ग्लेशियर फटा तो मचेगी भारी तबाही! नेपाल के बाद भारत के इस राज्य को लेकर क्यों बढ़ी चिंता

ग्लेशियर फटा तो मचेगी भारी तबाही! नेपाल के बाद भारत के इस राज्य को लेकर क्यों बढ़ी चिंता

नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले लोगों और वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी के आसपास अचानक आई बाढ़ ने देखते ही देखते बड़े इलाके को अपनी चपेट में ले लिया। इस आपदा में सैकड़ों लोग लापता बताए गए, जिनमें भारत से नेपाल पहुंचे पर्यटक भी शामिल थे। कई जगहों पर सड़कें, पुल और हाइड्रोपावर परियोजनाएं बाढ़ के तेज बहाव में बह गईं। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, इस घटना के पीछे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियर से बनी झील के अचानक फटने जैसी घटना को माना जा रहा है।

नेपाल की इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि हिमालय के दूसरे हिस्से कितने सुरक्षित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों और ऊंचाई वाले इलाकों में बनी झीलों पर बढ़ता दबाव आने वाले समय में ऐसी घटनाओं का खतरा बढ़ा सकता है। भारत में इस संदर्भ में उत्तराखंड को भी बेहद संवेदनशील माना जाता है। यहां ऊंचे पहाड़, ग्लेशियर, नदियां, भूस्खलन वाले क्षेत्र और बड़ी संख्या में जलविद्युत परियोजनाएं मौजूद हैं।

नेपाल की घटना ने क्यों बढ़ाई चिंता?

हिमालय का बड़ा हिस्सा भारत, नेपाल और तिब्बत के इलाकों में फैला हुआ है। इस पूरे क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियां कई मायनों में एक-दूसरे से मिलती-जुलती हैं। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने से कई झीलें बनती हैं। यदि किसी झील का प्राकृतिक या बर्फ से बना बांध अचानक टूट जाए तो लाखों-करोड़ों लीटर पानी बहुत कम समय में नीचे की ओर दौड़ सकता है।

इस तरह की बाढ़ सामान्य बारिश या नदी में पानी बढ़ने से अलग होती है। इसमें पानी के साथ बर्फ, पत्थर, मलबा और मिट्टी भी तेज गति से नीचे आती है। यही वजह है कि रास्ते में आने वाली सड़कें, पुल, मकान और दूसरी संरचनाएं कुछ ही मिनटों में क्षतिग्रस्त हो सकती हैं।

नेपाल के रसुवा में हुई घटना ने इसी खतरे की गंभीरता को सामने रखा है। भोटेकोशी नदी के आसपास अचानक बढ़े पानी ने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया। कई लोग लापता हुए और राहत एवं बचाव एजेंसियों को मुश्किल परिस्थितियों में काम करना पड़ा। इस घटना के बाद हिमालयी राज्यों में मौजूद ग्लेशियल झीलों और संवेदनशील नदी घाटियों पर निगरानी को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

उत्तराखंड क्यों माना जाता है संवेदनशील?

भारत में उत्तराखंड हिमालयी आपदाओं के लिहाज से सबसे संवेदनशील राज्यों में गिना जाता है। राज्य का बड़ा हिस्सा पहाड़ी है और यहां कई महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम होता है। गंगा की प्रमुख सहायक नदियां भी हिमालय के इन्हीं ऊंचाई वाले इलाकों से निकलती हैं।

उत्तराखंड में ग्लेशियर, बर्फ से ढके पहाड़, ऊंची झीलें और संकरी नदी घाटियां मौजूद हैं। कई स्थानों पर पहाड़ों की ढलान बेहद खड़ी है। ऐसे में अचानक होने वाली भारी बारिश, बादल फटने, ग्लेशियर टूटने या झील का पानी बाहर आने जैसी घटनाएं नीचे बसे इलाकों के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं।

राज्य पहले भी ऐसी आपदाओं का सामना कर चुका है। वर्ष 2013 में केदारनाथ क्षेत्र में आई विनाशकारी आपदा ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इसके बाद वर्ष 2021 में चमोली जिले में ग्लेशियर से जुड़ी घटना के कारण अचानक तेज बहाव आया और बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ। इस हादसे में जान-माल के साथ-साथ जलविद्युत परियोजनाओं को भी भारी क्षति पहुंची थी।

इन घटनाओं ने यह साफ किया कि हिमालयी क्षेत्रों में आपदा का खतरा केवल मानसून की भारी बारिश तक सीमित नहीं है। पहाड़ों में बर्फ और ग्लेशियरों से जुड़ी घटनाएं भी अचानक बड़ी त्रासदी का रूप ले सकती हैं।

उत्तराखंड में कैसे की जाती है तैयारी?

ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत करने पर लगातार जोर दिया जा रहा है। संवेदनशील इलाकों में प्रशासन और आपदा राहत एजेंसियों को मौसम तथा नदियों के जलस्तर पर नजर रखने के निर्देश दिए जाते हैं।

नेपाल में हुई घटना के बाद सीमावर्ती इलाकों और नदी घाटियों में निगरानी बढ़ाने की जरूरत और ज्यादा महसूस की गई है। चंपावत और पिथौरागढ़ जैसे जिलों में नदियों और संवेदनशील इलाकों पर विशेष नजर रखी जाती है। शारदा समेत कई नदियों के किनारे जलस्तर में होने वाले बदलाव को लगातार मॉनिटर किया जाता है।

यदि किसी नदी का पानी अचानक तेजी से बढ़ता है तो प्रशासन को निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सतर्क करने का प्रयास किया जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि खतरा बढ़ने से पहले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके।

सेंसर और अलर्ट सिस्टम बन रहे हैं मददगार

पहाड़ी इलाकों में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल भी बढ़ाया जा रहा है। संवेदनशील झीलों, ग्लेशियरों और नदी क्षेत्रों की निगरानी के लिए सेंसर, मौसम स्टेशन और दूसरी तकनीकी प्रणालियों का उपयोग किया जा रहा है।

इनका सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसी क्षेत्र में पानी का स्तर तेजी से बदलने या मौसम में अचानक गंभीर बदलाव आने पर इसकी जानकारी जल्दी मिल सकती है। इसके बाद संबंधित अधिकारियों को अलर्ट किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को चेतावनी जारी की जा सकती है।

कई जगहों पर ऑटोमेटिक सिस्टम और संचार व्यवस्था विकसित करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। सायरन, मोबाइल संदेश और स्थानीय प्रशासन के जरिए लोगों तक सूचना पहुंचाने की कोशिश की जाती है। पहाड़ों में आपदा के दौरान हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। इसलिए शुरुआती चेतावनी मिलने से लोगों को घरों और खतरनाक इलाकों से बाहर निकलने का अतिरिक्त समय मिल सकता है।

स्थानीय लोग ही बनते हैं पहली बचाव टीम

उत्तराखंड की आपदा तैयारियों में स्थानीय लोगों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। पहाड़ी गांवों में रहने वाले लोग अपने इलाके की भौगोलिक परिस्थितियों से अच्छी तरह परिचित होते हैं। उन्हें पता होता है कि कौन सा रास्ता सुरक्षित है, किस इलाके में भूस्खलन का खतरा रहता है और आपात स्थिति में लोग कहां शरण ले सकते हैं।

इसी वजह से कई स्थानों पर स्थानीय युवाओं और महिलाओं को आपदा प्रबंधन तथा प्राथमिक राहत-बचाव की ट्रेनिंग दी जाती है। इसका मकसद यह है कि बड़ी राहत एजेंसियों के पहुंचने से पहले स्थानीय स्तर पर तत्काल मदद शुरू की जा सके।

बाढ़, भूस्खलन या अचानक आए तेज पानी की स्थिति में सड़कें बंद हो सकती हैं। पुल टूट सकते हैं और संचार व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। ऐसे समय में स्थानीय प्रशिक्षित लोग फर्स्ट रिस्पॉन्डर की भूमिका निभा सकते हैं।

सेना, NDRF और SDRF भी रहती हैं तैयार

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में किसी बड़े हादसे के बाद केवल स्थानीय प्रशासन के भरोसे राहत अभियान चलाना मुश्किल हो सकता है। इसलिए आपदा के समय SDRF, NDRF और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका अहम हो जाती है।

राहत एवं बचाव टीमों को कठिन पहाड़ी इलाकों में काम करने के लिए विशेष उपकरण उपलब्ध कराए जाते हैं। संचार व्यवस्था टूटने की स्थिति में सैटेलाइट फोन जैसी तकनीक महत्वपूर्ण साबित होती है। लाइफ-सपोर्ट उपकरण, बचाव सामग्री और अन्य संसाधनों की मदद से दुर्गम क्षेत्रों में फंसे लोगों तक पहुंचने की कोशिश की जाती है।

आपदा के दौरान सेना और दूसरी एजेंसियों के साथ तालमेल भी महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि कई बार सड़क संपर्क पूरी तरह टूट जाता है। ऐसे में वैकल्पिक रास्तों और विशेष बचाव अभियानों की जरूरत पड़ सकती है।

सड़क और पुलों की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती

हिमालयी राज्यों में आपदा का असर केवल लोगों के घरों तक सीमित नहीं रहता। सड़कें और पुल टूटने से पूरा इलाका बाकी दुनिया से कट सकता है। यही कारण है कि भविष्य में पहाड़ी इलाकों में बुनियादी ढांचे को प्राकृतिक आपदाओं को ध्यान में रखकर तैयार करना जरूरी माना जा रहा है।

अचानक आने वाले तेज पानी और मलबे का दबाव सामान्य बाढ़ से काफी अधिक हो सकता है। इसलिए नदी किनारे बनने वाले पुल, सड़कें और दूसरी संरचनाएं तैयार करते समय स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और संभावित बाढ़ के खतरे को ध्यान में रखना जरूरी है।

नेपाल की त्रासदी भारत के लिए भी चेतावनी

नेपाल की घटना ने यह संदेश एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्र में आपदा की तैयारी केवल घटना होने के बाद शुरू नहीं की जा सकती। ग्लेशियरों, ऊंचाई वाली झीलों, नदियों और मौसम में होने वाले बदलावों पर लगातार निगरानी जरूरी है।

उत्तराखंड पहले ही कई बड़ी प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर चुका है। इसलिए यहां रहने वाले लोगों के लिए आपदा से बचाव की जानकारी, समय पर चेतावनी और स्थानीय स्तर पर तैयारी बेहद महत्वपूर्ण है।

विशेषज्ञों के लिए भी नेपाल की घटना एक महत्वपूर्ण संकेत है कि हिमालय के संवेदनशील क्षेत्रों में शुरुआती चेतावनी प्रणाली और वैज्ञानिक निगरानी को और मजबूत किया जाना चाहिए। क्योंकि पहाड़ों में आपदा कई बार बिना ज्यादा समय दिए सामने आती है।

ऐसे में उत्तराखंड के लिए सबसे बड़ी सुरक्षा केवल राहत और बचाव की क्षमता नहीं, बल्कि खतरे को पहले पहचानना, लोगों को समय रहते चेतावनी देना और स्थानीय समुदाय को तैयार रखना है। नेपाल में हुई त्रासदी के बाद हिमालयी राज्यों के लिए यही सबसे बड़ा सबक माना जा रहा है।