धामी सरकार की लोकप्रियता को लेकर सर्वे में बड़ा दावा, कांग्रेस के खाते में 14 सीटें आने का अनुमान
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने में अभी करीब एक साल का समय बाकी है, लेकिन 2027 के चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां धीरे-धीरे तेज होने लगी हैं। इसी बीच सामने आए एक मीडिया चैनल के चुनावी सर्वे ने राज्य की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। सर्वे में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में लौटने का अनुमान जताया गया है।
सर्वे के मुताबिक 70 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा को 54 सीटें मिलने की संभावना है, जबकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस 14 सीटों तक सीमित रह सकती है। यदि यह अनुमान वास्तविक चुनाव परिणामों में बदलता है तो भाजपा न केवल सरकार बनाने में सफल होगी, बल्कि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में हासिल सीटों के मुकाबले अपने प्रदर्शन को और बेहतर कर सकती है।
हालांकि चुनाव में अभी लंबा समय बाकी है और किसी भी सर्वे के आंकड़े अंतिम जनादेश नहीं माने जा सकते। चुनावी माहौल, उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय मुद्दे, राजनीतिक गठजोड़ और मतदान के समय मतदाताओं की प्राथमिकताएं नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं। इसके बावजूद सर्वे ने उत्तराखंड की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस की संभावित स्थिति को लेकर चर्चा जरूर तेज कर दी है।
धामी की लोकप्रियता को लेकर सर्वे में बड़ा दावा
सर्वे की सबसे महत्वपूर्ण बात मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की व्यक्तिगत स्वीकार्यता को लेकर किए गए दावे हैं। सर्वे में कहा गया है कि धामी को राज्य के अलग-अलग सामाजिक और आयु वर्गों में समर्थन मिल रहा है।
राजनीतिक दृष्टि से यह आंकड़ा भाजपा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री की छवि और सरकार के फैसलों को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकती है।
सर्वे में विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच धामी के समर्थन को लेकर अलग-अलग आंकड़े दिए गए हैं। वैश्य समुदाय में मुख्यमंत्री को 57.3 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग में 50.6 प्रतिशत, पंजाबी-सिख समुदाय में 49.7 प्रतिशत, ब्राह्मण वर्ग में 46.3 प्रतिशत, राजपूत समुदाय में 46.1 प्रतिशत और अनुसूचित जाति वर्ग में 45.3 प्रतिशत समर्थन मिलने का दावा किया गया है।
यदि इन आंकड़ों को संकेत के तौर पर देखा जाए तो मुख्यमंत्री की स्वीकार्यता किसी एक सामाजिक समूह तक सीमित नहीं दिखाई देती। भाजपा के लिए यह पहलू खासा महत्वपूर्ण है, क्योंकि उत्तराखंड जैसे राज्य में सामाजिक समीकरण चुनावी नतीजों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं।
उम्र के अलग-अलग पड़ावों में भी समर्थन का दावा
सर्वे में मुख्यमंत्री की लोकप्रियता को आयु वर्ग के आधार पर भी परखा गया है। इसमें दावा किया गया है कि युवाओं से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक धामी को समर्थन हासिल है।
18 से 25 वर्ष के आयु वर्ग में मुख्यमंत्री को 37.8 प्रतिशत समर्थन मिलने की बात कही गई है। 26 से 35 वर्ष की उम्र के लोगों में यह आंकड़ा 43 प्रतिशत, 36 से 50 वर्ष के वर्ग में 46.8 प्रतिशत और 51 से 60 वर्ष के वर्ग में 50.3 प्रतिशत बताया गया है।
वहीं 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में धामी का समर्थन 51.8 प्रतिशत रहने का दावा किया गया है।
इन आंकड़ों के आधार पर भाजपा के लिए यह संकेत निकलता है कि मुख्यमंत्री की स्वीकार्यता केवल किसी एक आयु समूह तक सीमित नहीं है। हालांकि युवा वर्ग में समर्थन का आंकड़ा अन्य आयु वर्गों की तुलना में कम बताया गया है, लेकिन भाजपा की चुनावी रणनीति में युवाओं को महत्वपूर्ण वर्ग माना जाता रहा है।
महिला मतदाताओं पर भी सरकार का फोकस
उत्तराखंड की राजनीति में महिला मतदाताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। पहाड़ी क्षेत्रों में महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक भूमिका के साथ-साथ चुनावी भागीदारी भी राजनीतिक दलों की रणनीति का अहम हिस्सा रहती है।
सर्वे में महिला आरक्षण से जुड़े मुख्यमंत्री के फैसले को लेकर 88 प्रतिशत लोगों के पूर्ण समर्थन का दावा किया गया है। यह आंकड़ा भाजपा के लिए खास महत्व रखता है, क्योंकि पार्टी महिला मतदाताओं को अपने प्रमुख राजनीतिक आधार के रूप में देखती रही है।
भाजपा आगामी चुनाव में महिला कल्याण, सशक्तीकरण और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े फैसलों को प्रमुखता से जनता के बीच ले जा सकती है। सर्वे के ये आंकड़े पार्टी को यह संदेश देने का अवसर दे सकते हैं कि सरकार के महिला केंद्रित फैसलों को जनता में समर्थन मिल रहा है।
हालांकि चुनाव के दौरान यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन नीतिगत फैसलों का वास्तविक मतदान व्यवहार पर कितना असर पड़ता है।
‘देवभूमि’ की पहचान भी चुनावी मुद्दा
उत्तराखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान हमेशा से चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। भाजपा भी राज्य की ‘देवभूमि’ की पहचान और मूल स्वरूप से जुड़े मुद्दों को लगातार राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता देती रही है।
सर्वे में दावा किया गया है कि 70 प्रतिशत लोग प्रदेश की पहचान और मूल स्वरूप को बनाए रखने के सरकार के प्रयासों के साथ हैं। भाजपा के लिए यह आंकड़ा सांस्कृतिक मुद्दों को लेकर अपने राजनीतिक अभियान को और मजबूती देने का आधार बन सकता है।
पार्टी आगामी चुनाव में विकास और सुशासन के साथ सांस्कृतिक पहचान से जुड़े मुद्दों को भी जोड़ने की रणनीति अपना सकती है। यही वजह है कि समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून और राज्य की पहचान से जुड़े विषयों को भी सर्वे में धामी सरकार की स्वीकार्यता के संदर्भ में देखा गया है।
यूसीसी और नकल विरोधी कानून को उपलब्धियों से जोड़ने की कोशिश
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार ने समान नागरिक संहिता और नकल विरोधी कानून जैसे फैसलों को अपनी प्रमुख उपलब्धियों में शामिल किया है। भाजपा इन फैसलों को प्रशासनिक सुधार और सुशासन की अपनी राजनीति से जोड़कर पेश करती रही है।
सर्वे में भी इन फैसलों के साथ धामी सरकार की लोकप्रियता को जोड़कर देखा गया है। भाजपा के लिए यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि पार्टी वर्ष 2027 के चुनाव में अपने शासनकाल के फैसलों का रिपोर्ट कार्ड मतदाताओं के सामने रखने की तैयारी करेगी।
इसके साथ विकास कार्यों, रोजगार, महिला सशक्तीकरण, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक सुधार जैसे विषय भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बन सकते हैं।
भाजपा के लिए सर्वे क्यों महत्वपूर्ण?
भाजपा के नजरिए से देखें तो सर्वे ऐसे समय सामने आया है जब पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव के लिए संगठनात्मक स्तर पर अपनी तैयारियां मजबूत कर रही है। यदि पार्टी के पक्ष में सर्वे के आंकड़े लगातार बने रहते हैं तो इससे कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ाने और चुनावी अभियान को गति देने में मदद मिल सकती है।
54 सीटों का अनुमान भाजपा को 2022 से बेहतर स्थिति में दिखाता है। इससे पार्टी अपने संगठन को यह संदेश देने की कोशिश कर सकती है कि सरकार के प्रति सकारात्मक माहौल बना हुआ है और सत्ता में वापसी की संभावनाएं मजबूत हैं।
हालांकि राजनीतिक दल अक्सर सर्वे के आंकड़ों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वास्तविक चुनाव में परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती सर्वे में दिखाई दे रहे समर्थन को मतदान तक बनाए रखना होगी।
कांग्रेस के सामने सत्ता विरोधी माहौल बनाने की चुनौती
सर्वे के अनुमान ने कांग्रेस के सामने भी बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। यदि विपक्षी पार्टी को केवल 14 सीटों तक सीमित रहने का अनुमान सामने आता है तो कांग्रेस को अपने चुनावी अभियान की रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है।
कांग्रेस के सामने सरकार के खिलाफ मजबूत सत्ता विरोधी माहौल तैयार करने की चुनौती होगी। उसे बेरोजगारी, महंगाई, स्थानीय विकास, पलायन, सड़क और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों को लेकर भाजपा सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश करनी होगी।
इसके साथ ही कांग्रेस को अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और उम्मीदवार चयन में सावधानी बरतनी होगी। चुनाव में भाजपा को चुनौती देने के लिए पार्टी को केवल सरकार की आलोचना करने के बजाय मतदाताओं के सामने वैकल्पिक नीतियों और नेतृत्व का स्पष्ट खाका भी रखना होगा।
अभी एक साल बाकी, बदल सकते हैं समीकरण
सर्वे के आंकड़े फिलहाल भाजपा के पक्ष में मजबूत तस्वीर पेश कर रहे हैं, लेकिन चुनावी राजनीति में एक साल का समय काफी लंबा होता है। इस दौरान सरकार के फैसले, विपक्ष के आंदोलन, स्थानीय मुद्दे, बेरोजगारी, आपदा प्रबंधन, विकास परियोजनाएं और क्षेत्रीय असंतोष जैसे मुद्दे राजनीतिक माहौल को प्रभावित कर सकते हैं।
इसके अलावा उम्मीदवारों की घोषणा के बाद कई विधानसभा क्षेत्रों में समीकरण बदल सकते हैं। किसी क्षेत्र में स्थानीय चेहरा पार्टी के प्रदर्शन को मजबूत कर सकता है, तो कहीं टिकट वितरण से असंतोष भी पैदा हो सकता है।
इसी तरह कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल यदि प्रभावी गठजोड़ या मजबूत चुनावी रणनीति बनाने में सफल रहते हैं तो मौजूदा अनुमानों में बदलाव संभव है।
धामी के लिए चुनौती सर्वे के आंकड़ों को जमीन पर उतारने की
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए भी सर्वे में सामने आए आंकड़े एक अवसर के साथ चुनौती हैं। यदि उनकी लोकप्रियता के दावे सही साबित होते हैं तो भाजपा उनके नेतृत्व को और मजबूती से चुनावी अभियान के केंद्र में रख सकती है।
लेकिन लोकप्रियता के आंकड़ों को सीटों में बदलने के लिए सरकार को अगले एक साल में शासन और संगठन दोनों मोर्चों पर लगातार सक्रिय रहना होगा। स्थानीय समस्याओं का समाधान, विकास कार्यों की गति और जनता से सीधा संवाद चुनावी नतीजों पर असर डाल सकता है।
फिलहाल सर्वे ने उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में शुरुआती बढ़त की तस्वीर जरूर पेश कर दी है। भाजपा के लिए यह आंकड़े उत्साह बढ़ाने वाले हैं, जबकि कांग्रेस के सामने इन्हें गलत साबित करने और मुकाबले को दोतरफा बनाने की चुनौती है।
2027 के विधानसभा चुनाव का अंतिम फैसला मतदाता करेंगे, लेकिन सर्वे के बाद इतना जरूर साफ है कि उत्तराखंड में चुनावी तैयारी अब धीरे-धीरे तेज होने लगी है। आने वाले महीनों में भाजपा और कांग्रेस की रणनीति, मुख्यमंत्री धामी की लोकप्रियता, सरकार के फैसलों और विपक्ष की सक्रियता के आधार पर यह मुकाबला और दिलचस्प होता जाएगा।




