16 साल बाद भारत पहुंचे पोलिश PM डोनाल्ड टस्क, जामनगर के महाराजा की दरियादिली को दुनिया ने फिर किया याद

16 साल बाद भारत पहुंचे पोलिश PM डोनाल्ड टस्क, जामनगर के महाराजा की दरियादिली को दुनिया ने फिर किया याद

भारत और पोलैंड के संबंधों में इतिहास, मानवीय संवेदनाओं और आर्थिक सहयोग की साझा विरासत रही है। इसी रिश्ते की एक खास कड़ी उस समय फिर चर्चा में आई, जब पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। गुरुवार को हैदराबाद हाउस में हुई इस बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच पुराने संबंधों और भविष्य में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर ध्यान दिया गया। इस मौके पर पीएम मोदी ने जामनगर के पूर्व महाराजा दिग्विजयसिंहजी रणजीतसिंहजी जडेजा के योगदान का उल्लेख किया, जिन्हें पोलैंड में ‘गुड महाराजा’ के नाम से जाना जाता है।

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब पोलैंड के हजारों नागरिकों को अपना घर छोड़ना पड़ा था, तब भारत ने कई शरणार्थियों को सुरक्षित ठिकाना दिया। जामनगर के महाराजा ने भी युद्ध की विभीषिका से प्रभावित पोलिश बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी उठाई थी। उनके इस मानवीय कदम की याद आज भी भारत और पोलैंड के रिश्तों में विशेष महत्व रखती है।

डोनाल्ड टस्क 21 से 23 अक्टूबर तक भारत की यात्रा पर हैं। इस दौरे में ऐतिहासिक संबंधों के साथ-साथ रक्षा उत्पादन, व्यापार, तकनीक, अंतरिक्ष और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं भी प्रमुख हैं। पोलैंड का उद्देश्य 2030 तक भारत के साथ अपने सालाना व्यापार को दोगुना करना है। इसी मकसद से टस्क के साथ लगभग 100 पोलिश कंपनियों के प्रतिनिधियों का एक कारोबारी दल भी भारत पहुंचा है।

युद्ध के मुश्किल दौर में भारत ने पोलिश बच्चों को दिया सहारा

भारत और पोलैंड की दोस्ती की सबसे उल्लेखनीय घटनाओं में से एक दूसरे विश्व युद्ध के समय सामने आई थी। वर्ष 1939 में नाजी जर्मनी और सोवियत संघ के हमलों के बाद पोलैंड पर कब्जा हो गया। युद्ध और विस्थापन के कारण बड़ी संख्या में पोलिश परिवार बिखर गए। हजारों लोग अपने घरों से दूर चले गए और अनेक बच्चों को सुरक्षित आश्रय की आवश्यकता पड़ी।

ऐसे कठिन समय में तत्कालीन नवानगर रियासत के महाराजा दिग्विजयसिंहजी ने मदद के लिए कदम बढ़ाया। वर्ष 1942 में जामनगर के निकट बालाचड़ी में लगभग 1,000 पोलिश बच्चों को रहने की जगह दी गई। वहां बच्चों के भोजन, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों का प्रबंध किया गया, ताकि वे युद्ध के माहौल से दूर सुरक्षित वातावरण में रह सकें।

महाराजा ने बच्चों को केवल आश्रय उपलब्ध कराने तक अपनी भूमिका सीमित नहीं रखी। उन्हें अपनी भाषा, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रहने का अवसर भी दिया गया। एक अनजान देश में रहते हुए अपनी संस्कृति को बचाए रखने की यह सुविधा उनके लिए महत्वपूर्ण थी। इसी वजह से पोलैंड में महाराजा के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना विकसित हुई। वहां उन्हें ‘डोब्री महाराजा’ कहा गया, जिसका अर्थ ‘गुड महाराजा’ यानी अच्छे महाराजा से है।

कोल्हापुर में भी हजारों पोलिश शरणार्थियों को मिला ठिकाना

पोलिश नागरिकों को भारत में सहायता केवल जामनगर तक सीमित नहीं थी। युद्ध के दौरान देश के दूसरे हिस्सों में भी शरणार्थियों के लिए व्यवस्था की गई। वर्ष 1943 में कोल्हापुर रियासत के वलीवडे शिविर में करीब 5,000 पोलिश शरणार्थियों ने शरण ली। इस शिविर में रहने वाले लोगों के लिए शिक्षा और इलाज जैसी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं।

भारत में मिले इन सुरक्षित ठिकानों ने उन लोगों को मुश्किल समय में सहारा दिया, जिन्हें युद्ध के कारण अपना देश छोड़ना पड़ा था। बच्चों की पढ़ाई, दैनिक जीवन और सांस्कृतिक गतिविधियों को जारी रखने की कोशिश की गई, जिससे शरणार्थियों को एक नया वातावरण मिलने के बावजूद अपनी पहचान से जुड़े रहने में मदद मिली।

वर्ष 1945 में दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हुआ। इसके बाद पोलिश नागरिकों की अपने देश वापसी शुरू हुई। वर्ष 1948 तक अधिकांश शरणार्थी पोलैंड लौट चुके थे। हालांकि, भारत में बिताए गए समय और यहां मिले सहयोग की यादें दोनों देशों के ऐतिहासिक रिश्तों का हिस्सा बनी रहीं।

महाराजा दिग्विजयसिंहजी के योगदान को पोलैंड में लंबे समय तक सम्मान के साथ याद किया गया। उनके निधन के बाद उन्हें पोलैंड के नागरिक सम्मानों में शामिल ‘कमांडर्स क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ मेरिट’ से सम्मानित किया गया। वर्ष 1989 में पोलैंड की राजधानी वारसॉ में उनके सम्मान में ‘गुड महाराजा स्क्वायर’ भी बनाया गया। यह सम्मान इस बात का प्रतीक है कि युद्ध के समय की गई मानवीय सहायता ने दोनों देशों के बीच स्थायी भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया।

16 साल बाद भारत पहुंचे पोलैंड के प्रधानमंत्री

डोनाल्ड टस्क का मौजूदा भारत दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह लगभग 16 साल बाद भारत आए हैं। इससे पहले उन्होंने वर्ष 2010 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान भारत की यात्रा की थी। इस बार उनके कार्यक्रम में राजनीतिक मुलाकातों के साथ व्यापारिक और औद्योगिक संपर्कों को भी खास जगह दी गई है।

पोलैंड की करीब 100 कंपनियों के प्रतिनिधियों का भारत आना दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को विस्तार देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। इस प्रतिनिधिमंडल के जरिए पोलिश कंपनियां भारतीय बाजार में नए अवसर तलाश सकती हैं और स्थानीय कंपनियों के साथ कारोबारी साझेदारी की संभावनाओं पर चर्चा कर सकती हैं।

पोलैंड ने वर्ष 2030 तक भारत के साथ सालाना व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए बाजार तक पहुंच, निवेश, औद्योगिक सहयोग और व्यापारिक प्रक्रियाओं को बेहतर बनाना अहम होगा। भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता भी दोनों पक्षों के आर्थिक संपर्कों को आगे बढ़ाने में मददगार हो सकता है। इससे कंपनियों को नए बाजारों तक पहुंचने और व्यापार बढ़ाने के अतिरिक्त अवसर मिल सकते हैं।

नई दिल्ली में अपने कार्यक्रमों के दौरान टस्क भारत-पोलैंड व्यापार मंच में भी शामिल होंगे। इसके बाद 23 अक्टूबर को वह बेंगलुरु जाएंगे, जहां उनकी मुलाकात सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और तकनीकी उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों तथा कारोबारियों से प्रस्तावित है।

रक्षा क्षेत्र में संयुक्त उत्पादन की संभावनाएं

भारत और पोलैंड के बीच सहयोग बढ़ाने के प्रमुख क्षेत्रों में रक्षा उद्योग भी शामिल है। पोलैंड भारत के साथ मिलकर हथियारों और अन्य रक्षा उपकरणों के निर्माण की संभावनाओं पर काम करना चाहता है। दोनों देशों के बीच सहयोग केवल तैयार उपकरणों की खरीद-बिक्री तक सीमित रहने के बजाय डिजाइन, तकनीकी विकास और उत्पादन तक बढ़ सकता है।

संयुक्त रक्षा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों को कई पहलुओं पर काम करना होगा। इनमें तकनीकी जानकारी साझा करने की व्यवस्था, गोपनीय दस्तावेजों की सुरक्षा और आपसी भरोसे से जुड़े समझौते शामिल हैं। यदि इन क्षेत्रों में सहमति बनती है, तो दोनों देश अपने औद्योगिक अनुभव और तकनीकी क्षमताओं का इस्तेमाल करते हुए साझेदारी के नए रास्ते तलाश सकते हैं।

भारत रक्षा उपकरणों के घरेलू निर्माण और तकनीकी क्षमता बढ़ाने पर जोर देता रहा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ अनुसंधान और उत्पादन का सहयोग दोनों देशों के उद्योगों के लिए अवसर पैदा कर सकता है। हालांकि, किसी भी संयुक्त परियोजना का वास्तविक स्वरूप संबंधित समझौतों और आगे होने वाली बातचीत पर निर्भर करेगा।

अंतरिक्ष, डिजिटल तकनीक और बैटरी रिसाइक्लिंग पर नजर

भारत और पोलैंड के बीच संभावित सहयोग का दायरा रक्षा और पारंपरिक व्यापार से आगे भी फैला हुआ है। सूचना प्रौद्योगिकी, डिजिटल सेवाएं, अंतरिक्ष और बैटरी रिसाइक्लिंग जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के उद्योग एक-दूसरे के साथ काम कर सकते हैं।

पोलैंड की खाद्य प्रसंस्करण, खनन और मशीनरी से जुड़ी औद्योगिक क्षमताएं भी व्यापारिक सहयोग के लिए उपयोगी हो सकती हैं। वहीं भारत का बड़ा तकनीकी बाजार और यहां मौजूद आईटी कंपनियां पोलिश कारोबारियों के लिए नए अवसर उपलब्ध करा सकती हैं। दोनों देशों के बीच उद्योगों का संपर्क बढ़ने से निवेश, तकनीकी जानकारी के आदान-प्रदान और संयुक्त कारोबारी परियोजनाओं की संभावनाएं विकसित हो सकती हैं।

बेंगलुरु यात्रा इस लिहाज से अहम है, क्योंकि शहर में सूचना प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़े अनेक उद्योग मौजूद हैं। टस्क यहां कारोबारियों और तकनीकी क्षेत्र के प्रतिनिधियों से मुलाकात करेंगे। इन संपर्कों के जरिए दोनों पक्ष अपने-अपने बाजारों की जरूरतों को समझने और संभावित साझेदारी के क्षेत्रों की पहचान करने की कोशिश कर सकते हैं।

भारत-पोलैंड व्यापार मंच भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे मंचों पर कंपनियों को सीधे संवाद करने, निवेश की संभावनाओं पर चर्चा करने और कारोबारी साझेदार तलाशने का अवसर मिलता है। पोलैंड का 2030 तक व्यापार दोगुना करने का लक्ष्य इसी तरह के संपर्कों को बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

यूक्रेन में शांति और वैश्विक मुद्दों पर भी सहयोग

भारत और पोलैंड के संबंधों में आर्थिक हितों के साथ अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भी अहम भूमिका निभाती हैं। पोलैंड भारत को एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में देखता है और यूक्रेन में शांति स्थापित करने के प्रयासों सहित व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग के मुद्दों पर भारत के साथ संवाद बढ़ाना चाहता है।

यूक्रेन युद्ध यूरोप की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में भारत और पोलैंड के बीच बातचीत का एक पहलू शांति के प्रयासों और वैश्विक चुनौतियों पर विचारों का आदान-प्रदान भी है। इस विषय पर किसी साझा पहल का स्वरूप दोनों देशों की बातचीत और भविष्य में बनने वाली सहमति पर निर्भर करेगा।

डोनाल्ड टस्क की भारत यात्रा में अतीत की मानवीय विरासत और भविष्य की रणनीतिक तथा आर्थिक संभावनाएं साथ-साथ दिखाई देती हैं। ‘गुड महाराजा’ की कहानी दोनों देशों को उस दौर की याद दिलाती है, जब भारत ने संकट में फंसे पोलिश बच्चों को आश्रय दिया था। अब दोनों देश रक्षा, व्यापार, अंतरिक्ष और तकनीक के क्षेत्रों में अपने संबंधों को आगे बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। ऐतिहासिक विश्वास को आधुनिक आर्थिक और औद्योगिक साझेदारी में बदलना इस यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य है।