अलग स्थानों पर लोगों को हिरासत में लेना शुरू कर दिया। जंतर-मंतर की ओर जाने वाले रास्तों पर बैरिकेडिंग की गई, कई इलाकों में आवाजाही प्रभावित हुई और सार्वजनिक परिवहन को लेकर भी यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा। इस बीच पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मुंह पर बैंडेज लगाकर विरोध जताने की तस्वीर चर्चा में रही। दिल्ली में प्रदर्शन को रोकने के लिए की गई व्यापक कार्रवाई के चलते राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए।

ममता बनर्जी ने मुंह पर बैंडेज लगाकर जताया विरोध

प्रदर्शन के दौरान ममता बनर्जी की एक तस्वीर ने खासा ध्यान खींचा, जिसमें उनके मुंह पर बैंडेज लगा दिखाई दिया। यह विरोध के प्रतीक के तौर पर सामने आया। ममता और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठाए और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों का मुद्दा उठाया। पार्टी की ओर से लगाए गए पोस्टरों में बंगाल में वोटों की कथित हेराफेरी के आरोप लगाए गए थे। तृणमूल नेताओं का कहना था कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए।

दिल्ली में ममता बनर्जी के साथ तृणमूल कांग्रेस के कई सांसद भी मौजूद थे। दक्षिण एवेन्यू बस स्टैंड के पास प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। इस कार्रवाई के समय तृणमूल सांसद डेरेक ओ’ब्रायन और पुलिसकर्मियों के बीच तीखी बहस भी हुई। पार्टी नेताओं ने हिरासत की कार्रवाई पर सवाल उठाए और इसे लोकतांत्रिक विरोध की आवाज दबाने की कोशिश बताया। ममता के मुंह पर बैंडेज वाली तस्वीर सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हुई और प्रदर्शन की सबसे चर्चित तस्वीरों में शामिल हो गई।

जंतर-मंतर पर नहीं पहुंच सके प्रदर्शनकारी, कई जगह हिरासत

CJP ने जंतर-मंतर पर जुटने का आह्वान किया था, लेकिन दिल्ली पुलिस ने इस आयोजन को अनुमति देने से इनकार कर दिया था। पुलिस की दलील थी कि प्रदर्शन की सूचना देर से दी गई थी और पहले हुए एक प्रदर्शन के दौरान नियमों के उल्लंघन तथा कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका को देखते हुए अनुमति नहीं दी जा सकती। इसके बाद शनिवार सुबह से ही राजधानी के प्रमुख इलाकों में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई।

जंतर-मंतर की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे प्रदर्शनकारियों को अलग-अलग जगहों पर रोका गया। पुलिस ने बैरिकेड लगाकर रास्ते बंद किए और कई लोगों को हिरासत में लेकर बसों में बैठाया। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए मध्य दिल्ली के साथ-साथ शहर की सीमाओं पर भी निगरानी बढ़ाई गई। कुछ प्रदर्शनकारी कैब और अन्य वाहनों से आयोजन स्थल तक पहुंचना चाहते थे, लेकिन रास्तों में जांच और बैरिकेडिंग के कारण उन्हें भी दिक्कत हुई।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जंतर-मंतर तक पहुंचने में नाकाम रहे लोगों ने बाद में दिल्ली के दूसरे हिस्सों में छोटे-छोटे समूहों में विरोध प्रदर्शन किए। इनमें दिल्ली हाट, सफदरजंग फ्लाईओवर, कनॉट प्लेस और राजघाट के आसपास के इलाके शामिल थे। इन जगहों पर जुटे लोगों को भी पुलिस ने हटाया और कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। इस तरह विरोध प्रदर्शन एक स्थान तक सीमित रहने के बजाय राजधानी के कई हिस्सों में दिखाई दिया।

CJP के प्रमुख नेताओं को भी हिरासत में लिया गया

प्रदर्शन से पहले ही CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके और संगठन से जुड़े वरिष्ठ नेताओं सौरव दास तथा आशुतोष रांका को दिल्ली हवाई अड्डे पर हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई। संगठन के मुताबिक, ये नेता मुंबई से दिल्ली पहुंचे थे और जंतर-मंतर पर होने वाले कार्यक्रम में शामिल होने वाले थे। उनकी हिरासत के बाद पार्टी ने पुलिस की कार्रवाई पर आपत्ति जताई और नेताओं की रिहाई की मांग की।

CJP का कहना था कि चुनाव आयोग के खिलाफ आवाज उठाना और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल करना लोकतांत्रिक अधिकार है। संगठन ने आरोप लगाया कि उसके नेताओं और समर्थकों को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से रोकने के लिए व्यापक स्तर पर कार्रवाई की गई। वहीं, पुलिस की ओर से सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता जताई गई।

इस घटनाक्रम ने प्रदर्शन के उद्देश्य के साथ-साथ विरोध करने के अधिकार और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर भी बहस छेड़ दी। प्रदर्शनकारी चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे थे, जबकि प्रशासन का ध्यान राजधानी में संभावित भीड़, यातायात और कानून-व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित रखने पर था।

दिल्ली मेट्रो से लेकर रेलवे तक, यात्रियों की बढ़ी परेशानी

प्रदर्शन का असर केवल राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा। दिल्ली में आने-जाने वाले आम यात्रियों को भी परिवहन संबंधी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास को लेकर प्रतिबंध लगाए गए। कुछ प्रमुख स्टेशनों पर गेट बंद किए गए, जबकि यात्रियों को वैकल्पिक रास्तों और यात्रा की योजना बनाने की जरूरत पड़ी।

नई दिल्ली, राजीव चौक, केंद्रीय सचिवालय, पटेल चौक और कश्मीरी गेट जैसे व्यस्त मेट्रो स्टेशनों को लेकर विशेष सतर्कता बरती गई। हालांकि, अलग-अलग समय पर लागू प्रतिबंधों की स्थिति बदलती रही। इसलिए सभी स्टेशनों को पूरे दिन बंद रहने की स्थिति के रूप में देखना सही नहीं होगा। यात्रियों को मेट्रो की आधिकारिक सूचनाओं के आधार पर अपनी यात्रा तय करने की सलाह दी गई।

रेलवे सेवाओं पर भी असर पड़ा। विरोध प्रदर्शन के दौरान राजधानी के प्रमुख रेलवे स्टेशनों के आसपास भारी यातायात और भीड़ की आशंका के चलते कई ट्रेनों को रद्द करने का फैसला किया गया। रिपोर्टों के मुताबिक, नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन पहुंचने वाली तथा वहां से चलने वाली अनेक ट्रेनें प्रभावित हुईं। कुछ स्थानीय और यात्री सेवाओं को भी रद्द किया गया।

रेलवे की ओर से यात्रियों को अपनी ट्रेन की स्थिति पहले जांचने की सलाह दी गई। इस वजह से स्टेशन पहुंचने वाले लोगों को वैकल्पिक ट्रेन, दूसरी यात्रा व्यवस्था या अपने कार्यक्रम में बदलाव करना पड़ा। मेट्रो और रेलवे पर एक साथ पड़े प्रभाव के चलते शनिवार को दिल्ली में सफर करना सामान्य दिनों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण रहा।

बाजारों और सार्वजनिक स्थानों पर भी सुरक्षा का असर

राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था सख्त होने का असर बाजारों और सार्वजनिक स्थानों पर भी देखने को मिला। मध्य दिल्ली के संवेदनशील इलाकों में पुलिस की मौजूदगी बढ़ाई गई और कई जगहों पर लोगों की आवाजाही पर नियंत्रण रखा गया। दुकानों के बंद रहने और कुछ व्यावसायिक गतिविधियों के प्रभावित होने की खबरें भी सामने आईं। हालांकि, पूरे दिल्ली शहर में सभी दुकानें बंद होने की पुष्टि नहीं हुई थी। इसलिए इसे पूरी राजधानी में घोषित बंद के बजाय कुछ इलाकों में प्रतिबंधों और सुरक्षा संबंधी व्यवधानों के रूप में समझना ज्यादा उचित होगा।

रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों की भीड़ और ट्रेनों के रद्द होने की खबरों के बीच लोगों को अपनी यात्रा की योजना बदलनी पड़ी। वहीं, मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास संबंधी प्रतिबंधों के कारण यात्रियों को वैकल्पिक स्टेशनों या दूसरे साधनों का सहारा लेना पड़ा। पुलिस की कार्रवाई के चलते प्रदर्शनकारियों के अलावा आम लोगों की दिनचर्या भी प्रभावित हुई।

दिल्ली में किसी औपचारिक, शहरव्यापी बंद की घोषणा नहीं की गई थी। इसके बावजूद सुरक्षा इंतजामों, यातायात नियंत्रण और परिवहन सेवाओं में बदलाव के कारण कुछ इलाकों में बंद जैसे हालात महसूस किए गए।

अरविंद केजरीवाल और वामपंथी नेताओं ने भी उठाई आवाज

CJP के प्रदर्शन को आम आदमी पार्टी और दूसरे विपक्षी दलों का भी समर्थन मिला। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल भी विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में हिरासत में लिए गए। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन समेत अन्य विपक्षी नेताओं के हिरासत में लिए जाने की खबरें भी सामने आईं। इस घटनाक्रम ने विरोध को केवल एक संगठन का कार्यक्रम रहने के बजाय व्यापक विपक्षी विरोध का रूप दे दिया।

विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की भूमिका और मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। उनका आरोप था कि मतदाता सूची में बदलावों की प्रक्रिया से मताधिकार प्रभावित हो सकता है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। प्रदर्शनकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी कर रहे थे।

वहीं, भारतीय जनता पार्टी की ओर से इस प्रदर्शन को लेकर अलग रुख सामने आया। भाजपा सांसद और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने इसे असफल प्रदर्शन बताते हुए कहा कि जंतर-मंतर की घटनाएं पूरे देश की भावना का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर अव्यवस्था पैदा करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। इसके जवाब में CJP की नेता रत्ना सिंह ने कहा कि प्रदर्शनकारियों को आयोजन स्थल तक पहुंचने से रोककर फिर प्रदर्शन को असफल बताना उचित नहीं है। उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध की अनुमति देने की मांग की।

SIR बना विरोध प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा

इस पूरे विवाद के केंद्र में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR भी रहा। विपक्षी दलों और प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में नामों को हटाने या बदलने की प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। उनका कहना था कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से सूची से बाहर नहीं होना चाहिए।

CJP ने इसी मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग से जवाबदेही की मांग की थी। संगठन का विरोध मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ था और प्रदर्शनकारियों ने उनके इस्तीफे की मांग को प्रमुखता से उठाया। इस मामले ने चुनावी प्रक्रिया, मतदाता अधिकारों और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही पर एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दिया।

हालांकि, मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के आरोप और उन पर चुनाव आयोग का पक्ष अलग-अलग विषय हैं। प्रदर्शन के दौरान लगाए गए आरोपों को स्थापित तथ्य मानने के बजाय उनकी स्वतंत्र जांच और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर समझना जरूरी है। यही विवाद अब राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का एक प्रमुख मुद्दा बन गया है।

हिरासत की कार्रवाई पर उठे सवाल, विरोध जारी रखने का ऐलान

प्रदर्शन के बाद हिरासत में लिए गए लोगों और पुलिस की कार्रवाई को लेकर विवाद और गहरा गया। CJP की नेता रत्ना सिंह ने आरोप लगाया कि उन्हें प्रदर्शन में शामिल होने से रोका गया और उनके साथ अनुचित व्यवहार किया गया। उन्होंने इस मामले में पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए दिल्ली की अदालत का रुख भी किया। उनकी याचिका में कथित तौर पर गलत तरीके से रोकने और हिरासत में रखने के मामले की जांच की मांग की गई।

दूसरी ओर, प्रशासन की ओर से सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति, पुलिस की शक्तियों और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर सवाल खड़े किए।

CJP ने संकेत दिया कि वह चुनाव आयोग के खिलाफ अपना विरोध जारी रखेगी। संगठन के नेताओं का कहना था कि केवल हिरासत में लेने से उनकी मांगें समाप्त नहीं होंगी। इस बीच विपक्षी दलों ने भी मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर अपनी आवाज उठाने के संकेत दिए।

जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन को रोकने के लिए किए गए सुरक्षा इंतजामों का असर दिल्ली के कई हिस्सों तक पहुंचा। ममता बनर्जी के मुंह पर बैंडेज वाली तस्वीर, विपक्षी नेताओं की हिरासत, मेट्रो और रेल सेवाओं में व्यवधान तथा राजनीतिक बयानबाजी इस पूरे मामले के प्रमुख पहलू बने। अब इस विवाद का अगला चरण इस बात पर निर्भर करेगा कि चुनाव आयोग और प्रशासन उठाए गए सवालों पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को आगे किस तरह रखते हैं।