महाराष्ट्र सरकार ने भाषा नीति पर बदला फैसला, नई समिति करेगी समीक्षा
महाराष्ट्र में स्कूलों में हिंदी भाषा को अनिवार्य किए जाने को लेकर पिछले कुछ महीनों से चल रहा विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। राज्य सरकार ने बढ़ते विरोध और विभिन्न वर्गों से मिल रही प्रतिक्रियाओं के बाद तीन-भाषा नीति (Three-Language Policy) से जुड़े अपने दोनों सरकारी आदेश (Government Resolutions – GRs) वापस लेने का निर्णय लिया है।
कैबिनेट की बैठक में लिए गए इस फैसले के बाद अब अप्रैल और जून में जारी किए गए दोनों आदेश प्रभावी नहीं रहेंगे। सरकार ने साथ ही एक नई विशेषज्ञ समिति गठित करने की घोषणा की है, जो राज्य की भाषा नीति की समीक्षा कर भविष्य के लिए सुझाव देगी।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब राज्य में भाषा, शिक्षा और क्षेत्रीय पहचान को लेकर व्यापक बहस चल रही थी। सरकार का कहना है कि नई नीति तैयार करने से पहले सभी पक्षों की राय को महत्व दिया जाएगा।
क्या था पूरा विवाद?
विवाद की शुरुआत 16 अप्रैल को जारी उस सरकारी आदेश से हुई, जिसमें कहा गया था कि महाराष्ट्र के मराठी और अंग्रेजी माध्यम (English Medium) स्कूलों में कक्षा 1 से 5 तक पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य किया जाएगा।
सरकार का तर्क था कि नई शिक्षा नीति (NEP) के अनुरूप छात्रों को बहुभाषी शिक्षा का लाभ मिलना चाहिए। लेकिन इस फैसले के सामने आते ही राज्य के कई हिस्सों में इसका विरोध शुरू हो गया।
शिक्षकों, अभिभावकों, शिक्षा विशेषज्ञों, मराठी भाषा संगठनों और विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसे लेकर चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि प्राथमिक कक्षाओं के छोटे बच्चों पर एक अतिरिक्त भाषा का बोझ डालना उचित नहीं है और राज्य की भाषाई पहचान को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
विरोध के बाद सरकार ने किया पहला बदलाव
बढ़ते विरोध को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने 17 जून को एक संशोधित सरकारी आदेश जारी किया।
इस संशोधित आदेश में हिंदी को अनिवार्य रखने की बजाय वैकल्पिक (Optional) भाषा के रूप में शामिल करने की बात कही गई। सरकार ने संकेत दिया कि छात्रों और स्कूलों को विकल्प दिया जाएगा।
हालांकि यह बदलाव भी विवाद को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सका। कई संगठनों ने मांग की कि दोनों आदेश पूरी तरह वापस लिए जाएं और नई भाषा नीति पर व्यापक चर्चा की जाए।
अब सरकार ने दोनों GR पूरी तरह वापस लिए
रविवार को हुई महाराष्ट्र मंत्रिमंडल (Cabinet) की बैठक में सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए अप्रैल और जून में जारी दोनों सरकारी आदेश वापस लेने का निर्णय लिया।
मुंबई में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि सरकार भाषा जैसे संवेदनशील विषय पर जल्दबाजी में कोई निर्णय नहीं लेना चाहती। इसलिए पहले जारी किए गए दोनों आदेश निरस्त किए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि आगे की भाषा नीति विशेषज्ञों की सिफारिशों और व्यापक विचार-विमर्श के आधार पर तय की जाएगी।
नई समिति करेगी भाषा नीति की समीक्षा
सरकार ने घोषणा की है कि राज्य की भाषा नीति पर विस्तृत अध्ययन करने के लिए एक नई समिति का गठन किया जाएगा।
इस समिति की अध्यक्षता प्रसिद्ध शिक्षाविद् डॉ. नरेंद्र जाधव करेंगे।
समिति का मुख्य कार्य होगा—
- राज्य में तीन-भाषा नीति के प्रभाव का अध्ययन करना।
- विभिन्न शिक्षा बोर्डों और विशेषज्ञों से सुझाव लेना।
- छात्रों पर भाषा के अतिरिक्त बोझ का मूल्यांकन करना।
- नई शिक्षा नीति (NEP) के अनुरूप संतुलित मॉडल तैयार करना।
- सरकार को भविष्य की भाषा नीति के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट सौंपना।
सरकार का कहना है कि समिति की सिफारिशों के आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी।
तीन-भाषा नीति क्या है?
भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy – NEP 2020) में बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया है।
तीन-भाषा नीति का उद्देश्य छात्रों को कम से कम तीन भाषाओं का ज्ञान देना है, जिसमें सामान्यतः शामिल हो सकते हैं—
- मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा
- हिंदी या अन्य भारतीय भाषा
- अंग्रेजी
हालांकि यह नीति राज्यों को अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार लागू करने की स्वतंत्रता भी देती है। इसी कारण अलग-अलग राज्यों में इसकी व्याख्या और क्रियान्वयन अलग-अलग तरीके से किए जा रहे हैं।
भाषा को लेकर क्यों हुआ इतना विरोध?
महाराष्ट्र में भाषा केवल शिक्षा का विषय नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान और क्षेत्रीय अस्मिता से भी जुड़ा मुद्दा माना जाता है।
कई सामाजिक संगठनों और मराठी भाषा समर्थकों का कहना था कि—
- प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों पर अतिरिक्त भाषाई दबाव नहीं होना चाहिए।
- छात्रों और अभिभावकों को भाषा चुनने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
- मराठी भाषा को प्राथमिकता बनाए रखना जरूरी है।
- किसी भी भाषा को अनिवार्य बनाने की बजाय विकल्प के रूप में उपलब्ध कराया जाना बेहतर होगा।
दूसरी ओर कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि बहुभाषी शिक्षा भविष्य की प्रतिस्पर्धा और रोजगार के अवसरों के लिहाज से लाभदायक हो सकती है, लेकिन इसका क्रियान्वयन छात्रों की आयु, सीखने की क्षमता और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
पूर्व सरकार को लेकर भी हुई राजनीतिक टिप्पणी
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की सरकार का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि पिछली सरकार के दौरान डॉ. रघुनाथ माशेलकर समिति की सिफारिशों को मंजूरी दी गई थी, जिसमें कक्षा 1 से 12 तक तीन-भाषा नीति लागू करने का प्रस्ताव शामिल था।
हालांकि इस विषय पर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच अलग-अलग मत सामने आए हैं और भाषा नीति को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी जारी है।
अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों की क्या राय है?
इस पूरे विवाद के दौरान अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों की अलग-अलग राय सामने आई।
कुछ लोगों का कहना है कि शुरुआती कक्षाओं में बच्चों को उनकी मातृभाषा में मजबूत आधार मिलना सबसे अधिक आवश्यक है। उनका मानना है कि बहुत जल्दी अतिरिक्त भाषाएं जोड़ने से बच्चों की सीखने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
वहीं कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भाषा सीखने के विकल्प लचीले हों और छात्रों की रुचि तथा स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार व्यवस्था बनाई जाए, तो बहुभाषी शिक्षा विद्यार्थियों के समग्र विकास में सहायक हो सकती है।
आगे क्या होगा?
सरकार द्वारा दोनों सरकारी आदेश वापस लिए जाने के बाद फिलहाल हिंदी को लेकर जारी विवादित व्यवस्था लागू नहीं रहेगी।
अब सभी की निगाहें नई समिति की सिफारिशों पर रहेंगी। समिति की रिपोर्ट आने के बाद राज्य सरकार तय करेगी कि महाराष्ट्र में तीन-भाषा नीति किस स्वरूप में लागू की जाए और छात्रों के हितों, शिक्षा की गुणवत्ता तथा क्षेत्रीय भाषाई संवेदनाओं के बीच किस प्रकार संतुलन बनाया जाए।



