पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में विधानसभा चुनाव के पहले चरण के दौरान राजनीतिक तनाव हिंसा में बदल गया। सोमवार को चुनाव प्रक्रिया के बीच सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ, जिसके बाद फायरिंग की घटनाएं सामने आईं। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि इस गोलीबारी में कम से कम 8 लोगों की जान चली गई। हालांकि, इस संख्या की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। घटनाओं के बाद पूरे क्षेत्र में हालात और अधिक संवेदनशील हो गए हैं।
दरअसल, सोमवार को PoK में विधानसभा चुनाव के पहले चरण के तहत मतदान कराया गया। लेकिन चुनाव शुरू होने से पहले ही कई राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने इसका विरोध किया था। कई इलाकों में लोगों ने मतदान केंद्रों से दूरी बनाए रखी और चुनाव प्रक्रिया के बहिष्कार का आह्वान किया। रिपोर्ट्स के अनुसार कई क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत काफी कम रहा, जिससे चुनाव की निष्पक्षता और जनभागीदारी को लेकर भी सवाल उठने लगे।
इसी बीच हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए। उनका आरोप था कि मौजूदा चुनावी व्यवस्था स्थानीय लोगों की वास्तविक इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करती। प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान सरकार की नीतियों और चुनावी प्रणाली के खिलाफ नारेबाजी करते हुए राजधानी मुजफ्फराबाद की ओर मार्च शुरू किया। जैसे-जैसे भीड़ आगे बढ़ी, कई स्थानों पर सुरक्षाबलों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, जिससे स्थिति तनावपूर्ण हो गई।
प्रदर्शनों का नेतृत्व जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) कर रही है। यह संगठन पिछले कई महीनों से चुनावी ढांचे और विशेष रूप से विधानसभा में आरक्षित सीटों के मुद्दे पर लगातार आंदोलन चला रहा है। संगठन का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था स्थानीय मतदाताओं के अधिकारों को कमजोर करती है और बाहरी प्रभाव को बढ़ावा देती है।
सरकार ने बढ़ते विरोध को देखते हुए 5 जून को प्रस्तावित बड़े प्रदर्शन से पहले ही JAAC पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद संगठन के कई प्रमुख नेताओं को हिरासत में लिया गया। कुछ नेताओं को गिरफ्तार किया गया, जबकि कई अन्य भूमिगत हो गए ताकि आंदोलन को जारी रखा जा सके। इसके बावजूद संगठन के कार्यकर्ताओं ने विभिन्न इलाकों में धरना-प्रदर्शन जारी रखा।
रावलाकोट, जो पुंछ डिवीजन का मुख्यालय माना जाता है, आंदोलन का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां कई नेताओं और समर्थकों ने धरना स्थलों से ही अभियान जारी रखा। प्रशासन की ओर से सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने पीछे हटने से इनकार कर दिया। इससे पूरे इलाके में लगातार तनाव बना रहा।
बीते कुछ सप्ताहों में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच कई बार झड़पें हुई हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इन घटनाओं में अब तक करीब 40 लोगों की मौत होने का दावा किया गया है, जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए हैं। कई इलाकों में सड़कें जाम रहीं और विरोध प्रदर्शन लगातार जारी रहे, जिससे सामान्य जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ।
हालात इतने गंभीर हो गए कि कई शहरों में बैंक लगातार दो सप्ताह तक बंद रहे। आर्थिक गतिविधियां लगभग ठप पड़ गईं और लोगों को दैनिक जरूरतों के लिए भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। कई बाजारों में कारोबार प्रभावित हुआ और प्रशासन को अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात करने पड़े।
सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कई क्षेत्रों में मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी गईं। संचार सेवाएं बाधित होने से लोगों को जानकारी हासिल करने और अपने परिजनों से संपर्क करने में कठिनाई हुई। इंटरनेट बंद होने से व्यापार, शिक्षा और अन्य ऑनलाइन सेवाओं पर भी व्यापक असर पड़ा।
भारत की सीमा से सटे पुंछ डिवीजन में सबसे अधिक विरोध प्रदर्शन देखने को मिले। प्रशासन ने इस क्षेत्र में आवाजाही पर कड़ी निगरानी रखी और कई स्थानों को पूरी तरह सील कर दिया। लगातार प्रतिबंधों के कारण आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हुई। स्थानीय लोगों का कहना है कि आटा, दवाइयों और अन्य जरूरी सामान की उपलब्धता भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई।
इस पूरे विवाद के केंद्र में PoK विधानसभा की 12 आरक्षित सीटें हैं। कुल 45 निर्वाचित सीटों वाली विधानसभा में ये 12 सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, जो भारतीय प्रशासित जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान जाकर बसे थे। सरकार का कहना है कि यह व्यवस्था ऐतिहासिक और संवैधानिक आधार पर लागू है और इसे बनाए रखना जरूरी है।
दूसरी ओर JAAC और कई स्थानीय संगठन इस व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि पाकिस्तान के विभिन्न शहरों में रहने वाले लोगों को PoK की स्थानीय सरकार चुनने का अधिकार नहीं होना चाहिए। उनका कहना है कि इससे स्थानीय मतदाताओं का प्रभाव कम हो जाता है और चुनावी नतीजों पर बाहरी असर पड़ता है।
प्रदर्शनकारी यह भी आरोप लगाते हैं कि इन 12 सीटों का फायदा अक्सर पाकिस्तान की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों, जैसे PML-N और PPP, को मिलता है। उनके अनुसार आरक्षित सीटों की मौजूदा व्यवस्था सत्ता संतुलन को प्रभावित करती है और स्थानीय जनता की राय कमजोर पड़ जाती है।
हालांकि पाकिस्तान सरकार और संबंधित अदालतों का कहना है कि इन सीटों को समाप्त करने या इनमें बदलाव करने के लिए केवल संवैधानिक संशोधन का रास्ता अपनाया जा सकता है। सरकार का दावा है कि मौजूदा चुनाव संविधान के अनुरूप कराए जा रहे हैं और किसी भी प्रकार का बदलाव कानूनी प्रक्रिया के तहत ही संभव है।
चुनाव कार्यक्रम को लेकर भी बदलाव किया गया है। पहले पूरी 45 सदस्यीय विधानसभा के लिए मतदान 27 जुलाई को एक ही चरण में होना था, लेकिन लगातार विरोध, सुरक्षा चुनौतियों और बढ़ते तनाव को देखते हुए चुनाव आयोग ने मतदान को तीन चरणों में कराने का फैसला लिया।
पहले चरण में मीरपुर डिवीजन में मतदान कराया गया। दूसरे चरण का मतदान 2 अगस्त को मुजफ्फराबाद डिवीजन और शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों पर प्रस्तावित है। वहीं तीसरा और अंतिम चरण 10 अगस्त को पुंछ डिवीजन में होगा, जिसे सबसे संवेदनशील क्षेत्र माना जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि राजनीतिक गतिरोध और विरोध प्रदर्शन जारी रहे तो आने वाले चरणों में भी सुरक्षा एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती बनी रहेगी। प्रशासन के लिए शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करना आसान नहीं होगा, जबकि प्रदर्शनकारी अपने आंदोलन को और तेज करने के संकेत दे चुके हैं।
फिलहाल पूरे क्षेत्र की स्थिति पर सभी की नजर बनी हुई है। सुरक्षा व्यवस्था पहले से अधिक कड़ी कर दी गई है और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त बल तैनात किए गए हैं। दूसरी ओर विरोध करने वाले संगठन चुनावी व्यवस्था में बदलाव की मांग पर अड़े हुए हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में PoK की राजनीतिक स्थिति किस दिशा में जाएगी, यह काफी हद तक सरकार, सुरक्षा एजेंसियों और आंदोलनकारी संगठनों के अगले कदम पर निर्भर करेगा।




