मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में नगा और कुकी समुदायों के बीच बढ़ता तनाव एक बार फिर गंभीर सुरक्षा चुनौती बन गया है। कांगपोकपी और कामजोंग जिलों में हिंसक घटनाओं के बाद प्रशासन को 24 घंटे का कर्फ्यू लागू करना पड़ा। बाजार बंद रहे और आम लोगों की आवाजाही पर रोक लग गई। हालात बिगड़ने के बाद संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF), असम राइफल्स, कोबरा बटालियन और मणिपुर पुलिस के कमांडो को अलग-अलग स्थानों पर तैनात किया गया है। अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती हिंसा को दूसरे इलाकों में फैलने से रोकना, गांवों में फंसे लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और हमलों में शामिल संदिग्धों का पता लगाना है।
पिछले दिनों हुई गोलीबारी और आगजनी की घटनाओं में 10 लोगों की जान जाने की खबर ने पूरे क्षेत्र में दहशत बढ़ा दी है। मृतकों में नगा और कुकी समुदायों के लोगों के अलावा एक नेपाली नागरिक भी शामिल बताया गया है। हिंसा के दौरान दोनों समुदायों से जुड़े 14 घरों को आग के हवाले कर दिया गया। चसाड इलाके में पुलिस थाने को भी निशाना बनाने की कोशिश की गई। लगातार सामने आ रही घटनाओं के कारण स्थानीय लोगों में असुरक्षा की भावना गहरी हो गई है। कई गांवों के निवासी घरों के भीतर रहने को मजबूर हैं, जबकि सुरक्षा एजेंसियां उन क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा रही हैं, जहां दोबारा गोलीबारी होने की आशंका है।
संवेदनशील गांवों में तलाशी अभियान, कई सुरक्षा एजेंसियां तैनात
जिले में शांति बहाल करने के लिए पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों ने संयुक्त रूप से अभियान तेज किया है। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, माकुई अशांग, तपोन और चसाड जैसे संवेदनशील इलाकों में संदिग्ध उपद्रवियों की तलाश की जा रही है। इसके लिए घर-घर जाकर तलाशी ली जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि हालिया हमलों में कौन लोग शामिल थे और क्या उन्हें सीमा पार सक्रिय किसी संगठन से मदद मिली थी।
इलाके में बड़ी संख्या में जवानों की मौजूदगी के बावजूद स्थानीय लोगों का कहना है कि गोलीबारी का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सीमावर्ती गांव के निवासी डेविड जॉन्सन के मुताबिक, लोग पिछले दिन से घरों में बंद हैं। उन्होंने बताया कि रात भर गोलियों की आवाजें सुनाई देती रहीं और सुबह भी बफर जोन के आसपास के गांवों में फायरिंग की घटनाएं हुईं। उनके अनुसार, भारी सुरक्षा तैनाती के बावजूद हमलावरों के गांवों तक पहुंचने और बस्तियों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं चिंता बढ़ा रही हैं।
प्रशासन के लिए केवल कर्फ्यू लागू करना ही पर्याप्त नहीं है। उसे प्रभावित गांवों में लोगों की सुरक्षा, संभावित हमलों को रोकने और समुदायों के बीच बढ़ते अविश्वास को कम करने की चुनौती का भी सामना करना पड़ रहा है। ऐसे इलाकों में स्थिति और जटिल हो जाती है, जहां दोनों समुदायों के लोग लंबे समय से आसपास के गांवों में रहते आए हैं। हिंसा बढ़ने के बाद सामान्य गतिविधियां बाधित होने के साथ-साथ लोगों के बीच संपर्क और आवाजाही भी प्रभावित हुई है।
चसाड में बंकरों को लेकर विवाद के बाद बढ़ा तनाव
हालिया घटनाक्रम में चसाड क्षेत्र की स्थिति खास तौर पर तनावपूर्ण रही। पुलिस के अनुसार, चसाड थाने के आसपास अवैध बंकर बनाए जाने की जानकारी मिलने के बाद सुरक्षा बलों ने कार्रवाई शुरू की थी। इस दौरान कुछ महिलाओं ने निर्माण कार्य रोकने की कोशिश की। इसके बाद अज्ञात हमलावरों की ओर से सुरक्षाकर्मियों पर गोलीबारी किए जाने की सूचना सामने आई। इस घटना में 42 वर्षीय एक महिला की मौत हो गई। इसके बाद इलाके में आगजनी और फायरिंग की घटनाएं हुईं, जिससे हालात और बिगड़ गए।
घटनाओं के दौरान नगा और कुकी समुदायों से जुड़े कुल 14 घरों को जला दिया गया। उपद्रवियों ने चसाड पुलिस थाने में आग लगाने का प्रयास भी किया। इस तरह सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए मौजूद संस्थानों और स्थानीय बस्तियों, दोनों के लिए खतरा पैदा हो गया। अधिकारियों को आशंका है कि यदि समय रहते हिंसा पर काबू नहीं पाया गया, तो इसका असर आसपास के अन्य गांवों पर भी पड़ सकता है।
इन घटनाओं के पीछे की पूरी जिम्मेदारी और हमलों की परिस्थितियों की जांच जरूरी है। फिलहाल सुरक्षा बलों का प्राथमिक उद्देश्य हिंसा को रोकना, संदिग्धों की पहचान करना और संवेदनशील स्थानों पर दोबारा हमले होने की आशंका कम करना है। स्थानीय स्तर पर विवादों का समाधान नहीं होने और एक-दूसरे पर आरोप लगाने की प्रवृत्ति ने स्थिति को और कठिन बना दिया है।
म्यांमार सीमा से जुड़े उग्रवादी संगठनों की भूमिका पर भी सवाल
मणिपुर में हालिया हिंसा के बीच सीमा पार सक्रिय उग्रवादी समूहों की संभावित भूमिका भी चर्चा में है। पिलोंग में 24 सितंबर को तांगखुल नगा समुदाय के लोगों की हत्या के मामले में कुकी नेशनल आर्मी-बर्मा (KNA-B) और म्यांमार में सक्रिय पीपुल्स डिफेंस फोर्स (PDF) के कुछ गुटों के नाम सामने आने की बात कही गई थी। शनिवार को सीमा स्तंभ संख्या 102 के नजदीक चसाड क्षेत्र में KNA-B से जुड़े तीन उग्रवादियों के मारे जाने की जानकारी भी सामने आई।
म्यांमार में फरवरी 2021 में सैन्य तख्तापलट के बाद वहां संघर्ष और अस्थिरता बढ़ी है। इस घटनाक्रम का असर भारत-म्यांमार सीमा से लगे इलाकों की सुरक्षा पर भी पड़ता रहा है। सीमावर्ती क्षेत्रों में सक्रिय सशस्त्र समूहों की आवाजाही, हथियारों की उपलब्धता और स्थानीय विवादों में बाहरी तत्वों की संभावित भागीदारी सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय है। हालांकि, किसी विशेष हमले में किस संगठन की वास्तविक भूमिका रही, इसका निर्धारण जांच और उपलब्ध सबूतों के आधार पर ही किया जा सकता है।
स्थानीय निवासियों का आरोप है कि बाहरी उग्रवादी समूहों की गतिविधियों से गांवों में असुरक्षा बढ़ी है। उनका कहना है कि सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बावजूद हमलों का खतरा बना हुआ है। ऐसे आरोपों की निष्पक्ष जांच और सीमा पर निगरानी मजबूत करना आने वाले दिनों में प्रशासन के लिए अहम रहेगा।
उखरुल तक सीमित विवाद अब कई जिलों में फैला
नगा-कुकी संघर्ष की शुरुआत और उसके विस्तार को समझने के लिए क्षेत्र के सामाजिक और भौगोलिक हालात पर ध्यान देना जरूरी है। पहले यह तनाव मुख्य रूप से उखरुल जिले के कुछ इलाकों तक सीमित माना जाता था, लेकिन बाद में कांगपोकपी, सेनापति, तामेंगलांग और कामजोंग के हिस्सों में भी हिंसक घटनाएं सामने आने लगीं। इन क्षेत्रों में नगा और कुकी समुदायों के लोग एक-दूसरे के नजदीक रहते हैं। ऐसे में किसी एक स्थान पर होने वाली घटना का असर आसपास की बस्तियों तक पहुंच सकता है।
अब दोनों पक्ष एक-दूसरे पर सशस्त्र लोगों को संरक्षण देने और क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करने जैसे आरोप लगा रहे हैं। आरोप-प्रत्यारोप के इस माहौल में स्थानीय विवाद तेजी से सामुदायिक तनाव का रूप ले सकते हैं। गोलीबारी, घरों में आग लगाने और लोगों की मौत जैसी घटनाओं के बाद बदले की आशंका भी बढ़ जाती है। यही वजह है कि प्रशासन के लिए केवल किसी एक घटना को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि व्यापक क्षेत्र में शांति बनाए रखना जरूरी हो गया है।
फरवरी से दोबारा तेज हुई हिंसा के बाद से मणिपुर के विभिन्न इलाकों में मौतों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। उपलब्ध विवरण में करीब 40 लोगों की मौत का उल्लेख है, जबकि बाद की कुछ रिपोर्टों में इससे अधिक संख्या बताई गई है। आंकड़ों में अंतर के कारण घटनाओं की समय-सीमा और रिपोर्टिंग के स्रोतों को ध्यान में रखना जरूरी है। इतना स्पष्ट है कि लगातार हो रही हिंसक घटनाओं ने प्रभावित जिलों में सामान्य जीवन और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर असर डाला है।
फरवरी से सितंबर तक कई बार भड़की हिंसा, गांवों में आगजनी और गोलीबारी
मणिपुर में नगा और कुकी समुदायों के बीच तनाव पिछले कई महीनों से अलग-अलग घटनाओं के रूप में सामने आता रहा है। फरवरी में उखरुल जिले के लितान इलाके में एक मामूली विवाद के बाद हालात बिगड़ने शुरू हुए। 7 फरवरी की रात दो तांगखुल नगा और दो कुकी युवकों के बीच झगड़ा हुआ था। अगले दिन एक कुकी परिवार के खाली घर में आग लगा दी गई। इसके बाद आरोपियों को सौंपने की मांग को लेकर तनाव बढ़ा और पत्थरबाजी तथा गोलीबारी की घटनाएं सामने आईं। कई घरों को नुकसान पहुंचा, जिसके बाद प्रशासन को कर्फ्यू लगाने और इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध जैसे कदम उठाने पड़े।
अप्रैल में भी हिंसा का सिलसिला थमा नहीं। 24 और 25 अप्रैल को उखरुल जिले के सिनाकीथेल तथा मुल्लम गांवों के आसपास गोलीबारी की दो घटनाएं हुईं। इनमें कम से कम तीन लोगों की मौत की खबर आई थी। मृतकों में तांगखुल नगा समुदाय का एक व्यक्ति भी शामिल बताया गया। इन घटनाओं ने दोनों समुदायों के बीच पहले से मौजूद अविश्वास को और बढ़ा दिया। सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौती यह थी कि एक इलाके में तनाव कम होने के बाद किसी दूसरे स्थान पर नई हिंसक घटना सामने आ रही थी।
मई में उखरुल और कामजोंग जिलों के कुछ गांवों में गोलीबारी और आगजनी की घटनाएं हुईं। इन घटनाओं में कम से कम छह लोगों के घायल होने की सूचना मिली थी। भारत-म्यांमार सीमा के पास तांगखुल नगा समुदाय के तीन गांवों में भी हमलों और आगजनी की खबरें सामने आईं। कुछ रिपोर्टों में करीब 15 घरों को निशाना बनाए जाने का उल्लेख किया गया। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं ने सीमा से सटे गांवों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी।
अगस्त के अंतिम दिनों में भी दोनों समुदायों के बीच हिंसा की खबरें आईं। ह्यूमन राइट्स वॉच के हवाले से सामने आए विवरण में नगा और कुकी-जो समुदायों के बीच संघर्ष के दौरान कम से कम सात लोगों की मौत का उल्लेख किया गया। सितंबर की शुरुआत तक फरवरी से शुरू हुए संघर्ष में मृतकों की संख्या 34 बताई गई थी। इसके बाद सितंबर के अंत तक कुछ रिपोर्टों में नगा-कुकी हिंसा से जुड़ी मौतों का आंकड़ा 50 से अधिक बताया गया। हालांकि, अलग-अलग रिपोर्टों में घटनाओं की समय-सीमा और मृतकों की संख्या में अंतर होने के कारण इन आंकड़ों की तुलना सावधानी से की जानी चाहिए।
शांति बहाली के सामने प्रशासन की बड़ी चुनौती
मौजूदा हालात में प्रशासन के सामने सबसे जरूरी काम हिंसा की नई घटनाओं को रोकना और प्रभावित इलाकों में सामान्य स्थिति बहाल करना है। कर्फ्यू और अतिरिक्त सुरक्षा तैनाती के जरिए लोगों की आवाजाही नियंत्रित करने के साथ संदिग्धों की पहचान करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन लंबे समय से जारी तनाव को खत्म करने के लिए सुरक्षा कार्रवाई के साथ स्थानीय स्तर पर संवाद और भरोसा बहाल करने की जरूरत भी होगी।
गांवों में रहने वाले लोगों की चिंताएं केवल तत्काल गोलीबारी तक सीमित नहीं हैं। घरों को आग के हवाले किए जाने, परिवारों की सुरक्षा और दोबारा हमले होने की आशंका के कारण रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है। बाजार बंद रहने से स्थानीय कारोबार पर असर पड़ता है और कर्फ्यू के कारण लोगों को जरूरी सामान जुटाने में भी परेशानी हो सकती है। ऐसे में प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ आम लोगों की बुनियादी जरूरतों का भी ध्यान रखना होगा।
मणिपुर के कांगपोकपी और कामजोंग जिलों में 24 घंटे के कर्फ्यू तथा सुरक्षा बलों की तैनाती के बीच अब निगाहें इस बात पर हैं कि हालात कितनी जल्दी सामान्य होते हैं। चसाड और आसपास के संवेदनशील गांवों में तलाशी अभियान, सीमा क्षेत्र की निगरानी और हिंसा में शामिल लोगों की पहचान आने वाले समय में अहम रहेगी। साथ ही, नगा और कुकी समुदायों के बीच तनाव कम करने के लिए निष्पक्ष जांच और संवाद की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल, लगातार हो रही गोलीबारी और आगजनी ने क्षेत्र में शांति स्थापित करने की चुनौती को और गंभीर बना दिया है।




