क्या प्रदूषित हवा में मॉर्निंग वॉक करना दिमाग के लिए भी बन सकता है खतरा? PM2.5 और डिमेंशिया के बीच सामने आया संबंध

क्या प्रदूषित हवा में मॉर्निंग वॉक करना दिमाग के लिए भी बन सकता है खतरा? PM2.5 और डिमेंशिया के बीच सामने आया संबंध

सर्दियों के मौसम में सुबह की सैर को सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है। बहुत से लोग दिन की शुरुआत पार्क में टहलने, दौड़ने या खुले वातावरण में व्यायाम करने से करते हैं। लेकिन जब हवा में प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है, तो यही आदत स्वास्थ्य के लिए परेशानी का कारण बन सकती है। प्रदूषित हवा में मौजूद बेहद छोटे कण केवल फेफड़ों और सांस की नलियों को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि इनके मस्तिष्क तक पहुंचने और उसकी कार्यप्रणाली पर असर डालने की आशंका भी सामने आई है। हालिया वैज्ञानिक समीक्षा में लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क और डिमेंशिया यानी मनोभ्रंश के बढ़ते जोखिम के बीच संबंध पाया गया है।

Alzheimer’s Research & Therapy में प्रकाशित 2026 की समीक्षा में दुनिया भर में किए गए 49 अध्ययनों का विश्लेषण किया गया। इसमें विशेष रूप से PM2.5 नाम के सूक्ष्म प्रदूषक कणों और डिमेंशिया के जोखिम के बीच संबंध पर ध्यान दिया गया। अध्ययन के निष्कर्षों के मुताबिक, हवा में PM2.5 की सांद्रता में प्रत्येक एक माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि के साथ डिमेंशिया का जोखिम लगभग सात प्रतिशत अधिक पाया गया। हालांकि, विशेषज्ञों की ओर से 14 प्रतिशत तक के जोखिम संबंध का भी उल्लेख किया गया है। इन आंकड़ों को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि अलग-अलग अध्ययनों के निष्कर्ष, विश्लेषण के तरीके और आबादी के आधार पर जोखिम का अनुमान बदल सकता है। यह संबंध प्रदूषण को एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य चिंता के रूप में सामने लाता है।

केवल सांस की बीमारी नहीं, दिमाग पर भी पड़ सकता है असर

वायु प्रदूषण के नुकसान की चर्चा होने पर आमतौर पर खांसी, सांस फूलना, अस्थमा, फेफड़ों की बीमारी और आंखों में जलन जैसी समस्याओं का जिक्र किया जाता है। हालांकि, प्रदूषित हवा का प्रभाव शरीर के दूसरे अंगों पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस जैसी प्रक्रियाएं बढ़ सकती हैं। ये प्रक्रियाएं मस्तिष्क की कोशिकाओं और उनके सामान्य कामकाज को प्रभावित करने में भूमिका निभा सकती हैं।

पीएसआरआई अस्पताल में पल्मोनरी, क्रिटिकल केयर और स्लीप मेडिसिन विभाग से जुड़े डॉ. जीसी खिलनानी ने वायु प्रदूषण और डिमेंशिया के बीच सामने आए संबंध को महत्वपूर्ण बताया है। उनके अनुसार, प्रदूषण के कारण मस्तिष्क में सूजन बढ़ने की आशंका रहती है और इसके दीर्घकालिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। हवा में मौजूद बेहद छोटे कण शरीर के भीतर पहुंचकर कई जैविक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं।

डिमेंशिया ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति की याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता और रोजमर्रा के काम करने की योग्यता प्रभावित होने लगती है। अल्जाइमर रोग डिमेंशिया का एक प्रमुख कारण है, लेकिन दोनों शब्दों का अर्थ एक जैसा नहीं है। डिमेंशिया कई तरह की बीमारियों और मस्तिष्क में होने वाले बदलावों के कारण हो सकता है। इसलिए प्रदूषण और डिमेंशिया के बीच संबंध को समझना बुजुर्गों की सेहत और सार्वजनिक स्वास्थ्य, दोनों के लिहाज से अहम है।

PM2.5 के कण इतने खतरनाक क्यों माने जाते हैं?

PM2.5 ऐसे सूक्ष्म कणों को कहा जाता है जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये इतने छोटे होते हैं कि सांस के साथ शरीर में प्रवेश करके फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंच सकते हैं। इन कणों में अलग-अलग स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषक शामिल हो सकते हैं। वाहनों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, ईंधन जलाना और अन्य प्रदूषणकारी गतिविधियां इनकी मात्रा बढ़ाने में योगदान दे सकती हैं।

इन कणों की समस्या सिर्फ इनके आकार तक सीमित नहीं है। इनकी बनावट और रासायनिक संरचना के आधार पर ये शरीर में जलन, सूजन और अन्य प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं से जुड़े हो सकते हैं। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण में रहता है, तो उसके शरीर पर बार-बार प्रदूषण का प्रभाव पड़ सकता है।

मस्तिष्क पर इसके असर को लेकर वैज्ञानिक कई संभावित प्रक्रियाओं का अध्ययन कर रहे हैं। इनमें शरीर में सूजन बढ़ना, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा होना और मस्तिष्क की प्रतिरक्षा प्रणाली की गतिविधियों में बदलाव शामिल हैं। हालांकि, हर व्यक्ति पर प्रदूषण का प्रभाव समान नहीं होता। उम्र, पहले से मौजूद बीमारियां, प्रदूषण की मात्रा और उसके संपर्क में रहने की अवधि जैसे कारक भी जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं।

क्या नाक के रास्ते मस्तिष्क तक पहुंच सकते हैं प्रदूषक?

नाक केवल सांस लेने का रास्ता नहीं है, बल्कि यह सूंघने की क्षमता से जुड़े तंत्र का भी हिस्सा है। नाक के ऊपरी हिस्से में मौजूद घ्राण तंत्रिकाएं गंध से जुड़ी सूचनाएं मस्तिष्क तक पहुंचाती हैं। वैज्ञानिक इस बात की जांच कर रहे हैं कि कुछ अतिसूक्ष्म प्रदूषक कण इस मार्ग या अन्य जैविक प्रक्रियाओं के जरिए मस्तिष्क को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं।

दिल्ली के मेडफर्स्ट ईएनटी सेंटर के संस्थापक डॉ. राजेश भारद्वाज के अनुसार, प्रदूषण के संपर्क से जुड़े संभावित प्रभावों में मस्तिष्क की सूजन और उसकी सामान्य कार्यप्रणाली में बदलाव शामिल हो सकते हैं। उनके मुताबिक, लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने वाले कुछ लोगों को ब्रेन फॉग, सुस्ती, थकान और साइनस में जलन जैसी शिकायतें हो सकती हैं।

ब्रेन फॉग किसी एक विशेष बीमारी का नाम नहीं है। इसका इस्तेमाल ऐसी स्थिति के लिए किया जाता है, जिसमें व्यक्ति को ध्यान केंद्रित करने, स्पष्ट रूप से सोचने या जानकारी याद रखने में परेशानी महसूस होती है। इस तरह के लक्षणों के कई कारण हो सकते हैं। नींद की कमी, तनाव, संक्रमण और दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं भी इनके पीछे हो सकती हैं। इसलिए केवल ब्रेन फॉग या थकान होने के आधार पर यह मान लेना सही नहीं होगा कि इसकी वजह वायु प्रदूषण ही है।

विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषण और मस्तिष्क के बीच संबंध पर शोध लगातार आगे बढ़ रहा है। मौजूदा निष्कर्ष चिंता जरूर पैदा करते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति में डिमेंशिया होने का कारण केवल प्रदूषण को नहीं माना जा सकता। इसके लिए अन्य जोखिम कारकों और चिकित्सकीय परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

प्रदूषण बढ़ने पर सुबह की सैर के दौरान क्या करें?

सुबह टहलने और व्यायाम करने से शारीरिक सक्रियता बनी रहती है, हृदय स्वास्थ्य को लाभ मिल सकता है और तनाव कम करने में भी मदद मिल सकती है। लेकिन हवा की गुणवत्ता खराब होने पर बाहर व्यायाम करने का फैसला सोच-समझकर करना चाहिए। खासकर दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में, जहां सर्दियों के दौरान कई बार प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है, रोजाना की दिनचर्या में कुछ बदलाव उपयोगी हो सकते हैं।

1. हवा की गुणवत्ता देखकर ही बाहर निकलें: सुबह की सैर पर जाने से पहले अपने इलाके का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) जांच लें। यदि प्रदूषण बहुत अधिक है, तो खुले में लंबे समय तक टहलने या दौड़ने से बचें। केवल समय देखकर यह न मानें कि सुबह की हवा हमेशा साफ होती है।

2. अधिक यातायात वाली सड़कों से दूरी रखें: व्यस्त सड़कों और वाहनों के धुएं वाले इलाकों में प्रदूषकों का संपर्क ज्यादा हो सकता है। बाहर जाना जरूरी हो तो कम यातायात वाले रास्ते और हरियाली वाले स्थान चुनना बेहतर हो सकता है। हालांकि, किसी पार्क में होने भर से हवा पूरी तरह साफ होने की गारंटी नहीं होती।

3. जरूरत पड़ने पर घर के अंदर व्यायाम करें: प्रदूषण का स्तर अधिक होने पर घर के भीतर हल्की एक्सरसाइज, स्ट्रेचिंग या अन्य सुरक्षित गतिविधियां की जा सकती हैं। इससे बाहरी प्रदूषकों के संपर्क को कम करने में मदद मिल सकती है। व्यायाम की तीव्रता अपनी उम्र और स्वास्थ्य के अनुसार रखें।

4. सही फिटिंग वाला N95 मास्क इस्तेमाल करें: यदि प्रदूषित वातावरण में बाहर जाना जरूरी हो, तो अच्छी तरह फिट होने वाला प्रमाणित N95 मास्क कुछ सूक्ष्म कणों के संपर्क को कम करने में मदद कर सकता है। मास्क का चेहरे पर ठीक से फिट होना जरूरी है। यह सभी प्रदूषकों से पूरी सुरक्षा नहीं देता और न ही खराब हवा में लंबे समय तक रहने को सुरक्षित बना देता है।

5. नाक की परेशानी को नजरअंदाज न करें: प्रदूषण के कारण कुछ लोगों को नाक में जलन, सूखापन या साइनस से जुड़ी शिकायतें हो सकती हैं। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से सलाइन नेजल वॉश का उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए साफ, सुरक्षित पानी और उत्पाद के निर्देशों का पालन करना जरूरी है। लगातार परेशानी होने पर चिकित्सकीय सलाह लें।

बुजुर्गों और बीमार लोगों को ज्यादा सावधानी की जरूरत

बुजुर्गों, बच्चों और पहले से सांस या हृदय संबंधी बीमारी से जूझ रहे लोगों को खराब वायु गुणवत्ता के दौरान विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। अस्थमा, सीओपीडी और हृदय रोग से पीड़ित लोगों में प्रदूषण के कारण लक्षण बढ़ सकते हैं। ऐसे लोगों को बाहर की गतिविधियों का समय सीमित रखने और अपनी निर्धारित दवाएं नियमित रूप से लेने के बारे में डॉक्टर की सलाह का पालन करना चाहिए।

यदि प्रदूषण के दौरान सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, असामान्य कमजोरी या दूसरे गंभीर लक्षण दिखाई दें, तो उन्हें केवल मौसम का असर समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जरूरत के अनुसार तुरंत चिकित्सा सहायता लें।

इसके साथ ही, याददाश्त में लगातार गिरावट, रोजमर्रा के कामों में कठिनाई या सोचने-समझने की क्षमता में बदलाव दिखाई देने पर भी डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है। ऐसे लक्षणों के कई कारण हो सकते हैं और समय पर जांच से उचित कारण का पता लगाने में मदद मिल सकती है।

प्रदूषण से बचाव व्यक्तिगत ही नहीं, सामूहिक जिम्मेदारी भी

वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को कम करने के लिए व्यक्तिगत सावधानियों के साथ-साथ प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण भी आवश्यक है। वाहनों से निकलने वाले उत्सर्जन को कम करना, औद्योगिक प्रदूषण पर निगरानी रखना, कचरा और अन्य सामग्री खुले में जलाने से बचना तथा स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

PM2.5 और डिमेंशिया के संबंध पर सामने आए वैज्ञानिक निष्कर्ष यह संकेत देते हैं कि साफ हवा का महत्व केवल सांस संबंधी बीमारियों से बचने तक सीमित नहीं है। मस्तिष्क और याददाश्त की सेहत के लिहाज से भी प्रदूषण को गंभीरता से लेने की जरूरत है। हालांकि, किसी एक अध्ययन या समीक्षा के आधार पर व्यक्तिगत जोखिम का सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

ऐसे में सुबह की सैर पूरी तरह छोड़ देना हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं है। बेहतर तरीका यह है कि हवा की गुणवत्ता पर नजर रखी जाए, प्रदूषण बढ़ने पर बाहर व्यायाम कम किया जाए और जरूरत के अनुसार घर के भीतर विकल्प अपनाए जाएं। साफ हवा में नियमित शारीरिक गतिविधि स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकती है, लेकिन प्रदूषित वातावरण में सावधानी बरतना भी उतना ही जरूरी है।