सोशल मीडिया पर इन दिनों 80 के दशक की याद दिलाने वाली तस्वीरों का ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। लोग अपनी मौजूदा तस्वीरें एआई टूल्स में अपलोड करके उन्हें पुराने दौर के अंदाज में बदलवा रहे हैं। किसी तस्वीर में रेट्रो हेयरस्टाइल दिखाई दे रहा है तो किसी में विंटेज कपड़े, पुराने जमाने का स्टूडियो बैकग्राउंड और 80s जैसा कैमरा इफेक्ट नजर आ रहा है। खास बात यह है कि ऐसी तस्वीर तैयार करने के लिए यूजर को किसी फोटो स्टूडियो जाने या एडिटिंग सीखने की जरूरत नहीं पड़ रही।
बस तस्वीर अपलोड करनी है, अपनी पसंद बतानी है और कुछ ही समय में एआई एक नई इमेज तैयार कर देता है। इसी आसानी की वजह से लोग एक-दो नहीं बल्कि कई-कई तस्वीरें बना रहे हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का एक ऐसा पहलू भी है, जिसके बारे में आम यूजर शायद ही सोचता है। तस्वीर भले ही उसे मुफ्त में मिल रही हो, लेकिन उसके पीछे कंप्यूटिंग, बिजली, कूलिंग, स्टोरेज और डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी कई चीजें काम करती हैं।
यानी एआई से तैयार की गई हर इमेज के पीछे एक वास्तविक संसाधन लागत मौजूद है।
एक तस्वीर तैयार करने में क्या-क्या होता है?
एआई से फोटो बनना बाहर से देखने पर बेहद आसान लगता है, लेकिन बैकएंड में यह एक जटिल प्रक्रिया होती है। जब यूजर अपनी तस्वीर अपलोड करता है तो सबसे पहले वह इंटरनेट के जरिए सर्वर तक पहुंचती है। वहां नेटवर्क, स्टोरेज और अलग-अलग सुरक्षा प्रणालियों का इस्तेमाल होता है। सिस्टम यह भी जांच सकता है कि अपलोड की गई तस्वीर और दिए गए निर्देश सुरक्षा नियमों के अनुरूप हैं या नहीं।
इसके बाद असली कंप्यूटिंग प्रक्रिया शुरू होती है। एआई मॉडल यूजर के निर्देश और उपलब्ध तस्वीर को समझकर नई इमेज तैयार करता है। इस काम के लिए शक्तिशाली कंप्यूटिंग हार्डवेयर, खासतौर पर GPU जैसे प्रोसेसर का इस्तेमाल होता है। यही प्रोसेसर बड़ी मात्रा में गणना करते हैं और इसी दौरान बिजली की खपत होती है।
कंप्यूटिंग के दौरान हार्डवेयर गर्म भी होता है। इसलिए डेटा सेंटरों में मशीनों का तापमान नियंत्रित रखने के लिए कूलिंग सिस्टम की जरूरत पड़ती है। कुछ सिस्टम में कूलिंग के लिए पानी का इस्तेमाल भी किया जाता है। इमेज बनने के बाद उसे नेटवर्क के जरिए यूजर के फोन या कंप्यूटर तक पहुंचाया जाता है और जरूरत के अनुसार कुछ समय के लिए स्टोर भी किया जा सकता है।
इस पूरी प्रक्रिया में कई ऐसे खर्च शामिल हैं, जिन्हें यूजर अपनी स्क्रीन पर नहीं देखता।
एक AI इमेज की कीमत कितनी हो सकती है?
एआई इमेज की लागत एक जैसी नहीं होती। यह इस बात पर निर्भर करती है कि तस्वीर किस गुणवत्ता में बनाई जा रही है और किस तरह के मॉडल या कंप्यूटिंग सिस्टम का इस्तेमाल हो रहा है।
OpenAI की API pricing को आधार मानकर देखें तो 1024×1024 पिक्सल की 10 लो-क्वालिटी इमेज बनाने की कीमत करीब 0.11 डॉलर बताई गई है। भारतीय मुद्रा में यह लगभग 10 रुपये के आसपास बैठती है। वहीं मीडियम क्वालिटी की 10 तस्वीरों की लागत करीब 0.42 डॉलर यानी लगभग 36 रुपये और हाई-क्वालिटी की 10 इमेज के लिए करीब 1.67 डॉलर यानी लगभग 142 रुपये तक हो सकती है।
इस हिसाब से मोटे तौर पर एक हाई-क्वालिटी इमेज की बेसिक API लागत करीब 14 रुपये के आसपास बैठती है। हालांकि यह सिर्फ उस कंप्यूटिंग सेवा की कीमत का एक संकेत है। बिजली, कूलिंग, पानी, डेटा सेंटर, नेटवर्क, सुरक्षा और अन्य ऑपरेशनल खर्च इसमें अलग-अलग हो सकते हैं।
इसलिए यह समझना जरूरी है कि यूजर को किसी सेवा में तस्वीर मुफ्त मिल रही है तो इसका मतलब यह नहीं है कि तस्वीर बनाने में कोई संसाधन खर्च नहीं हुआ।
हर तस्वीर कितनी बिजली इस्तेमाल करती है?
एआई इमेज जनरेशन की बिजली खपत के बारे में कोई एक तय आंकड़ा नहीं है। अलग-अलग मॉडल, सर्वर, इमेज क्वालिटी और डेटा सेंटर की तकनीक के कारण इसमें काफी अंतर हो सकता है।
फर्स्टपोस्ट की एक रिपोर्ट में एआई एनश्योर्ड के CTO डॉ. श्रीनिवास पद्मनाभनी के हवाले से अनुमान दिया गया कि एक एआई इमेज तैयार करने में करीब 1.2 वाट-घंटे बिजली की खपत हो सकती है। हालांकि दूसरे विशेषज्ञों के अनुमान इससे काफी अलग हैं।
मास्टेक ग्रुप के CTO और चीफ इनोवेशन ऑफिसर ऋत्विक बटाब्याल के मुताबिक इमेज जनरेशन में बिजली की जरूरत मॉडल और उसके इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर करती है। यह खपत वाट-घंटे के छोटे हिस्से से लेकर कई वाट-घंटे तक हो सकती है।
वहीं एआई एंड बियॉन्ड के सह-संस्थापक और CEO जसप्रीत बिंद्रा ने प्रति इमेज लगभग 0.1 से 4 वाट-घंटे तक का व्यापक अनुमान बताया है। इसका अर्थ है कि सभी एआई तस्वीरों को एक ही बिजली खपत के आंकड़े से नहीं आंका जा सकता।
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार भी एआई से जुड़े कुछ काम सामान्य डिजिटल गतिविधियों की तुलना में अधिक ऊर्जा मांग सकते हैं। खासतौर पर इमेज जनरेशन जैसी गतिविधियों में टेक्स्ट आधारित सामान्य एआई इस्तेमाल की तुलना में अधिक कंप्यूटिंग की जरूरत पड़ सकती है।
असली सवाल एक फोटो नहीं, करोड़ों तस्वीरों का है
अगर कोई व्यक्ति सिर्फ एक या दो तस्वीरें बनाता है तो उसकी ऊर्जा खपत बहुत बड़ी नहीं लगती। समस्या तब दिखाई देती है जब यही काम करोड़ों लोग एक साथ करने लगते हैं।
एआई से तस्वीर बनाने का चलन पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। पहले अलग-अलग AI art trends और फिर Ghibli-style इमेज जैसे ट्रेंड ने बड़ी संख्या में लोगों को इस तकनीक की ओर आकर्षित किया। अब 80s और रेट्रो स्टाइल वाली तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर खूब दिखाई दे रही हैं।
UNU से जुड़े एक अनुमान के मुताबिक 2022 और 2023 के दौरान टेक्स्ट-टू-इमेज सिस्टम के जरिए 15 अरब से ज्यादा तस्वीरें बनाई गईं। सिर्फ 2023 में ही प्रतिदिन लगभग 3.4 करोड़ एआई इमेज तैयार होने का अनुमान लगाया गया था।
यह आंकड़ा बताता है कि समस्या किसी एक यूजर की एक तस्वीर से नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर होने वाली कुल कंप्यूटिंग से जुड़ी है। अगर लाखों लोग किसी वायरल ट्रेंड के दौरान लगातार इमेज जनरेट करते हैं तो हर छोटी ऊर्जा खपत मिलकर काफी बड़ा आंकड़ा बना सकती है।
पानी की खपत क्यों जुड़ती है?
एआई की चर्चा में बिजली का जिक्र तो अक्सर होता है, लेकिन डेटा सेंटर के लिए पानी भी एक महत्वपूर्ण संसाधन हो सकता है। शक्तिशाली सर्वर लगातार काम करते हैं और उनसे पैदा होने वाली गर्मी को नियंत्रित करना जरूरी होता है। इसके लिए अलग-अलग तरह की कूलिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनमें कुछ परिस्थितियों में पानी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
ग्लोबल एआई नेटवर्क से जुड़े अनुमानों के मुताबिक एआई को सपोर्ट करने वाले डेटा सेंटरों की बिजली जरूरत आने वाले वर्षों में काफी बढ़ सकती है। 2030 तक इन डेटा सेंटरों के लिए लगभग 945 टेरावॉट-घंटे बिजली की सालाना जरूरत का अनुमान लगाया गया है।
इसी के साथ डेटा सेंटरों की कूलिंग के लिए पानी की मांग भी बढ़ सकती है। संबंधित अनुमान में 2030 तक करीब 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी की जरूरत की बात कही गई है।
हालांकि इन आंकड़ों को किसी एक एआई तस्वीर की सीधी लागत नहीं माना जा सकता। यह पूरे डेटा सेंटर और एआई इंफ्रास्ट्रक्चर की संभावित जरूरतों का व्यापक अनुमान है।
‘फ्री’ AI का मतलब पूरी तरह मुफ्त नहीं
यूजर के नजरिए से देखें तो तस्वीर बनाना बेहद आसान है। कोई अलग सॉफ्टवेयर खरीदने की जरूरत नहीं, महंगे फोटोशूट की जरूरत नहीं और कई मामलों में अलग से पैसे भी नहीं देने पड़ते। लेकिन पर्दे के पीछे इस सुविधा को चलाने के लिए कंपनियों को महंगे सर्वर, GPU, डेटा सेंटर, बिजली, कूलिंग और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश करना पड़ता है।
यही वजह है कि एआई से बनाई गई तस्वीर की कीमत सिर्फ उस रकम से तय नहीं की जा सकती, जो यूजर ने अपनी जेब से दी है। इसके पीछे संसाधनों की खपत भी जुड़ी हुई है।
क्या 80s ट्रेंड पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा है?
एक अकेली तस्वीर को पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा कहना सही नहीं होगा। असली चिंता उस पैमाने की है, जिस पर एआई इमेज जनरेशन हो रही है। जब एक वायरल ट्रेंड लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंचता है और हर व्यक्ति कई तस्वीरें बनाता है, तब कुल कंप्यूटिंग जरूरत तेजी से बढ़ सकती है।
इसलिए एआई तस्वीरों का मुद्दा सिर्फ टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया ट्रेंड तक सीमित नहीं है। इसके साथ ऊर्जा, पानी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती मांग का सवाल भी जुड़ा है।
80s स्टाइल की एक तस्वीर बनाना भले ही कुछ सेकंड का काम हो, लेकिन उसके पीछे चलने वाली मशीनें, सर्वर और कूलिंग सिस्टम लगातार संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए अगली बार जब आप किसी ट्रेंड के तहत दर्जनों एआई तस्वीरें बनाएं, तो यह याद रखना भी जरूरी है कि स्क्रीन पर दिखाई देने वाली आसान प्रक्रिया के पीछे एक बड़ा कंप्यूटिंग सिस्टम काम कर रहा है।




