भारत और यूरोपीय संघ के बीच रिश्ते लगातार कई नए क्षेत्रों में विस्तार की ओर बढ़ रहे हैं। व्यापार, निवेश, रक्षा, तकनीक, साइबर सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच बातचीत आगे बढ़ रही है। हालांकि, भारत के रूस के साथ लंबे समय से चले आ रहे आर्थिक और रक्षा संबंध इस साझेदारी में एक अहम पहलू बने हुए हैं। भारत में यूरोपीय संघ के नए राजदूत जीन-एरिक पैकेट ने भारत-EU संबंधों को लेकर कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी बात रखी है। उन्होंने माना कि रूस और भारत के बीच जारी व्यापारिक तथा रक्षा संबंध यूरोप की भारत के साथ रक्षा औद्योगिक साझेदारी बढ़ाने की कोशिशों में एक चुनौती के रूप में मौजूद हैं।
राजदूत के मुताबिक, भारत और यूरोप के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं काफी व्यापक हैं, लेकिन दोनों पक्षों को यह भी देखना होगा कि मौजूदा परिस्थितियों में किन क्षेत्रों में मिलकर काम किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच सूचना सुरक्षा समझौते को लेकर भी बातचीत चल रही है। यह समझौता दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि इससे संवेदनशील सूचनाओं और तकनीकी सहयोग से जुड़े क्षेत्रों में आगे बढ़ने की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।
पैकेट ने कहा कि यूरोपीय संघ के कई सदस्य देश पहले से भारत को अलग-अलग संसाधन और तकनीकी सहयोग उपलब्ध करा रहे हैं। दूसरी ओर भारत भी यूरोपीय सप्लाई चेन में कुछ महत्वपूर्ण कंपोनेंट उपलब्ध कराता है। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच औद्योगिक सहयोग का आधार पहले से मौजूद है। अब कोशिश इस सहयोग को और व्यवस्थित तथा व्यापक बनाने की है।
रक्षा उद्योग में नई साझेदारी का प्रस्ताव
भारत और यूरोपीय संघ रक्षा क्षेत्र में सिर्फ खरीद-बिक्री तक सीमित संबंधों के बजाय संयुक्त औद्योगिक सहयोग की दिशा में भी आगे बढ़ने पर विचार कर रहे हैं। राजदूत पैकेट के अनुसार, दोनों पक्ष एक भारत-EU रक्षा उद्योग मंच बनाने की संभावना पर चर्चा कर रहे हैं। इस प्रस्तावित मंच के जरिए भारत और यूरोप की रक्षा कंपनियों को एक-दूसरे के करीब लाने और सप्लाई चेन में सहयोग की संभावनाएं तलाशने की कोशिश की जाएगी।
इस तरह के प्लेटफॉर्म से कंपनियों के बीच बातचीत बढ़ सकती है और भविष्य में संयुक्त उत्पादन या जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग की संभावनाएं खुल सकती हैं। भारत पिछले कुछ वर्षों में रक्षा उत्पादन और आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहा है। ऐसे में यूरोपीय कंपनियों के साथ तकनीक, उत्पादन और सप्लाई चेन के स्तर पर सहयोग भारत के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
हालांकि, पैकेट ने साफ संकेत दिया कि रूस के साथ भारत के मौजूदा संबंधों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसे यूरोपीय संघ के लिए एक ऐसी बाधा बताया, जिसे भारत के साथ रक्षा औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाते समय ध्यान में रखना होगा।
रूस-यूक्रेन युद्ध पर मोदी के रुख की EU ने की सराहना
भारत और रूस के रिश्तों की चर्चा के बीच राजदूत पैकेट ने रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रुख का भी उल्लेख किया। उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को युद्ध खत्म करने और बातचीत की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश देने वाले मोदी के रुख का स्वागत किया।
पैकेट ने उम्मीद जताई कि भारत की ओर से लगातार शांति और बातचीत पर जोर दिए जाने से रूस को संघर्ष समाप्त करने के लिए वार्ता की मेज तक लाने में मदद मिल सकती है। यूरोपीय संघ लंबे समय से रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त करता रहा है। ऐसे में भारत की भूमिका और उसके रूस के साथ संवाद को यूरोप की नजर से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत ने इस संघर्ष के दौरान रूस और पश्चिमी देशों दोनों के साथ अपने अलग-अलग संबंध बनाए रखे हैं। यूरोपीय संघ के साथ बढ़ते संबंधों के बीच यह संतुलन आगे भी भारत-EU बातचीत में चर्चा का विषय बना रह सकता है।
FTA के साथ निवेश सुरक्षा समझौते पर भी आगे बढ़ रही बातचीत
भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार संबंधों को नई दिशा देने के लिए प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी FTA भी बातचीत के प्रमुख मुद्दों में शामिल है। राजदूत पैकेट ने बताया कि EU केवल FTA तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के साथ निवेश सुरक्षा समझौते पर भी बातचीत चल रही है।
उनके मुताबिक, इस निवेश समझौते को लेकर 2027 की पहली छमाही में लागू होने की उम्मीद है। ऐसे समझौते का उद्देश्य दोनों क्षेत्रों के निवेशकों के लिए अधिक स्पष्ट और सुरक्षित कारोबारी माहौल तैयार करना होता है।
FTA को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिसंबर में ब्रुसेल्स दौरे से जुड़ी संभावनाओं पर भी सवाल किया गया था। पैकेट ने इस यात्रा की पुष्टि नहीं की। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि यदि ऐसा दौरा होता है तो समझौते को अंतिम रूप देने के लिए यह एक प्रभावी अवसर साबित हो सकता है।
भारत और EU के बीच लंबे समय से व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही है। दोनों पक्षों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ाने के साथ-साथ बाजार पहुंच से जुड़े मुद्दे भी इस प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
रूसी तेल खरीद पर यूरोप की क्या चिंता है?
भारत के रूस से आर्थिक संबंधों का एक बड़ा हिस्सा ऊर्जा व्यापार से जुड़ा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूसी ऊर्जा की खरीद जारी रखी, जबकि यूरोपीय संघ ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं। राजदूत पैकेट ने माना कि EU के प्रतिबंध भारत को रूसी ऊर्जा खरीदने से रोकने में सफल नहीं रहे।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रूसी तेल से बने कुछ पेट्रोलियम उत्पादों के यूरोपीय बाजार में पहुंचने पर अलग-अलग नियम और सीमाएं लागू होती हैं। यह विषय भारत और यूरोपीय संघ के बीच आर्थिक संबंधों में संवेदनशील मुद्दों में से एक बना हुआ है।
इसके बावजूद दोनों पक्ष ऐसे क्षेत्रों की तलाश कर रहे हैं जहां व्यावहारिक सहयोग को बढ़ाया जा सके। समुद्री सुरक्षा और नौसैनिक सहयोग भी इसी व्यापक एजेंडे का हिस्सा है।
समुद्री सुरक्षा और साइबर क्षेत्र में बढ़ सकता है सहयोग
राजदूत पैकेट ने ‘ऑपरेशन अटलांटा’ के तहत भारत और EU के बीच प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर चल रही बातचीत का भी उल्लेख किया। इसका उद्देश्य दोनों पक्षों की नौसेनाओं के बीच बेहतर समन्वय और सहयोग को मजबूत करना बताया गया है।
समुद्री मार्गों की सुरक्षा को भारत और यूरोप दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर इंडो-पैसिफिक और पश्चिमी एशिया के आसपास बदलती परिस्थितियों के बीच सुरक्षित समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार के लिए अहम हैं। पैकेट ने कहा कि नेविगेशन की स्वतंत्रता को लेकर भारत और यूरोप की सोच में काफी समानता है।
उन्होंने साइबर सुरक्षा, विदेशी हस्तक्षेप और सूचना में हेरफेर जैसे मुद्दों पर भी भविष्य में अधिक सहयोग की संभावना जताई। डिजिटल तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ इन विषयों को दोनों पक्षों की सुरक्षा और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
IMEC को लेकर EU की प्राथमिकता बरकरार
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी IMEC की गति प्रभावित होने को लेकर भी राजदूत से सवाल किया गया। उन्होंने कहा कि भारत और यूरोपीय संघ इस परियोजना को महत्वपूर्ण मानते हैं और इसे आगे बढ़ाने के लिए निवेश जारी है।
IMEC का उद्देश्य भारत को पश्चिम एशिया के रास्ते यूरोप से जोड़ने वाली एक आधुनिक आर्थिक और परिवहन व्यवस्था तैयार करना है। इसके तहत समुद्री और रेल संपर्क के जरिए सामान तथा ऊर्जा के परिवहन को आसान बनाने की परिकल्पना की गई है।
पैकेट ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में सबसे जरूरी बात समुद्री मार्गों पर आवाजाही की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करना है। उनका कहना था कि सुरक्षित और खुले समुद्री रास्ते भारत तथा यूरोप के बीच आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने में मदद कर सकते हैं। इसी व्यापक लक्ष्य से IMEC को भी जोड़ा जा रहा है।
CBAM पर भारत और यूरोप के बीच बातचीत
भारत और EU के बीच एक अन्य अहम मुद्दा कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM है। यूरोपीय संघ इसे अपनी जलवायु नीति का हिस्सा मानता है। इसके तहत कुछ कार्बन-गहन उत्पादों के आयात पर उनके कार्बन उत्सर्जन से जुड़े प्रावधान लागू होते हैं।
पैकेट ने बताया कि इस मुद्दे पर बातचीत के लिए ब्रुसेल्स से एक टीम भारत आएगी। EU का कहना है कि CBAM का एक उद्देश्य कार्बन लीकेज को रोकना और यूरोपीय उद्योगों के लिए समान प्रतिस्पर्धी परिस्थितियां बनाए रखना है।
भारत की ओर से भी इस व्यवस्था को लेकर अपनी चिंताएं और सवाल उठाए जाते रहे हैं। ऐसे में आने वाली बातचीत दोनों पक्षों के बीच इस विषय को समझने और संभावित समाधान तलाशने का अवसर दे सकती है।
राजदूत ने कहा कि यूरोपीय संघ पार्टनर देशों में कार्बन प्राइसिंग को बढ़ावा देने की संभावना को भी महत्वपूर्ण मानता है। भारत और यूरोप के बीच इस विषय पर आगे की बातचीत से यह स्पष्ट हो सकता है कि दोनों पक्ष पर्यावरणीय लक्ष्यों और व्यापारिक हितों के बीच किस तरह तालमेल बनाने की कोशिश करते हैं।
भारत और EU के संबंध इस समय केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। रक्षा उद्योग, निवेश, ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, इंडो-पैसिफिक, IMEC और जलवायु नीति जैसे कई विषय एक साथ बातचीत के एजेंडे में हैं। वहीं रूस के साथ भारत के पुराने रक्षा और ऊर्जा संबंध यूरोप के साथ बढ़ती साझेदारी में एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि प्रदान कर रहे हैं। आने वाले समय में FTA, निवेश सुरक्षा समझौते और रक्षा औद्योगिक सहयोग से जुड़े फैसले यह तय करेंगे कि भारत और यूरोपीय संघ अपने संबंधों को किस तरह अगले चरण तक ले जाते हैं।



