कुत्ते, बिल्ली, बंदर या किसी दूसरे संक्रमित स्तनधारी जानवर के काटने अथवा खरोंचने को अक्सर लोग मामूली चोट समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन कुछ मामलों में ऐसा करना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। रेबीज एक वायरल संक्रमण है, जो समय रहते उचित चिकित्सा न मिलने पर जानलेवा बन सकता है। इस बीमारी की सबसे बड़ी चिंता यह है कि संक्रमण के शुरुआती दौर में इसे रोका जा सकता है, मगर एक बार इसके स्पष्ट लक्षण सामने आने के बाद मरीज की जान बचाना बेहद कठिन हो जाता है।
दुनियाभर में रेबीज आज भी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। इसके बावजूद वैज्ञानिकों के पास संक्रमित व्यक्ति को लक्षण शुरू होने से पहले बचाने के प्रभावी उपाय मौजूद हैं। सवाल यह है कि जब वैक्सीन और अन्य बचाव के तरीके उपलब्ध हैं, तो बीमारी बढ़ जाने के बाद ऐसा इलाज क्यों नहीं मिल पाया है जो भरोसेमंद तरीके से मरीज को ठीक कर सके? इसके पीछे वायरस की कार्यप्रणाली, मस्तिष्क की संरचना और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी कई जटिल वजहें हैं।
शरीर में प्रवेश करने के बाद कहां पहुंचता है रेबीज का वायरस?
रेबीज का कारण एक वायरस है, जो आमतौर पर संक्रमित जानवर की लार के जरिए फैलता है। किसी संक्रमित जानवर के काटने, खरोंचने या उसकी लार के खुले घाव अथवा आंख, नाक और मुंह की श्लेष्म झिल्ली के संपर्क में आने से संक्रमण का खतरा हो सकता है। हालांकि, हर जानवर के काटने से रेबीज नहीं होता, लेकिन संभावित संपर्क को गंभीरता से लेना जरूरी है।
शरीर में प्रवेश करने के बाद वायरस प्रभावित ऊतकों में कुछ समय तक रह सकता है। इसके बाद यह परिधीय नसों के जरिए केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की ओर बढ़ता है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी शामिल होते हैं। वायरस का इन हिस्सों तक पहुंचना बीमारी को गंभीर बनाने वाली प्रमुख घटनाओं में से एक है।
रेबीज के संक्रमण में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि लक्षण तुरंत सामने नहीं आते। कई लोगों में बीमारी विकसित होने में कई सप्ताह या महीने लग सकते हैं। यह अवधि घाव की जगह, वायरस की मात्रा और मस्तिष्क तक उसकी पहुंच जैसे कारकों से प्रभावित हो सकती है। इस दौरान व्यक्ति को सामान्य महसूस हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि संभावित संक्रमण को नजरअंदाज करना सुरक्षित है।
लक्षण सामने आने के बाद इलाज इतना कठिन क्यों हो जाता है?
रेबीज के इलाज में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक वायरस का तंत्रिका तंत्र तक पहुंचना है। जब तक संक्रमण के लक्षण दिखाई देते हैं, तब तक वायरस मस्तिष्क और उससे जुड़ी संरचनाओं को प्रभावित कर चुका हो सकता है। इस चरण में केवल वायरस को रोकना ही चुनौती नहीं होती, बल्कि शरीर के महत्वपूर्ण कार्यों को सुरक्षित बनाए रखना भी मुश्किल हो जाता है।
मस्तिष्क को कई हानिकारक पदार्थों से बचाने के लिए शरीर में एक प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था होती है, जिसे ब्लड-ब्रेन बैरियर कहा जाता है। यह रक्त से मस्तिष्क के ऊतकों तक पदार्थों के पहुंचने को नियंत्रित करती है। इसका काम बेहद जरूरी है, लेकिन यही व्यवस्था कई दवाओं के लिए मस्तिष्क तक पर्याप्त मात्रा में पहुंचना कठिन बना सकती है।
इसके अलावा, रेबीज वायरस तंत्रिका कोशिकाओं के भीतर पहुंचकर काम करता है। इसलिए ऐसी दवा विकसित करना आसान नहीं है, जो संक्रमित कोशिकाओं तक पहुंचे, वायरस की गतिविधि को रोके और साथ ही मस्तिष्क की सामान्य कार्यप्रणाली को नुकसान न पहुंचाए।
बीमारी बढ़ने पर तंत्रिका तंत्र को होने वाला नुकसान भी गंभीर हो सकता है। यदि मस्तिष्क सांस लेने, निगलने और हृदय की गतिविधियों को नियंत्रित करने वाली प्रक्रियाओं को ठीक से संचालित नहीं कर पाता, तो मरीज की हालत तेजी से बिगड़ सकती है। यही कारण है कि लक्षण शुरू होने के बाद रेबीज को नियंत्रित करना चिकित्सा विज्ञान की सबसे कठिन चुनौतियों में गिना जाता है।
रेबीज होने पर शरीर में कौन-कौन से बदलाव आते हैं?
बीमारी की शुरुआत में बुखार, सिरदर्द, थकान और सामान्य अस्वस्थता जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। कुछ मरीजों को उस जगह दर्द, जलन, खुजली या झुनझुनी महसूस होती है, जहां जानवर ने काटा था। ये लक्षण सामान्य बीमारियों जैसे लग सकते हैं, इसलिए केवल शुरुआती संकेतों के आधार पर रेबीज की पहचान करना मुश्किल हो सकता है।
जैसे-जैसे संक्रमण आगे बढ़ता है, मरीज के व्यवहार और तंत्रिका तंत्र में बदलाव दिख सकते हैं। कुछ लोगों में बेचैनी, भ्रम, अत्यधिक उत्तेजना और निगलने में परेशानी विकसित होती है। पानी पीने की कोशिश करने पर गले की मांसपेशियों में दर्दनाक ऐंठन हो सकती है। इस लक्षण को हाइड्रोफोबिया यानी पानी से डर के रूप में जाना जाता है, हालांकि इसका संबंध पानी से होने वाली वास्तविक आशंका के बजाय निगलने की कठिनाई और ऐंठन से होता है।
रेबीज का एक दूसरा रूप भी होता है, जिसमें धीरे-धीरे मांसपेशियों में कमजोरी और लकवे जैसे लक्षण बढ़ते हैं। सभी मरीजों में बीमारी एक ही तरीके से सामने नहीं आती। गंभीर अवस्था में सांस लेने में परेशानी, चेतना में बदलाव और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों की कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है।
एक बार लक्षण विकसित होने के बाद रेबीज लगभग हमेशा जानलेवा होता है। हालांकि, हर मरीज की स्थिति और बीमारी की गति एक जैसी नहीं होती। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि किसी व्यक्ति की मृत्यु निश्चित रूप से कितने समय में होगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि लक्षणों का इंतजार करने के बजाय संभावित संपर्क के तुरंत बाद चिकित्सा सहायता ली जाए।
क्या वैज्ञानिकों ने कभी रेबीज का इलाज खोजने की कोशिश नहीं की?
ऐसा बिल्कुल नहीं है। वैज्ञानिक और डॉक्टर लंबे समय से रेबीज के उन्नत चरण में मरीजों को बचाने के तरीकों पर काम कर रहे हैं। इस दिशा में चर्चित प्रयासों में मिल्वौकी प्रोटोकॉल भी शामिल है। इस तरीके में गंभीर रूप से बीमार मरीज के उपचार के दौरान गहन चिकित्सा सहायता और कुछ विशेष दवाओं के इस्तेमाल जैसे उपाय आजमाए गए थे।
हालांकि, इस प्रोटोकॉल से लगातार और भरोसेमंद सफलता नहीं मिली। इसे रेबीज का प्रमाणित या नियमित रूप से प्रभावी इलाज नहीं माना जाता। कुछ दुर्लभ मरीजों के जीवित बचने की खबरें जरूर सामने आई हैं, लेकिन ऐसे मामले सामान्य उपचार के रूप में किसी एक विधि की प्रभावशीलता साबित नहीं करते।
वर्तमान चिकित्सा में लक्षण शुरू होने के बाद रेबीज का कोई ऐसा स्थापित उपचार उपलब्ध नहीं है जो बीमारी को विश्वसनीय तरीके से ठीक कर सके। अस्पताल में मरीज को गहन देखभाल, सांस लेने में सहायता, ऐंठन और अन्य जटिलताओं को नियंत्रित करने के उपाय दिए जा सकते हैं। इनसे सहायक उपचार मिलता है, लेकिन वायरस को खत्म करके मरीज को ठीक करने की गारंटी नहीं मिलती।
इसी वजह से वैज्ञानिकों का एक बड़ा जोर ऐसे उपचार विकसित करने पर है, जो वायरस को तंत्रिका तंत्र तक पहुंचने से पहले रोक सकें या संक्रमण के शुरुआती चरण में प्रभावी साबित हों।
रेबीज से बचाव के लिए वैक्सीन कैसे काम करती है?
रेबीज के मामले में वैक्सीन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। संभावित संक्रमण के बाद समय पर दी गई रेबीज वैक्सीन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को वायरस के खिलाफ सुरक्षा विकसित करने के लिए प्रेरित करती है। कुछ गंभीर प्रकार के संपर्क में रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन भी दिया जाता है, जो तुरंत उपलब्ध एंटीबॉडी प्रदान करता है। इसकी जरूरत संपर्क की श्रेणी, पहले से टीकाकरण और चिकित्सकीय आकलन के आधार पर तय की जाती है।
यह समझना जरूरी है कि संपर्क के बाद वैक्सीन लगवाना और लक्षण शुरू हो जाने के बाद इलाज करना दो अलग-अलग स्थितियां हैं। संपर्क के बाद समय पर शुरू किया गया उपचार वायरस को बीमारी पैदा करने से रोक सकता है। लेकिन लक्षण आने के बाद केवल वैक्सीन लगवा लेने से विकसित रेबीज का इलाज होने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
रेबीज से बचाव के लिए सबसे जरूरी है कि संभावित संपर्क को छिपाया न जाए और घरेलू उपचार के भरोसे समय बर्बाद न किया जाए। जानवर पालतू हो, घाव छोटा हो या खून कम निकला हो, फिर भी डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। चिकित्सक तय करेंगे कि वैक्सीन, इम्युनोग्लोबुलिन या अन्य कदमों की आवश्यकता है या नहीं।
जानवर के काटने या खरोंचने पर सबसे पहले क्या करें?
अगर किसी जानवर ने काट लिया है या ऐसी खरोंच लगाई है जिससे संक्रमण का खतरा हो सकता है, तो तुरंत प्राथमिक उपचार शुरू करें। घाव को साबुन और बहते पानी से कम से कम 15 मिनट तक अच्छी तरह धोएं। उपलब्ध होने पर घाव की सफाई के बाद उपयुक्त एंटीसेप्टिक का इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसके बाद बिना देर किए नजदीकी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र जाएं। डॉक्टर को बताएं कि किस जानवर ने काटा, घटना कब हुई, शरीर के किस हिस्से पर चोट लगी और क्या पहले कभी रेबीज का टीकाकरण कराया गया है। इन्हीं जानकारियों के आधार पर आगे का उपचार तय किया जा सकता है।
घाव पर मिर्च, तेल, मिट्टी या दूसरे घरेलू पदार्थ लगाने से बचें। घाव को जलाने या किसी पारंपरिक तरीके से संक्रमण निकालने की कोशिश करना भी नुकसान पहुंचा सकता है। यदि जानवर उपलब्ध है, तो उसके बारे में जानकारी स्वास्थ्यकर्मियों को दें, लेकिन जानवर को पकड़ने या उसके संपर्क में दोबारा आने का जोखिम न लें।
रेबीज को लेकर सबसे जरूरी बात
रेबीज की गंभीरता के बावजूद यह बीमारी सही समय पर कदम उठाकर रोकी जा सकती है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वायरस के मस्तिष्क तक पहुंचने और लक्षण शुरू होने के बाद प्रभावी उपचार के विकल्प बेहद सीमित रह जाते हैं। यही वजह है कि इस बीमारी में रोकथाम और समय पर चिकित्सा सहायता का महत्व किसी भी दूसरी चीज से अधिक है।
यदि किसी संभावित संक्रमित जानवर ने काटा, खरोंचा या उसकी लार खुले घाव अथवा आंख, नाक या मुंह के संपर्क में आई है, तो लक्षण आने का इंतजार न करें। घाव को तुरंत 15 मिनट तक साबुन और पानी से धोएं और उसी दिन चिकित्सकीय सहायता लें। सही समय पर पूरा उपचार रेबीज से बचने का सबसे प्रभावी तरीका है।




