अमेरिका ने एक बार फिर अपनी व्यापार नीति को लेकर बड़ा फैसला लेते हुए कई देशों के लिए नए आयात शुल्क (टैरिफ) लागू करने का ऐलान किया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने भारत सहित 17 देशों से अमेरिका आने वाले कुछ उत्पादों पर 10 प्रतिशत का नया टैरिफ लगाने की घोषणा की है। अमेरिकी सरकार का कहना है कि इन देशों से आने वाले कुछ सामानों के निर्माण में कथित तौर पर जबरन मजदूरी (Forced Labor) का इस्तेमाल किया गया है। इसी आधार पर यह कार्रवाई की गई है। यह फैसला शुक्रवार रात से प्रभावी होगा और आने वाले समय में इसके दायरे को और बढ़ाया जा सकता है।
इस नए कदम को ट्रंप प्रशासन की सख्त व्यापार नीति का हिस्सा माना जा रहा है। व्हाइट हाउस का कहना है कि अमेरिका ऐसे उत्पादों को अपने बाजार में प्रवेश नहीं देना चाहता जिनके निर्माण में श्रमिकों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ हो। इसी उद्देश्य से विभिन्न देशों के आयात पर नई शुल्क व्यवस्था लागू की जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक यह केवल शुरुआती चरण है और भविष्य में अन्य देशों या उत्पादों पर भी अतिरिक्त टैरिफ लगाए जा सकते हैं।
भारत के लिए राहत की बात यह रही कि उसे अपेक्षाकृत कम टैरिफ वाली श्रेणी में रखा गया है। शुरुआती विचार-विमर्श के दौरान भारत पर 12.5 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का प्रस्ताव सामने आया था, लेकिन दोनों देशों के बीच श्रम मानकों और लेबर प्रैक्टिस को लेकर हुई बातचीत के बाद अमेरिका ने भारत को 10 प्रतिशत वाले समूह में शामिल कर लिया। इससे भारतीय निर्यातकों को संभावित रूप से बड़ी राहत मिली है, क्योंकि ऊंचे टैरिफ का सीधा असर उनकी प्रतिस्पर्धा पर पड़ सकता था।
जानकारी के अनुसार अमेरिका ने कुल 60 व्यापारिक साझेदार देशों के लिए नई टैरिफ व्यवस्था तैयार की है। इनमें कुछ देशों पर 10 प्रतिशत और कुछ पर 12.5 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाया जाएगा। भारत उन 17 देशों में शामिल है जिन्हें कम दर वाले स्लैब में रखा गया है। इस समूह में ब्रिटेन, कनाडा, इंडोनेशिया, मेक्सिको और बांग्लादेश जैसे देश भी शामिल हैं। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि जिन देशों ने श्रम सुधारों की दिशा में सकारात्मक पहल दिखाई है, उन्हें अपेक्षाकृत कम दर का लाभ दिया गया है।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) के कार्यालय ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय केवल व्यापारिक संतुलन से जुड़ा नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा को बढ़ावा देना भी है। अमेरिका का दावा है कि वह लंबे समय से ऐसे उत्पादों के आयात पर सख्ती बरतता आया है जिनका संबंध जबरन मजदूरी से होता है। अब वह चाहता है कि उसके व्यापारिक साझेदार भी इसी प्रकार के मानकों को अपनाएं और ऐसी वस्तुओं के निर्यात पर रोक लगाने के लिए ठोस कदम उठाएं।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि अमेरिका में लगभग एक सदी से ऐसे सामानों के आयात पर प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था मौजूद है जो मजबूर श्रम के जरिए बनाए गए हों। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब अन्य देशों को भी इसी दिशा में गंभीरता से काम करना चाहिए। उनके मुताबिक कई देशों ने इस विषय पर अमेरिका के साथ सकारात्मक सहयोग किया है और इसी वजह से उन्हें कम टैरिफ वाली श्रेणी में रखा गया है। ग्रीर ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में ये देश अपने स्तर पर प्रभावी निगरानी और कार्यान्वयन सुनिश्चित करेंगे।
नई टैरिफ व्यवस्था शुक्रवार रात 12 बजे से लागू हो जाएगी। इसके बाद संबंधित देशों से अमेरिका पहुंचने वाले उत्पादों पर नई दरों के अनुसार शुल्क वसूला जाएगा। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इससे वैश्विक सप्लाई चेन में पारदर्शिता बढ़ेगी और कंपनियों पर यह दबाव बनेगा कि वे अपने उत्पादन में अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का पालन करें।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब हाल ही में ट्रंप प्रशासन को अस्थायी टैरिफ व्यवस्था को लेकर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में कानूनी चुनौती का सामना करना पड़ा था। अदालत में झटका मिलने के बाद अब प्रशासन ने नई कानूनी व्यवस्था के तहत टैरिफ लागू करने का रास्ता अपनाया है। माना जा रहा है कि इस कदम के जरिए ट्रंप प्रशासन अपनी व्यापारिक नीति को और मजबूत आधार देने की कोशिश कर रहा है।
इन नए आयात शुल्कों को लागू करने के लिए अमेरिका ने ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 का सहारा लिया है। यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार देता है जो अमेरिका के अनुसार अनुचित, भेदभावपूर्ण या गैर-निष्पक्ष व्यापारिक गतिविधियों में शामिल हों। इसी प्रावधान के तहत आयात शुल्क बढ़ाने, व्यापारिक प्रतिबंध लगाने या अन्य दंडात्मक कदम उठाए जा सकते हैं।
धारा 301 का उपयोग ट्रंप अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी कर चुके हैं। उस समय चीन से आयातित कई उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाया गया था, जिसे लेकर दोनों देशों के बीच लंबा व्यापारिक विवाद भी देखने को मिला। हालांकि कानूनी चुनौतियों के बावजूद वह नीति काफी हद तक प्रभावी रही थी। अब एक बार फिर इसी प्रावधान के जरिए नए देशों पर कार्रवाई की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल घोषित 10 प्रतिशत टैरिफ अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय पहले ही 16 अन्य देशों के खिलाफ अलग से जांच शुरू कर चुका है। इन देशों पर आरोप है कि उन्होंने जरूरत से अधिक उत्पादन कर वैश्विक बाजार में कीमतों को प्रभावित किया, जिससे अमेरिकी उद्योगों को प्रतिस्पर्धा में नुकसान उठाना पड़ा। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो इन देशों पर भी अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है।
बताया जा रहा है कि जिन 16 देशों की जांच चल रही है, उनसे अमेरिका अपने कुल आयात का लगभग 70 प्रतिशत प्राप्त करता है। ऐसे में यदि भविष्य में इन पर भी अतिरिक्त टैरिफ लगाए जाते हैं तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, सप्लाई चेन और कई उद्योगों पर देखने को मिल सकता है। फिलहाल जांच पूरी नहीं हुई है, इसलिए अंतिम निर्णय बाद में लिया जाएगा।
भारत के संदर्भ में देखा जाए तो 10 प्रतिशत टैरिफ निश्चित रूप से अतिरिक्त लागत बढ़ा सकता है, लेकिन 12.5 प्रतिशत की तुलना में यह अपेक्षाकृत कम प्रभाव डालेगा। व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत श्रम मानकों और निर्यात प्रक्रियाओं को लेकर अमेरिका के साथ सहयोग बनाए रखता है तो आगे भी राहत मिलने की संभावना बनी रह सकती है। दूसरी ओर भारतीय निर्यातकों को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके उत्पादों की सप्लाई चेन अंतरराष्ट्रीय श्रम नियमों के अनुरूप हो ताकि भविष्य में किसी अतिरिक्त कार्रवाई से बचा जा सके।
अमेरिका का यह फैसला केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। ट्रंप प्रशासन लगातार यह संकेत दे रहा है कि व्यापारिक संबंधों में अब श्रमिक अधिकार, उत्पादन की पारदर्शिता और निष्पक्ष व्यापार जैसे मुद्दों को भी प्रमुखता दी जाएगी। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अन्य देश इन नए नियमों पर किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं और क्या अमेरिका वास्तव में आगे और देशों या उत्पादों पर भी अतिरिक्त टैरिफ लगाने का फैसला करता है। फिलहाल भारत सहित 17 देशों के लिए 10 प्रतिशत की नई आयात शुल्क व्यवस्था लागू होने जा रही है, जबकि व्यापक जांच और संभावित नए प्रतिबंधों पर दुनिया की नजर बनी हुई है।




