जलझूलनी एकादशी पर बन रहा खास संयोग: विष्णु पूजा के साथ शाम को तुलसी दीपक और मंगलवार के ये उपाय जरूर करें

जलझूलनी एकादशी पर बन रहा खास संयोग: विष्णु पूजा के साथ शाम को तुलसी दीपक और मंगलवार के ये उपाय जरूर करें

आज मंगलवार, 22 सितंबर को जलझूलनी एकादशी मनाई जा रही है। इसे डोल ग्यारस के नाम से भी जाना जाता है। इस बार एकादशी तिथि मंगलवार के दिन पड़ रही है और गणेश उत्सव का समय भी चल रहा है। ऐसे में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आज भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण, गणेश जी और मंगल ग्रह से जुड़े पूजन किए जा सकते हैं। शाम के समय तुलसी पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है।

जलझूलनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं। वहीं मंगलवार होने के कारण हनुमान जी और मंगल ग्रह की आराधना भी की जाती है। ज्योतिषीय परंपराओं में मंगल ग्रह से जुड़ी परेशानियों के लिए मसूर की दाल का दान और शिवलिंग पूजन जैसे उपाय बताए गए हैं।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार, आज पूजा की शुरुआत गणेश जी के पूजन से की जा सकती है। इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करें। शाम को सूर्यास्त के बाद तुलसी के सामने दीपक जलाने और मंत्र जाप की परंपरा भी है।

सबसे पहले करें गणेश जी की पूजा

धार्मिक मान्यता के अनुसार किसी भी शुभ पूजा से पहले भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है। इसलिए जलझूलनी एकादशी पर भी सबसे पहले गणेश जी की पूजा की जा सकती है।

गणेश जी को साफ जल अर्पित करें। इसके बाद दूर्वा, फूल और हार चढ़ाएं। पूजा के दौरान धूप और दीप जलाकर आरती करें। भगवान को मोदक या अपनी श्रद्धा के अनुसार मिठाई का भोग लगाया जा सकता है। गणेश जी की पूजा करते समय ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का जाप करने की परंपरा है।

गणेश पूजन के बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना शुरू की जा सकती है। चूंकि एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है, इसलिए इस दिन विष्णु पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है।

भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का करें पूजन

जो श्रद्धालु एकादशी का व्रत रखते हैं, वे गणेश पूजन के बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा कर सकते हैं। पूजा शुरू करने से पहले व्रत का संकल्प लेने की परंपरा है। व्रत रखने वाले व्यक्ति अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार कर सकते हैं।

पूजा में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पंचामृत से अभिषेक करने की परंपरा है। पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और मिश्री को मिलाकर तैयार किया जाता है। इसके बाद भगवान को फूल, हार और वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। पूजा में लाल या पीले रंग के वस्त्र अर्पित करने की परंपरा भी बताई गई है।

भगवान विष्णु की आराधना करते समय ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप किया जा सकता है। पूजा समाप्त होने पर भगवान से अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगें और परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करें।

एकादशी के दिन केवल किसी एक देवता की पूजा तक सीमित रहने के बजाय श्रद्धालु अपने इष्टदेव का भी ध्यान कर सकते हैं। धार्मिक परंपरा में इस दिन भगवान विष्णु के नाम का स्मरण, भजन और धार्मिक पाठ करने की सलाह दी जाती है।

अगले दिन इस तरह पूरा होता है व्रत

एकादशी व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए द्वादशी का दिन भी महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार अगले दिन सुबह भगवान विष्णु की दोबारा पूजा की जाती है। इसके बाद जरूरतमंद व्यक्ति या परिवार को भोजन कराया जाता है।

भोजन या दान-पुण्य करने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। हालांकि व्रत और पारण की सही विधि अलग-अलग परंपराओं और पंचांग के अनुसार अलग हो सकती है, इसलिए स्थानीय पंचांग में दिए गए समय का ध्यान रखना उचित माना जाता है।

शाम को तुलसी के सामने जलाएं दीपक

जलझूलनी एकादशी पर तुलसी पूजा का भी विशेष धार्मिक महत्व बताया जाता है। भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा में तुलसी पत्र अर्पित करने की परंपरा है। श्रीकृष्ण को भोग लगाते समय तुलसी का पत्ता रखने की धार्मिक मान्यता है।

शाम को सूर्यास्त के बाद तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जलाया जा सकता है। तुलसी को फूल, हार और लाल वस्त्र अर्पित करने की परंपरा भी कई स्थानों पर देखने को मिलती है। इसके बाद तुलसी के सामने बैठकर मंत्र का जाप किया जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार सूर्यास्त के बाद तुलसी के पौधे में पानी नहीं डालना चाहिए और उस समय तुलसी के पत्तों को तोड़ने से भी बचना चाहिए। पूजा के दौरान तुलसी नामाष्टक का पाठ किया जा सकता है।

तुलसी नामाष्टक में तुलसी के विभिन्न स्वरूपों और उनके धार्मिक महत्व का स्मरण किया जाता है। इसकी शुरुआत ‘वृंदा, वृंदावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी’ जैसे नामों से होती है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार इसका पाठ कर सकते हैं।

मंत्र जाप के लिए 108 बार की संख्या बताई जाती है। जिन लोगों के पास अधिक समय नहीं है, वे 11 बार भी जाप कर सकते हैं। इसके बाद तुलसी के सामने प्रार्थना करके परिवार की सुख-समृद्धि और शांति की कामना की जा सकती है।

मंगलवार होने से मंगल ग्रह की पूजा भी करें

इस बार जलझूलनी एकादशी मंगलवार को पड़ रही है। ज्योतिषीय परंपरा में मंगलवार का संबंध मंगल ग्रह से माना जाता है। जिन लोगों की कुंडली में मंगल से संबंधित दोष बताए गए हैं, उन्हें मंगलवार के दिन मंगल की पूजा करने की सलाह दी जाती है।

मंगल ग्रह की पूजा के लिए शिवलिंग का पूजन करने की परंपरा है। शिवलिंग पर लाल गुलाल, लाल फूल और मसूर की दाल अर्पित की जा सकती है। इसके साथ ही तांबे के पात्र से जल चढ़ाने और दीपक जलाने की विधि भी बताई गई है।

पूजा के दौरान ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप किया जा सकता है। इसके बाद जरूरतमंद व्यक्ति को मसूर की दाल का दान करने की परंपरा है। मान्यता है कि मंगलवार के दिन इस प्रकार का दान मंगल ग्रह से संबंधित शांति उपायों में शामिल किया जाता है।

हालांकि कुंडली से जुड़े किसी भी विशेष उपाय को व्यक्तिगत रूप से अपनाने से पहले योग्य ज्योतिषी से सलाह लेना उचित हो सकता है, क्योंकि अलग-अलग कुंडलियों में ग्रहों की स्थिति अलग होती है।

हनुमान जी की आराधना भी करें

मंगलवार के दिन भगवान हनुमान की पूजा की भी परंपरा है। इसलिए एकादशी के इस संयोग में श्रद्धालु हनुमान मंदिर जाकर दर्शन कर सकते हैं या घर पर हनुमान जी की पूजा कर सकते हैं।

हनुमान जी के सामने दीपक जलाकर हनुमान चालीसा का पाठ किया जा सकता है। इसके साथ ही बजरंगबली का स्मरण करके अपनी श्रद्धा के अनुसार प्रार्थना की जा सकती है।

इस तरह आज की पूजा में गणेश जी से शुरुआत करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना, शाम को तुलसी पूजा तथा मंगलवार के कारण मंगल और हनुमान जी की पूजा को शामिल किया जा सकता है।

पूजा में रखें इन बातों का ध्यान

जलझूलनी एकादशी पर व्रत रखने वाले लोगों को अपनी सेहत का ध्यान रखना चाहिए। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं या किसी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति के लिए उपवास करना जरूरी नहीं है। स्वास्थ्य के अनुसार भोजन करना अधिक महत्वपूर्ण है।

पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री उपलब्ध न हो तो केवल जल, फूल और दीपक के साथ भी श्रद्धा से पूजा की जा सकती है। धार्मिक कर्मकांड में आस्था और परंपरा के अनुसार विधि अलग-अलग हो सकती है।

एकादशी के दिन भगवान विष्णु का नाम स्मरण, धार्मिक पाठ, दान-पुण्य और जरूरतमंद लोगों की सहायता को भी शुभ कार्यों में शामिल किया जाता है। इसलिए पूजा के साथ जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना या अपनी क्षमता के अनुसार उपयोगी वस्तुओं का दान करना भी किया जा सकता है।

जलझूलनी एकादशी पर श्रद्धालु दिनभर भगवान विष्णु का ध्यान कर सकते हैं और शाम को तुलसी के सामने दीपक जलाकर पूजा पूरी कर सकते हैं। मंगलवार के संयोग के कारण गणेश जी, मंगल ग्रह और हनुमान जी से जुड़े पूजन भी अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार किए जा सकते हैं।