भारत के सॉफ्ट ड्रिंक बाजार में मुकाबला लगातार तेज होता जा रहा है। एक तरफ लंबे समय से बाजार में मजबूत पकड़ रखने वाली कोका-कोला और पेप्सिको जैसी ग्लोबल कंपनियां हैं, तो दूसरी ओर रिलायंस इंडस्ट्रीज के दोबारा लॉन्च किए गए कैंपा कोला ने बेहद कम समय में अपनी मौजूदगी मजबूत की है। कम कीमत और तेजी से बढ़ते डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के दम पर कैंपा कोला ने कार्बोनेटेड बेवरेज मार्केट में स्थापित कंपनियों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।
हालांकि, कैंपा कोला की बढ़ती लोकप्रियता और आक्रामक कीमतों के बावजूद कोका-कोला अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करने के मूड में नहीं है। कंपनी के चीफ एग्जीक्यूटिव हेनरिक ब्रॉन का कहना है कि किसी प्रतिस्पर्धी की कीमतों या किसी एक तिमाही में बाजार हिस्सेदारी में होने वाले बदलाव को देखकर कंपनी अपनी लंबे समय की रणनीति नहीं बदलेगी।
ब्रॉन के मुताबिक, तेजी से विकसित हो रहे बाजारों में इस तरह की प्रतिस्पर्धा सामान्य बात है। कभी किसी कंपनी की कीमतें ज्यादा आक्रामक हो सकती हैं तो कभी मार्केट शेयर में कुछ समय के लिए बदलाव देखने को मिल सकता है। ऐसे हालात में जरूरी यह है कि कंपनी तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय अपने कारोबार की बुनियाद को मजबूत बनाए रखे।
कीमतों की लड़ाई में नहीं कूदेगी कंपनी
भारत जैसे बड़े और तेजी से बढ़ते बाजार में कीमत एक अहम हथियार बन चुकी है। कैंपा कोला ने इसी रणनीति का इस्तेमाल करते हुए ग्राहकों को कम कीमत पर अपने उत्पाद उपलब्ध कराए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कैंपा कोला के कुछ उत्पादों की शुरुआती कीमत महज 10 रुपये से है। कम कीमत वाले पैक ने खासतौर पर ऐसे ग्राहकों को आकर्षित करने में मदद की है, जो किफायती विकल्प तलाशते हैं।
इसके बावजूद कोका-कोला के CEO का संकेत साफ है कि कंपनी केवल प्रतिस्पर्धी की कीमतों का मुकाबला करने के लिए कीमतों में लगातार बदलाव नहीं करेगी। उनका मानना है कि हर प्राइस कट या मार्केट शेयर में बदलाव का तुरंत जवाब देना लंबे समय में कारोबार के लिए सही रणनीति नहीं हो सकती।
हेनरिक ब्रॉन ने कहा कि किसी तिमाही में कंपनी की हिस्सेदारी घट सकती है या बाजार में कोई प्रतिस्पर्धी कीमतों को लेकर अप्रत्याशित कदम उठा सकता है। लेकिन ऐसे बदलावों को लेकर जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया देने के बजाय उन संकेतों पर ध्यान देना चाहिए, जो वास्तव में कारोबार की दिशा बताते हैं।
यानी कोका-कोला फिलहाल कैंपा कोला की कीमतों की होड़ में सीधे उतरने के बजाय अपने ब्रांड, उत्पादों और वितरण व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर देना चाहती है।
कैंपा कोला ने कैसे बदली बाजार की तस्वीर?
कैंपा कोला कभी भारत में एक जाना-पहचाना सॉफ्ट ड्रिंक ब्रांड हुआ करता था। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने इस पुराने ब्रांड को खरीदने के बाद साल 2022 में नए अंदाज के साथ दोबारा बाजार में उतारा। इसके बाद रिलायंस ने अपने मजबूत रिटेल नेटवर्क, व्यापक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम और अपेक्षाकृत कम कीमतों का इस्तेमाल करते हुए कैंपा कोला का तेजी से विस्तार किया।
रिलायंस की रणनीति केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रही। कंपनी ने अलग-अलग बाजारों और छोटे शहरों तक पहुंच बनाने की कोशिश की, जहां कीमत ग्राहकों के खरीदारी के फैसले में बड़ी भूमिका निभाती है। इसी वजह से कैंपा कोला को धीरे-धीरे बाजार में अपनी जगह बनाने में मदद मिली।
कंपनी की तेजी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि रिलायंस के दावे के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में कैंपा कोला देश का चौथा सबसे बड़ा कार्बोनेटेड सॉफ्ट ड्रिंक ब्रांड बन गया। इस दौरान ब्रांड की ग्रॉस सेल्स 4,700 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है।
इतनी तेजी से बढ़ती बिक्री ने यह संकेत दिया है कि भारतीय सॉफ्ट ड्रिंक बाजार में नए खिलाड़ियों के लिए भी जगह बन रही है। खासतौर पर तब, जब कोई कंपनी कम कीमत, बड़े डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और मजबूत रिटेल पहुंच को एक साथ इस्तेमाल करे।
सिर्फ कैंपा नहीं, नए खिलाड़ियों से बढ़ी प्रतिस्पर्धा
भारत के कार्बोनेटेड बेवरेज बाजार में बदलाव केवल कैंपा कोला की वजह से नहीं हो रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कई नए और क्षेत्रीय खिलाड़ियों ने भी अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश की है। इन कंपनियों की रणनीति अक्सर कम कीमत, स्थानीय पसंद और मजबूत क्षेत्रीय वितरण पर आधारित रही है।
क्रिसिल रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार, नए खिलाड़ियों की संयुक्त बाजार हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2024 में करीब 2 फीसदी थी। इसके वित्त वर्ष 2026 तक बढ़कर अनुमानित 6-7 फीसदी तक पहुंचने की बात कही गई है।
यह आंकड़ा बताता है कि भारतीय सॉफ्ट ड्रिंक उद्योग में प्रतिस्पर्धा का दायरा बढ़ रहा है। पहले जहां कुछ बड़े ब्रांड बाजार पर हावी दिखाई देते थे, वहीं अब ग्राहक के पास विकल्पों की संख्या बढ़ रही है।
कैंपा कोला इसी बदलते परिदृश्य का एक प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है। रिलायंस के संसाधनों और नेटवर्क ने पुराने ब्रांड को नई ताकत दी है। वहीं इसकी किफायती कीमतों ने इसे बड़े पैमाने पर ग्राहकों तक पहुंचाने में भूमिका निभाई है।
कोका-कोला का फोकस किन चीजों पर रहेगा?
कैंपा कोला जैसी कंपनियों की चुनौती के बीच कोका-कोला अपनी प्राथमिकताएं बदलने के बजाय अपने मौजूदा मॉडल को और मजबूत करने पर जोर दे रही है। हेनरिक ब्रॉन ने कारोबार के कुछ बुनियादी पहलुओं को खास तौर पर महत्वपूर्ण बताया है।
इनमें पैकेजिंग की रणनीति, ब्रांड निर्माण और रेवेन्यू ग्रोथ मैनेजमेंट जैसे क्षेत्र शामिल हैं। कंपनी का मानना है कि लंबे समय तक मजबूत प्रदर्शन के लिए सिर्फ कीमत कम करना पर्याप्त नहीं है। ग्राहक के बीच ब्रांड की पहचान, उत्पाद की उपलब्धता और अलग-अलग कीमतों पर सही पैक साइज उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
ब्रॉन के मुताबिक, जिन बाजारों में कंपनियां मुश्किल परिस्थितियों का बेहतर तरीके से सामना कर रही हैं, वहां कारोबार के मूल सिद्धांतों पर लगातार काम किया गया है। उनका संदेश यह है कि बाजार में उतार-चढ़ाव आते रहेंगे, लेकिन कंपनी को अपने स्थापित बिजनेस मॉडल और अनुशासित प्रक्रिया से भटकना नहीं चाहिए।
इसका सीधा मतलब यह है कि कोका-कोला कैंपा कोला की हर गतिविधि का जवाब उसी अंदाज में देने के बजाय अपनी दीर्घकालिक क्षमता पर भरोसा करना चाहती है।
मार्केट शेयर में बदलाव को लेकर भी बेफिक्र
किसी भी कंज्यूमर ब्रांड के लिए बाजार हिस्सेदारी बेहद अहम मानी जाती है। खासकर सॉफ्ट ड्रिंक जैसे बाजार में, जहां ब्रांड की लोकप्रियता और बिक्री के आंकड़ों को लेकर कंपनियों के बीच लगातार प्रतिस्पर्धा रहती है।
लेकिन कोका-कोला के CEO का कहना है कि किसी एक तिमाही में मार्केट शेयर कम हो जाना अपने आप में कंपनी की लंबी अवधि की स्थिति को तय नहीं करता। इसी तरह, किसी प्रतिद्वंद्वी का कुछ समय के लिए तेजी से आगे निकलना भी जरूरी नहीं कि स्थायी बदलाव का संकेत हो।
इसलिए कंपनी तत्काल दबाव में आकर अपने पूरे बिजनेस मॉडल को बदलने के बजाय उन क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहती है, जो भविष्य में लगातार ग्रोथ देने में मदद कर सकते हैं।
यह रणनीति खासतौर पर भारत जैसे बाजार में महत्वपूर्ण हो सकती है, जहां अलग-अलग आय वर्ग के ग्राहकों के लिए कीमत, पैकेजिंग और ब्रांड की पसंद अलग-अलग हो सकती है।
रिलायंस के लिए कैंपा कोला क्यों अहम है?
रिलायंस इंडस्ट्रीज ने कैंपा कोला के जरिए भारतीय बेवरेज बाजार में अपनी महत्वाकांक्षा स्पष्ट कर दी है। कंपनी के पास पहले से ही देशभर में बड़ा रिटेल और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क है। इसका फायदा कैंपा कोला को बाजार में तेजी से पहुंच बनाने में मिला है।
कम कीमतों के साथ रिलायंस ने इसे बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराने की कोशिश की है। अगर यह रणनीति लंबे समय तक सफल रहती है, तो कैंपा कोला के सामने सिर्फ बिक्री बढ़ाने की संभावना नहीं होगी, बल्कि देश के सॉफ्ट ड्रिंक बाजार में अपनी हिस्सेदारी को और मजबूत करने का मौका भी होगा।
दूसरी ओर, कोका-कोला और पेप्सिको जैसी कंपनियों के लिए यह स्थिति बताती है कि भारत में प्रतिस्पर्धा अब केवल दो बड़े ग्लोबल ब्रांडों के बीच नहीं रह गई है।
आगे क्या होगा?
भारत का सॉफ्ट ड्रिंक बाजार आने वाले समय में और ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो सकता है। कैंपा कोला की तेजी, नए खिलाड़ियों की बढ़ती हिस्सेदारी और ग्राहकों के बीच किफायती विकल्पों की मांग कंपनियों की रणनीति को प्रभावित कर सकती है।
फिलहाल कोका-कोला की तरफ से दिया गया संदेश स्पष्ट है कि वह केवल प्रतिस्पर्धी की कीमतों को देखकर अपनी दिशा नहीं बदलेगी। कंपनी ब्रांड की ताकत, पैकेजिंग, वितरण और रेवेन्यू ग्रोथ जैसे मूल क्षेत्रों पर काम जारी रखेगी।
वहीं रिलायंस के लिए चुनौती यह होगी कि शुरुआती तेजी को लंबे समय तक कायम कैसे रखा जाए। कैंपा कोला ने जिस रफ्तार से बाजार में अपनी जगह बनाई है, उसे बनाए रखना उसके लिए अगला बड़ा लक्ष्य होगा।
इस तरह भारतीय सॉफ्ट ड्रिंक बाजार में आने वाले समय में मुकाबला सिर्फ इस बात पर नहीं होगा कि कौन कम कीमत पर बोतल बेचता है। असली लड़ाई ग्राहक की पसंद, ब्रांड की पहचान, वितरण नेटवर्क और लंबे समय तक टिकाऊ ग्रोथ हासिल करने की होगी। कोका-कोला फिलहाल इसी लंबी दौड़ पर ध्यान केंद्रित करती दिखाई दे रही है।



