तालिबान के पांच साल: अफगानिस्तान में बदले समीकरणों के बीच भारत क्यों बन रहा है अहम साझेदार

तालिबान के पांच साल: अफगानिस्तान में बदले समीकरणों के बीच भारत क्यों बन रहा है अहम साझेदार

15 अगस्त 2021 को तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर अफगानिस्तान की सत्ता अपने हाथों में ले ली थी। इसके साथ ही अमेरिका के नेतृत्व में करीब दो दशक तक चले सैन्य अभियान और राष्ट्र निर्माण की कोशिशों का अंत हो गया। अब तालिबान शासन को पांच साल पूरे हो चुके हैं। इस अवधि में अफगानिस्तान ने राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक स्तर पर कई बड़े बदलाव देखे हैं। तालिबान सत्ता में बना हुआ है, लेकिन देश को स्थिर, समृद्ध और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य बनाने की उसकी कोशिशें अभी भी अधूरी हैं।

इन पांच वर्षों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अफगानिस्तान के साथ भारत के संबंधों ने नई दिशा पकड़ी है। भारत ने तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी, लेकिन उसके साथ संपर्क भी पूरी तरह खत्म नहीं किया। नई दिल्ली ने मानवीय सहायता, विकास सहयोग और राजनयिक संवाद के जरिए अफगानिस्तान में अपनी मौजूदगी बनाए रखी। बदलते क्षेत्रीय समीकरणों के बीच यही नीति अब भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण साबित हो रही है।

सत्ता पर पकड़, लेकिन चुनौतियां बरकरार

तालिबान ने सैन्य ताकत के जरिए सत्ता हासिल कर ली, लेकिन शासन चलाना उसके लिए कहीं अधिक जटिल साबित हुआ। सत्ता संभालने के बाद उसे आर्थिक संकट, बेरोजगारी, मानवीय जरूरतों, विदेशी निवेश की कमी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

तालिबान की नीतियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताएं भी कम नहीं हुई हैं। खासकर महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी पर लगाए गए प्रतिबंधों ने उसकी वैश्विक स्वीकार्यता को प्रभावित किया है। नागरिक स्वतंत्रताओं और मानवाधिकारों को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं।

इसी वजह से तालिबान को व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल नहीं हो सकी। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि उसने दुनिया से पूरी तरह दूरी बना ली है। सत्ता में बने रहने के लिए तालिबान अब दूसरे देशों के साथ व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। उसकी विदेश नीति में यह व्यावहारिकता सत्ता की जरूरतों से पैदा हुई है।

पाकिस्तान के साथ रिश्तों में आया बदलाव

तालिबान की वापसी के समय पाकिस्तान को उम्मीद थी कि काबुल में नई सरकार उसके लिए रणनीतिक रूप से लाभकारी साबित होगी। लेकिन पांच साल बाद तस्वीर काफी अलग नजर आती है। दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर तनाव बढ़ा है।

डूरंड रेखा को लेकर विवाद और पाकिस्तान विरोधी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी TTP की गतिविधियां इस तनाव की प्रमुख वजहों में हैं। पाकिस्तान के लिए अफगान सीमा से जुड़ी सुरक्षा चुनौती लगातार गंभीर बनी हुई है। व्यापार और सीमा संबंधी विवादों ने भी दोनों देशों के रिश्तों में खटास बढ़ाई है।

अफगानिस्तान भी अपनी विदेश नीति को केवल पाकिस्तान पर निर्भर रखने के पक्ष में नहीं दिखता। वह दूसरे क्षेत्रीय देशों के साथ संबंध बढ़ाकर अपने लिए विकल्प तैयार करना चाहता है। यही बदलाव भारत के लिए भी नए अवसर पैदा करता है।

चीन की उम्मीदें भी पूरी तरह नहीं हुईं

तालिबान के सत्ता में आने के बाद चीन से भी अफगानिस्तान में बड़े आर्थिक निवेश की उम्मीद जताई गई थी। अफगानिस्तान के खनिज संसाधनों और उसकी रणनीतिक स्थिति को देखते हुए चीन के लिए यहां आर्थिक और भू-राजनीतिक संभावनाएं मौजूद थीं।

फिर भी पिछले पांच वर्षों में चीन की ओर से अपेक्षित स्तर पर निवेश देखने को नहीं मिला। अस्थिर सुरक्षा वातावरण, कमजोर संस्थागत ढांचा, आर्थिक अनिश्चितता और निवेश से जुड़े जोखिम इसके प्रमुख कारण हैं। चीन के सामने अपनी कई अन्य रणनीतिक प्राथमिकताएं भी हैं, जिनमें अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्धा और एशिया-प्रशांत क्षेत्र से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।

ऐसे माहौल में अफगानिस्तान को ऐसे साझेदारों की आवश्यकता है जो केवल निवेश ही नहीं, बल्कि लंबे समय से उसके विकास और संस्थागत निर्माण से जुड़े रहे हों। इस संदर्भ में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

भारत ने तालिबान से दूरी और संवाद के बीच रास्ता चुना

तालिबान की वापसी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वह अफगानिस्तान के साथ अपने पुराने संबंधों को कैसे बनाए रखे। नई दिल्ली ने न तो तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता दी और न ही अफगानिस्तान से पूरी तरह संबंध तोड़े।

भारत ने व्यवहारिक कूटनीति का रास्ता अपनाया। इसे broadly ऐसी नीति के रूप में देखा जा सकता है जिसमें मान्यता दिए बिना संवाद और सहयोग जारी रखा जाता है। भारत ने अफगान जनता के साथ अपने संबंधों को प्राथमिकता दी और मानवीय सहायता पहुंचाने का सिलसिला जारी रखा।

भारत की ओर से गेहूं, दवाइयां, टीके और अन्य जरूरी सामग्री भेजी गई। जून 2022 में काबुल में भारतीय तकनीकी मिशन को फिर से सक्रिय किया गया। इससे यह संदेश गया कि भारत अफगानिस्तान की जनता और अपने दीर्घकालिक हितों से पीछे हटने वाला नहीं है।

दो दशक की भारतीय भूमिका बनी आधार

अफगानिस्तान में भारत की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए 2001 से 2021 के बीच की उसकी भूमिका पर नजर डालना जरूरी है। इन दो दशकों में भारत ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और विकास से जुड़ी परियोजनाओं में 3 अरब डॉलर से अधिक का योगदान किया था।

संसद भवन, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, क्षमता निर्माण और अन्य विकास परियोजनाओं के जरिए भारत ने अफगान समाज में अपनी अलग पहचान बनाई। भारत की सहायता को मुख्य रूप से नागरिक और विकासात्मक परियोजनाओं से जोड़ा गया, इसलिए वहां भारत की छवि केवल एक रणनीतिक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि विकास सहयोगी के रूप में भी बनी।

तालिबान के लौटने के बाद भी नई दिल्ली के लिए इस लंबे निवेश और संबंधों को अचानक समाप्त करना आसान नहीं था। इसलिए मानवीय सहायता और सीमित राजनयिक संपर्क के जरिए भारत ने अपनी मौजूदगी बरकरार रखी।

भारत के लिए अफगानिस्तान सिर्फ पड़ोसी क्षेत्र नहीं

भारत की अफगानिस्तान नीति को केवल मानवीय सहायता के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे महत्वपूर्ण सुरक्षा और रणनीतिक हित भी जुड़े हुए हैं।

नई दिल्ली की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों के लिए न किया जाए। इसके अलावा, भारत अफगानिस्तान में ऐसी राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था चाहता है जिससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता कम हो।

दूसरी ओर, अफगानिस्तान की स्थिति भारत के मध्य एशिया से जुड़ने की महत्वाकांक्षा से भी संबंधित है। कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान के साथ भारत अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंध लगातार मजबूत कर रहा है। अफगानिस्तान भौगोलिक रूप से दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकता है।

यदि वहां स्थिरता आती है तो व्यापार, परिवहन और क्षेत्रीय संपर्क की नई संभावनाएं खुल सकती हैं। इसी वजह से भारत के लिए अफगानिस्तान में प्रभाव और संवाद बनाए रखना दीर्घकालिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

तालिबान से बढ़ता संवाद

पिछले वर्ष अक्टूबर में अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी की भारत यात्रा ने दोनों देशों के बीच बढ़ते संपर्क को और स्पष्ट किया। बातचीत के दौरान व्यापार, विकास, संपर्क और सुरक्षा जैसे मुद्दे चर्चा में रहे। यह यात्रा इस बात का संकेत थी कि तालिबान भी भारत के साथ संबंधों को व्यावहारिक स्तर पर आगे बढ़ाना चाहता है।

तालिबान शासन की पांचवीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित ‘विजय दिवस’ समारोह के लिए भारत को निमंत्रण मिलना भी इसी बढ़ते संवाद का एक संकेत माना जा सकता है। हालांकि, ऐसे संपर्क को भारत द्वारा तालिबान की नीतियों का समर्थन या उसकी औपचारिक मान्यता के रूप में देखना सही नहीं होगा।

रणनीति के साथ मूल्यों पर भी जोर

भारत के लिए अफगानिस्तान के साथ संबंध केवल रणनीतिक गणित तक सीमित नहीं हैं। नई दिल्ली लंबे समय से शिक्षा, विकास, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक प्रगति को अपने सहयोग का हिस्सा बनाती रही है।

यही वजह है कि तालिबान की महिलाओं और लड़कियों से जुड़ी नीतियां भारत के लिए भी चिंता का विषय हैं। भारत एक ओर अफगानिस्तान में संवाद और सहयोग बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी ओर वह यह भी अपेक्षा करता है कि वहां मानव गरिमा, शिक्षा, समानता और नागरिक अधिकारों का सम्मान हो।

आने वाले समय में भारत की नीति इसी संतुलन पर निर्भर करेगी। उसे एक तरफ सुरक्षा और क्षेत्रीय हितों की रक्षा करनी है, वहीं दूसरी तरफ अपने लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवीय दृष्टिकोण से समझौता भी नहीं करना है।

आगे क्या है भारत के सामने चुनौती?

तालिबान के शासन के पांच साल पूरे होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि अफगानिस्तान आने वाले वर्षों में किस दिशा में जाएगा। यदि वहां राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक सुधार आते हैं तो भारत के साथ सहयोग का दायरा काफी बढ़ सकता है। व्यापार, मानवीय सहायता, शिक्षा, स्वास्थ्य, संपर्क और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी इसके प्रमुख क्षेत्र हो सकते हैं।

लेकिन यदि आतंकवाद, आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता बनी रहती है तो भारत के सामने सुरक्षा संबंधी चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं।

फिलहाल नई दिल्ली ने जो रास्ता चुना है, वह न तो पूरी तरह दूरी बनाने का है और न ही तालिबान के साथ बिना शर्त खड़े होने का। भारत अपने पुराने विकासात्मक संबंधों, वर्तमान सुरक्षा जरूरतों और बदलते क्षेत्रीय समीकरणों को साथ लेकर आगे बढ़ रहा है।

तालिबान की सत्ता के पांच साल बाद अफगानिस्तान में भारत का कद इसी संतुलित नीति की वजह से बढ़ता दिखाई दे रहा है। पाकिस्तान के साथ काबुल के तनाव, चीन की सीमित सक्रियता और अफगानिस्तान की आर्थिक जरूरतों ने भारत के लिए संवाद का नया अवसर बनाया है। हालांकि, इस अवसर को स्थायी प्रभाव में बदलने के लिए भारत को सुरक्षा, विकास, मानवीय मूल्यों और क्षेत्रीय संपर्क—इन सभी मोर्चों पर सावधानी से आगे बढ़ना होगा।