बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती कुछ साल उसके शारीरिक, मानसिक, भाषाई और सामाजिक विकास के लिहाज से बेहद अहम होते हैं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, बच्चे में नई-नई क्षमताएं विकसित होने लगती हैं। वह बैठना, खड़ा होना, चलना, बोलना, चीजों को समझना और आसपास के लोगों के साथ जुड़ना सीखता है। इन क्षमताओं को विकास के महत्वपूर्ण पड़ाव यानी डेवलपमेंटल माइलस्टोन कहा जाता है।
करीब 18 महीने यानी डेढ़ साल की उम्र तक बच्चे के विकास में कई बदलाव दिखाई देने लगते हैं। हालांकि हर बच्चे के सीखने की गति अलग हो सकती है, लेकिन कुछ क्षमताएं ऐसी हैं जिन पर इस उम्र में माता-पिता को विशेष ध्यान देना चाहिए। अगर बच्चा इन क्षेत्रों में लगातार पीछे नजर आ रहा है, तो बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित माना जाता है।
बिना सहारे चलने में परेशानी
डेढ़ साल की उम्र तक बच्चे की शारीरिक गतिविधियों में काफी बदलाव आने लगता है। ज्यादातर बच्चे इस समय तक अपने पैरों पर खड़े होकर बिना किसी सहारे के चलना शुरू कर देते हैं। वे घर में इधर-उधर घूमने, खिलौनों तक पहुंचने और खुद से कुछ दूरी तय करने की कोशिश करते हैं।
अगर बच्चा 18 महीने का हो चुका है लेकिन अभी तक बिना सहारे के चल नहीं पा रहा है, तो माता-पिता को इस बात पर ध्यान देना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है कि बच्चे को निश्चित रूप से कोई बीमारी है, लेकिन यह ऐसा संकेत हो सकता है जिसके बारे में डॉक्टर से चर्चा करना जरूरी है।
बाल रोग विशेषज्ञ बच्चे की दूसरी शारीरिक गतिविधियों को भी देख सकते हैं। मसलन, बच्चा खुद बैठ पा रहा है या नहीं, खड़े होने की कोशिश करता है या नहीं और उसके हाथ-पैरों की गतिविधियां सामान्य तरीके से हो रही हैं या नहीं। इन सभी बातों को देखकर ही बच्चे के विकास का आकलन किया जाता है।
बातचीत के लिए शब्दों का इस्तेमाल नहीं करता
बच्चे की भाषा और बातचीत करने की क्षमता भी उसके विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। डेढ़ साल की उम्र में बच्चा आसपास की चीजों और लोगों के लिए कुछ शब्दों का इस्तेमाल करने की कोशिश करने लगता है। उदाहरण के लिए, वह माता-पिता को बुलाने या अपनी जरूरत बताने के लिए आसान शब्द बोल सकता है।
इस उम्र में बच्चे का हर शब्द साफ-साफ समझ में आए, यह जरूरी नहीं है। कई बच्चे शब्दों का अपना छोटा या अलग उच्चारण करते हैं। फिर भी अगर बच्चा किसी भी अर्थपूर्ण शब्द का इस्तेमाल करने की कोशिश नहीं कर रहा है, तो इस बारे में बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना चाहिए।
माता-पिता को यह भी देखना चाहिए कि बच्चा अपनी जरूरत बताने के लिए केवल रोने या इशारे पर निर्भर है या किसी तरह आवाज, शब्द या संकेत के जरिए बातचीत करने की कोशिश भी करता है।
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि 18 महीने के बच्चे से दो शब्दों को जोड़कर बोलने की अपेक्षा करना जरूरी नहीं है। दो शब्दों को साथ जोड़कर बोलना, जैसे “और दूध” या “मम्मी आओ”, दो साल की उम्र के विकास संबंधी पड़ावों में शामिल किया जाता है। इसलिए केवल दो शब्दों का वाक्य न बोल पाने को 18 महीने में अपने आप में गंभीर देरी नहीं माना जाना चाहिए।
आसान बात समझने में भी दिक्कत
बच्चा कितना बोलता है, इसके साथ यह देखना भी जरूरी है कि वह दूसरों की कही हुई बात कितनी समझता है। 18 महीने की उम्र तक ज्यादातर बच्चे बहुत आसान और छोटे निर्देशों को समझने की कोशिश करने लगते हैं।
उदाहरण के लिए, माता-पिता बच्चे से कह सकते हैं, “गेंद लाओ”, “खिलौना दो” या “इधर आओ।” बच्चा हर बार तुरंत निर्देश माने, यह जरूरी नहीं है। वह खेल में व्यस्त हो सकता है या उसका ध्यान किसी दूसरी चीज पर हो सकता है।
लेकिन अगर बच्चा लगातार आसान निर्देशों को समझने में परेशानी दिखाता है और सामान्य बातचीत पर भी प्रतिक्रिया बहुत कम देता है, तो माता-पिता को डॉक्टर से बात करनी चाहिए। चिकित्सक बच्चे की भाषा समझने की क्षमता के साथ उसकी सुनने और संवाद करने की क्षमता का भी आकलन कर सकते हैं।
कई बार बच्चे को सुनने में परेशानी होने पर भी भाषा और निर्देश समझने में देरी दिखाई दे सकती है। इसलिए केवल व्यवहार देखकर खुद से किसी बीमारी का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
लोगों से जुड़ने में बहुत कम रुचि
बच्चे का सामाजिक विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका चलना या बोलना। डेढ़ साल की उम्र में बच्चा माता-पिता और आसपास के लोगों की मौजूदगी को पहचानने और उनके साथ जुड़ने की कोशिश करने लगता है।
वह किसी पसंदीदा खिलौने या दिलचस्प चीज की तरफ इशारा कर सकता है। वह माता-पिता के साथ किताब देखने, खेल खेलने या किसी चीज को साझा करने में रुचि दिखा सकता है। बच्चे का सामाजिक व्यवहार धीरे-धीरे ज्यादा स्पष्ट होने लगता है।
अगर माता-पिता को लगातार महसूस होता है कि बच्चा लोगों के साथ बातचीत या जुड़ाव में बहुत कम रुचि लेता है, उनकी तरफ देखने या प्रतिक्रिया देने की कोशिश बहुत कम करता है या अपनी पसंद की चीजें दूसरों के साथ साझा नहीं करता, तो डॉक्टर से चर्चा करना जरूरी हो सकता है।
यहां यह समझना भी जरूरी है कि केवल आंखों में आंखें डालकर न देखने या कम सामाजिक होने के आधार पर किसी बच्चे को ऑटिज्म या किसी अन्य विकास संबंधी स्थिति से जोड़ना सही नहीं है। चिकित्सक बच्चे के कई अलग-अलग व्यवहारों और विकास के क्षेत्रों को एक साथ देखते हैं।
एक ही संकेत से न निकालें कोई निष्कर्ष
बच्चों में विकास की गति अलग-अलग हो सकती है। कोई बच्चा जल्दी चलना शुरू कर देता है, जबकि दूसरा बच्चा कुछ समय बाद चलना सीख सकता है। इसी तरह किसी बच्चे की शब्दावली दूसरे बच्चे की तुलना में कम या ज्यादा हो सकती है।
इसलिए किसी एक गतिविधि में थोड़ी देरी देखकर घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर बच्चे में एक से ज्यादा क्षेत्रों में लगातार देरी दिखाई दे रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना महत्वपूर्ण हो जाता है।
विशेष रूप से अगर चलने, बोलने, समझने और सामाजिक व्यवहार से जुड़े कई संकेत एक साथ दिखाई दे रहे हों, तो बच्चे का विकास संबंधी मूल्यांकन कराया जा सकता है। समय पर जांच होने से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि बच्चे को अतिरिक्त सहायता की जरूरत है या नहीं।
पहले सीखी हुई क्षमता खो दे तो तुरंत बताएं
माता-पिता को सिर्फ उन चीजों पर ध्यान नहीं देना चाहिए जो बच्चा अभी तक नहीं सीख पाया है। यह भी देखना जरूरी है कि बच्चा पहले क्या कर पाता था।
अगर बच्चा पहले कोई शब्द बोलता था और अब बोलना बंद कर दिया है, पहले लोगों के साथ प्रतिक्रिया करता था और अब बिल्कुल कम कर रहा है, या पहले से सीखी हुई कोई अन्य क्षमता खो चुका है, तो इस बदलाव की जानकारी डॉक्टर को जल्द देनी चाहिए।
ऐसे मामलों में चिकित्सक बच्चे की पूरी विकासात्मक स्थिति को समझने के लिए आगे की जांच या विशेषज्ञ की सलाह दे सकते हैं।
माता-पिता कैसे रखें बच्चे के विकास पर नजर?
बच्चे के विकास पर नजर रखने के लिए माता-पिता रोजमर्रा की गतिविधियों को ध्यान से देख सकते हैं। बच्चा कैसे चलता है, कितनी आवाजें या शब्द इस्तेमाल करता है, बात समझने पर कैसी प्रतिक्रिया देता है और परिवार के लोगों के साथ कैसे जुड़ता है—इन सभी चीजों पर ध्यान देना उपयोगी है।
बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से करने के बजाय उसके अपने विकास में हो रहे बदलावों को देखना ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर किसी बात को लेकर लगातार चिंता बनी हुई है, तो डॉक्टर से मिलने में देरी नहीं करनी चाहिए।
18 महीने की उम्र में नियमित स्वास्थ्य जांच के दौरान बच्चे के विकास से जुड़े सवाल डॉक्टर से पूछे जा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर चिकित्सक विकास संबंधी जांच की सलाह दे सकते हैं।
सबसे अहम बात यह है कि विकास में देरी का मतलब हमेशा किसी गंभीर समस्या का होना नहीं होता। लेकिन किसी संभावित समस्या की पहचान और जरूरत पड़ने पर शुरुआती मदद बच्चे के विकास के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। इसलिए माता-पिता को घबराने के बजाय बच्चे में दिखाई देने वाले संकेतों को समझना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सलाह लेना चाहिए।




