भारत-रूस रक्षा साझेदारी में बड़ा कदम: RELOS समझौता लागू, सैनिकों और सैन्य संसाधनों की साझा तैनाती संभव

भारत-रूस रक्षा साझेदारी में बड़ा कदम: RELOS समझौता लागू, सैनिकों और सैन्य संसाधनों की साझा तैनाती संभव

भारत और रूस के बीच दशकों से चले आ रहे रणनीतिक संबंधों में रक्षा सहयोग की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। दोनों देशों के बीच सैन्य उपकरणों की खरीद, तकनीकी सहयोग, प्रशिक्षण और संयुक्त सैन्य अभ्यास के क्षेत्र में लंबे समय से साझेदारी रही है। अब इस संबंध को लॉजिस्टिक सहयोग के स्तर पर भी मजबूती मिलने जा रही है। भारत और रूस के बीच Reciprocal Exchange of Logistics Support यानी RELOS समझौते के लागू होने से दोनों देशों की सेनाओं के बीच संसाधनों और सैन्य सुविधाओं के इस्तेमाल को लेकर सहयोग का एक औपचारिक ढांचा तैयार हुआ है।

यह समझौता ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सैन्य गतिविधियां और सुरक्षा चुनौतियां लगातार बदल रही हैं। लंबी दूरी पर होने वाले सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रम और समुद्री गतिविधियों के दौरान किसी भी देश की सेना के लिए लॉजिस्टिक सपोर्ट बेहद महत्वपूर्ण होता है। ईंधन, भोजन, पानी, मरम्मत, तकनीकी सहायता और अन्य आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता सैन्य अभियानों की प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकती है।

RELOS के जरिए भारत और रूस एक-दूसरे की सैन्य सुविधाओं का निर्धारित शर्तों और तय उद्देश्यों के तहत उपयोग कर सकेंगे। इससे दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग को व्यावहारिक रूप से आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस समझौते को किसी स्थायी सैन्य गठबंधन के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इसका मुख्य फोकस लॉजिस्टिक सहयोग, सैन्य प्रशिक्षण और संयुक्त गतिविधियों को सुविधाजनक बनाना है।

RELOS समझौता क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?

RELOS का पूरा नाम Reciprocal Exchange of Logistics Support है। सरल शब्दों में इसे आपसी लॉजिस्टिक सहयोग की व्यवस्था कहा जा सकता है। ऐसे समझौतों का उद्देश्य दो देशों की सेनाओं को एक-दूसरे की निर्धारित सैन्य सुविधाओं और लॉजिस्टिक संसाधनों तक सीमित और अधिकृत पहुंच उपलब्ध कराना होता है।

किसी भी सैन्य अभ्यास या लंबी दूरी की तैनाती के दौरान सेना को केवल हथियार और सैन्य उपकरणों की जरूरत नहीं होती। सैनिकों के लिए भोजन और पानी, वाहनों और विमानों के लिए ईंधन, तकनीकी खराबी की स्थिति में मरम्मत और रखरखाव तथा अन्य आवश्यक सेवाएं भी जरूरी होती हैं। यदि किसी मित्र देश के साथ पहले से लॉजिस्टिक सहयोग की व्यवस्था मौजूद हो, तो ऐसी गतिविधियों को अधिक व्यवस्थित तरीके से संचालित किया जा सकता है।

भारत और रूस के बीच RELOS व्यवस्था भी इसी उद्देश्य से जुड़ी है। इसके तहत दोनों देशों की सेनाएं निर्धारित परिस्थितियों में एक-दूसरे की उपलब्ध सुविधाओं का उपयोग कर सकती हैं। इसका इस्तेमाल संयुक्त अभ्यास, प्रशिक्षण और अन्य स्वीकृत सैन्य गतिविधियों के दौरान किया जा सकता है।

किन सैन्य सुविधाओं का इस्तेमाल हो सकता है?

लॉजिस्टिक सहयोग समझौतों में आमतौर पर सैन्य जरूरतों से जुड़ी कई सुविधाओं को शामिल किया जाता है। RELOS के संदर्भ में भी एयरबेस, नौसैनिक सुविधाओं और अन्य संबंधित सैन्य ढांचे के उपयोग की व्यवस्था महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

यदि भारतीय सैन्य विमान किसी निर्धारित अभ्यास या प्रशिक्षण गतिविधि के लिए रूस में जाते हैं, तो उन्हें आवश्यक परिस्थितियों में संबंधित सुविधाओं से लॉजिस्टिक सहायता मिल सकती है। इसी तरह रूसी सैन्य गतिविधियों के दौरान भारत में उपलब्ध निर्धारित सुविधाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस तरह की व्यवस्था से सैन्य गतिविधियों की योजना बनाना आसान हो सकता है। लंबी दूरी की यात्रा के दौरान विमानों या नौसैनिक जहाजों को बीच में आवश्यक सेवाएं उपलब्ध होने से संचालन अधिक सुविधाजनक हो सकता है।

हालांकि, ऐसी सुविधाओं का इस्तेमाल समझौते में तय नियमों और दोनों देशों की सहमति के अनुसार ही किया जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी भी देश की सेना दूसरे देश के सभी सैन्य अड्डों का बिना अनुमति के इस्तेमाल कर सकती है।

ईंधन से लेकर मरम्मत तक मिल सकती है लॉजिस्टिक सहायता

सैन्य अभियानों में लॉजिस्टिक सपोर्ट की भूमिका काफी व्यापक होती है। किसी विमान या युद्धपोत को लंबी दूरी की गतिविधि के दौरान ईंधन की आवश्यकता हो सकती है। इसी तरह सैनिकों के लिए भोजन और पानी की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होती है।

RELOS जैसी व्यवस्था के तहत निर्धारित शर्तों के अनुसार ईंधन भरने, आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने और तकनीकी सहायता जैसी सुविधाओं का प्रावधान हो सकता है। सैन्य उपकरणों की सामान्य मरम्मत और रखरखाव से जुड़ी सुविधाएं भी सहयोग का हिस्सा बन सकती हैं।

इसके अलावा सैन्य विमानों की आवाजाही के दौरान एयर ट्रैफिक कंट्रोल और अन्य फ्लाइट सपोर्ट सेवाएं भी उपयोगी हो सकती हैं। इससे दोनों देशों की वायु सेनाओं के बीच संयुक्त प्रशिक्षण और अभ्यास को बेहतर ढंग से संचालित करने में सहायता मिल सकती है।

नौसैनिक गतिविधियों के संदर्भ में भी लॉजिस्टिक सहयोग महत्वपूर्ण है। लंबी समुद्री यात्राओं के दौरान जहाजों को ईंधन, रखरखाव और अन्य जरूरी सेवाओं की आवश्यकता होती है। निर्धारित बंदरगाह सुविधाओं तक पहुंच मिलने से ऐसी गतिविधियों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।

सैन्य गतिविधियों के लिए तय होगी सीमित व्यवस्था

RELOS समझौते को लेकर सामने आई जानकारी के अनुसार, दोनों देशों के बीच सैन्य संसाधनों की मौजूदगी और गतिविधियों को लेकर सीमित व्यवस्था का प्रावधान है। इसमें सैनिकों, सैन्य विमानों और युद्धपोतों की निर्धारित संख्या में मौजूदगी की बात कही गई है।

ऐसी व्यवस्था का उद्देश्य स्थायी सैन्य अड्डा स्थापित करना या किसी दूसरे देश में लंबे समय तक सैन्य बल तैनात करना नहीं है। इसके बजाय इसे प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास और सहयोगात्मक गतिविधियों की आवश्यकताओं के संदर्भ में देखा जाता है।

यह अंतर समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि लॉजिस्टिक सपोर्ट समझौते और स्थायी सैन्य गठबंधन एक जैसी व्यवस्थाएं नहीं होतीं। RELOS का प्रमुख उद्देश्य सैन्य गतिविधियों को सुविधाजनक बनाने के लिए संसाधनों और सुविधाओं के साझा उपयोग को व्यवस्थित करना है।

समझौते पर बातचीत से लागू होने तक का सफर

भारत और रूस के बीच लॉजिस्टिक सहयोग को लेकर बातचीत लंबे समय से चल रही थी। दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध पहले से मजबूत रहे हैं और समय के साथ सैन्य सहयोग के नए क्षेत्रों को भी इसमें शामिल किया गया है।

RELOS समझौते पर फरवरी 2025 में हस्ताक्षर किए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद समझौते को लागू करने के लिए दोनों देशों में आवश्यक प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की गईं। रूस की ओर से दिसंबर 2025 में इसे मंजूरी मिलने के बाद इसके प्रभावी होने का रास्ता साफ हुआ।

समझौते की अवधि शुरुआती तौर पर पांच वर्ष बताई गई है। आगे दोनों देशों की सहमति और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार इसकी अवधि बढ़ाई जा सकती है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत और रूस सैन्य सहयोग को दीर्घकालिक ढांचे में आगे बढ़ाने के इच्छुक हैं।

भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से क्यों अहम है RELOS?

भारत की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए समुद्री और हवाई क्षेत्र में लंबी दूरी की सैन्य गतिविधियों का महत्व काफी अधिक है। भारत हिंद महासागर क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका रखता है और उसकी नौसेना नियमित रूप से विभिन्न देशों के साथ संयुक्त अभ्यास करती है।

ऐसी स्थिति में लॉजिस्टिक सहयोग की व्यवस्था होने से सैन्य गतिविधियों के संचालन में सुविधा मिल सकती है। किसी मित्र देश के साथ पहले से तय नियमों के तहत आवश्यक संसाधनों और सुविधाओं तक पहुंच होने से लंबी दूरी के अभ्यासों की योजना बनाना आसान हो सकता है।

भारतीय नौसेना के लिए समुद्री यात्राओं के दौरान लॉजिस्टिक सपोर्ट उपयोगी हो सकता है, जबकि वायुसेना के लिए लंबी दूरी के प्रशिक्षण और संयुक्त अभ्यासों में एयरबेस तथा अन्य सुविधाओं का महत्व रहता है।

इसके अलावा, इस तरह के समझौते आपातकालीन परिस्थितियों में भी सहयोग की संभावनाओं को बढ़ा सकते हैं, हालांकि किसी भी वास्तविक स्थिति में सहायता का स्वरूप संबंधित नियमों और दोनों देशों की सहमति पर निर्भर करेगा।

भारत-रूस के पुराने रक्षा संबंधों को मिल सकता है नया आधार

भारत और रूस के रक्षा संबंध कई दशकों से चले आ रहे हैं। दोनों देशों के बीच लड़ाकू विमान, मिसाइल प्रणाली, नौसैनिक तकनीक और अन्य रक्षा उपकरणों से जुड़े सहयोग का लंबा इतिहास रहा है।

भारत की सैन्य क्षमताओं के विकास में रूस की भूमिका लंबे समय तक महत्वपूर्ण रही है। हालांकि, भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपने रक्षा सहयोग को कई देशों तक विस्तारित किया है और रक्षा उपकरणों की खरीद के स्रोतों में भी विविधता लाई है।

इसके बावजूद रूस के साथ सैन्य और रणनीतिक संबंध भारत की विदेश नीति में महत्वपूर्ण बने हुए हैं। RELOS समझौता इस पुराने सहयोग को एक नए क्षेत्र में आगे बढ़ाता है, जहां सैन्य संसाधनों और सुविधाओं के उपयोग को लेकर अधिक औपचारिक व्यवस्था मौजूद होगी।

संयुक्त सैन्य अभ्यासों में हो सकती है सुविधा

भारत और रूस के बीच समय-समय पर संयुक्त सैन्य अभ्यास आयोजित किए जाते रहे हैं। इन अभ्यासों का उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं को एक-दूसरे की कार्यप्रणाली समझने, संयुक्त संचालन क्षमता विकसित करने और आपसी समन्वय बढ़ाने का अवसर देना होता है।

लंबी दूरी पर होने वाले सैन्य अभ्यासों में लॉजिस्टिक व्यवस्था एक बड़ी चुनौती हो सकती है। सैनिकों, विमानों और नौसैनिक जहाजों की आवाजाही के साथ-साथ उनके लिए आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था भी करनी होती है।

RELOS लागू होने के बाद निर्धारित नियमों के तहत ऐसी गतिविधियों के दौरान लॉजिस्टिक सपोर्ट प्राप्त करना आसान हो सकता है। इससे अभ्यासों की योजना और संचालन में समय तथा संसाधनों की बचत होने की संभावना है।

क्षेत्रीय सुरक्षा के संदर्भ में समझौते का महत्व

आज के बदलते वैश्विक सुरक्षा वातावरण में देश अपने रणनीतिक साझेदारों के साथ सहयोग को मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं। सैन्य सहयोग अब केवल हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं है। प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, खुफिया सहयोग और लॉजिस्टिक सपोर्ट भी आधुनिक रक्षा साझेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।

भारत और रूस के बीच RELOS समझौते को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। यह दोनों देशों को अपनी सैन्य गतिविधियों के दौरान एक-दूसरे के साथ बेहतर तालमेल बनाने का अवसर देता है।

हालांकि, किसी भी समझौते के वास्तविक प्रभाव का आकलन उसके लागू होने के बाद होने वाली गतिविधियों और उसके इस्तेमाल के तरीके से ही किया जा सकता है। केवल समझौते के लागू होने से क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण में तत्काल बड़ा बदलाव होना जरूरी नहीं है।

क्या RELOS किसी सैन्य गठबंधन का संकेत है?

RELOS को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठ सकता है कि क्या यह भारत और रूस के बीच किसी नए सैन्य गठबंधन की शुरुआत है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे सीधे तौर पर सैन्य गठबंधन कहना उचित नहीं होगा।

भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है। भारत विभिन्न देशों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार रक्षा और रणनीतिक सहयोग करता है। लॉजिस्टिक सपोर्ट समझौते भी आमतौर पर सैन्य गतिविधियों को सुविधाजनक बनाने के लिए किए जाते हैं और इन्हें अनिवार्य रूप से पारस्परिक सैन्य रक्षा संधि नहीं माना जाता।

RELOS का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं को निर्धारित परिस्थितियों में लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराना और सैन्य सहयोग को अधिक व्यावहारिक बनाना है।

आगे भारत-रूस रक्षा सहयोग के लिए क्या मायने हैं?

RELOS के लागू होने के बाद भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग के लिए एक अतिरिक्त संस्थागत ढांचा उपलब्ध हो गया है। इससे संयुक्त अभ्यास, प्रशिक्षण और सैन्य गतिविधियों के दौरान संसाधनों के इस्तेमाल को अधिक व्यवस्थित तरीके से किया जा सकता है।

भविष्य में इस समझौते का उपयोग किस स्तर पर और कितनी बार किया जाता है, यह दोनों देशों की रणनीतिक प्राथमिकताओं और सुरक्षा आवश्यकताओं पर निर्भर करेगा। साथ ही, वैश्विक परिस्थितियों में होने वाले बदलाव भी दोनों देशों के रक्षा संबंधों की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।

फिलहाल RELOS समझौते का लागू होना भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा सहयोग में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। इससे दोनों देशों की सेनाओं को आपसी लॉजिस्टिक सहयोग, संयुक्त प्रशिक्षण और निर्धारित सैन्य गतिविधियों के दौरान बेहतर समन्वय स्थापित करने के लिए एक औपचारिक व्यवस्था मिल गई है।