भारत में बढ़ता डायबिटीज और मोटापा बड़ी चुनौती बने, चीन से तुलना में क्या सामने आई तस्वीर?

भारत में बढ़ता डायबिटीज और मोटापा बड़ी चुनौती बने, चीन से तुलना में क्या सामने आई तस्वीर?

भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के बावजूद गैर-संचारी बीमारियों का बढ़ता दबाव चिंता पैदा कर रहा है। मधुमेह, मोटापा और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएं अब केवल उम्रदराज लोगों तक सीमित नहीं रह गई हैं। बदलती जीवनशैली, खानपान की आदतों में बदलाव, शारीरिक गतिविधियों की कमी और बढ़ते वजन के कारण इन बीमारियों का जोखिम लगातार बढ़ रहा है। सामने आए आंकड़े बताते हैं कि आने वाले समय में बीमारी का इलाज करने के साथ-साथ उसे रोकने और शुरुआती चरण में पहचानने पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी होगा।

भारत और चीन जैसे बड़ी आबादी वाले देशों में गैर-संचारी रोगों का बोझ तेजी से बढ़ रहा है। दोनों देशों की स्थिति की तुलना करने पर कुछ मामलों में चीन का स्तर भारत से अधिक दिखाई देता है, लेकिन भारत में जिस तेजी से मधुमेह और अधिक वजन की समस्या बढ़ रही है, वह स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी है।

डायबिटीज के मामले बढ़े, पुरुष और महिलाएं दोनों प्रभावित

भारत में मधुमेह का बढ़ता प्रसार सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2015-16 की तुलना में 2019-21 से 2022-24 के बीच पुरुषों में मधुमेह का स्तर करीब 15.6 प्रतिशत से बढ़कर 20.9 प्रतिशत हो गया। इसी अवधि में महिलाओं के बीच भी यह आंकड़ा 13.5 प्रतिशत से बढ़कर 17.8 प्रतिशत तक पहुंच गया।

इन आंकड़ों से साफ है कि समस्या किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। पुरुषों के साथ महिलाओं में भी डायबिटीज का बोझ बढ़ रहा है। इसका संबंध कई ऐसे बदलावों से है जो पिछले कुछ वर्षों में लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बने हैं।

काम करने का तरीका बदलना, लंबे समय तक बैठे रहना, पैदल चलने या व्यायाम के लिए कम समय मिलना और भोजन में ज्यादा कैलोरी वाले विकल्पों की बढ़ती मौजूदगी शरीर के मेटाबॉलिज्म पर असर डाल सकती है। यही वजह है कि डायबिटीज से बचाव के लिए केवल दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय जीवनशैली में सुधार को भी अहम माना जा रहा है।

बढ़ता वजन डायबिटीज के खतरे को और गंभीर बना रहा

मधुमेह के साथ-साथ अधिक वजन और मोटापा भी भारत में तेजी से उभरती स्वास्थ्य समस्याएं हैं। आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं में अधिक वजन और मोटापे का स्तर 24 प्रतिशत से बढ़कर 30.7 प्रतिशत हुआ है। पुरुषों में भी यह आंकड़ा 22.9 प्रतिशत से बढ़कर 27.3 प्रतिशत तक पहुंच गया।

बढ़ते वजन को सिर्फ शरीर की बनावट से जोड़कर देखना सही नहीं होगा। मोटापा कई अन्य बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकता है। अधिक वजन वाले लोगों में मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए वजन को नियंत्रित रखना लंबे समय में स्वास्थ्य की सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।

शहरी क्षेत्रों में बैठकर काम करने वाली नौकरियों, निजी वाहनों पर बढ़ती निर्भरता और रोजमर्रा की गतिविधियों में कमी ने भी इस चुनौती को बढ़ाया है। इसके अलावा तैयार भोजन और ज्यादा कैलोरी वाले खाद्य पदार्थों की उपलब्धता ने खानपान के पैटर्न को प्रभावित किया है।

मोटापे में चीन की स्थिति कुछ मामलों में भारत से आगे

भारत की तुलना चीन से करने पर तस्वीर थोड़ी अलग दिखाई देती है। उपलब्ध सर्वेक्षण आंकड़ों में वयस्क मोटापे का स्तर चीन में करीब 8.3 प्रतिशत और भारत में लगभग 7.3 प्रतिशत बताया गया है। यानी इस पैमाने पर चीन भारत से आगे है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में मोटापे को लेकर चिंता कम हो जाती है। भारत में अधिक वजन और मोटापे के आंकड़ों में जिस तरह वृद्धि हुई है, वह आने वाले वर्षों के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए चुनौती यह है कि समस्या को गंभीर स्तर तक पहुंचने से पहले ही नियंत्रित किया जाए।

विश्व स्वास्थ्य संगठन भी अधिक वजन और मोटापे को गैर-संचारी बीमारियों के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल करता है। इसका असर केवल किसी व्यक्ति के वर्तमान स्वास्थ्य पर नहीं बल्कि भविष्य में होने वाली गंभीर बीमारियों की संभावना पर भी पड़ सकता है।

हाई ब्लड प्रेशर की तस्वीर भी महत्वपूर्ण

उच्च रक्तचाप यानी हाई ब्लड प्रेशर भी भारत के सामने मौजूद बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पुरुषों में उच्च रक्तचाप का स्तर करीब 21.3 प्रतिशत से बढ़कर 22.1 प्रतिशत हुआ। दूसरी ओर महिलाओं में यह आंकड़ा 24 प्रतिशत से घटकर 19.4 प्रतिशत दर्ज किया गया।

इससे पता चलता है कि अलग-अलग बीमारियों में पुरुषों और महिलाओं के बीच रुझान एक जैसा नहीं है। कुछ मामलों में सुधार दिखाई देता है, जबकि दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का बोझ बढ़ रहा है। चीन के साथ तुलना करने पर कई परिस्थितियों में वहां उच्च रक्तचाप और मोटापे का स्तर भारत से ज्यादा दिखाई देता है।

फिर भी भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गैर-संचारी रोगों को शुरुआती स्तर पर पहचानने और नियंत्रित करने की व्यवस्था लगातार मजबूत की जाए। हाई ब्लड प्रेशर अक्सर बिना स्पष्ट लक्षणों के भी मौजूद रह सकता है। ऐसे में नियमित जांच बेहद उपयोगी हो सकती है।

बीमारी का इलाज नहीं, रोकथाम बने प्राथमिकता

भारत के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि स्वास्थ्य व्यवस्था केवल बीमारी सामने आने के बाद इलाज करने तक सीमित न रहे। नियमित स्क्रीनिंग और शुरुआती पहचान को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का अहम हिस्सा बनाना जरूरी है।

ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर की समय-समय पर जांच, वजन की निगरानी, संतुलित भोजन और नियमित शारीरिक गतिविधि ऐसी आदतें हैं जो जोखिम को कम करने में मदद कर सकती हैं। लोगों को यह समझना होगा कि स्वास्थ्य जांच सिर्फ बीमारी होने पर ही जरूरी नहीं है। समय रहते जांच कराने से किसी समस्या का पता शुरुआती चरण में लगाया जा सकता है।

यही कारण है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्तर पर गैर-संचारी रोगों की जांच को मजबूत करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अगर बीमारी का पता शुरुआती अवस्था में चल जाए तो उसके प्रबंधन की संभावना बेहतर हो सकती है और आगे चलकर गंभीर जटिलताओं का खतरा कम किया जा सकता है।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ सकता है आर्थिक दबाव

डायबिटीज, मोटापा और उच्च रक्तचाप का असर सिर्फ मरीज की सेहत तक सीमित नहीं रहता। इन बीमारियों के लंबे समय तक बने रहने पर नियमित जांच, दवाओं और चिकित्सा सेवाओं की जरूरत पड़ सकती है। इससे परिवारों के साथ-साथ स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच पहले की तुलना में बेहतर हुई है और स्वास्थ्य बीमा का दायरा भी बढ़ा है। इसके बावजूद लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों की बढ़ती संख्या भविष्य में स्वास्थ्य संसाधनों की मांग बढ़ा सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2024 के अंत तक भारत में 1.7 करोड़ से ज्यादा उच्च रक्तचाप और मधुमेह के मरीज उपचार प्राप्त कर रहे थे। हालांकि, मरीजों को लगातार देखभाल उपलब्ध कराना और मधुमेह की प्रभावी निगरानी बनाए रखना अब भी बड़ी चुनौती है।

जीवनशैली में छोटे बदलाव भी अहम

गैर-संचारी बीमारियों से मुकाबले के लिए सिर्फ सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। व्यक्तिगत स्तर पर भी लोगों को अपनी दिनचर्या में बदलाव करने की जरूरत है। नियमित पैदल चलना या दूसरी शारीरिक गतिविधियां करना, संतुलित भोजन लेना, जरूरत के अनुसार वजन कम करना और नियमित स्वास्थ्य जांच कराना उपयोगी कदम हो सकते हैं।

खास तौर पर उन लोगों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए जिनका वजन लगातार बढ़ रहा है या जिनकी दिनचर्या में शारीरिक गतिविधि बहुत कम है। स्वस्थ जीवनशैली को बीमारी के इलाज के बाद अपनाने के बजाय बीमारी से बचाव के लिए पहले से अपनाना ज्यादा प्रभावी रणनीति हो सकती है।

भारत के लिए आंकड़े हैं चेतावनी

भारत और चीन दोनों ही गैर-संचारी रोगों के बढ़ते बोझ से जूझ रहे हैं। कुछ संकेतकों में चीन भारत से आगे है, जबकि भारत में डायबिटीज और अधिक वजन के आंकड़ों में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल रही है। इसलिए केवल दोनों देशों के बीच प्रतिशत की तुलना करना पर्याप्त नहीं है। भारत के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बढ़ते जोखिम को समय रहते कैसे नियंत्रित किया जाए।

डायबिटीज, मोटापा और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों को रोकने के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था, परिवार और व्यक्ति—तीनों स्तरों पर प्रयास जरूरी होंगे। नियमित स्क्रीनिंग और शुरुआती इलाज के साथ लोगों की जीवनशैली में सुधार पर भी जोर देना होगा।

अगर रोकथाम को प्राथमिकता दी जाती है तो भविष्य में गंभीर बीमारियों के बोझ और इलाज पर होने वाले खर्च को कम करने में मदद मिल सकती है। मौजूदा आंकड़े भारत के लिए एक स्पष्ट संकेत हैं कि गैर-संचारी रोगों के खिलाफ लड़ाई को और तेज करने का समय आ चुका है। बीमारी के गंभीर होने का इंतजार करने के बजाय समय रहते जांच, सही खानपान और सक्रिय जीवनशैली को अपनाना ही आगे की सबसे बड़ी जरूरत है।