देशभर में भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामलों को लेकर लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार सवालों के घेरे में रही है। कई ऐसे केस हैं जिनमें केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) अपनी जांच पूरी कर चुकी है, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी अदालतों में नियमित सुनवाई शुरू नहीं हो सकी। अब इन मामलों को तेजी से निपटाने के लिए एजेंसी ने नई रणनीति तैयार की है। जानकारी के अनुसार, सीबीआई ने देशभर में लंबित करीब 158 मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में कराने की दिशा में पहल शुरू कर दी है।
सूत्रों के अनुसार, एजेंसी सभी हाई कोर्टों से संपर्क करने की तैयारी में है ताकि इन पुराने मामलों को विशेष अदालतों में स्थानांतरित किया जा सके। माना जा रहा है कि हाल ही में लागू किए गए नए पेपर लीक रोधी कानून के तहत विभिन्न राज्यों में गठित की जा रही विशेष अदालतों में इन मामलों की सुनवाई कराने का प्रस्ताव रखा जाएगा। इससे वर्षों से लंबित मुकदमों को जल्द निष्कर्ष तक पहुंचाने की कोशिश की जाएगी।
बताया जा रहा है कि सीबीआई केवल मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में भेजने की मांग ही नहीं करेगी, बल्कि सुनवाई में किसी तरह की देरी न हो, इसके लिए विशेष सरकारी वकीलों की नियुक्ति और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी लेने को तैयार है। एजेंसी का मानना है कि यदि अभियोजन पक्ष को पर्याप्त सहयोग मिले तो इन मामलों की सुनवाई अपेक्षाकृत कम समय में पूरी हो सकती है।
देश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान पेपर लीक और भर्ती घोटालों ने लाखों युवाओं की उम्मीदों पर असर डाला है। कई प्रतियोगी परीक्षाएं विवादों में घिरीं, परीक्षाएं रद्द करनी पड़ीं और दोबारा आयोजित करनी पड़ीं। ऐसे में केवल जांच पूरी होना पर्याप्त नहीं माना जा रहा, बल्कि दोषियों को सजा दिलाने के लिए न्यायिक प्रक्रिया का समय पर पूरा होना भी उतना ही आवश्यक है।
जानकारी के मुताबिक, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ही वर्ष 2000 के बाद दर्ज ऐसे लगभग 25 मामले हैं जिनमें जांच पूरी होने के बावजूद अदालतों में सुनवाई की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई। इन मामलों में कई चर्चित भर्ती और प्रवेश परीक्षा घोटाले शामिल हैं, जो वर्षों से न्यायिक प्रक्रिया का इंतजार कर रहे हैं।
इन पुराने मामलों में वर्ष 2004 की कॉमन एडमिशन टेस्ट से जुड़ी कथित गड़बड़ियां, 2010-11 की एम्स पीजी भर्ती परीक्षा में अनियमितताओं के आरोप, 2011 की दिल्ली विश्वविद्यालय मेडिकल एवं डेंटल प्रवेश परीक्षा से जुड़े मामले, वर्ष 2013 की कर्मचारी चयन आयोग (SSC) भर्ती परीक्षा और शिक्षकों की भर्ती में कथित धांधली जैसे कई अहम प्रकरण शामिल बताए जाते हैं। इन मामलों में जांच एजेंसी अपना काम पूरा कर चुकी है, लेकिन अदालतों में मुकदमे अभी भी शुरुआती चरण से आगे नहीं बढ़ पाए हैं।
केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि कई अन्य राज्यों में भी ऐसे मामले लंबित हैं। बिहार में कुल पांच मामले अदालत में लंबित होने की जानकारी सामने आई है। इनमें से तीन मामले कथित नीट-2024 पेपर लीक से जुड़े बताए जाते हैं। इन मामलों में जांच पूरी होने के बावजूद नियमित सुनवाई प्रारंभ होने का इंतजार है।
हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2022 के कांस्टेबल भर्ती परीक्षा से जुड़ा मामला भी उन प्रकरणों में शामिल है जिनकी सुनवाई अभी शुरू नहीं हो सकी है। राज्य में ऐसे कुल तीन मामले बताए गए हैं जो न्यायिक प्रक्रिया की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसी तरह जम्मू-कश्मीर में भी तीन ऐसे मामले लंबित हैं जिनमें ट्रायल शुरू होने का इंतजार किया जा रहा है।
झारखंड और कर्नाटक में पांच-पांच मामलों की सुनवाई लंबित बताई गई है। वहीं महाराष्ट्र में तीन ऐसे मामले हैं, जिनमें दो कथित तौर पर नीट-2024 परीक्षा से संबंधित हैं। राजस्थान में आठ मामलों की सुनवाई शुरू नहीं हो सकी है, जबकि तमिलनाडु में यह संख्या 14 तक पहुंच गई है। पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में भी 10-10 मामलों के लंबित होने की जानकारी सामने आई है।
सूत्रों का कहना है कि कई मामलों में जांच पूरी हुए वर्षों बीत चुके हैं, लेकिन अदालतों में ट्रायल शुरू नहीं होने से पूरी न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हुई है। इसका असर उन लाखों अभ्यर्थियों पर भी पड़ता है, जिन्होंने निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली की उम्मीद के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं में हिस्सा लिया था। लंबे समय तक मामलों के लंबित रहने से आरोप तय होने, गवाहों की पेशी और अंतिम फैसले में लगातार देरी होती रहती है।
हाल के वर्षों में पेपर लीक की घटनाओं को देखते हुए केंद्र सरकार ने सख्त कानून लागू किया है, जिसके तहत परीक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारी लीक करने, संगठित गिरोह चलाने और तकनीकी माध्यमों से परीक्षा प्रक्रिया को प्रभावित करने वालों के खिलाफ कठोर दंड का प्रावधान किया गया है। इसी कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए विशेष अदालतों के गठन की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जा रही है।
सीबीआई का मानना है कि यदि पुराने मामलों को भी इन्हीं विशेष अदालतों में स्थानांतरित किया जाता है तो वर्षों से लंबित मुकदमों को गति मिल सकती है। इससे जांच एजेंसी, अभियोजन पक्ष और अदालतों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होगा तथा मामलों के शीघ्र निपटारे की संभावना बढ़ेगी।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि केवल नए कानून बनाना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया भी जरूरी है। यदि लंबे समय तक मुकदमे लंबित रहते हैं तो कानून का निवारक प्रभाव कमजोर पड़ सकता है। ऐसे में फास्ट ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था का उद्देश्य दोषियों को जल्द सजा दिलाना और भविष्य में होने वाली अनियमितताओं पर अंकुश लगाना है।
सूत्रों के मुताबिक, सीबीआई जल्द ही सभी संबंधित हाई कोर्टों को औपचारिक रूप से प्रस्ताव भेज सकती है। यदि अदालतें इन मामलों को विशेष अदालतों में स्थानांतरित करने की अनुमति देती हैं, तो कई वर्षों से अटकी सुनवाई आगे बढ़ सकती है। एजेंसी का दावा है कि वह विशेष लोक अभियोजकों के साथ-साथ आवश्यक प्रशासनिक और कानूनी सहायता भी उपलब्ध कराएगी ताकि किसी प्रकार की तकनीकी बाधा सुनवाई में देरी का कारण न बने।
भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं में पारदर्शिता बनाए रखना सरकार और जांच एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती माना जाता है। ऐसे में यदि लंबित मामलों का शीघ्र निपटारा होता है तो इससे न केवल न्यायिक व्यवस्था पर लोगों का भरोसा मजबूत होगा, बल्कि भविष्य में परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में भी यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।



