हरियाणा पुलिस ने संगठित अपराध, गैंग गतिविधियों और सक्रिय अपराधियों पर प्रभावी नियंत्रण के लिए पारंपरिक पुलिसिंग के साथ तकनीक और डेटा का इस्तेमाल बढ़ा दिया है। इसी दिशा में प्रदेश पुलिस ने आरजेएसएफ (रोहतक-झज्जर-सोनीपत-फरीदाबाद) मॉडल को राज्यभर में विस्तार देने की प्रक्रिया शुरू की है। इस मॉडल के तहत पुलिस ने सक्रिय अपराधियों की पहचान, उनके वर्तमान ठिकाने, आपराधिक रिकॉर्ड और गतिविधियों की जानकारी को एक केंद्रीकृत डेटाबेस में दर्ज करना शुरू किया है।
पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक एक फरवरी से 25 अगस्त तक प्रदेश में कुल 45,207 सक्रिय अपराधियों का डेटाबेस तैयार किया गया है। इनमें से 26,026 अपराधियों का सत्यापन पूरा हो चुका है, जो कुल संख्या का करीब 57.57 प्रतिशत है। अब पुलिस की प्राथमिकता शेष 19,137 अपराधियों के सत्यापन को जल्द पूरा करने की है, ताकि उनकी मौजूदा गतिविधियों और संभावित आपराधिक नेटवर्क पर नजर रखी जा सके।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार अपराध की बदलती प्रकृति को देखते हुए अब केवल पुराने रिकॉर्ड के आधार पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। अपराधियों की वर्तमान गतिविधियों, संपर्कों और लोकेशन से जुड़ी सूचनाओं को लगातार अपडेट करना जरूरी हो गया है। इसी सोच के तहत पुलिस ने डेटा आधारित निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया है।
अपराध होने से पहले रोकने पर जोर
पुलिस महानिदेशक अजय सिंघल ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि प्रदेश में पुलिसिंग को ज्यादा से ज्यादा इंटेलिजेंस आधारित, तकनीक समर्थित और डेटा संचालित बनाया जाए। उनका जोर इस बात पर है कि पुलिस के पास अपराधियों से संबंधित जो सूचनाएं उपलब्ध हैं, उनका इस्तेमाल केवल रिकॉर्ड रखने तक सीमित न रहे, बल्कि संभावित अपराधों की पहचान और रोकथाम के लिए किया जाए।
डीजीपी के अनुसार किसी सक्रिय अपराधी की पहचान और उसकी वर्तमान स्थिति का सही पता होना अपराध नियंत्रण की बुनियादी जरूरत है। पुलिस का उद्देश्य ऐसे लोगों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखते हुए संभावित आपराधिक घटनाओं को पहले ही रोकना है।
इस व्यवस्था में अपराधियों का सत्यापन केवल एक बार की कार्रवाई नहीं होगी। उनकी स्थिति में होने वाले बदलावों को रिकॉर्ड में लगातार अपडेट करने की व्यवस्था बनाई गई है। इससे पुलिस को यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि कोई अपराधी अपने पुराने पते पर रह रहा है, जेल में है, उसकी मृत्यु हो चुकी है या वह किसी दूसरे स्थान पर जाकर गतिविधियां चला रहा है।
हर सप्ताह अपडेट हो रहा अपराधियों का रिकॉर्ड
आरजेएसएफ मॉडल के तहत सक्रिय अपराधियों की साप्ताहिक जांच की जा रही है। पुलिस टीमें संबंधित अपराधियों के मौजूदा ठिकाने और स्थिति की जानकारी जुटाकर रिकॉर्ड को अपडेट कर रही हैं। इसका मकसद पुलिस के पास मौजूद पुराने डेटा को वास्तविक स्थिति से जोड़ना है।
अब तक हुए सत्यापन में 7,425 अपराधी अपने दर्ज पते पर मौजूद मिले, जबकि 1,612 अपराधी जेल में पाए गए। वहीं 375 अपराधियों की मृत्यु की पुष्टि हो चुकी है। इन जानकारियों को डेटाबेस में अपडेट किया जा रहा है, ताकि पुलिस के रिकॉर्ड में ऐसे अपराधियों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट रूप से दर्ज रहे।
पुलिस की यह कवायद खासतौर पर उन अपराधियों के मामले में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिनका लंबे समय से कोई सत्यापन नहीं हुआ है या जिनके पते और गतिविधियों में बदलाव हो चुका है। नियमित सत्यापन से पुलिस को ऐसे अपराधियों की पहचान करने में मदद मिलेगी, जो किसी दूसरे जिले में जाकर सक्रिय हो सकते हैं।
चेहरे से पहचान की तकनीक भी निगरानी का हिस्सा
अपराधियों की पहचान को और मजबूत बनाने के लिए पुलिस तकनीकी साधनों का भी इस्तेमाल कर रही है। अब तक 6,762 अपराधियों का एफआरएस यानी फेस रिकाग्निशन सिस्टम डेटा अपलोड किया जा चुका है। इसके जरिए अपराधियों की पहचान को तकनीकी स्तर पर मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।
फेस रिकाग्निशन डेटा के इस्तेमाल से पुलिस को किसी संदिग्ध व्यक्ति की पहचान से जुड़ी जांच में सहायता मिल सकती है। अधिकारियों का मानना है कि जब अपराधियों का व्यक्तिगत रिकॉर्ड, सत्यापन संबंधी जानकारी और चेहरा आधारित पहचान से जुड़ा डेटा एक व्यवस्थित प्रणाली में उपलब्ध होगा, तो पुलिस की निगरानी क्षमता और तेज कार्रवाई दोनों में सुधार आएगा।
यह व्यवस्था विशेष रूप से उन मामलों में उपयोगी हो सकती है, जहां अपराधी अपनी पहचान या ठिकाना बदलकर पुलिस की नजर से बचने की कोशिश करते हैं।
संवेदनशील जिलों से शुरू हुआ था मॉडल
आरजेएसएफ मॉडल की शुरुआत रोहतक, झज्जर, सोनीपत और फरीदाबाद जैसे जिलों से की गई थी। इन जिलों में संगठित अपराध और सक्रिय अपराधियों से जुड़ी चुनौतियों को देखते हुए पुलिस ने वहां अपराधियों के रिकॉर्ड की नियमित निगरानी और सत्यापन पर विशेष जोर दिया।
मॉडल से मिले परिणामों के आधार पर अब इसे प्रदेश के दूसरे जिलों में भी लागू किया जा रहा है। पुलिस का मानना है कि एक समान डेटा आधारित व्यवस्था बनने से अलग-अलग जिलों में सक्रिय अपराधियों की जानकारी को साझा करना आसान होगा।
इससे यदि कोई अपराधी एक जिले से दूसरे जिले में जाकर गतिविधियां शुरू करता है तो संबंधित जिलों की पुलिस के बीच सूचना का आदान-प्रदान तेजी से किया जा सकेगा। अंतर-जिला स्तर पर ऐसी निगरानी संगठित अपराध के नेटवर्क को पहचानने में भी मदद कर सकती है।
कई जिलों में सत्यापन की स्थिति बेहतर
प्रदेश के विभिन्न जिलों में सक्रिय अपराधियों के सत्यापन को लेकर अलग-अलग स्तर पर प्रगति हुई है। पुलिस के मुताबिक रोहतक, झज्जर और फरीदाबाद में 100 प्रतिशत सत्यापन पूरा किया जा चुका है। वहीं हिसार में 99.11 प्रतिशत, सोनीपत में 93.13 प्रतिशत और सिरसा में 81.97 प्रतिशत सक्रिय अपराधियों का सत्यापन पूरा हो चुका है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कुछ जिलों में पुलिस ने अपने डेटाबेस को काफी हद तक अपडेट कर लिया है, जबकि अन्य जिलों में अभी भी बड़ी संख्या में अपराधियों के सत्यापन का काम जारी है। पुलिस मुख्यालय की ओर से शेष अपराधियों की जांच जल्द पूरी करने पर जोर दिया जा रहा है।
सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने के बाद पुलिस के पास यह जानकारी ज्यादा स्पष्ट रूप से उपलब्ध होगी कि किसी जिले में दर्ज सक्रिय अपराधियों में से कितने वास्तव में क्षेत्र में मौजूद हैं और कितने जेल में हैं या अन्य कारणों से अब सक्रिय नहीं हैं।
अपराधी ही नहीं, नेटवर्क पर भी नजर
हरियाणा पुलिस की नई रणनीति का दायरा केवल व्यक्तिगत अपराधियों की पहचान तक सीमित नहीं है। पुलिस अब अपराधियों के बीच संपर्क, उनकी गतिविधियों में बदलाव और संभावित नेटवर्क को भी निगरानी के दायरे में ला रही है।
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक किसी अपराधी की गतिविधि में अचानक बदलाव, नए लोगों से संपर्क या दूसरे जिलों में सक्रियता जैसी सूचनाएं अपराध की संभावित तैयारी का संकेत दे सकती हैं। इसलिए डेटा को लगातार अपडेट करने के साथ इन जानकारियों का विश्लेषण भी महत्वपूर्ण होगा।
डीजीपी अजय सिंघल ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि अपराधियों की गतिविधियों और उनके आपराधिक संपर्कों में होने वाले बदलावों को समय रहते चिन्हित किया जाए। इसके साथ ही जिलों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान को मजबूत करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
अंतर-जिला निगरानी होगी और मजबूत
हरियाणा में अपराध का एक हिस्सा जिला सीमाओं से आगे बढ़कर संचालित होता है। ऐसे में पुलिस के लिए केवल अपने जिले के अपराधियों का रिकॉर्ड रखना पर्याप्त नहीं है। आरजेएसएफ मॉडल के विस्तार के पीछे एक प्रमुख उद्देश्य अंतर-जिला स्तर पर सूचनाओं को जोड़ना भी है।
यदि किसी अपराधी का नाम एक जिले के रिकॉर्ड में है, लेकिन वह दूसरे जिले में सक्रिय है, तो साझा डेटा के जरिए उसकी गतिविधियों की जानकारी संबंधित पुलिस इकाइयों तक पहुंचाई जा सकेगी। इससे संभावित अपराध की स्थिति में प्रतिक्रिया का समय कम करने और संदिग्ध नेटवर्क पर कार्रवाई करने में मदद मिल सकती है।
पुलिस का लक्ष्य आने वाले समय में ऐसी व्यवस्था विकसित करना है, जिसमें अपराधियों की जानकारी नियमित रूप से अपडेट होती रहे और जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारियों को तत्काल उपलब्ध हो सके।
डेटा से प्रिवेंटिव पुलिसिंग को बढ़ावा
हरियाणा पुलिस की इस पहल को प्रिवेंटिव पुलिसिंग यानी अपराध होने से पहले उसकी संभावना को पहचानकर रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अभी तक पुलिसिंग में किसी घटना के बाद जांच और कार्रवाई की बड़ी भूमिका रहती थी, लेकिन तकनीक और डेटा के इस्तेमाल से संभावित अपराध की पहले से पहचान करने की कोशिश बढ़ रही है।
45 हजार से अधिक सक्रिय अपराधियों का डेटाबेस तैयार होना इस व्यवस्था का बड़ा आधार है। अब चुनौती इस डेटा को लगातार अपडेट रखने और उससे उपयोगी इंटेलिजेंस तैयार करने की है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी रिकॉर्ड को स्थायी नहीं माना जाएगा, बल्कि अपराधियों की स्थिति में बदलाव के साथ इसे अपडेट किया जाता रहेगा।
इस पूरी कवायद से पुलिस को अपराधियों की वास्तविक स्थिति का बेहतर आकलन करने, उनके संभावित नेटवर्क को समझने और संवेदनशील क्षेत्रों में पहले से निगरानी बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
हरियाणा पुलिस का फोकस अब केवल अपराध दर्ज होने के बाद कार्रवाई तक सीमित रखने के बजाय ऐसी पुलिसिंग व्यवस्था विकसित करने पर है, जिसमें डेटा, तकनीक और खुफिया सूचनाओं को जोड़कर अपराध की रोकथाम की जा सके। आरजेएसएफ मॉडल का प्रदेशभर में विस्तार इसी रणनीति का हिस्सा है। आने वाले समय में शेष 19,137 सक्रिय अपराधियों के सत्यापन और उनके रिकॉर्ड को अपडेट करने के साथ यह व्यवस्था राज्य की अपराध नियंत्रण रणनीति में और महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।




