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भारत-बांग्लादेश CEPA समझौते की तैयारी तेज, व्यापार, निवेश और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को मिल सकती है नई गति
भारत और बांग्लादेश के बीच आर्थिक संबंधों को और मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। बांग्लादेश सरकार ने भारत के साथ व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (Comprehensive Economic Partnership Agreement – CEPA) करने की अपनी मंशा दोहराई है। सरकार का मानना है कि इस समझौते के माध्यम से दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों का विस्तार होगा, निवेश को बढ़ावा मिलेगा और बदलते वैश्विक आर्थिक माहौल में दोनों अर्थव्यवस्थाओं को दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।
बांग्लादेश सरकार की ओर से यह जानकारी संसद में साझा की गई। सरकार ने स्पष्ट किया कि भारत के साथ प्रस्तावित CEPA केवल व्यापार बढ़ाने का माध्यम नहीं होगा, बल्कि इसका उद्देश्य व्यापारिक प्रक्रियाओं को सरल बनाना, निवेश सहयोग को मजबूत करना, उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाना और दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी को व्यापक स्वरूप देना भी है।
संसद में सरकार ने रखी आर्थिक रणनीति
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, संसद की कार्यवाही के दौरान वाणिज्य मंत्री अब्दुल मुक्तदिर उपस्थित नहीं थे। उनकी अनुपस्थिति में वाणिज्य राज्य मंत्री शरीफुल आलम ने सांसदों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए सरकार की व्यापार और आर्थिक रणनीति पर विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि बांग्लादेश सरकार वर्तमान समय में ऐसे आर्थिक सुधारों पर काम कर रही है जिनसे घरेलू उद्योगों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाया जा सके। सरकार का उद्देश्य आयात पर अत्यधिक निर्भरता कम करना, स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देना और निर्यात क्षमता का विस्तार करना है।
राज्य मंत्री ने बताया कि सरकार घरेलू उद्योगों को आधुनिक तकनीक, बेहतर उत्पादन प्रणाली और आवश्यक कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न नीतिगत कदम उठा रही है। उनका कहना था कि यदि विनिर्माण क्षेत्र मजबूत होगा तो देश की निर्यात क्षमता भी स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी।
CEPA क्या है और इसका उद्देश्य क्या होता है?
व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) सामान्य मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की तुलना में अधिक व्यापक माना जाता है। इसमें केवल वस्तुओं के व्यापार तक सीमित प्रावधान नहीं होते, बल्कि सेवाओं, निवेश, बौद्धिक संपदा, डिजिटल व्यापार, सीमा शुल्क प्रक्रियाओं, व्यापार सुविधा, आर्थिक सहयोग और विभिन्न नियामक क्षेत्रों को भी शामिल किया जा सकता है।
ऐसे समझौतों का उद्देश्य दो देशों के बीच व्यापारिक बाधाओं को कम करना, निवेश को प्रोत्साहित करना तथा आर्थिक गतिविधियों को अधिक सुगम बनाना होता है। यदि भारत और बांग्लादेश के बीच CEPA लागू होता है तो भविष्य में दोनों देशों के उद्योगों और कारोबारियों को कई क्षेत्रों में सहयोग के नए अवसर मिल सकते हैं।
व्यापार असंतुलन कम करने पर सरकार का जोर
बांग्लादेश सरकार ने संसद में यह भी कहा कि भारत के साथ प्रस्तावित समझौते का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य दोनों देशों के बीच मौजूद व्यापार असंतुलन को कम करना है।
सरकार का कहना है कि वर्तमान समय में भारत से बांग्लादेश का आयात निर्यात की तुलना में काफी अधिक है। यदि बांग्लादेशी उत्पादों को भारतीय बाजार में बेहतर पहुंच मिलती है तो देश के निर्यात में वृद्धि हो सकती है और व्यापार संतुलन में सुधार आने की संभावना बनेगी।
सरकार का मानना है कि व्यापारिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने और बाजार तक आसान पहुंच मिलने से स्थानीय उद्योगों को भी प्रतिस्पर्धा करने का बेहतर अवसर मिलेगा।
द्विपक्षीय व्यापार के आंकड़े
संसद में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान भारत और बांग्लादेश के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 11.39 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।
इन आंकड़ों के अनुसार बांग्लादेश का भारत को निर्यात लगभग 1.76 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जबकि व्यापार का बड़ा हिस्सा भारत से होने वाले आयात का था। यही कारण है कि बांग्लादेश सरकार व्यापार असंतुलन को कम करने के लिए नई आर्थिक रणनीति पर कार्य कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच व्यापारिक बाधाएं कम होती हैं और निर्यात को प्रोत्साहन मिलता है तो व्यापार संतुलन में धीरे-धीरे सुधार संभव हो सकता है।
किन क्षेत्रों को मिल सकता है लाभ?
यदि भारत और बांग्लादेश के बीच CEPA पर सहमति बनती है तो कई औद्योगिक क्षेत्रों को इसका लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
- रेडीमेड गारमेंट उद्योग
- वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र
- कृषि एवं कृषि आधारित उत्पाद
- चमड़ा एवं चमड़े से जुड़े उत्पाद
- दवा उद्योग
- खाद्य प्रसंस्करण उद्योग
- हल्के इंजीनियरिंग उत्पाद
- विनिर्माण क्षेत्र
- सेवा क्षेत्र
- सूचना प्रौद्योगिकी आधारित सेवाएं
विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय बाजार तक बेहतर पहुंच मिलने से बांग्लादेशी निर्यातकों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं। वहीं भारतीय कंपनियों को भी निवेश और औद्योगिक सहयोग के नए विकल्प मिल सकते हैं।
स्थानीय उद्योगों को मजबूत करने की नीति
बांग्लादेश सरकार ने संसद में कहा कि उसकी आर्थिक नीति का मुख्य उद्देश्य घरेलू उद्योगों को मजबूत बनाना है।
सरकार चाहती है कि जिन वस्तुओं का निर्माण देश के भीतर संभव है, उनके लिए आयात पर निर्भरता कम की जाए। इसके साथ-साथ उद्योगों को आधुनिक मशीनरी, तकनीक और गुणवत्तापूर्ण कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आयात को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
सरकार का मानना है कि इस रणनीति से उत्पादन क्षमता बढ़ेगी, रोजगार के अवसर पैदा होंगे और निर्यात में भी सकारात्मक वृद्धि देखने को मिल सकती है।
निवेश बढ़ाने पर विशेष ध्यान
CEPA के संभावित लाभों में निवेश सहयोग भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यदि दोनों देशों के बीच निवेश संबंधी प्रक्रियाएं सरल होती हैं तो भारतीय कंपनियां बांग्लादेश में विनिर्माण, बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स, सूचना प्रौद्योगिकी और सेवा क्षेत्र में निवेश बढ़ा सकती हैं।
इसी प्रकार बांग्लादेशी उद्योगों को भी भारतीय बाजार में विस्तार के बेहतर अवसर प्राप्त हो सकते हैं। इससे दोनों देशों के निजी क्षेत्र के बीच आर्थिक सहयोग और मजबूत हो सकता है।
LDC दर्जा समाप्त होने की तैयारी
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के साथ CEPA की दिशा में बांग्लादेश की सक्रियता का एक बड़ा कारण उसका बदलता अंतरराष्ट्रीय आर्थिक दर्जा भी है।
आने वाले वर्षों में बांग्लादेश संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित Least Developed Country (LDC) श्रेणी से बाहर हो जाएगा। LDC का दर्जा समाप्त होने के बाद कई विकसित बाजारों में उसे वर्तमान में मिलने वाली विशेष व्यापारिक रियायतें समाप्त हो सकती हैं।
ऐसी स्थिति में नए मुक्त व्यापार समझौते और व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते बांग्लादेश के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं ताकि उसके निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव कम हो सके।
शुल्क रियायतों पर पड़ सकता है असर
LDC श्रेणी से बाहर आने के बाद बांग्लादेश को कई देशों में शुल्क मुक्त या रियायती व्यापार की जो सुविधाएं मिलती रही हैं, उनमें बदलाव संभव है।
यदि ऐसी रियायतें समाप्त होती हैं तो बांग्लादेशी उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसी कारण सरकार पहले से ऐसे समझौतों पर काम कर रही है जिनसे उसके निर्यातकों को बड़े बाजारों तक निरंतर पहुंच मिलती रहे।
भारत के साथ CEPA को इसी व्यापक आर्थिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
अन्य देशों के साथ भी बढ़ रहा है सहयोग
बांग्लादेश सरकार ने संसद में यह भी जानकारी दी कि वह केवल भारत के साथ ही नहीं बल्कि अन्य देशों के साथ भी व्यापारिक समझौतों का विस्तार कर रही है।
सरकार के अनुसार—
- भूटान के साथ 6 दिसंबर 2020 को व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।
- जापान के साथ 6 फरवरी 2026 को द्विपक्षीय व्यापार समझौते को आगे बढ़ाया गया।
इन समझौतों का उद्देश्य निर्यात बढ़ाना, निवेश आकर्षित करना और वैश्विक बाजारों में बांग्लादेश की भागीदारी मजबूत करना है।
दक्षिण एशियाई व्यापार को बढ़ावा देने की योजना
सरकार ने यह भी कहा कि दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) के सदस्य देशों के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए भी कई कदम उठाए जा रहे हैं।
इन प्रयासों में शामिल हैं—
- गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करना।
- संवेदनशील वस्तुओं की सूची में कमी लाना।
- आयात-निर्यात प्रक्रियाओं को सरल बनाना।
- सीमा शुल्क सहयोग बढ़ाना।
- द्विपक्षीय व्यापार समझौतों को प्रोत्साहित करना।
- क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण को मजबूत करना।
सरकार का मानना है कि यदि दक्षिण एशिया के देशों के बीच व्यापार बढ़ता है तो पूरे क्षेत्र की आर्थिक विकास दर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
भारत-बांग्लादेश आर्थिक संबंधों का महत्व
भारत और बांग्लादेश लंबे समय से एक-दूसरे के महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार रहे हैं। दोनों देशों के बीच सड़क, रेल, अंतर्देशीय जलमार्ग और समुद्री संपर्क में पिछले कुछ वर्षों के दौरान उल्लेखनीय विस्तार हुआ है।
इसके अलावा ऊर्जा सहयोग, सीमा पार व्यापार, बिजली आपूर्ति, परिवहन संपर्क और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में भी दोनों देशों ने कई संयुक्त परियोजनाओं पर कार्य किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि CEPA पर सहमति बनती है तो इन मौजूदा सहयोग क्षेत्रों को और अधिक मजबूती मिल सकती है।
व्यापारिक प्रक्रियाएं हो सकती हैं आसान
आर्थिक जानकारों के अनुसार CEPA लागू होने की स्थिति में कई व्यापारिक प्रक्रियाओं को सरल बनाया जा सकता है।
संभावित लाभों में शामिल हो सकते हैं—
- सीमा शुल्क प्रक्रियाओं का सरलीकरण।
- दस्तावेजी औपचारिकताओं में कमी।
- व्यापार लागत में संभावित कमी।
- आपूर्ति श्रृंखला को अधिक प्रभावी बनाना।
- सीमा पार लॉजिस्टिक्स में सुधार।
- उद्योगों के बीच तकनीकी सहयोग बढ़ाना।
- निवेशकों के लिए बेहतर कारोबारी वातावरण तैयार करना।
हालांकि, समझौते के अंतिम स्वरूप का निर्धारण दोनों देशों के बीच होने वाली औपचारिक वार्ताओं और आपसी सहमति के बाद ही होगा।
क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को मिल सकती है नई दिशा
भारत और बांग्लादेश के बीच प्रस्तावित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता केवल द्विपक्षीय व्यापार तक सीमित नहीं माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को भी नई दिशा दे सकता है।
यदि व्यापार, निवेश, सेवाओं, उद्योग, लॉजिस्टिक्स और आर्थिक नीतियों में सहयोग बढ़ता है तो दोनों देशों के निजी क्षेत्र, विनिर्माण उद्योग, निर्यातकों तथा निवेशकों को दीर्घकालिक अवसर मिल सकते हैं। बांग्लादेश सरकार इसी दृष्टिकोण के साथ CEPA को अपनी भविष्य की आर्थिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रही है और भारत के साथ व्यापक आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक रुख बनाए हुए है।




