अगले बजट में कस्टम ड्यूटी पर बड़ा फैसला संभव! वित्त मंत्री ने दिए नए संकेत,

अगले बजट में कस्टम ड्यूटी पर बड़ा फैसला संभव! वित्त मंत्री ने दिए नए संकेत,

देश में टैक्स व्यवस्था को अधिक सरल और निवेश के अनुकूल बनाने की दिशा में केंद्र सरकार लगातार कदम उठा रही है। कॉरपोरेट टैक्स, इनकम टैक्स और वस्तु एवं सेवा कर (GST) में सुधार के बाद अब सरकार की नजर कस्टम ड्यूटी व्यवस्था पर है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संकेत दिए हैं कि आने वाले बजट में आयात शुल्क यानी कस्टम टैरिफ को और अधिक सरल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण फैसले लिए जा सकते हैं। उनका कहना है कि सरकार का लक्ष्य अधिकांश वस्तुओं पर कस्टम टैरिफ को सिंगल डिजिट तक लाना है, ताकि व्यापारिक माहौल बेहतर बने और उद्योगों को राहत मिल सके।

हाल ही में आयोजित एक आर्थिक कार्यक्रम में वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार पिछले कुछ वर्षों से कस्टम ड्यूटी के ढांचे को व्यवस्थित करने पर लगातार काम कर रही है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य आयात शुल्क की जटिलता को कम करना और विभिन्न क्षेत्रों में एक समान एवं पारदर्शी व्यवस्था तैयार करना है। उन्होंने विश्वास जताया कि यदि सुधारों की रफ्तार इसी तरह जारी रही तो वर्ष 2027-28 तक अधिकांश उत्पादों पर कस्टम ड्यूटी एकल अंक में पहुंच सकती है। हालांकि कुछ संवेदनशील और विशेष श्रेणी की वस्तुओं को इससे अलग रखा जा सकता है।

वित्त मंत्री ने बताया कि बीते बजटों में सरकार ने कई स्तरों पर कस्टम ड्यूटी के स्लैब कम किए हैं। पहले जहां अलग-अलग उत्पादों पर कई प्रकार की दरें लागू थीं, वहीं अब उन्हें सीमित करने का प्रयास किया गया है। इससे उद्योगों के लिए नियमों को समझना आसान होगा और कारोबार की लागत में भी कमी आने की संभावना है। सरकार का मानना है कि सरल टैक्स व्यवस्था निवेशकों का विश्वास बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कस्टम ड्यूटी में सुधार का एक बड़ा उद्देश्य इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर जैसी समस्याओं को समाप्त करना है। कई उद्योगों में ऐसी स्थिति बन जाती थी, जहां तैयार उत्पाद पर लगने वाला आयात शुल्क उसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की तुलना में कम होता था। इससे घरेलू विनिर्माण क्षेत्र को नुकसान उठाना पड़ता था और कंपनियों की लागत बढ़ जाती थी। सरकार अब इस तरह की विसंगतियों को दूर करने पर विशेष ध्यान दे रही है।

सीतारमण ने कहा कि जब आयात शुल्क की संरचना सरल और तर्कसंगत होती है, तब उद्योगों को दीर्घकालिक निवेश की योजना बनाने में आसानी होती है। इससे विदेशी निवेशकों का भरोसा भी बढ़ता है और घरेलू उत्पादन को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलता है। उनका मानना है कि टैक्स सुधार केवल राजस्व बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि आर्थिक विकास को गति देने का भी महत्वपूर्ण साधन हैं।

अपने संबोधन में उन्होंने कोविड-19 महामारी के बाद सरकार द्वारा किए गए पूंजीगत खर्च का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, महामारी के बाद केंद्र सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास परियोजनाओं पर बड़े पैमाने पर निवेश किया। इसका सकारात्मक असर निजी क्षेत्र पर पड़ा और कंपनियों ने भी नए निवेश की दिशा में कदम बढ़ाए। उन्होंने कहा कि जब सरकार बड़े पैमाने पर आधारभूत ढांचे में निवेश करती है, तो निजी क्षेत्र का भरोसा मजबूत होता है और आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलती है।

वित्त मंत्री का कहना था कि सरकार के कैपिटल एक्सपेंडिचर ने केवल रोजगार के अवसर ही नहीं बढ़ाए, बल्कि उद्योगों के लिए नए बाजार भी तैयार किए। सड़क, रेलवे, बंदरगाह, हवाई अड्डों और अन्य सार्वजनिक परियोजनाओं पर निवेश का लाभ निजी कंपनियों को भी मिला। इससे देश में उत्पादन क्षमता बढ़ाने और आर्थिक गतिविधियों को मजबूत करने में मदद मिली।

उन्होंने राज्यों की वित्तीय स्थिति पर भी विस्तार से बात की। उनका कहना था कि राज्य सरकारों को कर्ज लेने से पहले उसकी उपयोगिता और भुगतान क्षमता का गंभीरता से आकलन करना चाहिए। यदि कर्ज का उपयोग केवल खर्च चलाने के लिए किया जाएगा तो भविष्य में आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। इसके विपरीत यदि उधार ली गई राशि का उपयोग ऐसे परिसंपत्तियों के निर्माण में किया जाए जो भविष्य में आय और विकास का आधार बनें, तो उसका सकारात्मक प्रभाव लंबे समय तक दिखाई देगा।

सीतारमण ने कहा कि राज्यों को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि वे जितना कर्ज लें, उसे समय पर चुकाने की क्षमता भी रखें। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान पीढ़ी द्वारा लिया गया अत्यधिक कर्ज भविष्य की पीढ़ियों पर अनावश्यक बोझ नहीं बनना चाहिए। वित्तीय अनुशासन और जिम्मेदार उधारी किसी भी राज्य की मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए बेहद आवश्यक है।

उन्होंने बताया कि हाल के वर्षों में कई राज्यों ने अपने कर्ज प्रबंधन को लेकर केंद्र सरकार से चर्चा की है। कुछ राज्यों ने अपने ऋण की स्थिति का आकलन करने और उसे बेहतर तरीके से प्रबंधित करने के लिए वित्त मंत्रालय की विशेषज्ञ टीमों से सहयोग भी लिया। इस प्रक्रिया के तहत कई राज्यों को अपने पुराने कर्ज के पुनर्गठन यानी रीस्ट्रक्चरिंग में सहायता मिली, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति को संतुलित करने में मदद मिली।

उन्हें इस बात की खुशी है कि अब कई राज्य अपने वित्तीय दायित्वों को लेकर पहले की तुलना में अधिक जागरूक हो गए हैं। राज्य सरकारें यह समझ रही हैं कि केवल कर्ज लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे समय पर चुकाने की रणनीति भी बनानी होती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कर्ज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि अंततः उसका भुगतान करना ही पड़ता है।

सार्वजनिक ऋण से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया का कोई भी देश केवल अपने आंतरिक संसाधनों के आधार पर विकास नहीं कर सकता। विकास परियोजनाओं, आधारभूत ढांचे और सामाजिक योजनाओं के लिए समय-समय पर उधार लेना आवश्यक होता है। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि उधार की मात्रा नियंत्रित रहे और उसका उपयोग उत्पादक कार्यों में किया जाए।

यदि कर्ज का इस्तेमाल आर्थिक विकास को गति देने वाले क्षेत्रों में किया जाए, तो उससे भविष्य में राजस्व बढ़ता है और ऋण चुकाना आसान हो जाता है। वहीं, यदि उधार का उपयोग केवल अल्पकालिक खर्चों के लिए किया जाए, तो लंबे समय में वित्तीय चुनौतियां बढ़ सकती हैं। इसलिए केंद्र और राज्यों दोनों को संतुलित वित्तीय नीति अपनाने की आवश्यकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार आने वाले बजट में कस्टम ड्यूटी को और अधिक सरल बनाती है, तो इसका सकारात्मक असर व्यापार, उद्योग और निवेश पर दिखाई दे सकता है। आयात-निर्यात से जुड़े कारोबारियों को स्पष्ट और आसान टैक्स ढांचा मिलेगा, जबकि घरेलू उद्योगों को भी बेहतर प्रतिस्पर्धा का अवसर प्राप्त होगा। साथ ही, विदेशी कंपनियों के लिए भारत में निवेश का माहौल और अधिक आकर्षक बन सकता है।

टैक्स प्रणाली में पारदर्शिता और सरलता बढ़ने से उद्योगों का अनुपालन खर्च कम होता है। इससे कंपनियां अपने संसाधनों का बेहतर उपयोग कर पाती हैं और उत्पादन बढ़ाने पर अधिक ध्यान दे सकती हैं। सरकार भी लंबे समय से यही कोशिश कर रही है कि टैक्स व्यवस्था ऐसी हो, जिसमें कम विवाद हों और अधिक पारदर्शिता दिखाई दे।

वित्त मंत्री के ताजा संकेत बताते हैं कि सरकार अगले बजट में कस्टम ड्यूटी ढांचे में व्यापक बदलाव की दिशा में आगे बढ़ सकती है। यदि अधिकांश उत्पादों पर टैरिफ सिंगल डिजिट तक लाने की योजना सफल होती है, तो यह भारतीय उद्योग, व्यापार और निवेश के लिए एक महत्वपूर्ण सुधार साबित हो सकता है। इसके साथ ही वित्तीय अनुशासन, जिम्मेदार कर्ज प्रबंधन और पूंजीगत निवेश पर सरकार का जोर आने वाले वर्षों में देश की आर्थिक वृद्धि को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।