फ्रांस में महंगाई के खिलाफ जनआक्रोश: 8 लाख लोगों का प्रदर्शन, राष्ट्रपति भवन के पास हिंसा; कई शहरों में आगजनी और लूटपाट

फ्रांस में महंगाई के खिलाफ जनआक्रोश: 8 लाख लोगों का प्रदर्शन, राष्ट्रपति भवन के पास हिंसा; कई शहरों में आगजनी और लूटपाट

फ्रांस में बढ़ती महंगाई, महंगे ईंधन और सरकारी सेवाओं की बदहाल स्थिति को लेकर शुरू हुआ विरोध अब बड़े जनआंदोलन का रूप ले चुका है। शनिवार को देशभर में करीब 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे। प्रदर्शन के दौरान राजधानी पेरिस समेत कई शहरों में हिंसा, आगजनी और दुकानों में लूटपाट की घटनाएं सामने आईं। हालात इतने बिगड़ गए कि राष्ट्रपति भवन एलिजे पैलेस के आसपास भी प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव पैदा हो गया। फ्रांस 24 की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति भवन से लगभग 400 मीटर की दूरी पर प्रदर्शनकारियों ने गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया। हिंसक घटनाओं के सिलसिले में करीब 1,200 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

दूसरी ओर, लिमोज शहर में नकाब पहने प्रदर्शनकारियों ने टाउन हॉल में आग लगा दी। आग से 143 साल पुरानी ऐतिहासिक इमारत को भारी नुकसान पहुंचा और वह लगभग पूरी तरह तबाह हो गई। देश के अलग-अलग हिस्सों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी रही। यह आंदोलन करीब एक महीने पहले स्कूली विद्यार्थियों के विरोध से शुरू हुआ था, लेकिन अब इसमें विश्वविद्यालयों के छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों और मजदूर संगठनों की भागीदारी भी बढ़ गई है।

स्कूलों से निकली विरोध की चिंगारी, देशव्यापी आंदोलन में बदली

फ्रांस में मौजूदा विरोध की शुरुआत 21 सितंबर को पेरिस के लाइसी सेंट-एक्सूपेरी स्कूल से हुई थी। यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों ने शिक्षकों की कमी, जरूरी संसाधनों के अभाव और स्कूल की समस्याओं को लेकर आवाज उठाई। यह संस्थान ऐसे क्षेत्र में स्थित है, जहां आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बड़ी आबादी रहती है। विद्यार्थियों का कहना था कि शिक्षा व्यवस्था में मौजूद कमियों का सीधा असर उनकी पढ़ाई पर पड़ रहा है।

शुरुआत में यह विरोध एक स्कूल तक सीमित दिखाई दे रहा था। हालांकि, 29 सितंबर को प्रशासन की ओर से अतिरिक्त कर्मचारियों की व्यवस्था किए जाने के बाद वहां की हड़ताल समाप्त हो गई। इसके बावजूद दूसरे इलाकों में विद्यार्थियों का गुस्सा शांत नहीं हुआ। देखते ही देखते विरोध का दायरा बढ़ने लगा और महज आठ दिनों में यह आंदोलन करीब 410 स्कूलों तक पहुंच गया।

इसके बाद विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों ने भी आंदोलन में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। अभिभावकों, शिक्षकों और श्रमिक संगठनों के समर्थन से यह विरोध शिक्षा से जुड़ी मांगों तक सीमित नहीं रहा। इसमें महंगाई, वेतन, पेंशन और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति जैसे व्यापक मुद्दे भी शामिल हो गए। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि बढ़ती जीवन-यापन लागत के बीच आम परिवारों के लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।

महंगाई से लेकर शिक्षा व्यवस्था तक, प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें

इस आंदोलन में शामिल लोगों की नाराजगी के पीछे कई आर्थिक और सामाजिक कारण हैं। प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि सरकार उनकी समस्याओं पर ठोस कदम उठाए और केवल आश्वासन देने के बजाय आम लोगों की स्थिति सुधारने के लिए प्रभावी नीतियां लागू करे।

प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:

  1. वेतन और पेंशन में बढ़ोतरी: लोगों की मांग है कि बढ़ती कीमतों के अनुरूप उनकी आय में इजाफा किया जाए, ताकि परिवारों पर आर्थिक दबाव कम हो सके।
  2. महंगाई पर नियंत्रण: ईंधन समेत रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी वस्तुओं की बढ़ती कीमतों को लेकर लोग नाराज हैं। वे चाहते हैं कि सरकार आम नागरिकों को राहत देने के लिए कदम उठाए।
  3. सरकारी सेवाओं में सुधार: प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता बेहतर होनी चाहिए और आम लोगों को जरूरी सुविधाएं आसानी से मिलनी चाहिए।
  4. स्कूलों की समस्याओं का समाधान: शिक्षकों की कमी दूर करने, पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने और जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत कराने की मांग भी आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इन मांगों से साफ है कि विरोध केवल किसी एक सरकारी फैसले के खिलाफ नहीं है। इसके पीछे आर्थिक असमानता, सार्वजनिक सुविधाओं की स्थिति और आम परिवारों के खर्च से जुड़ी कई चिंताएं हैं।

पुलिस की कार्रवाई से बढ़ा आक्रोश, छात्र की चोट ने बढ़ाई नाराजगी

आंदोलन के दौरान पुलिस की कार्रवाई भी विवाद का बड़ा मुद्दा बन गई है। 5 अक्टूबर को उत्तरी फ्रांस के लेंस शहर में प्रदर्शन के दौरान एक गंभीर घटना हुई। रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस के एक ग्रेनेड की चपेट में आने से 15 वर्षीय लड़के का हाथ बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। चोट इतनी गंभीर थी कि उसका हाथ काटना पड़ा।

इस घटना ने प्रदर्शनकारियों और उनके समर्थकों के बीच पुलिस की सख्ती को लेकर नाराजगी और बढ़ा दी। आंदोलन से जुड़े लोगों ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर सवाल उठाए। वहीं, कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव की स्थिति बनी रही।

उपलब्ध रिपोर्ट में बताया गया है कि देशभर में हुई झड़पों के दौरान 200 से अधिक छात्र, स्कूलों के 85 कर्मचारी और करीब 700 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। इस दौरान हजारों लोगों को हिरासत में भी लिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, अब तक 6,000 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया जा चुका था। इनमें बड़ी संख्या नाबालिगों की बताई गई है, जिन्हें बाद में बिना आरोप लगाए रिहा कर दिया गया।

फ्रांस में स्कूली छात्रों से शुरू हुए इस आंदोलन के दौरान हिंसक घटनाओं का पैमाना असामान्य माना जा रहा है। विरोध में शामिल लोगों की संख्या बढ़ने के साथ प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने और प्रदर्शनकारियों की शिकायतों का समाधान करने की चुनौती भी बढ़ गई है।

कई शहरों में दुकानों को बनाया निशाना, सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल

प्रदर्शनों के दौरान हिंसा केवल सरकारी इमारतों या सड़कों तक सीमित नहीं रही। कुछ स्थानों पर युवकों के समूहों ने बंद दुकानों में घुसकर सामान लूटा और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया। कई जगहों पर वाहनों को आग लगा दी गई। पुलिस के साथ झड़पों की घटनाएं भी सामने आईं।

समाचार एजेंसी एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 10 शहरों में सुपरमार्केट, दवा की दुकानों, कपड़ों के प्रतिष्ठानों, इलेक्ट्रॉनिक सामान की दुकानों और महंगे ब्रांड के शोरूम को निशाना बनाया गया। कुछ घटनाओं में लूटपाट करने वाले समूहों की गतिविधियां सुनियोजित दिखाई दीं।

रिपोर्ट में बताया गया कि कुछ युवक चेहरे पर नकाब और हाथों में दस्ताने पहनकर दुकानों तक पहुंचे। आरोप है कि वे अंदर जाने से पहले सुरक्षा कैमरों के कनेक्शन काट देते थे। इसके बाद दुकानों के शीशे तोड़कर भीतर घुसते और सामान लेकर फरार हो जाते थे।

इन घटनाओं ने आंदोलन के शांतिपूर्ण स्वरूप को लेकर बहस तेज कर दी है। एक ओर बड़ी संख्या में लोग आर्थिक और सामाजिक मांगों के समर्थन में सड़कों पर उतर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हिंसा और लूटपाट की घटनाओं ने आम नागरिकों, दुकानदारों और प्रशासन की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

मैक्रों की चेतावनी: सरकारी इमारतों और कारोबारों पर हमले बर्दाश्त नहीं

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाओं पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने चेतावनी दी कि सरकारी कार्यालयों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और सार्वजनिक संपत्तियों पर हमला करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

मैक्रों ने स्पष्ट किया कि आगजनी, लूटपाट और तोड़फोड़ में शामिल लोगों को कानून के मुताबिक सजा का सामना करना पड़ेगा। टाउन हॉल जैसी सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की बात कही गई।

सरकार के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। उसे एक तरफ हिंसक घटनाओं पर नियंत्रण करना है, तो दूसरी ओर उन आर्थिक और सामाजिक शिकायतों का समाधान भी तलाशना है, जिनके चलते बड़ी संख्या में लोग आंदोलन से जुड़ रहे हैं। केवल सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने से विरोध की मूल वजहें खत्म होंगी या नहीं, यह आने वाले समय में सरकार की नीतियों पर निर्भर करेगा।

2018 के येलो वेस्ट आंदोलन की यादें फिर ताजा

फ्रांस में मौजूदा प्रदर्शन को 2018 में हुए येलो वेस्ट आंदोलन से भी जोड़कर देखा जा रहा है। उस समय ईंधन पर कर बढ़ाने की सरकारी योजना के खिलाफ बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए थे। प्रदर्शनकारियों ने पीले रंग की चमकदार जैकेट पहनकर विरोध जताया था। फ्रेंच भाषा में इस आंदोलन को ‘गिले जॉन’ और अंग्रेजी में ‘येलो वेस्ट’ कहा गया।

पीली जैकेट फ्रांस में वाहन चालकों के लिए सुरक्षा उपकरण के तौर पर इस्तेमाल होती है। सड़क पर गाड़ी खराब होने या किसी आपात स्थिति में इसे पहनने से व्यक्ति दूर से दिखाई देता है। इसी वजह से यह जैकेट विरोध का प्रतीक बन गई थी। आंदोलन में शामिल लोगों ने इसे आम नागरिकों की आर्थिक परेशानियों और सरकारी नीतियों के खिलाफ एकजुटता के प्रतीक के रूप में अपनाया।

मौजूदा विरोध के दौरान भी सोशल मीडिया पर लोगों से येलो वेस्ट आंदोलन को दोबारा शुरू करने की अपील की गई। इससे पुरानी नाराजगी और वर्तमान आर्थिक समस्याओं के बीच संबंध की चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, दोनों आंदोलनों की परिस्थितियों और मांगों में अंतर हो सकता है, लेकिन महंगाई और आम नागरिकों पर बढ़ते आर्थिक बोझ का मुद्दा दोनों में महत्वपूर्ण रहा है।

राजनीतिक दल भी आमने-सामने, पुलिस और प्रदर्शनकारियों को लेकर अलग-अलग रुख

आंदोलन ने फ्रांस की राजनीति में भी बहस तेज कर दी है। अगले साल अप्रैल में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को ध्यान में रखते हुए विभिन्न राजनीतिक दल इस विरोध को लेकर अपनी रणनीति तय कर रहे हैं।

दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन ने पुलिस का समर्थन किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कट्टर वामपंथी समूहों ने प्रदर्शनकारियों की वास्तविक मांगों को अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। उनके रुख से स्पष्ट है कि वह हिंसा और कानून-व्यवस्था के मुद्दे को प्रमुखता देना चाहती हैं।

इसके विपरीत, वामपंथी नेता जीन-ल्यूक मेलांशों ने कहा कि देश के अधिकांश हिस्सों में प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे हैं। उन्होंने मीडिया कवरेज पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि टेलीविजन चैनल हिंसा की घटनाओं को बार-बार दिखाकर पूरे आंदोलन की ऐसी तस्वीर पेश कर रहे हैं, मानो हर जगह हिंसा हो रही हो।

इस तरह फ्रांस में जारी आंदोलन अब महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़े सवालों के साथ-साथ राजनीतिक टकराव का मुद्दा भी बन गया है। सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह हिंसा पर नियंत्रण रखते हुए लोगों की बुनियादी मांगों का समाधान निकाले। आंदोलन का आगे क्या रुख होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार आर्थिक राहत, शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक सेवाओं में सुधार के मोर्चे पर कितने प्रभावी कदम उठाती है।