हिंदू धर्म में अधिक मास, जिसे पुरुषोत्तम मास या मलमास भी कहा जाता है, अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मास विशेष रूप से भगवान विष्णु की आराधना, दान-पुण्य और सत्कर्मों के लिए समर्पित होता है। वर्ष 2026 में यह शुभ अवधि 17 मई से शुरू होकर 15 जून तक रहने की संभावना है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पूरे महीने में किए गए दान, सेवा और पुण्य कार्यों का कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है। यही कारण है कि इस अवधि में लोग अपने व्यवहार, आचरण और कर्मों को अधिक सात्विक और सकारात्मक रखने का प्रयास करते हैं।
अधिक मास का धार्मिक महत्व
अधिक मास को हिंदू पंचांग में विशेष स्थान प्राप्त है। इसे “पुरुषोत्तम मास” इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह भगवान विष्णु को समर्पित होता है। मान्यता है कि इस महीने में की गई पूजा, व्रत और सेवा सामान्य दिनों की तुलना में अधिक फलदायी होती है।
इस दौरान मंदिरों में विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं, लोग दान-पुण्य करते हैं और अपने जीवन में आध्यात्मिक शुद्धता लाने का प्रयास करते हैं। यह समय आत्मचिंतन और धार्मिक अनुशासन का प्रतीक माना जाता है।
भांजे-भांजी का सम्मान क्यों माना जाता है पुण्यकारी?
धार्मिक परंपराओं में भांजे और भांजी (बहन के बच्चे) को विशेष स्थान दिया गया है। कई मान्यताओं के अनुसार इन्हें अत्यंत शुभ और पवित्र संबंध माना जाता है। यह विश्वास है कि इनका सम्मान करने से घर-परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
शास्त्रों और लोक परंपराओं में यह भी कहा गया है कि भांजे-भांजी का स्नेह और सेवा करने से पारिवारिक संबंध मजबूत होते हैं और घर में सौहार्द और समृद्धि बढ़ती है।
धार्मिक मान्यताओं के पीछे की भावना
इस परंपरा के पीछे मुख्य उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों को मजबूत करना भी है। भांजे-भांजी को सम्मान देना रिश्तों में प्रेम, आदर और अपनापन बढ़ाने का एक माध्यम माना गया है।
कई परंपराओं में इसे निस्वार्थ सेवा का प्रतीक भी माना जाता है, जो व्यक्ति के मन से अहंकार को दूर कर विनम्रता और करुणा को बढ़ाता है।
अधिक मास में भांजे-भांजी का स्वागत कैसे किया जाता है?
इस पवित्र महीने में यदि भांजा या भांजी घर आते हैं, तो उनका स्वागत विशेष रीति-रिवाजों के साथ किया जाता है।
- उन्हें आदरपूर्वक बैठाया जाता है
- माथे पर तिलक लगाकर शुभकामनाएं दी जाती हैं
- आरती उतारकर आशीर्वाद लिया जाता है
- सात्विक भोजन और मिठाइयों का भोग कराया जाता है
- विदाई के समय वस्त्र, फल या उपहार दिए जाते हैं
यह सभी परंपराएं सम्मान और प्रेम का प्रतीक मानी जाती हैं।
क्या मिलता है इसका धार्मिक फल?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिक मास में भांजे-भांजी का सम्मान करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। यह कार्य व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाने और पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने में सहायक माना जाता है।
साथ ही यह भी विश्वास है कि इस प्रकार का व्यवहार भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने का माध्यम बनता है और व्यक्ति के जीवन में शुभ परिणाम देता है।
सामाजिक और पारिवारिक संदेश
इस परंपरा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि परिवार के रिश्तों को केवल औपचारिक न मानकर उन्हें स्नेह और सम्मान के साथ निभाया जाए। भांजे-भांजी के प्रति अपनापन और सम्मान परिवार में भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करता है।
(Photo : AI Generated)




