भारत-कनाडा CEPA डील क्या है? 70 अरब डॉलर के कारोबार का लक्ष्य, एयरोस्पेस से लेकर लिथियम तक क्या बदलेगा?

भारत-कनाडा CEPA डील क्या है? 70 अरब डॉलर के कारोबार का लक्ष्य, एयरोस्पेस से लेकर लिथियम तक क्या बदलेगा?

भारत और कनाडा के आर्थिक संबंधों को नई दिशा देने के लिए दोनों देश व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते यानी CEPA पर आगे बढ़ रहे हैं। इस प्रस्तावित समझौते का मकसद केवल आयात-निर्यात बढ़ाना नहीं, बल्कि दोनों देशों की कंपनियों के लिए कारोबार की प्रक्रिया आसान करना, निवेश को प्रोत्साहित करना और अहम औद्योगिक क्षेत्रों में सहयोग के नए अवसर तैयार करना भी है। बातचीत के दौरान बाजार तक पहुंच, वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार की शर्तों तथा कारोबारी बाधाओं को कम करने जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है। दोनों देशों की कोशिश है कि 2026 के अंत तक इस समझौते को अंतिम रूप दिया जा सके। हालांकि, अभी कई विषयों पर सहमति बनना बाकी है। अगर बातचीत तय दिशा में आगे बढ़ती है, तो आने वाले वर्षों में भारत और कनाडा के व्यापारिक रिश्तों में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

2030 तक कारोबार को 70 अरब कनाडाई डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य

भारत और कनाडा के बीच व्यापार को बड़े स्तर पर विस्तारित करने की योजना इस समझौते के केंद्र में है। कनाडा सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का कुल व्यापार लगभग 30.4 अरब कनाडाई डॉलर रहा था। अब इसे 2030 तक बढ़ाकर करीब 70 अरब कनाडाई डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने में CEPA की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। व्यापारिक नियमों में सरलता आने और बाजार में प्रवेश से जुड़ी परेशानियां घटने पर कंपनियों के लिए दूसरे देश में अपने उत्पादों और सेवाओं का विस्तार करना आसान हो सकता है। इसके साथ ही दोनों तरफ से निवेश बढ़ने की संभावनाएं भी बन सकती हैं।

इस समझौते से भारतीय निर्यातकों को कनाडा में अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। वहीं, कनाडा की कंपनियां भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार और तेजी से बढ़ती औद्योगिक मांग का लाभ उठाने की कोशिश कर सकती हैं। हालांकि, व्यापार को दोगुने से भी अधिक स्तर तक ले जाने के लिए केवल समझौता होना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए कंपनियों की भागीदारी, प्रतिस्पर्धी कीमतें, परिवहन सुविधाएं और दोनों देशों के नियमों के अनुरूप कारोबार करना भी जरूरी होगा।

कनाडा के व्यापार मंत्री ने बताया भारत दौरे का एजेंडा

कनाडा भारत के साथ व्यावसायिक संबंधों को मजबूत करने के लिए कई क्षेत्रों में संभावनाएं तलाश रहा है। कनाडा के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री मनिंदर सिद्धू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भारत को अपने अगले पड़ाव के रूप में बताया। उन्होंने जानकारी दी कि इस व्यापार मिशन का ध्यान एयरोस्पेस, स्वच्छ ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, लाइफ साइंसेज, कृषि एवं खाद्य उत्पादों और वानिकी जैसे क्षेत्रों पर रहेगा। ये ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें दोनों देशों की कंपनियां अपने अनुभव, संसाधनों और तकनीकी क्षमताओं का इस्तेमाल करके सहयोग बढ़ा सकती हैं।

कनाडा के लिए भारत इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां उपभोक्ताओं की बड़ी संख्या के साथ-साथ बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, ऊर्जा और तकनीक से जुड़ी जरूरतें बढ़ रही हैं। दूसरी ओर, भारतीय कंपनियों को कनाडा के संसाधनों, तकनीकी विशेषज्ञता और औद्योगिक नेटवर्क से लाभ मिल सकता है। व्यापार मिशन और CEPA पर चल रही बातचीत को इसी व्यापक आर्थिक सहयोग के संदर्भ में देखा जा रहा है।

ऊर्जा कारोबार में भारत के लिए कितनी बड़ी संभावना?

भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ बिजली, परिवहन और औद्योगिक गतिविधियों के लिए ऊर्जा की जरूरत भी लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। देश अपनी ऊर्जा मांग पूरी करने के लिए बड़े पैमाने पर विदेशों से कच्चा तेल और अन्य ईंधन आयात करता है। ऐसे में कनाडा के साथ ऊर्जा व्यापार बढ़ाना भारत के लिए एक संभावित विकल्प हो सकता है। Firstpost की रिपोर्ट के अनुसार, कनाडा दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन भारत के साथ उसका तेल कारोबार अब तक सीमित रहा है।

रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, कनाडा से भारत को कच्चे तेल का पहला निर्यात 2024 में हुआ था, जिसकी कीमत करीब 15 करोड़ डॉलर बताई गई। इसके मुकाबले भारत हर साल लगभग 150 अरब डॉलर का तेल आयात करता है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि दोनों देशों के बीच ऊर्जा कारोबार का विस्तार करने की कितनी गुंजाइश मौजूद है। हालांकि, वास्तविक कारोबार बढ़ने का फैसला कीमतों, परिवहन लागत, आपूर्ति व्यवस्था और कंपनियों के व्यावसायिक हितों जैसे कारकों पर निर्भर करेगा।

इस क्षेत्र में तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी LNG भी बातचीत का महत्वपूर्ण विषय है। प्राकृतिक गैस को बेहद कम तापमान पर तरल रूप में बदला जाता है, जिससे इसे विशेष जहाजों के जरिए लंबी दूरी तक पहुंचाना संभव होता है। भारत के लिए LNG की आपूर्ति के नए विकल्प विकसित करना ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से उपयोगी हो सकता है। वहीं, कनाडा को अपने ऊर्जा संसाधनों के लिए एक बड़े बाजार तक पहुंच बनाने का अवसर मिल सकता है।

लिथियम, निकेल और ग्रेफाइट जैसे खनिजों पर भी नजर

ऊर्जा के अलावा महत्वपूर्ण खनिजों का व्यापार भी भारत-कनाडा साझेदारी के अहम क्षेत्रों में शामिल है। क्रिटिकल मिनरल्स उन खनिजों को कहा जाता है, जिनकी आधुनिक उद्योगों और तकनीकी उत्पादों में महत्वपूर्ण भूमिका होती है और जिनकी आपूर्ति बाधित होने से उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों, सौर ऊर्जा उपकरणों, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य आधुनिक तकनीकों के निर्माण में ऐसे खनिजों की जरूरत पड़ती है।

भारत घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने और इलेक्ट्रिक वाहनों सहित स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े उद्योगों का विस्तार करने पर काम कर रहा है। इसके लिए कच्चे माल की नियमित और भरोसेमंद आपूर्ति जरूरी है। कनाडा के साथ सहयोग से भारत को खनिजों की उपलब्धता बढ़ाने, तकनीकी अनुसंधान करने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने में मदद मिल सकती है।

भारत में कनाडा के उच्चायुक्त क्रिस्टोफर कूटर के मुताबिक, भारत की महत्वपूर्ण खनिजों की सूची में शामिल सभी 32 खनिज कनाडा में उपलब्ध हैं। कनाडा अपने खनन क्षेत्र की क्षमता बढ़ाने के साथ संबंधित बुनियादी ढांचे में भी निवेश कर रहा है। इसमें रेलवे जैसी परिवहन सुविधाओं का विकास शामिल है, ताकि खनिजों को खदानों से बाजार तक पहुंचाना आसान हो सके।

फिलहाल, भारत और कनाडा के बीच इन खनिजों का व्यापार सभी श्रेणियों में समान रूप से विकसित नहीं है। पोटाश का कारोबार होता है, जबकि तांबे और निकेल का व्यापार अपेक्षाकृत सीमित बताया गया है। कनाडा में लिथियम और ग्रेफाइट जैसे संसाधनों की मौजूदगी भी दोनों देशों के बीच संभावित सहयोग को महत्वपूर्ण बनाती है। फिर भी खनिजों की उपलब्धता अपने आप में सस्ती और नियमित आपूर्ति की गारंटी नहीं है। इसके लिए खनन परियोजनाओं, निवेश, पर्यावरणीय मंजूरियों और परिवहन व्यवस्था पर भी काम करना होगा।

एयरोस्पेस और तकनीक में संयुक्त कारोबार के अवसर

CEPA की बातचीत में एयरोस्पेस क्षेत्र को भी अहम स्थान दिया जा रहा है। इस उद्योग में विमान निर्माण, विमान के पुर्जे, संबंधित उपकरण, इंजीनियरिंग और तकनीकी सेवाएं शामिल होती हैं। भारत अपने विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करने और उच्च तकनीक वाले उद्योगों में घरेलू क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में कनाडाई कंपनियों के साथ सहयोग से भारतीय कंपनियों को विशेषज्ञता, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय कारोबारी नेटवर्क तक पहुंच बनाने का अवसर मिल सकता है।

कनाडा की कंपनियों के लिए भी भारत का बाजार आकर्षक संभावनाएं प्रस्तुत कर सकता है। वे भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी करके उत्पादन, उपकरणों की आपूर्ति और तकनीकी सेवाओं से जुड़े अवसर तलाश सकती हैं। यदि व्यापार समझौते के तहत नियमों और बाजार तक पहुंच से संबंधित बाधाओं को कम करने पर सहमति बनती है, तो इस क्षेत्र में संयुक्त परियोजनाओं और निवेश की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

एयरोस्पेस के साथ टेक्नोलॉजी और लाइफ साइंसेज जैसे क्षेत्रों को भी व्यापार मिशन में शामिल किया गया है। इन क्षेत्रों में सहयोग का दायरा केवल सामान की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अनुसंधान, विशेषज्ञ सेवाओं और व्यावसायिक साझेदारी तक बढ़ सकता है।

भारत और कनाडा के बीच किन उत्पादों का होता है व्यापार?

दोनों देशों के मौजूदा व्यापार के आंकड़े बताते हैं कि उनके आर्थिक रिश्तों में पहले से ही कई उत्पाद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। कनाडा सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में कनाडा ने भारत को करीब 3.9 अरब कनाडाई डॉलर का सामान निर्यात किया। इनमें सब्जियां, खनिज ईंधन, तेल और लकड़ी का गूदा जैसे उत्पाद शामिल थे। दूसरी तरफ, कनाडा ने भारत से लगभग 9.7 अरब कनाडाई डॉलर के सामान का आयात किया। भारत से आने वाले प्रमुख उत्पादों में कीमती पत्थर और धातुएं, मशीनरी तथा दवा उत्पाद शामिल थे।

ये आंकड़े दोनों देशों के बीच वस्तुओं के व्यापार की स्थिति दिखाते हैं, जबकि 30.4 अरब कनाडाई डॉलर का कुल व्यापार वस्तुओं और सेवाओं दोनों को शामिल करता है। इसलिए इन दोनों आंकड़ों की तुलना करते समय उनके दायरे को ध्यान में रखना जरूरी है।

यदि CEPA के तहत कारोबारी प्रक्रियाएं सरल होती हैं, तो भारतीय दवा कंपनियों, मशीनरी निर्माताओं और दूसरे निर्यातकों को कनाडा में अपने उत्पादों की पहुंच बढ़ाने के अवसर मिल सकते हैं। इसी तरह कनाडाई कृषि, ऊर्जा और औद्योगिक कंपनियां भारत में अपनी बिक्री बढ़ाने की संभावनाएं तलाश सकती हैं।

अमेरिका पर निर्भरता कम करना चाहता है कनाडा

भारत के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने की कनाडा की कोशिश को उसकी व्यापक व्यापार नीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है। कनाडा का अमेरिका के साथ गहरा व्यापारिक संबंध है और उसका बड़ा कारोबारी हित अमेरिकी बाजार से जुड़ा हुआ है। हालांकि, किसी एक बड़े बाजार पर अधिक निर्भरता होने से व्यापार नीति में बदलाव, शुल्क संबंधी फैसलों और दूसरे आर्थिक घटनाक्रमों का असर भी ज्यादा पड़ सकता है।

इसी कारण कनाडा अपने निर्यात के लिए दूसरे देशों में अवसर तलाश रहा है। भारत की विशाल आबादी, बढ़ती औद्योगिक गतिविधियां और ऊर्जा तथा तकनीकी उत्पादों की मांग उसे कनाडाई कारोबारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संभावित बाजार बनाती है। भारत के लिए भी कनाडा के साथ व्यापार बढ़ाना ऊर्जा, खनिजों और उच्च तकनीक वाले क्षेत्रों में नए विकल्प तैयार करने का रास्ता हो सकता है।

कुल मिलाकर, प्रस्तावित CEPA समझौता भारत और कनाडा के आर्थिक रिश्तों को व्यापक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। इसका असर ऊर्जा, क्रिटिकल मिनरल्स, एयरोस्पेस, कृषि, दवा उद्योग और तकनीक जैसे क्षेत्रों में दिखाई दे सकता है। दोनों देशों ने 2030 तक व्यापार को 70 अरब कनाडाई डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन इसे हासिल करना बातचीत के नतीजों और समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा। 2026 के अंत तक समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश के बीच अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बाजार तक पहुंच, व्यापारिक नियमों और निवेश से जुड़े लंबित मुद्दों पर दोनों पक्ष किस तरह सहमति बनाते हैं।