इजराइल चुनाव में नेतन्याहू की राह मुश्किल: दक्षिणपंथी दलों की बगावत से बिगड़ सकता है सत्ता का गणित, विपक्ष भी बंटा

इजराइल चुनाव में नेतन्याहू की राह मुश्किल: दक्षिणपंथी दलों की बगावत से बिगड़ सकता है सत्ता का गणित, विपक्ष भी बंटा

इजराइल में चुनावी मुकाबला प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए आसान नजर नहीं आ रहा है। चुनाव जीतने के बावजूद उनके सामने सरकार बनाने में मुश्किल आने की आशंका है। इसकी सबसे बड़ी वजह उनके अपने दक्षिणपंथी राजनीतिक खेमे में उभर रही प्रतिस्पर्धा है। छोटी पार्टियां लिकुड के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही हैं। इससे न केवल नेतन्याहू की पार्टी को नुकसान पहुंच सकता है, बल्कि चुनाव के बाद बहुमत जुटाने का समीकरण भी बदल सकता है।

नेतन्याहू के सामने दूसरी चुनौती यह है कि दक्षिणपंथी दल चुनाव में उनका समर्थन हासिल करने के बावजूद नई सरकार में शामिल होने से इनकार कर सकते हैं। ऐसे में चुनावी सफलता मिलने पर भी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना उनके लिए मुश्किल हो सकता है। चुनाव से 11 दिन पहले वे छोटे दक्षिणपंथी दलों के मतदाताओं को अपनी तरफ खींचने में जुटे हैं।

दूसरी तरफ विपक्षी खेमे में भी प्रधानमंत्री पद को लेकर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज है। नेता गादी आइजनकोट अपनी पार्टी याशर को विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका मानना है कि सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उभरने से प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी को मजबूती मिलेगी। हालांकि, इस रणनीति से विपक्षी गठबंधन के दूसरे दलों के सामने भी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

छोटी दक्षिणपंथी पार्टियों से लिकुड के वोट बैंक को खतरा

नेतन्याहू की पार्टी लिकुड लंबे समय से इजराइल की दक्षिणपंथी राजनीति की प्रमुख ताकत रही है। लेकिन इस बार ओफर विंटर और योआज हेंडेल से जुड़ी पार्टियां इसी राजनीतिक आधार पर अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं। इन दलों के मैदान में उतरने से दक्षिणपंथी मतदाताओं के सामने विकल्प बढ़ गए हैं।

नेतन्याहू की चिंता केवल इतनी नहीं है कि इन पार्टियों के कारण उनकी पार्टी को कम वोट मिल सकते हैं। असली परेशानी चुनाव के बाद बनने वाले गठबंधन को लेकर है। यदि छोटी पार्टियां अपने लिए पर्याप्त समर्थन जुटा लेती हैं, तो वे सरकार गठन के दौरान अपनी शर्तें रख सकती हैं। दूसरी ओर, यदि वे जरूरी वोट हासिल करने में विफल रहती हैं, तो उनके समर्थकों के मत संसद में प्रतिनिधित्व हासिल करने में काम नहीं आ सकते।

इसी वजह से नेतन्याहू मतदाताओं से अपील कर रहे हैं कि वे छोटी पार्टियों के बजाय लिकुड को वोट दें। उन्हें आशंका है कि ओफर विंटर को मिलने वाला समर्थन अंततः एविगडोर लिबरमैन के नेतृत्व वाले राजनीतिक खेमे के काम आ सकता है। विंटर के मतदाता यदि लिकुड से दूर जाते हैं, तो दक्षिणपंथी खेमे की कुल सीटों पर इसका असर पड़ सकता है।

इस तरह नेतन्याहू के लिए चुनौती दोहरी है। उन्हें चुनाव में अपनी पार्टी का समर्थन बनाए रखना है और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि चुनाव के बाद संभावित सहयोगी उनके साथ सरकार बनाने को तैयार रहें।

3.25% वोट का नियम बिगाड़ सकता है पूरा चुनावी हिसाब

इजराइल की चुनाव व्यवस्था में किसी पार्टी के लिए संसद तक पहुंचने की न्यूनतम सीमा 3.25% वोट है। यदि कोई दल इस सीमा को पार नहीं कर पाता, तो उसे संसद में सीटें नहीं मिलतीं। यही नियम छोटी पार्टियों के लिए सबसे बड़ा जोखिम और बड़ी पार्टियों के लिए रणनीतिक चिंता का विषय बन सकता है।

मान लीजिए कि दक्षिणपंथी मतदाताओं का एक हिस्सा लिकुड को छोड़कर किसी छोटी पार्टी को वोट देता है। यदि वह पार्टी 3.25% की सीमा पार नहीं कर पाती, तो उसके लिए डाले गए वोट संसद में सीटों में तब्दील नहीं होंगे। इससे दक्षिणपंथी खेमे को मिलने वाली कुल सीटों की संख्या प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में नेतन्याहू के लिए सरकार बनाने के लिए आवश्यक समर्थन जुटाना अधिक कठिन हो जाएगा।

हालांकि, ओफर विंटर की पार्टी को पूरी तरह कमजोर मानना भी सही नहीं होगा। उपलब्ध चुनावी सर्वेक्षणों में उसे कई बार न्यूनतम सीमा पार करते हुए दिखाया गया है। 1 अक्टूबर के बाद किए गए 19 बड़े सर्वे में से 11 में पार्टी संसद में पहुंचने के लिए जरूरी समर्थन हासिल करती दिखाई दी। पिछले सप्ताह जारी सात सर्वे में से चार में भी उसका समर्थन 3.25% से ऊपर रहा।

इन आंकड़ों से साफ है कि विंटर की पार्टी के संसद में पहुंचने की संभावना बनी हुई है, लेकिन इसे निश्चित नहीं कहा जा सकता। अंतिम परिणाम मतदाताओं के रुख और चुनाव के आखिरी दिनों में होने वाले बदलावों पर निर्भर करेगा।

नेतन्याहू के लिए सबसे अनुकूल स्थिति यह होगी कि दक्षिणपंथी वोटों का बड़ा हिस्सा लिकुड के साथ बना रहे। लेकिन यदि छोटी पार्टियां पर्याप्त समर्थन हासिल कर लेती हैं, तो उन्हें चुनाव के बाद गठबंधन की राजनीति में अधिक महत्व मिल सकता है।

विंटर का समर्थन मिलने पर भी सरकार में शामिल होने की गारंटी नहीं

चुनाव के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया में केवल सीटों की संख्या ही मायने नहीं रखती, बल्कि संभावित सहयोगियों की शर्तें भी महत्वपूर्ण होती हैं। ओफर विंटर की पार्टी ने संकेत दिया है कि वह राष्ट्रपति के सामने नेतन्याहू को प्रधानमंत्री बनाने की सिफारिश कर सकती है। हालांकि, इस कदम को नई सरकार में शामिल होने की प्रतिबद्धता नहीं माना जा सकता।

विंटर की पार्टी का रुख सेना में अनिवार्य भर्ती से जुड़े कानून पर निर्भर कर सकता है। वह चाहती है कि अति-रूढ़िवादी यहूदी पार्टियां इस मुद्दे पर सहमति बनाएं। यदि ऐसा नहीं होता, तो विंटर ऐसी सरकार का हिस्सा बनने से इनकार कर सकते हैं जिसमें इन दलों का प्रभाव अधिक हो।

यह मांग नेतन्याहू के लिए परेशानी बढ़ा सकती है, क्योंकि सरकार बनाने के लिए उन्हें अलग-अलग विचारधारा वाले सहयोगियों को साथ रखना पड़ सकता है। एक सहयोगी को संतुष्ट करने के लिए उठाया गया कदम दूसरे दलों को नाराज कर सकता है। नतीजतन, चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद गठबंधन को स्थिर रखना मुश्किल हो सकता है।

विंटर ने गादी आइजनकोट और एविगडोर लिबरमैन के साथ सरकार बनाने की संभावना को खुला रखा है। हालांकि, उन्होंने यायर गोलान के साथ गठबंधन करने से इनकार किया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि चुनाव के बाद राजनीतिक समीकरण केवल दक्षिणपंथ और विपक्ष के बीच सीधी लड़ाई तक सीमित नहीं रहेंगे। अलग-अलग दल अपने मुद्दों और शर्तों के आधार पर समर्थन देने का फैसला कर सकते हैं।

विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनने की कोशिश में आइजनकोट

नेतन्याहू के सामने विपक्षी चुनौती भी मजबूत हो रही है। गादी आइजनकोट अपनी पार्टी याशर को विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनाने के लिए सक्रिय हैं। उनकी रणनीति है कि दूसरे विपक्षी दलों के समर्थकों को अपनी ओर आकर्षित किया जाए, जिससे प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी को अधिक राजनीतिक वजन मिल सके।

हालांकि, इस कोशिश का दूसरा पहलू भी है। यदि विपक्षी मतदाता अपनी पसंद बदलकर याशर के साथ जाते हैं, तो अन्य विपक्षी पार्टियों की सीटें घट सकती हैं। इससे नेतन्याहू को हटाने के लिए एक साझा रणनीति बनाना मुश्किल हो सकता है। चुनाव के बाद विपक्षी दलों को एक साथ आना होगा, लेकिन प्रधानमंत्री पद को लेकर प्रतिस्पर्धा उनके बीच मतभेद पैदा कर सकती है।

आइजनकोट नेतन्याहू की नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद प्रधानमंत्री देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने में नाकाम रहे। आइजनकोट का कहना है कि किसी नेता का आकलन उसके वादों या भाषणों से नहीं, बल्कि उसके काम और परिणामों से किया जाना चाहिए।

उन्होंने नेतन्याहू को ‘एंटी-लीडर’ बताते हुए कहा कि नेतृत्व का अर्थ गलतियों और विफलताओं की जिम्मेदारी लेना भी है। उनके मुताबिक, इजराइल को ऐसी सरकार की जरूरत है जो अपनी नाकामियों को स्वीकार करे और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ देश के संबंध बेहतर बनाए।

प्रधानमंत्री पद की पसंद में आइजनकोट को बढ़त

चुनावी मुकाबले में किसी पार्टी का समर्थन महत्वपूर्ण होता है, लेकिन प्रधानमंत्री पद के लिए मतदाताओं की पसंद भी राजनीतिक माहौल का संकेत देती है। उपलब्ध सर्वेक्षणों में आइजनकोट को इस मामले में नेतन्याहू से आगे दिखाया गया है।

एक सर्वे में 41% लोगों ने आइजनकोट को प्रधानमंत्री पद के लिए पसंद किया, जबकि नेतन्याहू के पक्ष में 38% लोगों ने राय दी। एक अन्य सर्वेक्षण में आइजनकोट को 44% और नेतन्याहू को 38% समर्थन मिला।

ये आंकड़े आइजनकोट के लिए उत्साहजनक हो सकते हैं, लेकिन केवल प्रधानमंत्री पद की पसंद में बढ़त मिलने से सरकार बनाने का रास्ता साफ नहीं होता। इसके लिए उनकी पार्टी और सहयोगी दलों को संसद में पर्याप्त समर्थन जुटाना होगा। विपक्ष के भीतर नेतृत्व को लेकर सहमति बनाना भी उतना ही जरूरी होगा।

61 सीटों का बहुमत नहीं मिला तो क्या होगा?

इजराइल की संसद में कुल 120 सदस्य होते हैं। सामान्य तौर पर सरकार बनाने के लिए 61 सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है। यदि किसी नेता के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है, तो उसे दूसरे दलों के साथ समझौता करना पड़ता है। यही वजह है कि चुनाव में सबसे अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी के लिए भी सरकार बनाना हमेशा आसान नहीं होता।

आइजनकोट एक ऐसे विकल्प पर विचार कर रहे हैं, जिसमें अरब पार्टियों के मतदान से दूर रहने की स्थिति में उनकी सरकार को संसद में मंजूरी मिल सकती है। इस तरह वे पारंपरिक बहुमत के बिना भी सरकार बनाने की संभावना तलाश रहे हैं। हालांकि, यह अभी एक संभावित रणनीति है, कोई तय राजनीतिक समझौता नहीं।

इस विकल्प को सफल बनाने के लिए आइजनकोट को विभिन्न दलों का समर्थन हासिल करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी सरकार को संसद में पर्याप्त समर्थन मिले। विपक्ष के सभी घटकों के बीच सहमति बनाना उनके लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

नई सरकार में देरी हुई तो कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं नेतन्याहू

चुनाव के बाद यदि कोई भी गठबंधन बहुमत हासिल करने में सफल नहीं होता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है। ऐसी स्थिति में नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में पद पर बने रह सकते हैं। आइजनकोट चाहते हैं कि चुनाव के बाद जल्द नई सरकार का गठन हो, ताकि देश को लंबे समय तक राजनीतिक अनिश्चितता का सामना न करना पड़े।

इजराइल पहले भी इस तरह की स्थिति देख चुका है। अप्रैल 2019 से नवंबर 2022 के बीच देश में पांच बार चुनाव हुए थे। इस अवधि में नेतन्याहू कुल 19 महीने तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे। यह उदाहरण दिखाता है कि चुनाव होने के बावजूद स्थायी सरकार बनाने में कितना समय लग सकता है।

इस बार भी यदि दक्षिणपंथी दलों के बीच वोटों का बंटवारा होता है, छोटे सहयोगी दल अपनी शर्तों पर अड़ते हैं और विपक्ष प्रधानमंत्री पद को लेकर एकजुट नहीं हो पाता, तो सरकार गठन में देरी की आशंका बनी रहेगी।

फिलहाल नेतन्याहू के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि जीत के बाद संसद में पर्याप्त समर्थन जुटाना है। वहीं, आइजनकोट को विपक्षी दलों को साथ लाने के साथ अपनी पार्टी की स्थिति मजबूत करनी होगी। अंतिम फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सा राजनीतिक खेमा सीटों का बेहतर गणित तैयार कर पाता है और चुनाव के बाद अपने सहयोगियों को एक साथ रखने में सफल रहता है।