पश्चिम एशिया में हाल के तनाव के कम होने और सुरक्षा परिस्थितियों में सुधार के संकेत मिलने के बाद भारत और ईरान के बीच रणनीतिक महत्व वाले चाबहार पोर्ट को लेकर गतिविधियां एक बार फिर तेज होने की संभावना जताई जा रही है। लंबे समय से विभिन्न कारणों से प्रभावित रहे इस प्रोजेक्ट पर दोनों देशों के अधिकारी जल्द चर्चा कर सकते हैं। माना जा रहा है कि यदि परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं तो बंदरगाह पर सामान्य परिचालन बहाल करने और इसके विस्तार की योजनाओं को दोबारा गति मिल सकती है।
चाबहार पोर्ट भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी नीति का अहम हिस्सा माना जाता है। इस परियोजना के जरिए भारत पाकिस्तान के रास्ते पर निर्भर हुए बिना अफगानिस्तान, मध्य एशिया और रूस जैसे बाजारों तक पहुंच बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। यही वजह है कि नई दिल्ली लंबे समय से इस बंदरगाह को विकसित करने में निवेश और तकनीकी सहयोग प्रदान करती रही है।
सूत्रों के अनुसार, भारत और ईरान के बीच प्रस्तावित बातचीत का केंद्र शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल हो सकता है, जिसका संचालन मई 2024 में हुए 10 वर्षीय समझौते के तहत इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल) के पास है। दोनों देशों के अधिकारी टर्मिनल की क्षमता बढ़ाने, माल ढुलाई के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विस्तार की संभावनाओं पर विचार कर सकते हैं।
हाल के वर्षों में अमेरिकी प्रतिबंधों और क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण इस परियोजना की रफ्तार प्रभावित हुई थी। हालांकि अब युद्ध संबंधी तनाव में कमी आने के बाद माहौल अपेक्षाकृत स्थिर होता दिखाई दे रहा है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय वार्ता के जरिए बंदरगाह की गतिविधियों को सामान्य स्तर पर लाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।
भारत पहले ही इस परियोजना से जुड़े अपने प्रमुख वित्तीय वादों को पूरा कर चुका है। ईरान के पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन के साथ हुए समझौते के अंतर्गत भारत ने आवश्यक उपकरणों की खरीद के लिए करीब 120 मिलियन डॉलर का निवेश किया है। यह निवेश बंदरगाह की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने और भविष्य में अधिक मात्रा में कार्गो संभालने की क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से किया गया था।
आने वाले दौर की चर्चाओं में कंटेनर हैंडलिंग क्षमता में बड़े स्तर पर विस्तार का मुद्दा भी प्रमुख रह सकता है। पहले बनाई गई योजनाओं के अनुसार चाबहार की मौजूदा क्षमता, जो लगभग एक लाख टीईयू (ट्वेंटी फुट इक्विवेलेंट यूनिट्स) के आसपास है, उसे बढ़ाकर पांच लाख टीईयू तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया था। इसके अलावा नए कार्गो बर्थ विकसित करने और आधुनिक सुविधाएं जोड़ने पर भी विचार किया जा सकता है।
भारत की व्यापक योजना केवल बंदरगाह संचालन तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली लंबे समय से चाबहार को क्षेत्रीय परिवहन नेटवर्क से जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। इसके तहत बंदरगाह को इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) से जोड़ने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे भारत, ईरान, रूस और मध्य एशियाई देशों के बीच व्यापार को नई गति मिल सके।
चाबहार-जहेदान रेल परियोजना भी इस पूरी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। लगभग 700 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन के जरिए बंदरगाह को ईरान के राष्ट्रीय रेल नेटवर्क से जोड़े जाने की योजना है। इसके पूरा होने पर समुद्री और रेल परिवहन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित होगा और सामान की आवाजाही अधिक तेज और सस्ती हो सकेगी।
जानकारों का मानना है कि अगले कुछ वर्षों में भारत इस परियोजना में 400 से 500 मिलियन डॉलर तक का अतिरिक्त निवेश करने की दिशा में भी आगे बढ़ सकता है। इसका उद्देश्य बंदरगाह के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, लॉजिस्टिक सुविधाओं का विस्तार करना और क्षेत्रीय व्यापार को अधिक प्रभावी बनाना है।
चाबहार की रणनीतिक अहमियत केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि भू-राजनीतिक स्तर पर भी काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह बंदरगाह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया के साथ सीधे संपर्क का विकल्प प्रदान करता है, जहां पहुंच के लिए पाकिस्तान के भू-मार्ग पर निर्भरता एक बड़ी चुनौती रही है। इस वजह से चाबहार को भारत की दीर्घकालिक विदेश और व्यापार नीति का प्रमुख स्तंभ माना जाता है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट और वहां चीन की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए भी चाबहार का महत्व बढ़ जाता है। ग्वादर बंदरगाह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में चाबहार के विकास को क्षेत्रीय स्तर पर संतुलन कायम करने की दिशा में भी देखा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत की गतिविधियां यहां तेजी से बढ़ती हैं तो इससे पाकिस्तान की चिंताएं बढ़ सकती हैं।
सूत्रों के मुताबिक आगामी बैठकों में इस बात पर भी विशेष चर्चा हो सकती है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच किस प्रकार वाणिज्यिक गतिविधियों को बिना किसी बाधा के जारी रखा जाए। व्यापारिक कंपनियों और निवेशकों के लिए स्थिर और सुरक्षित माहौल तैयार करना दोनों देशों की प्राथमिकताओं में शामिल रह सकता है।
हालांकि अभी तक संभावित बैठकों की कोई निश्चित समय-सीमा सार्वजनिक नहीं की गई है। पोर्ट, शिपिंग मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और भारत में स्थित ईरानी दूतावास की ओर से भी इस संबंध में आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसके बावजूद हालात में सुधार के संकेतों के बीच यह माना जा रहा है कि चाबहार परियोजना को फिर से गति देने की दिशा में आने वाले समय में महत्वपूर्ण प्रगति देखने को मिल सकती है।
यदि प्रस्तावित योजनाएं तय समय के अनुसार आगे बढ़ती हैं तो चाबहार पोर्ट न केवल भारत और ईरान के बीच आर्थिक सहयोग का नया अध्याय लिखेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र में व्यापार और संपर्क व्यवस्था के लिए भी एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर सकता है। इससे दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और रूस के बीच कारोबारी संबंधों को नई मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।




