ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) को लेकर माता-पिता के बीच इलाज और भविष्य को लेकर कई तरह की चिंताएं रहती हैं। ऐसे में जब कोई व्यक्ति किसी बच्चे के ऑटिज्म को पूरी तरह ठीक करने का दावा करता है, तो परिवार स्वाभाविक रूप से उस विकल्प की ओर आकर्षित हो सकता है। पिछले कुछ समय से स्टेम सेल थेरेपी को लेकर भी ऐसे दावे सामने आते रहे हैं। कुछ जगहों पर इसे ऑटिज्म समेत कई स्थितियों के इलाज के तौर पर प्रचारित किया जाता है।
लेकिन ऑटिज्म के मामले में स्टेम सेल थेरेपी को लेकर अब स्वास्थ्य मंत्रालय और नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने स्पष्ट रुख सामने रखा है। सरकारी एडवाइजरी का मकसद ऐसे उपचारों के अनधिकृत और व्यावसायिक इस्तेमाल को रोकना तथा मरीजों को अप्रमाणित दावों से बचाना है। इसलिए अगर कोई क्लीनिक या डॉक्टर ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल उपचार को सामान्य इलाज बताकर पेश कर रहा है, तो परिवार को उपचार शुरू करने से पहले उसके वैज्ञानिक और नियामकीय आधार की अच्छी तरह जांच करनी चाहिए।
स्टेम सेल थेरेपी क्या है और विवाद किस बात को लेकर है?
स्टेम सेल ऐसी कोशिकाएं होती हैं जिनमें शरीर में अलग-अलग प्रकार की कोशिकाओं में बदलने की क्षमता हो सकती है। चिकित्सा विज्ञान में कुछ विशेष परिस्थितियों में स्टेम सेल आधारित उपचारों का स्थापित इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर बीमारी में स्टेम सेल का इस्तेमाल प्रभावी या सुरक्षित उपचार के रूप में साबित हो चुका है।
ऑटिज्म के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि स्टेम सेल थेरेपी को रूटीन उपचार के तौर पर स्वीकार करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए किसी परिवार को केवल विज्ञापन, सोशल मीडिया पोस्ट, मरीजों की व्यक्तिगत कहानियों या किसी क्लीनिक के दावों के आधार पर ऐसा इलाज शुरू नहीं करना चाहिए।
विशेषज्ञों की सलाह का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि ऑटिज्म एक न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है और इसके लक्षण तथा जरूरतें हर बच्चे में अलग-अलग हो सकती हैं। ऐसे में किसी एक कथित उपचार को सभी बच्चों के लिए समाधान बताना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।
ऑटिज्म में स्टेम सेल को लेकर सरकार का क्या रुख है?
स्वास्थ्य मंत्रालय और NMC की एडवाइजरी में स्टेम सेल के गैर-स्वीकृत इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट चेतावनी दी गई है। ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल थेरेपी को नियमित या मानक उपचार के तौर पर इस्तेमाल करने का समर्थन करने वाले पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि कोई अस्पताल या क्लीनिक केवल व्यावसायिक सेवा के रूप में ऑटिज्म के मरीजों को स्टेम सेल उपचार उपलब्ध कराकर इसे प्रमाणित इलाज के रूप में पेश नहीं कर सकता।
यदि किसी विशेष स्टेम सेल आधारित उपचार का अध्ययन करना हो, तो वह निर्धारित नियामकीय प्रक्रिया और उचित क्लीनिकल ट्रायल के दायरे में होना चाहिए। रिसर्च और सामान्य इलाज के बीच अंतर समझना मरीजों और परिवारों के लिए बेहद जरूरी है। किसी उपचार का क्लीनिकल ट्रायल में अध्ययन होना इस बात की गारंटी नहीं है कि वह बीमारी का सिद्ध इलाज बन चुका है। ट्रायल का उद्देश्य ही यह पता लगाना होता है कि किसी उपचार की प्रभावशीलता और सुरक्षा कितनी है।
किन मामलों में स्टेम सेल उपचार का इस्तेमाल स्थापित है?
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि स्टेम सेल शब्द सुनकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि हर प्रकार की स्टेम सेल थेरेपी गैरकानूनी या बेकार है। चिकित्सा विज्ञान में कुछ विशिष्ट बीमारियों और परिस्थितियों में स्टेम सेल आधारित उपचार स्थापित चिकित्सा प्रक्रियाओं का हिस्सा हैं। उदाहरण के तौर पर कुछ गंभीर रक्त संबंधी बीमारियों में हेमाटोपोएटिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट जैसी प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाता है। कुछ मामलों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट इसी तरह की स्थापित चिकित्सा व्यवस्था का हिस्सा होता है।
लेकिन ऐसी स्वीकृत प्रक्रियाओं का उदाहरण देकर किसी दूसरी बीमारी के लिए स्टेम सेल थेरेपी को स्वतः प्रमाणित उपचार नहीं माना जा सकता। हर बीमारी के लिए उपचार की प्रभावशीलता और सुरक्षा अलग-अलग वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर निर्धारित होती है।
यही वजह है कि किसी क्लीनिक द्वारा यह कहना कि “स्टेम सेल से कई बीमारियों का इलाज होता है, इसलिए ऑटिज्म भी ठीक हो जाएगा”, अपने आप में वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
महंगे पैकेज और ‘पूरी तरह ठीक’ करने के दावों से रहें सावधान
माता-पिता के लिए सबसे बड़ा खतरा उन दावों से हो सकता है जिनमें ऑटिज्म को पूरी तरह खत्म करने या बच्चे को कुछ ही सत्रों में सामान्य करने की बात कही जाती है। ऐसे दावों को स्वीकार करने से पहले परिवार को प्रमाण और नियामकीय मंजूरी के बारे में सवाल पूछने चाहिए। किसी उपचार की कीमत ज्यादा होना उसके प्रभावी होने का प्रमाण नहीं है। इसी तरह विदेश से आया उपचार, अत्याधुनिक मशीन, विशेष लैब या ‘एडवांस्ड सेल थेरेपी’ जैसे शब्द भी अपने आप में किसी इलाज को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं बनाते।
अगर किसी केंद्र में इलाज शुरू करने से पहले लाखों रुपये का पैकेज लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा है, तो परिवार को सावधानी बरतनी चाहिए। उपचार की प्रकृति, उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण, संभावित जोखिम, विकल्प और डॉक्टर की योग्यता के बारे में स्पष्ट जानकारी लेना जरूरी है।
क्लीनिकल ट्रायल और कमर्शियल इलाज में अंतर समझें
स्टेम सेल के क्षेत्र में एक आम भ्रम यह है कि अगर किसी प्रक्रिया को ‘रिसर्च’ या ‘क्लीनिकल ट्रायल’ कहा जा रहा है, तो वह मरीज के लिए सामान्य उपचार के रूप में उपलब्ध हो जाती है। ऐसा जरूरी नहीं है। क्लीनिकल ट्रायल नियामकीय और नैतिक प्रक्रियाओं के तहत किया जाता है। इसमें मरीजों की सुरक्षा, अध्ययन की पद्धति, सहमति और निगरानी जैसे पहलू महत्वपूर्ण होते हैं।
इसलिए यदि कोई व्यक्ति ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल उपचार को रिसर्च का नाम देकर उपलब्ध करा रहा है, तो परिवार को यह पता करना चाहिए कि वह वास्तव में स्वीकृत क्लीनिकल ट्रायल का हिस्सा है या केवल उपचार को आकर्षक बनाने के लिए ‘रिसर्च’ शब्द इस्तेमाल किया जा रहा है। सिर्फ किसी डॉक्टर के कह देने से कोई प्रक्रिया क्लीनिकल ट्रायल नहीं बन जाती।
नियमों का उल्लंघन करने पर डॉक्टरों पर कार्रवाई संभव
NMC ने डॉक्टरों और चिकित्सा संस्थानों को गैर-स्वीकृत उपचारों तथा उनके प्रचार को लेकर सावधान किया है। यदि कोई चिकित्सक ऐसी बीमारी के लिए स्टेम सेल उपचार उपलब्ध कराता है, जिसके लिए वह मानक उपचार के रूप में स्वीकृत नहीं है, तो संबंधित पेशेवर और नियामकीय नियम लागू हो सकते हैं।
इसी तरह मरीजों को आकर्षित करने के लिए भ्रामक विज्ञापन, बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावे या किसी उपचार को चमत्कारी समाधान के रूप में पेश करना भी गंभीर मामला हो सकता है।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी एडवाइजरी के अनुरूप नियमों के पालन और शिकायतों पर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा गया है। संबंधित राज्य मेडिकल काउंसिल और अन्य सक्षम संस्थाएं शिकायतों की जांच नियमानुसार कर सकती हैं।
माता-पिता को इलाज से पहले कौन-कौन से सवाल पूछने चाहिए?
किसी बच्चे के लिए महंगा या नया उपचार शुरू करने से पहले परिवार कुछ बुनियादी सवाल जरूर पूछ सकता है। सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि प्रस्तावित उपचार ऑटिज्म के लिए नियामक रूप से स्वीकृत है या नहीं। इसके बाद डॉक्टर से उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों और उपचार के संभावित फायदे तथा जोखिम के बारे में जानकारी मांगी जानी चाहिए।
अगर डॉक्टर क्लीनिकल ट्रायल का दावा करता है, तो ट्रायल का नाम, संस्थान, नियामकीय अनुमति और मरीज की भूमिका के बारे में स्पष्ट जानकारी ली जानी चाहिए। परिवार को यह भी पूछना चाहिए कि अगर स्टेम सेल उपचार नहीं कराया जाता, तो बच्चे के लिए अन्य स्थापित विकल्प क्या हैं। दूसरी विशेषज्ञ राय लेना भी महत्वपूर्ण हो सकता है, खासकर तब जब उपचार महंगा हो या उसके प्रभाव को लेकर बड़े दावे किए जा रहे हों।
ऑटिज्म में परिवार को किस बात पर ध्यान देना चाहिए?
ऑटिज्म से जुड़े हर बच्चे की जरूरत एक जैसी नहीं होती। इसलिए इलाज का उद्देश्य केवल किसी एक लक्षण को खत्म करना नहीं, बल्कि बच्चे के विकास, संचार, व्यवहार, सीखने और रोजमर्रा की क्षमताओं को उसकी जरूरत के अनुसार बेहतर समर्थन देना हो सकता है।
माता-पिता को किसी भी उपचार के बारे में फैसला लेते समय बच्चे का मूल्यांकन करने वाले योग्य विशेषज्ञों से चर्चा करनी चाहिए। इंटरनेट पर उपलब्ध व्यक्तिगत अनुभव या किसी दूसरे बच्चे के परिणाम को अपने बच्चे के लिए निश्चित परिणाम का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अप्रमाणित उपचार की वजह से बच्चे के लिए जरूरी और स्थापित सेवाओं में देरी न हो।
सरकार की एडवाइजरी का मकसद क्या है?
स्टेम सेल तकनीक चिकित्सा अनुसंधान का महत्वपूर्ण क्षेत्र है और भविष्य में इसके कई संभावित उपयोगों पर अध्ययन जारी है। लेकिन वैज्ञानिक संभावना और प्रमाणित उपचार के बीच अंतर होता है। स्वास्थ्य मंत्रालय और NMC की चेतावनी इसी अंतर को स्पष्ट करती है। किसी उपचार को मरीजों के लिए नियमित रूप से उपलब्ध कराने से पहले उसकी प्रभावशीलता, सुरक्षा और नियामकीय स्थिति का पर्याप्त आधार होना जरूरी है।
इसलिए ऑटिज्म के नाम पर स्टेम सेल थेरेपी का पैकेज खरीदने से पहले परिवार को विज्ञापन के बजाय प्रमाण पर ध्यान देना चाहिए। यदि कोई केंद्र बच्चे को पूरी तरह ठीक करने की गारंटी देता है, तुरंत भुगतान के लिए दबाव बनाता है या उपचार के जोखिमों और वैज्ञानिक प्रमाणों की स्पष्ट जानकारी नहीं देता, तो अतिरिक्त सावधानी बरतना उचित है।
नोट: स्टेम सेल उपचार से जुड़ा कोई भी फैसला केवल योग्य चिकित्सा विशेषज्ञ की सलाह और संबंधित उपचार की नियामकीय स्थिति की पुष्टि करने के बाद ही लें। किसी उपचार के बारे में ‘रिसर्च’, ‘एडवांस्ड’ या ‘100 प्रतिशत इलाज’ जैसे दावों को वैज्ञानिक प्रमाण और आधिकारिक मंजूरी के आधार पर ही परखें।




