पितृ पक्ष में किस दिन करें श्राद्ध? मृत्यु की तारीख मालूम है तो पंचांग से ऐसे खोजें सही तिथि

पितृ पक्ष में किस दिन करें श्राद्ध? मृत्यु की तारीख मालूम है तो पंचांग से ऐसे खोजें सही तिथि

पितृ पक्ष में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान जैसे धार्मिक कर्म किए जाते हैं। मान्यता के अनुसार परिवार में जिस व्यक्ति का निधन जिस हिंदू तिथि को हुआ हो, उसी तिथि पर पितृ पक्ष के दौरान उसका श्राद्ध किया जाता है। यही वजह है कि श्राद्ध के लिए अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख से ज्यादा महत्वपूर्ण उस दिन की हिंदू तिथि मानी जाती है।

कई परिवारों में ऐसी स्थिति भी होती है जब किसी बुजुर्ग या परिजन के निधन की तारीख तो परिवार को याद रहती है, लेकिन यह जानकारी नहीं होती कि उस दिन हिंदू पंचांग के अनुसार कौन सी तिथि चल रही थी। खासकर पुराने समय में हुई मृत्यु के मामलों में यह समस्या ज्यादा सामने आती है। यदि आपके परिवार में भी ऐसी स्थिति है, तो पंचांग की मदद से उस तारीख की तिथि निकाली जा सकती है।

इस साल पितृ पक्ष की शुरुआत 27 सितंबर, रविवार से होने की बात कही गई है। पितृ पक्ष के दौरान अलग-अलग तिथियों पर पितरों के लिए धार्मिक कर्म किए जाते हैं। ऐसे में अगर आपको किसी परिजन के निधन की अंग्रेजी तारीख मालूम है, लेकिन उसकी हिंदू तिथि नहीं पता, तो उसे जानने का तरीका समझना जरूरी है।

मृत्यु की तारीख से कैसे पता करें हिंदू तिथि?

मान लीजिए किसी व्यक्ति के पिता का निधन 1 अगस्त 1998 को हुआ था। उस समय वह बहुत छोटा था और इसलिए उसे यह जानकारी नहीं है कि उनके पिता की मृत्यु किस हिंदू तिथि को हुई थी। हालांकि, परिवार के दस्तावेजों या अन्य माध्यम से उसे अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख यानी 1 अगस्त 1998 पता है।

ऐसे मामले में सबसे पहले उस वर्ष का पंचांग देखना होगा। इसके लिए बाजार में मिलने वाले पुराने या कई वर्षों की तिथियां बताने वाले पंचांग का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा आजकल मोबाइल और इंटरनेट पर उपलब्ध ऑनलाइन पंचांग में भी पुराने वर्षों की तारीख खोजी जा सकती है।

ऑनलाइन पंचांग खोलने के बाद वर्ष, महीना और तारीख चुनें। यहां उदाहरण के तौर पर 1 अगस्त 1998 को सर्च किया गया। तारीख चुनने पर उस दिन से संबंधित पंचांग की जानकारी दिखाई देगी। इसमें तिथि, पक्ष, नक्षत्र और अन्य पंचांग संबंधी विवरण दिए होते हैं।

इस उदाहरण में 1 अगस्त 1998 को सावन महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि बताई गई है। अष्टमी तिथि सुबह 6 बजकर 42 मिनट तक थी, जबकि उस दिन सूर्योदय सुबह 5 बजकर 42 मिनट पर हो चुका था। इसलिए उस दिन के लिए अष्टमी तिथि ही मानी जाएगी।

इस तरह मृत्यु की अंग्रेजी तारीख को पंचांग में देखकर संबंधित हिंदू तिथि की पहचान की जा सकती है। इसके बाद पितृ पक्ष में उसी तिथि के दिन संबंधित परिजन का श्राद्ध किया जाता है।

पंचांग में सूर्योदय इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

यहां एक बात समझना जरूरी है कि अंग्रेजी कैलेंडर और हिंदू पंचांग में दिन और तिथि की गणना एक जैसी नहीं होती। सामान्य कैलेंडर में रात 12 बजे के बाद तारीख बदल जाती है। यानी एक तारीख खत्म होकर अगली तारीख शुरू हो जाती है। लेकिन हिंदू पंचांग में तिथि का निर्धारण सूर्य और चंद्रमा की स्थिति के आधार पर होता है।

इसी कारण किसी तिथि की अवधि हमेशा 24 घंटे की नहीं होती। कोई तिथि इससे कम समय तक रह सकती है तो किसी तिथि की अवधि इससे ज्यादा भी हो सकती है। इसलिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि किसी तारीख की रात तक कौन सी तिथि चल रही थी।

श्राद्ध की तिथि निर्धारित करने में सूर्योदय के समय मौजूद तिथि को विशेष महत्व दिया जाता है। उदाहरण के लिए अगर किसी तारीख को अष्टमी सुबह के समय मौजूद है और उसके कुछ समय बाद नवमी शुरू हो जाती है, तो उस दिन का संबंध अष्टमी से माना जा सकता है, क्योंकि सूर्योदय के समय अष्टमी तिथि चल रही थी।

इसी वजह से पुराने समय में हुई मृत्यु की तिथि खोजते समय पंचांग में केवल तारीख देखकर आगे नहीं बढ़ना चाहिए। उस तारीख के सूर्योदय और तिथि समाप्त होने के समय को भी देखना जरूरी होता है।

मृत्यु की तारीख और श्राद्ध की तारीख अलग हो सकती है

यह भी समझना जरूरी है कि जिस दिन व्यक्ति की मृत्यु हुई थी, वह अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख और पितृ पक्ष में श्राद्ध किए जाने का दिन एक नहीं होता। मृत्यु की वास्तविक तारीख किसी भी महीने में हो सकती है, जबकि वार्षिक श्राद्ध के लिए उसी हिंदू तिथि को पितृ पक्ष में खोजा जाता है।

उदाहरण के तौर पर अगर किसी व्यक्ति का निधन सावन महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुआ था, तो हर साल पितृ पक्ष में उसके लिए अष्टमी तिथि पर श्राद्ध किया जाएगा। इसका मतलब यह नहीं है कि हर साल अंग्रेजी कैलेंडर में उसी तारीख को श्राद्ध होगा। अंग्रेजी तारीख बदल सकती है, लेकिन संबंधित हिंदू तिथि के आधार पर श्राद्ध का दिन तय होता है।

पितृ पक्ष में प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक अलग-अलग तिथियों के लिए श्राद्ध किए जाते हैं। परिवार को जिस पूर्वज की मृत्यु की तिथि ज्ञात हो, उसके अनुसार संबंधित तिथि पर धार्मिक कर्म किए जा सकते हैं।

किसी भी महीने में हुई मृत्यु की तिथि कैसे काम आएगी?

किसी व्यक्ति का निधन साल के किसी भी महीने में हुआ हो, उसके श्राद्ध के लिए उस दिन की हिंदू तिथि का पता लगाना जरूरी है। यह जरूरी नहीं कि मृत्यु पितृ पक्ष के दौरान ही हुई हो।

उदाहरण के लिए किसी की मृत्यु फाल्गुन महीने में कृष्ण पक्ष की किसी तिथि को हुई और किसी दूसरे व्यक्ति की मृत्यु सावन महीने में शुक्ल पक्ष की किसी तिथि को हुई। दोनों मामलों में पंचांग से मृत्यु वाले दिन की तिथि देखी जाएगी। पितृ पक्ष आने पर उसी तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाएगा।

इसलिए परिवार में पुरानी मृत्यु की तारीखों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना उपयोगी हो सकता है। यदि केवल अंग्रेजी तारीख उपलब्ध है, तो पंचांग की सहायता से उसके अनुरूप हिंदू तिथि निकाली जा सकती है।

अगर मृत्यु की तारीख ही मालूम नहीं हो तो क्या करें?

कुछ परिवारों के सामने इससे भी बड़ी समस्या होती है। उन्हें अपने किसी पूर्वज के निधन का साल या अनुमानित समय तो पता होता है, लेकिन सही तारीख की जानकारी नहीं होती। ऐसी स्थिति में हर साल पितृ पक्ष के दौरान असमंजस की स्थिति बन सकती है कि श्राद्ध किस दिन किया जाए।

धार्मिक परंपरा में ऐसी स्थिति के लिए भी व्यवस्था बताई गई है। यदि किसी पितर की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, तो पितृ पक्ष की सर्वपितृ अमावस्या को उनका श्राद्ध किया जा सकता है। इसे आश्विन अमावस्या भी कहा जाता है।

सर्वपितृ अमावस्या का संबंध उन पितरों के श्राद्ध से भी जोड़ा जाता है जिनकी मृत्यु की तिथि परिवार को ज्ञात नहीं है। ऐसे में परिवार के सदस्य इस दिन अपने उन पूर्वजों के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध जैसे कर्म कर सकते हैं।

पितृ पक्ष में तिथियों का महत्व समझना जरूरी

पितृ पक्ष में कुल 15 तिथियों का धार्मिक महत्व बताया जाता है। इस अवधि में प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक अलग-अलग दिनों में श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। इसलिए किसी परिजन की मृत्यु की तारीख पता होने के बावजूद यह मान लेना सही नहीं होगा कि उसी अंग्रेजी तारीख को हर साल श्राद्ध किया जाएगा।

पहले मृत्यु की तारीख को पंचांग में देखकर यह पता करें कि उस दिन कौन सी हिंदू तिथि थी। इसके बाद पितृ पक्ष के पंचांग में उसी तिथि को खोजें। यही वह दिन होगा जिस दिन संबंधित पितर के लिए श्राद्ध कर्म किए जाते हैं।

हालांकि पंचांगों में गणना पद्धति और स्थानीय सूर्योदय के आधार पर कुछ अंतर दिखाई दे सकता है। इसलिए किसी विशेष परिवार की परंपरा या जटिल स्थिति में स्थानीय विद्वान या पुरोहित से पंचांग मिलान कर लेना उचित रहता है।

इस तरह अगर किसी परिजन की मृत्यु की अंग्रेजी तारीख आपके पास उपलब्ध है लेकिन हिंदू तिथि मालूम नहीं है, तो पुराने पंचांग या ऑनलाइन पंचांग से उस तारीख की जानकारी निकाली जा सकती है। वहीं यदि मृत्यु की तारीख भी उपलब्ध नहीं है, तो सर्वपितृ अमावस्या का दिन पितरों के श्राद्ध के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।