दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर हुई कार्रवाई के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के तीन नेताओं की रिहाई और उन पर लगाई गई शर्तों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। पार्टी के संयोजक अभिजीत दिपके के साथ आशुतोष रांका और सौरव दास को सशर्त रिहा किया गया है। तीनों को एक स्पेशल बॉन्ड भरना पड़ा है, जिसके तहत उन्हें अगले एक साल तक ऐसी गतिविधियों से दूर रहने की शर्त दी गई है, जिनसे सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका पैदा हो। इसके अलावा उनके जंतर-मंतर जाने पर भी रोक लगाई गई है। दिल्ली कैंट के स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की अदालत में हुई कार्यवाही के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन नेताओं को एक साल तक किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन से दूर रहना पड़ेगा? क्या वे सरकार या किसी संवैधानिक पद पर बैठे अधिकारी के खिलाफ अपनी बात नहीं रख सकते? और यदि वे निर्धारित शर्तों का पालन नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ किस तरह की कानूनी कार्रवाई की जा सकती है?
इस मामले में सबसे जरूरी बात यह समझना है कि शांति बनाए रखने के लिए भरवाया गया बॉन्ड और किसी व्यक्ति पर हर तरह के प्रदर्शन की रोक, दोनों एक ही बात नहीं हैं। बॉन्ड की शर्तों का दायरा, प्रशासन की ओर से जारी निर्देश और किसी प्रदर्शन के लिए आवश्यक अनुमति अलग-अलग कानूनी पहलू हैं। इसलिए तीनों नेताओं की रिहाई के बाद लगाई गई शर्तों को सीधे तौर पर एक साल तक विरोध करने पर पूर्ण प्रतिबंध मान लेना सही नहीं होगा। हालांकि, जंतर-मंतर जाने पर लगाई गई रोक का पालन करना उनके लिए जरूरी है। किसी दूसरे स्थान पर प्रदर्शन करने की स्थिति में भी उन्हें यह देखना होगा कि गतिविधि से संबंधित प्रशासनिक आदेशों और कानून का उल्लंघन न हो।
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग के बीच हुई कार्रवाई
इस पूरे मामले की शुरुआत मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आयोजित किए गए प्रदर्शन से हुई। दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध दर्ज कराने की योजना बनाई गई थी, लेकिन प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं होने के कारण पुलिस ने वहां लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगा दी थी। इसी घटनाक्रम के बीच 10 अक्टूबर को सीजेपी से जुड़े अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को विमान से उतरने से पहले ही हिरासत में ले लिया गया।
पुलिस ने तीनों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 126 और 170 के तहत कार्रवाई की। पुलिस की इस कार्रवाई का आधार शांति व्यवस्था बिगड़ने की आशंका बताया गया। इसके बाद तीनों को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। रविवार सुबह हुई सुनवाई के बाद उन्हें कुछ शर्तों के साथ रिहा करने का आदेश दिया गया। रिहाई के लिए बॉन्ड भरवाने और निर्धारित नियमों का पालन करने की हिदायत दी गई।
इस कार्रवाई के बाद राजनीतिक विरोध, सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन की अनुमति और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस्तेमाल होने वाली कानूनी शक्तियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। किसी प्रदर्शन में शामिल होने की मंशा अपने आप में कानून तोड़ने के बराबर नहीं होती। दूसरी ओर, प्रशासन को भीड़ जुटने, संभावित टकराव या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका होने पर कानून के मुताबिक कदम उठाने का अधिकार है। ऐसे मामलों में यह देखना महत्वपूर्ण होता है कि कार्रवाई किन परिस्थितियों में की गई और मजिस्ट्रेट ने रिहाई के दौरान कौन-सी शर्तें निर्धारित कीं।
आखिर क्या होता है शांति बनाए रखने वाला बॉन्ड?
किसी व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरवाने का उद्देश्य उससे यह आश्वासन लेना होता है कि वह निर्धारित अवधि के दौरान सार्वजनिक शांति भंग करने वाली गतिविधियों में शामिल नहीं होगा। इसे आम भाषा में मुचलका भी कहा जाता है। यह व्यवस्था एहतियाती प्रकृति की होती है। इसका मकसद किसी संभावित विवाद या अशांति को रोकना है, न कि हर परिस्थिति में व्यक्ति को अपने विचार व्यक्त करने से वंचित कर देना।
ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट संबंधित व्यक्ति के सामने शर्तें रख सकता है और कानूनी प्रक्रिया के तहत उसका पक्ष सुन सकता है। बॉन्ड में निर्धारित अवधि और अन्य शर्तों का महत्व होता है। अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास के मामले में एक साल तक शांति भंग करने वाली गतिविधियों से दूर रहने की शर्त बताई गई है। साथ ही, जंतर-मंतर जाने पर भी रोक लगाई गई है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। शांति बनाए रखने का आश्वासन देना और किसी भी मुद्दे पर विरोध दर्ज कराने का अधिकार पूरी तरह समाप्त हो जाना अलग-अलग बातें हैं। किसी व्यक्ति को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी राय रखने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल लागू कानूनों और वैध प्रशासनिक प्रतिबंधों के दायरे में रहकर करना होता है। यदि किसी खास स्थान पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं है, तो वहां बिना अनुमति पहुंचकर विरोध करना कानूनी परेशानी का कारण बन सकता है।
BNS की धारा 126 और 170 किस तरह काम करती हैं?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की अधिवक्ता अंकिता तिवारी के अनुसार, इस तरह के मामलों में संबंधित कानूनी प्रावधानों का उद्देश्य शांति व्यवस्था बनाए रखना है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 126 गलत तरीके से किसी व्यक्ति के आने-जाने पर रोक लगाने यानी सदोष अवरोध से संबंधित है, जबकि धारा 170 शांति भंग की आशंका से जुड़ी एहतियाती पुलिस कार्रवाई के संदर्भ में इस्तेमाल की जा सकती है। इन प्रावधानों को समझते समय इनके कानूनी अर्थ और संबंधित प्रक्रिया में अंतर करना आवश्यक है।
धारा 170 के तहत की गई गिरफ्तारी या हिरासत की स्थिति में संबंधित व्यक्ति को कानून में निर्धारित समय के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की प्रक्रिया लागू होती है। पुलिस की कार्रवाई के बाद मजिस्ट्रेट यह देख सकता है कि मामले में आगे कौन-सी कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। इसके बाद शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड से जुड़ी कार्यवाही की जा सकती है।
धारा 126 को लेकर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इसका वास्तविक विषय सदोष अवरोध है। शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा की मांग और बॉन्ड से संबंधित कार्यवाही को केवल इसी धारा का दूसरा नाम मान लेना कानूनी रूप से सही नहीं होगा। ऐसी कार्यवाही में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के संबंधित प्रावधान भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए किसी मामले में गिरफ्तारी, नोटिस, बॉन्ड और शर्तों के उल्लंघन के परिणामों को समझने के लिए अदालत के आदेश और लागू कानून की सटीक धाराओं को देखना जरूरी है।
तीनों नेताओं के मामले में भी केवल धाराओं के नाम के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वे पूरे एक साल तक किसी भी प्रकार का प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे। इसके लिए रिहाई के आदेश में दर्ज शर्तों, जंतर-मंतर से संबंधित प्रतिबंध और भविष्य में होने वाली गतिविधियों की प्रकृति को ध्यान में रखना होगा।
किन परिस्थितियों को शांति भंग होने का खतरा माना जा सकता है?
सार्वजनिक शांति से जुड़े मामलों में परिस्थितियां काफी अहम होती हैं। किसी कार्यक्रम में हिंसा की आशंका, लोगों के बीच टकराव की स्थिति, धमकी, मारपीट या भीड़ के अनियंत्रित होने जैसे पहलुओं को प्रशासन गंभीरता से ले सकता है। हालांकि, हर असहमति, नारेबाजी या सरकार की आलोचना को अपने आप शांति भंग करने वाला कृत्य नहीं माना जा सकता।
किसी विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले लोगों का व्यवहार, आयोजन का स्थान, प्रशासन की अनुमति और उस समय लागू प्रतिबंधों को देखकर स्थिति का आकलन किया जाता है। यदि कोई गतिविधि कानून के तहत प्रतिबंधित है या उसके दौरान हिंसा अथवा सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने वाला आचरण सामने आता है, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।
इसके उलट, शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखना और किसी नीति या अधिकारी के खिलाफ असहमति जताना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। ऐसे अधिकारों पर रोक लगाने के लिए लागू कानूनी प्रावधानों और परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। इसलिए बॉन्ड की शर्तों की व्याख्या भी व्यापक प्रतिबंध मानकर नहीं, बल्कि उसके वास्तविक शब्दों और कानूनी दायरे के आधार पर की जानी चाहिए।
बॉन्ड की शर्तें तोड़ने पर क्या हो सकता है?
यदि कोई व्यक्ति शांति बनाए रखने के लिए दिए गए बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसके लिए कानूनी परिणाम पैदा हो सकते हैं। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर कथित उल्लंघन पर पुलिस बिना किसी प्रक्रिया के उसे जेल भेज सकती है। आगे की कार्रवाई इस बात पर निर्भर करेगी कि बॉन्ड किस कानूनी प्रावधान के तहत लिया गया था, आदेश में क्या शर्तें लिखी गई थीं और कथित उल्लंघन की प्रकृति क्या है।
कानून के अनुसार, बॉन्ड के उल्लंघन की स्थिति में संबंधित व्यक्ति को दोबारा कानूनी कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है। लागू प्रावधानों और परिस्थितियों के आधार पर बॉन्ड की राशि जब्त करने या अन्य कदम उठाने की संभावना हो सकती है। यदि इस दौरान कोई अलग अपराध भी किया जाता है, तो उसके लिए संबंधित कानूनी धाराओं के तहत अलग से कार्रवाई की जा सकती है।
इसलिए किसी भी शर्त का उल्लंघन करने से पहले उसके परिणामों को समझना जरूरी है। यदि संबंधित व्यक्ति को लगता है कि आदेश की शर्तें अस्पष्ट हैं, अत्यधिक व्यापक हैं या उसके अधिकारों को प्रभावित करती हैं, तो वह उचित कानूनी सलाह लेकर उपलब्ध कानूनी उपायों पर विचार कर सकता है। अदालत के आदेश की सही प्रति देखे बिना यह तय करना संभव नहीं है कि किसी खास गतिविधि पर रोक का दायरा कितना व्यापक है।
क्या अभिजीत दिपके और उनके साथी एक साल तक प्रदर्शन नहीं कर सकते?
इस सवाल का सीधा जवाब है कि केवल एक साल का बॉन्ड भरने से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को हर प्रकार के शांतिपूर्ण प्रदर्शन से रोक दिया गया है। अधिवक्ता अंकिता तिवारी के अनुसार, शांति बनाए रखने की शर्त का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति विरोध प्रदर्शन में हिस्सा ही नहीं ले सकता। लेकिन किसी भी कार्यक्रम में शामिल होने से पहले उसे लागू प्रतिबंधों और प्रशासनिक अनुमति की शर्तों को ध्यान में रखना होगा।
तीनों नेताओं के लिए जंतर-मंतर जाने पर लगाई गई रोक विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इस प्रतिबंध को नजरअंदाज कर वहां पहुंचना उनके लिए कानूनी मुश्किल खड़ी कर सकता है। यदि वे किसी दूसरे स्थान पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना चाहते हैं, तो उन्हें उस जगह से जुड़े नियमों, अनुमति की जरूरत और बॉन्ड की वास्तविक शर्तों की जानकारी लेनी होगी। किसी प्रदर्शन का शांतिपूर्ण होना महत्वपूर्ण है, लेकिन जहां अनुमति अनिवार्य हो, वहां केवल शांतिपूर्ण रहने का इरादा अनुमति का विकल्प नहीं बन सकता।
कुल मिलाकर, इस मामले में एक साल की अवधि को सभी तरह के विरोध प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। असली स्थिति मजिस्ट्रेट के आदेश में दर्ज शर्तों और लागू कानून से स्पष्ट होगी। तीनों नेताओं को रिहाई के समय दी गई हिदायतों का पालन करना होगा। यदि वे अपनी बात शांतिपूर्वक रखना चाहते हैं, तो उन्हें कानून के दायरे में रहते हुए और संबंधित प्रशासनिक नियमों का पालन करते हुए ही ऐसा करना होगा। बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करने पर कानूनी कार्रवाई की आशंका बनी रहेगी।




