भारत में सैटेलाइट इंटरनेट के क्षेत्र में आने वाले समय में बड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। रिलायंस जियो इस बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने के लिए लो अर्थ ऑर्बिट यानी LEO सैटेलाइट का विशाल नेटवर्क तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। कंपनी की योजना करीब 1,600 सैटेलाइट वाले कॉन्स्टेलेशन को विकसित करने की है, जिसके जरिए भारत समेत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हाई-स्पीड इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।
रिलायंस जियो के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में सबसे महत्वपूर्ण चरण टेस्ट फ्लाइट को माना जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी अगले साल सितंबर में अपने प्रस्तावित LEO नेटवर्क के लिए शुरुआती परीक्षण के तौर पर कुछ सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेज सकती है। इस परीक्षण के जरिए जियो यह परखना चाहती है कि उसका हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, नेटवर्क सिस्टम और दूसरी तकनीक वास्तविक अंतरिक्ष परिस्थितियों में किस तरह काम करती है।
हालांकि जियो का अंतिम लक्ष्य ग्लोबल कनेक्टिविटी देना है, लेकिन शुरुआती चरण में कंपनी का मुख्य ध्यान भारत पर रहने वाला है। देश के ऐसे हिस्सों तक तेज इंटरनेट पहुंचाने की कोशिश की जाएगी जहां अभी पारंपरिक ब्रॉडबैंड या मोबाइल नेटवर्क की पहुंच सीमित है।
पहले टेस्ट, फिर बड़े स्तर पर नेटवर्क की तैनाती
जियो के सैटेलाइट नेटवर्क को एक साथ तैयार करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से विकसित किए जाने की योजना है। टेस्ट फ्लाइट के बाद कंपनी बड़े पैमाने पर सैटेलाइट लॉन्च की दिशा में बढ़ सकती है। रिपोर्ट के अनुसार 2028 की शुरुआत से बड़े स्तर पर तैनाती शुरू होने की संभावना है।
टेस्ट मिशन का उद्देश्य केवल सैटेलाइट को अंतरिक्ष में पहुंचाना नहीं होगा। इसके जरिए जियो अपने पूरे सिस्टम की तकनीकी क्षमता की जांच करेगी। इसमें सैटेलाइट से ग्राउंड स्टेशन तक कनेक्शन, डेटा ट्रांसमिशन, नेटवर्क कंट्रोल, सॉफ्टवेयर और अन्य जरूरी तकनीकों का परीक्षण शामिल हो सकता है।
सूत्रों के मुताबिक शुरुआती परीक्षण के बाद अगले दो से तीन तिमाहियों के भीतर करीब 90 से 100 कवरेज सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजने की योजना है। यदि यह कार्यक्रम तय समय के मुताबिक आगे बढ़ता है, तो भारत में सैटेलाइट आधारित इंटरनेट सेवा की शुरुआत 2028 के दौरान देखने को मिल सकती है।
इस तरह टेस्ट फ्लाइट जियो के लिए केवल एक प्रयोग नहीं बल्कि उसके पूरे सैटेलाइट इंटरनेट कारोबार की नींव रखने वाला अहम कदम साबित हो सकती है।
2030 तक 400-450 सैटेलाइट का लक्ष्य
रिलायंस जियो का सैटेलाइट नेटवर्क काफी बड़े स्तर पर तैयार किया जाना है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कंपनी का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 400 से 450 सैटेलाइट तैनात करने का है। इसके बाद नेटवर्क का विस्तार जारी रहेगा और वर्ष 2035 तक पूरे कॉन्स्टेलेशन को पूरा करने की योजना बताई गई है।
पूरी योजना के तहत लगभग 1,600 सैटेलाइट का नेटवर्क तैयार किया जाना है। इतनी बड़ी संख्या में सैटेलाइट के जरिए कंपनी पृथ्वी के बड़े हिस्से को कवर करने की क्षमता विकसित करना चाहती है।
LEO सैटेलाइट पारंपरिक जियोस्टेशनरी सैटेलाइट की तुलना में पृथ्वी के काफी करीब रहते हैं। इसका एक बड़ा फायदा कम लेटेंसी के रूप में देखा जाता है। इसी वजह से दुनिया की कई बड़ी टेक्नोलॉजी और स्पेस कंपनियां सैटेलाइट इंटरनेट के लिए LEO नेटवर्क पर काम कर रही हैं।
जियो भी इसी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए ऐसे ग्राहकों तक ब्रॉडबैंड पहुंचाने की तैयारी में है, जहां जमीन पर फाइबर या दूसरे पारंपरिक नेटवर्क का विस्तार करना मुश्किल या महंगा है।
भारत के दूरदराज इलाकों तक पहुंचाने की तैयारी
जियो के प्लान में सबसे महत्वपूर्ण बात उन क्षेत्रों को कनेक्ट करना है जहां अभी हाई-स्पीड इंटरनेट की सुविधा पर्याप्त नहीं है। कंपनी हाई थ्रूपुट सैटेलाइट यानी HTS तकनीक का इस्तेमाल करके ज्यादा क्षमता वाला ब्रॉडबैंड नेटवर्क तैयार करने की दिशा में बढ़ रही है।
HTS तकनीक के जरिए एक सैटेलाइट से बड़ी मात्रा में डेटा ट्रांसफर किया जा सकता है। इससे एक ही सैटेलाइट के माध्यम से बड़ी संख्या में यूजर्स को इंटरनेट सेवा देने की क्षमता बढ़ जाती है।
भारत जैसे बड़े और भौगोलिक रूप से विविध देश में इसका महत्व काफी अधिक हो सकता है। पहाड़ी इलाकों, सीमावर्ती क्षेत्रों, द्वीपों और ऐसे ग्रामीण क्षेत्रों में जहां फाइबर नेटवर्क पहुंचाना कठिन है, सैटेलाइट कनेक्टिविटी एक वैकल्पिक समाधान बन सकती है।
जियो की योजना केवल शहरों में मौजूद इंटरनेट नेटवर्क को मजबूत करने तक सीमित नहीं बताई जा रही है। कंपनी का उद्देश्य ऐसे क्षेत्रों को भी हाई-स्पीड कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना है, जहां अभी डिजिटल सेवाओं की पहुंच अपेक्षाकृत कम है।
एक सैटेलाइट से 100-150 Gbps क्षमता
जियो के प्रस्तावित कॉन्स्टेलेशन की तकनीकी क्षमता भी इसे खास बनाती है। रिपोर्ट के अनुसार कंपनी के प्रत्येक सैटेलाइट से करीब 100 से 150 गीगाबिट प्रति सेकंड यानी Gbps थ्रूपुट मिलने की उम्मीद है।
अगर पूरे नेटवर्क को इसी क्षमता के साथ विकसित किया जाता है, तो यह भारत में प्रस्तावित LEO सैटेलाइट नेटवर्क के बीच काफी बड़ी क्षमता वाला सिस्टम बन सकता है।
पूरे कॉन्स्टेलेशन के तैयार होने पर भारत के ऊपर संबंधित ऑर्बिट में लगभग 30 से 32 सैटेलाइट मौजूद रहने की बात कही गई है। इनकी संयुक्त क्षमता करीब 4 से 4.8 टेराबिट प्रति सेकंड यानी Tbps तक पहुंच सकती है।
यह क्षमता बताती है कि कंपनी केवल सीमित संख्या में ग्राहकों को कनेक्ट करने वाला छोटा नेटवर्क बनाने के बजाय बड़े पैमाने पर सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवा की तैयारी कर रही है।
650 किलोमीटर की ऊंचाई पर होंगे Jio के सैटेलाइट
जियो के सैटेलाइट नेटवर्क की एक और खासियत उनकी प्रस्तावित ऊंचाई होगी। रिपोर्ट के मुताबिक जियो के LEO सैटेलाइट्स को पृथ्वी की सतह से करीब 650 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित करने की योजना है।
LEO नेटवर्क के लिए सैटेलाइट की ऊंचाई एक महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू होती है, क्योंकि इसका सीधा संबंध कवरेज, लेटेंसी, सैटेलाइट की संख्या और नेटवर्क डिजाइन से होता है।
जियो का प्रस्तावित ऑर्बिटल स्तर उसे दुनिया की प्रमुख सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों के साथ सीधे प्रतिस्पर्धा की स्थिति में ला सकता है। यही कारण है कि भारत के सैटेलाइट ब्रॉडबैंड बाजार में आने वाले वर्षों में मुकाबला काफी दिलचस्प होने की संभावना है।
मस्क की Starlink और Bezos की Amazon Leo से मुकाबला
सैटेलाइट इंटरनेट की वैश्विक दौड़ में एलन मस्क की कंपनी Starlink पहले से ही एक प्रमुख नाम है। वहीं जेफ बेजोस की Amazon भी LEO आधारित सैटेलाइट इंटरनेट नेटवर्क तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
भारत में भी इन कंपनियों की योजनाओं को लेकर काफी चर्चा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक Starlink को भारत में 600 Gbps क्षमता की मंजूरी मिली है, जबकि Amazon LEO ने करीब 3 Tbps क्षमता के लिए आवेदन किया है।
ऐसे में जियो का प्रस्तावित 4 से 4.8 Tbps का नेटवर्क क्षमता के लिहाज से इन योजनाओं से बड़ा दिखाई देता है। हालांकि अंतिम क्षमता और वास्तविक प्रदर्शन इस बात पर निर्भर करेगा कि नेटवर्क किस तरह तैनात होता है और नियामकीय मंजूरियों तथा तकनीकी परीक्षणों के बाद इसका संचालन किस स्वरूप में किया जाता है।
इस लिहाज से जियो की एंट्री भारत के सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में प्रतिस्पर्धा को और तेज कर सकती है।
ITU में दाखिल किया गया आवेदन
इतने बड़े सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन को अंतरिक्ष में स्थापित करने के लिए केवल सैटेलाइट तैयार करना ही पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए ऑर्बिटल स्लॉट और रेडियो फ्रीक्वेंसी से जुड़े अंतरराष्ट्रीय समन्वय की भी जरूरत होती है।
इसी प्रक्रिया के तहत जियो ने इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन यानी ITU के पास अपना आवेदन जमा किया है। ITU संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रेडियो फ्रीक्वेंसी और ऑर्बिटल संसाधनों के समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों के लिए यह प्रक्रिया इसलिए अहम है क्योंकि बड़ी संख्या में सैटेलाइट पृथ्वी की कक्षा में भेजे जाने पर अलग-अलग नेटवर्क के बीच फ्रीक्वेंसी और ऑर्बिटल इंटरफेरेंस से जुड़ी चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।
जियो की ओर से दाखिल किया गया आवेदन उसके LEO नेटवर्क को लेकर कंपनी की लंबी अवधि की तैयारी को दर्शाता है।
IN-SPACe से भी मिल चुकी है मंजूरी
जियो की सैटेलाइट योजना को भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़े नियामकीय स्तर पर भी आगे बढ़ाया जा चुका है। इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर यानी IN-SPACe ने जियो की योजना को मंजूरी दे दी है।
भारत में निजी कंपनियों की अंतरिक्ष गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए IN-SPACe की भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे में इस मंजूरी के बाद जियो के लिए अपने सैटेलाइट नेटवर्क को अगले चरणों में ले जाने का रास्ता खुलता है।
अब आने वाले समय में टेस्ट लॉन्च और उसके बाद सैटेलाइट्स की चरणबद्ध तैनाती इस परियोजना के सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव होंगे।
2028 में शुरू हो सकती है सैटेलाइट कनेक्टिविटी
जियो के प्रस्तावित कार्यक्रम को देखें तो 2027 का सितंबर टेस्टिंग के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है। इसके बाद अगर तकनीकी परीक्षण सफल रहते हैं और जरूरी प्रक्रियाएं समय पर पूरी होती हैं, तो 2028 की शुरुआत से बड़े पैमाने पर सैटेलाइट तैनाती शुरू हो सकती है।
90 से 100 कवरेज सैटेलाइट की शुरुआती तैनाती के बाद भारत में सेवा उपलब्ध कराने की दिशा में तेजी आ सकती है। इसके बाद धीरे-धीरे नेटवर्क का विस्तार करते हुए 2030 तक 400-450 सैटेलाइट और आगे 2035 तक लगभग 1,600 सैटेलाइट के लक्ष्य की ओर बढ़ने की योजना है।
हालांकि यह पूरा कार्यक्रम कई तकनीकी, नियामकीय और लॉन्च से जुड़ी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
जियो के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह प्रोजेक्ट?
रिलायंस जियो पहले ही भारत के टेलीकॉम और डिजिटल बाजार में बड़ा नेटवर्क खड़ा कर चुकी है। अब सैटेलाइट इंटरनेट के क्षेत्र में प्रवेश कंपनी के लिए कनेक्टिविटी कारोबार का अगला बड़ा विस्तार हो सकता है।
अगर LEO नेटवर्क योजना के मुताबिक तैयार होता है, तो जियो के पास जमीन पर मौजूद अपने मौजूदा नेटवर्क के साथ सैटेलाइट कनेक्टिविटी को जोड़ने का अवसर होगा। इससे दूरदराज के इलाकों में इंटरनेट पहुंचाने के नए रास्ते खुल सकते हैं।
सैटेलाइट इंटरनेट का इस्तेमाल केवल सामान्य ब्रॉडबैंड के लिए ही नहीं, बल्कि बैकअप कनेक्टिविटी, ग्रामीण डिजिटल सेवाओं, आपदा के समय संचार और उन क्षेत्रों में इंटरनेट उपलब्ध कराने के लिए भी किया जा सकता है जहां पारंपरिक नेटवर्क की पहुंच सीमित है।
फिलहाल जियो की ओर से टेस्ट फ्लाइट और ITU आवेदन से जुड़े सवालों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन प्रस्तावित 1,600 LEO सैटेलाइट नेटवर्क, 650 किलोमीटर की ऑर्बिटल ऊंचाई और 4 से 4.8 Tbps तक की संभावित क्षमता इसे भारत के उभरते सैटेलाइट इंटरनेट बाजार की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में शामिल करती है।
अब सबकी नजर जियो के प्रस्तावित टेस्ट लॉन्च पर होगी। यदि शुरुआती परीक्षण सफल रहता है, तो 2028 से भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का एक नया दौर शुरू हो सकता है, जिसमें मुकेश अंबानी की जियो का मुकाबला एलन मस्क की Starlink और जेफ बेजोस की Amazon LEO जैसी वैश्विक कंपनियों से होगा।




