अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्र के नाम अपने हालिया संबोधन में एक बार फिर अमेरिकी चुनाव व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को विदेशी ताकतों से खतरा है और चुनावों में बाहरी हस्तक्षेप की संभावनाओं को अब हल्के में नहीं लिया जा सकता। ट्रंप ने अपने भाषण में विशेष रूप से चीन, रूस, ईरान और उत्तर कोरिया का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि इन देशों ने अलग-अलग तरीकों से अमेरिकी चुनावी ढांचे और जनमत को प्रभावित करने की कोशिश की।
भारतीय समयानुसार शुक्रवार सुबह प्रसारित इस संबोधन में ट्रंप ने कहा कि उनकी सरकार देश को आर्थिक और रणनीतिक रूप से मजबूत दिशा में ले जा रही है, लेकिन निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना अभी भी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल है। उनके अनुसार यदि किसी देश की चुनावी प्रक्रिया पर नागरिकों का भरोसा कमजोर पड़ जाए तो लोकतंत्र की बुनियाद भी कमजोर हो जाती है।
2020 और 2018 के चुनावों से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करने का ऐलान
अपने संबोधन के दौरान ट्रंप ने बताया कि उनकी सरकार ऐसे कई दस्तावेज सार्वजनिक कर रही है जो अब तक गोपनीय रखे गए थे। उनका दावा है कि ये रिकॉर्ड 2018 और 2020 के चुनावों से जुड़े हैं और इनमें ऐसी जानकारियां मौजूद हैं जो चुनावी सुरक्षा तथा विदेशी दखल के बारे में नई तस्वीर पेश करती हैं।
ट्रंप ने कहा कि इन दस्तावेजों को सामने लाने का उद्देश्य राजनीतिक विवाद पैदा करना नहीं बल्कि अमेरिकी नागरिकों को पूरी जानकारी उपलब्ध कराना है ताकि चुनावी व्यवस्था पर भरोसा बहाल किया जा सके। उन्होंने कहा कि लोगों को यह जानने का अधिकार है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
चुनावी ईमानदारी को लोकतंत्र की सबसे बड़ी शर्त बताया
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने भाषण में कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक देश की सबसे बड़ी ताकत उसके स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव होते हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका तभी मजबूत रह सकता है जब हर मतदाता को यह विश्वास हो कि उसका वोट सुरक्षित है और चुनाव किसी भी तरह की धोखाधड़ी, साइबर हमले या बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त हैं।
उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था कई मामलों में अपेक्षित मानकों पर खरी नहीं उतरती। ट्रंप के मुताबिक चुनावी प्रक्रिया में मौजूद कमियों को दूर करना राष्ट्रीय सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
चीन पर वोटरों का डेटा हासिल करने का आरोप
अपने संबोधन के सबसे चर्चित हिस्से में ट्रंप ने चीन पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि हाल ही में सामने आए खुफिया दस्तावेजों से संकेत मिलता है कि 2020 के चुनाव के दौरान चीन ने करोड़ों अमेरिकी मतदाताओं का व्यक्तिगत डेटा हासिल किया।
ट्रंप के अनुसार इस कथित डेटा में मतदाताओं के नाम, पते, फोन नंबर और राजनीतिक झुकाव जैसी जानकारियां शामिल थीं। उन्होंने इसे अमेरिकी इतिहास में चुनावी डेटा से जुड़ी सबसे बड़ी सेंधमारी करार दिया। हालांकि अपने भाषण में उन्होंने इन आरोपों के समर्थन में किसी सार्वजनिक तकनीकी रिपोर्ट या विस्तृत प्रमाण का उल्लेख नहीं किया।
खुफिया एजेंसियों पर जानकारी छिपाने का आरोप
राष्ट्रपति ने यह भी दावा किया कि अमेरिकी खुफिया तंत्र के कुछ अधिकारियों ने इस मामले से जुड़ी जानकारियों को सार्वजनिक नहीं होने दिया। उनके मुताबिक कुछ महत्वपूर्ण सूचनाओं को जानबूझकर दबाया गया जिससे पूरे मामले की गंभीरता लोगों तक नहीं पहुंच सकी।
ट्रंप ने कहा कि उन्होंने नेशनल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर के कार्यालय, न्याय विभाग, एफबीआई और सीआईए को पूरे मामले की विस्तृत जांच करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जांच में कोई अधिकारी जानकारी छिपाने का दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ सख्त प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
पत्रकारों को प्रभावित करने का भी लगाया आरोप
ट्रंप ने अपने संबोधन में यह दावा भी किया कि चीन ने अमेरिकी जनमत को प्रभावित करने के उद्देश्य से कुछ पत्रकारों को आर्थिक लाभ पहुंचाने की कोशिश की। उनके अनुसार उनके खिलाफ नकारात्मक खबरें प्रकाशित कराने के लिए धन की पेशकश की गई ताकि चुनाव से पहले उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके।
उन्होंने आरोप लगाया कि विदेशी ताकतें केवल साइबर माध्यमों तक सीमित नहीं रहीं बल्कि मीडिया और सूचना तंत्र के जरिए भी चुनावी माहौल को प्रभावित करने की कोशिश करती रही हैं। हालांकि इन दावों के संबंध में उन्होंने किसी विशेष संस्था या व्यक्ति का नाम सार्वजनिक नहीं किया।
रूस, ईरान और उत्तर कोरिया का भी किया जिक्र
ट्रंप ने अपने भाषण में केवल चीन ही नहीं बल्कि रूस, ईरान और उत्तर कोरिया का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के आकलन के अनुसार कई विरोधी देश अमेरिकी चुनावी ढांचे को प्रभावित करने की तकनीकी क्षमता रखते हैं।
उनका कहना था कि इन देशों के अलावा कुछ गैर-सरकारी समूह भी साइबर गतिविधियों के माध्यम से चुनावी प्रणाली को नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर सकते हैं। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को अपनी डिजिटल सुरक्षा लगातार मजबूत करनी होगी ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी कोशिश को रोका जा सके।
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर जताया अविश्वास
राष्ट्रपति ट्रंप ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आधुनिक वोटिंग मशीनें साइबर हमलों के प्रति संवेदनशील हो सकती हैं और यदि सुरक्षा मानकों में कमी रह जाए तो चुनाव परिणामों पर असर पड़ सकता है।
इसी आधार पर उन्होंने पेपर बैलेट यानी कागज के मतपत्रों की व्यवस्था को फिर से प्राथमिकता देने की वकालत की। ट्रंप का कहना था कि पारंपरिक मतदान प्रणाली अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद साबित हो सकती है क्योंकि उसमें ऑडिट और पुनर्गणना करना अपेक्षाकृत आसान होता है।
राज्यों के साथ मिलकर चुनावी सुधार की बात
ट्रंप ने कहा कि उनकी सरकार चुनावी सुरक्षा को मजबूत करने के लिए राज्य सरकारों, स्थानीय चुनाव अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों के साथ मिलकर काम करेगी। उन्होंने दावा किया कि कई राज्यों में मतदान व्यवस्था में गंभीर कमियां सामने आई हैं और इनकी जानकारी संबंधित गवर्नरों, सांसदों तथा अन्य जनप्रतिनिधियों को भी दी जा रही है।
उन्होंने कहा कि प्रशासन का उद्देश्य किसी विशेष राज्य या राजनीतिक दल को निशाना बनाना नहीं बल्कि पूरे देश में एक समान और सुरक्षित चुनाव प्रणाली विकसित करना है। ट्रंप ने भरोसा दिलाया कि चुनावी ढांचे को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
सेव एक्ट को जल्द पारित करने की अपील
अपने संबोधन के अंत में राष्ट्रपति ट्रंप ने सांसदों से ‘सेव एक्ट’ को शीघ्र पारित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह कानून चुनावी पंजीकरण और मतदान प्रक्रिया में अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू करने के उद्देश्य से लाया गया है।
ट्रंप ने अमेरिकी नागरिकों से भी अपील की कि वे अपने-अपने प्रतिनिधियों से इस विधेयक के समर्थन की मांग करें। उनके अनुसार यदि यह कानून पारित होता है तो चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी और मतदान प्रणाली को अधिक सुरक्षित बनाया जा सकेगा।
पुराने आरोपों को फिर दोहराया
गौरतलब है कि ट्रंप इससे पहले भी कई अवसरों पर 2020 के राष्ट्रपति चुनाव को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। अपने ताजा संबोधन में भी उन्होंने उन दावों को दोहराया और कहा कि चुनावी व्यवस्था में सुधार के बिना लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास पूरी तरह मजबूत नहीं हो सकता। ट्रंप ने दोहराया कि उनकी सरकार का लक्ष्य अमेरिका की चुनाव प्रणाली को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाना है ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार के विदेशी हस्तक्षेप या साइबर खतरे की आशंका को न्यूनतम किया जा सके।




