कुछ साल पहले तक जब बच्चों से पूछा जाता था कि वे बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं, तो जवाब लगभग तय होते थे। कोई डॉक्टर बनने की बात करता था, कोई इंजीनियर, वैज्ञानिक, पायलट या शिक्षक बनने का सपना देखता था। लेकिन डिजिटल दौर ने बच्चों के सपनों की दिशा काफी हद तक बदल दी है। अब कई बच्चे ऐसे करियर की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिसका नाम कुछ दशक पहले तक शायद ही किसी ने सुना हो। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, यूट्यूबर, गेमिंग क्रिएटर और कंटेंट क्रिएटर जैसे प्रोफेशन बच्चों की कल्पना में तेजी से जगह बना रहे हैं।
अमेरिका और नॉर्वे में किए गए एक अध्ययन के आंकड़े इस बदलाव को और स्पष्ट करते हैं। रिसर्च में मिडिल और हाई स्कूल के 60 प्रतिशत से ज्यादा बच्चों ने सोशल मीडिया से जुड़े करियर को लेकर रुचि दिखाई। यानी बड़ी संख्या में बच्चे अब कैमरे के सामने खुद को देखना चाहते हैं, न कि केवल पारंपरिक नौकरियों को अपने भविष्य का रास्ता मानते हैं।
यह बदलाव केवल किशोरों तक सीमित नहीं है। कम उम्र के बच्चे भी सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाले क्रिएटर्स से प्रभावित हो रहे हैं। सात साल तक के बच्चों में भी इन्फ्लुएंसर या ऑनलाइन कंटेंट क्रिएटर बनने की इच्छा सामने आने लगी है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर सोशल मीडिया ने बच्चों की करियर सोच को इतना प्रभावित कैसे कर दिया?
बच्चों के रोल मॉडल तेजी से बदल रहे हैं
बच्चों की पसंद पर उनके आसपास का माहौल और उनके सामने मौजूद रोल मॉडल का गहरा असर पड़ता है। पहले बच्चे अपने आसपास डॉक्टर, शिक्षक, इंजीनियर, सैनिक, खिलाड़ी या वैज्ञानिक जैसे पेशेवरों को देखते थे। फिल्मों और किताबों में भी सफलता की कहानियां अक्सर इन्हीं क्षेत्रों से जुड़ी होती थीं।
अब स्थिति काफी अलग है। स्मार्टफोन के जरिए बच्चों की पहुंच ऐसे लोगों तक हो गई है, जिन्हें वे अपने घर बैठे रोज देख सकते हैं। यूट्यूब वीडियो, इंस्टाग्राम रील्स, गेमिंग स्ट्रीम और दूसरे शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म ने क्रिएटर्स को बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना दिया है।
एक बच्चा किसी इन्फ्लुएंसर को रोजाना वीडियो बनाते, घूमते, नए प्रोडक्ट इस्तेमाल करते, गेम खेलते या लाखों लोगों से बातचीत करते देखता है। उसे यह पूरा काम मनोरंजक भी लगता है और आकर्षक भी। धीरे-धीरे वह इस जीवनशैली को सफलता की तस्वीर के रूप में देखने लगता है।
यही वजह है कि बच्चों के लिए सोशल मीडिया क्रिएटर केवल मनोरंजन करने वाला व्यक्ति नहीं रह गया है। वह उनके लिए एक संभावित करियर मॉडल भी बन रहा है।
कम उम्र में लोकप्रियता का आकर्षण
इन्फ्लुएंसर बनने की चाहत के पीछे सबसे बड़ा कारण लोकप्रियता और पहचान का आकर्षण माना जा सकता है। पारंपरिक करियर में सफलता हासिल करने के लिए वर्षों तक पढ़ाई, ट्रेनिंग और अनुभव की जरूरत पड़ती है। इसके मुकाबले सोशल मीडिया पर किसी वीडियो के वायरल होने की कहानी बहुत जल्दी सामने आती है।
बच्चे जब देखते हैं कि कोई कम उम्र का क्रिएटर कुछ ही समय में लाखों फॉलोअर्स हासिल कर रहा है, तो उन्हें लगता है कि यह रास्ता आसान और रोमांचक है। उन्हें फॉलोअर्स, लाइक्स, कमेंट्स, ब्रांड प्रमोशन और ऑनलाइन कमाई सफलता के सीधे संकेत दिखाई देते हैं।
हालांकि सोशल मीडिया की स्क्रीन पर दिखाई देने वाली यह तस्वीर अधूरी हो सकती है। किसी सफल क्रिएटर के पीछे लगातार कंटेंट तैयार करने, दर्शकों की पसंद समझने, तकनीक सीखने, असफलताओं से निपटने और लंबे समय तक काम करने की मेहनत भी होती है। लेकिन बच्चे अक्सर इस मेहनत का केवल छोटा हिस्सा ही देख पाते हैं।
2018 के मुकाबले तस्वीर काफी बदल चुकी है
बच्चों के करियर सपनों में आए इस बदलाव को समझने के लिए कुछ साल पीछे जाना जरूरी है। वर्ष 2018 में लगभग 20 हजार बच्चों को शामिल करते हुए किए गए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर और शिक्षक जैसे पारंपरिक पेशे प्रमुख विकल्पों में शामिल थे।
उस समय सोशल मीडिया मौजूद जरूर था, लेकिन आज की तरह बच्चों की जिंदगी के हर हिस्से में नहीं पहुंचा था। शॉर्ट वीडियो का चलन भी वर्तमान स्तर पर नहीं था। इसके बाद स्मार्टफोन की पहुंच बढ़ी और वीडियो प्लेटफॉर्म ने बच्चों तथा युवाओं की आदतों को तेजी से बदल दिया।
आज बच्चे केवल सोशल मीडिया का इस्तेमाल मनोरंजन के लिए नहीं करते, बल्कि उसी के जरिए जानकारी हासिल करते हैं, नए लोगों को देखते हैं और दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं। इसलिए यह स्वाभाविक है कि उनकी करियर पसंद पर भी इसका असर दिखाई दे।
भारत में भी तेजी से बढ़ रहा है इन्फ्लुएंसर कल्चर
यह ट्रेंड केवल अमेरिका या यूरोप तक सीमित नहीं है। भारत में भी बच्चों और युवाओं के बीच सोशल मीडिया क्रिएटर बनने का आकर्षण बढ़ रहा है। एक सर्वे के मुताबिक भारत के जेन-अल्फा बच्चों में 37 प्रतिशत सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनने की इच्छा रखते हैं।
देश में कम उम्र के कंटेंट क्रिएटर्स की संख्या बढ़ने की बात भी सामने आई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल 16 वर्ष से कम उम्र के चाइल्ड इन्फ्लुएंसर्स की संख्या में सालाना आधार पर 41 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। ऐसे बच्चों की संख्या 83,212 तक पहुंचने का दावा किया गया है।
इन आंकड़ों से साफ है कि सोशल मीडिया ने बच्चों के लिए करियर के विकल्पों की सूची काफी लंबी कर दी है। अब बच्चा यह नहीं सोचता कि करियर का मतलब केवल डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी नौकरी है। वह वीडियो क्रिएशन, गेमिंग, फैशन, कॉमेडी, टेक्नोलॉजी, ट्रैवल और अन्य डिजिटल क्षेत्रों को भी पेशे के रूप में देख रहा है।
शॉर्ट वीडियो ने बढ़ाई पहुंच
सोशल मीडिया के इस बदलाव में शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। कुछ सेकंड या एक-दो मिनट के वीडियो आसानी से देखे जा सकते हैं। यही वजह है कि बच्चों का ध्यान भी ऐसे कंटेंट की ओर जल्दी जाता है।
एक वीडियो पसंद आने के बाद प्लेटफॉर्म का एल्गोरिदम उसी तरह के कई अन्य वीडियो दिखाता रहता है। अगर कोई बच्चा लगातार सफल इन्फ्लुएंसर्स की वीडियो देखता है, तो उसके सामने बार-बार वही जीवनशैली और सफलता की कहानियां आने लगती हैं।
इससे बच्चे के मन में यह धारणा बन सकती है कि सोशल मीडिया की दुनिया ही सफलता का सबसे आसान रास्ता है। यही वह जगह है जहां माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
क्या इन्फ्लुएंसर बनना गलत करियर है?
ऐसा बिल्कुल नहीं है। कंटेंट क्रिएशन आज एक वास्तविक और तेजी से विकसित होता हुआ क्षेत्र है। डिजिटल मार्केटिंग, वीडियो प्रोडक्शन, एडिटिंग, डिजाइनिंग, ब्रांडिंग और कम्युनिकेशन जैसे कई क्षेत्रों में सोशल मीडिया ने रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं।
कई लोग अपनी प्रतिभा के दम पर सोशल मीडिया के जरिए सफल बिजनेस भी खड़ा कर रहे हैं। इसलिए बच्चों की डिजिटल क्रिएटिविटी को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह पारंपरिक करियर से अलग है।
समस्या तब शुरू होती है जब बच्चा केवल फॉलोअर्स और लोकप्रियता को सफलता का पैमाना मानने लगे। यदि उसे यह समझ ही नहीं है कि कंटेंट बनाने के पीछे कितनी मेहनत, कौशल और जिम्मेदारी होती है, तो वह सोशल मीडिया की चमकदार तस्वीर से भ्रमित हो सकता है।
बच्चों को रोकने के बजाय सही दिशा दिखाना जरूरी
माता-पिता के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वे बच्चों की रुचि को समझें। अगर बच्चा वीडियो बनाना चाहता है, कैमरे के सामने बोलने में रुचि रखता है या एडिटिंग सीखना चाहता है, तो उसे तुरंत गलत नहीं कहना चाहिए।
इसके बजाय उसे यह समझाया जा सकता है कि कंटेंट क्रिएशन भी एक कौशल आधारित क्षेत्र है। वीडियो बनाना, कहानी कहना, रिसर्च करना, कैमरा चलाना, एडिटिंग करना और दर्शकों तक सही जानकारी पहुंचाना सीखने की जरूरत होती है।
साथ ही बच्चों को यह भी बताना जरूरी है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली हर चीज वास्तविक जिंदगी की पूरी तस्वीर नहीं होती। वायरल वीडियो के पीछे कई असफल वीडियो भी हो सकते हैं और बड़ी संख्या में फॉलोअर्स के बावजूद कमाई की कोई गारंटी नहीं होती।
करियर चुनते समय रुचि के साथ क्षमता भी देखें
बच्चे का भविष्य केवल ट्रेंड के आधार पर तय नहीं होना चाहिए। आज इन्फ्लुएंसर लोकप्रिय है, कल कोई दूसरा डिजिटल प्रोफेशन चर्चा में हो सकता है। इसलिए बच्चों को यह समझना जरूरी है कि करियर चुनने का आधार उनकी रुचि, क्षमता, मेहनत और लंबे समय तक सीखने की इच्छा होनी चाहिए।
स्कूल भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। बच्चों को अलग-अलग क्षेत्रों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि उन्हें यह पता चल सके कि किसी भी पेशे में सफलता केवल प्रसिद्धि से नहीं मिलती।
डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर, शिक्षक, खिलाड़ी या इन्फ्लुएंसर—हर क्षेत्र में मेहनत और विशेषज्ञता की जरूरत होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि सोशल मीडिया ने कुछ नए करियर विकल्प बच्चों के सामने बहुत ज्यादा दिखाई देने वाले बना दिए हैं।
असली चुनौती सपनों को रोकना नहीं, समझदारी से चुनना है
बच्चों का इन्फ्लुएंसर बनने का सपना अपने आप में चिंता की बात नहीं है। चिंता तब होनी चाहिए जब वे केवल इंटरनेट पर दिखाई देने वाली चमक को देखकर अपने भविष्य का फैसला करने लगें और बाकी विकल्पों को समझे बिना नजरअंदाज कर दें।
नई पीढ़ी डिजिटल दुनिया में बड़ी हो रही है। इसलिए उसके करियर सपनों का बदलना स्वाभाविक है। जरूरत इस बात की है कि बच्चों को सोशल मीडिया की संभावनाओं के साथ उसकी सीमाओं और जोखिमों के बारे में भी बताया जाए।
आखिरकार करियर कोई वायरल वीडियो नहीं है, जिसे कुछ सेकंड में सफलता मिल जाए। सही करियर वह है जिसमें बच्चा अपनी रुचि और क्षमता को पहचानकर लगातार सीख सके, मेहनत कर सके और लंबे समय में अपने लिए मजबूत भविष्य तैयार कर सके। सोशल मीडिया नई पीढ़ी के सपनों को बदल रहा है, लेकिन उन सपनों को सही दिशा देना अभी भी माता-पिता, स्कूल और समाज की जिम्मेदारी है।




