युद्ध की आहट का वैश्विक बाजारों पर असर: एशियाई शेयरों में उतार-चढ़ाव, कच्चे तेल में तेज उछाल, वॉल स्ट्रीट में सीमित बढ़त

युद्ध की आहट का वैश्विक बाजारों पर असर: एशियाई शेयरों में उतार-चढ़ाव, कच्चे तेल में तेज उछाल, वॉल स्ट्रीट में सीमित बढ़त

मध्य-पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक वित्तीय बाजारों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है, जिसके चलते दुनिया भर के शेयर बाजारों में अस्थिरता का माहौल बना हुआ है। सुरक्षित निवेश (Safe Haven Assets) की ओर निवेशकों का झुकाव बढ़ रहा है, जबकि जोखिम वाले निवेशों में बिकवाली देखी जा रही है।

3 मार्च को एशियाई शेयर बाजारों में मिला-जुला कारोबार देखने को मिला। कुछ बाजारों में तेज गिरावट दर्ज की गई, जबकि कुछ सूचकांक सीमित दायरे में कारोबार करते रहे। इसी बीच कच्चे तेल की कीमतों में लगातार दूसरे दिन भी बड़ी तेजी देखने को मिली, जिसने ऊर्जा बाजार और आयातक देशों की चिंता बढ़ा दी है।

भारत में होली के अवसर पर घरेलू शेयर बाजार बंद रहे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजारों की हलचल पर निवेशकों की नजर बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मध्य-पूर्व में तनाव और बढ़ता है तो आने वाले दिनों में वैश्विक बाजारों में उतार-चढ़ाव और तेज हो सकता है।

एशियाई शेयर बाजारों में कैसा रहा कारोबार?

एशिया के अधिकांश शेयर बाजारों में निवेशकों का रुख सतर्क दिखाई दिया। बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिम के कारण कई प्रमुख सूचकांकों में दबाव बना रहा।

जापान का निक्केई इंडेक्स दबाव में

जापान के शेयर बाजार में बिकवाली का माहौल देखने को मिला। निक्केई इंडेक्स करीब 2.3 प्रतिशत की गिरावट के साथ लगभग 56,700 के स्तर के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया।

विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक अनिश्चितता के कारण विदेशी निवेशकों ने जोखिम कम करने की रणनीति अपनाई, जिसका असर जापानी बाजार पर भी पड़ा। तकनीकी और निर्यात आधारित कंपनियों के शेयरों में भी दबाव देखने को मिला।

दक्षिण कोरिया में बड़ी गिरावट

दक्षिण कोरिया का शेयर बाजार भी दबाव से नहीं बच सका। कोस्पी इंडेक्स लगभग 4 प्रतिशत तक गिरकर 6,000 के आसपास पहुंच गया।

तकनीकी कंपनियों और निर्यात आधारित सेक्टरों में कमजोरी देखने को मिली। वैश्विक मांग को लेकर बढ़ती चिंता और निवेशकों की सतर्कता ने बाजार की चाल को प्रभावित किया।

चीन और हॉन्गकॉन्ग के बाजार अपेक्षाकृत स्थिर

जहां जापान और दक्षिण कोरिया के बाजारों में तेज गिरावट रही, वहीं चीन और हॉन्गकॉन्ग के बाजार अपेक्षाकृत स्थिर नजर आए।

  • शंघाई कंपोजिट लगभग 4,180 के आसपास कारोबार करता रहा।
  • हैंगसेंग इंडेक्स करीब 26,070 के स्तर पर लगभग सपाट रहा।

इन बाजारों में सीमित उतार-चढ़ाव देखने को मिला, जिससे संकेत मिला कि निवेशक फिलहाल नई परिस्थितियों का आकलन करने की कोशिश कर रहे हैं।

पाकिस्तान के बाजार में शुरुआत में मजबूती

3 मार्च के कारोबार में पाकिस्तान के KSE-30 इंडेक्स में शुरुआती कारोबार के दौरान लगभग 0.8 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई और यह करीब 46,688 के स्तर तक पहुंच गया।

हालांकि, इससे पहले वाले कारोबारी सत्र में पाकिस्तान का बाजार भारी दबाव में रहा था, जहां तेज बिकवाली के चलते ट्रेडिंग को अस्थायी रूप से रोकना पड़ा था।

कच्चे तेल में लगातार दूसरी बड़ी तेजी

भू-राजनीतिक तनाव का सबसे बड़ा असर कमोडिटी बाजार में देखने को मिला।

ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत में 3 मार्च को 3 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई और यह 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया।

इससे पहले 2 मार्च को भी ब्रेंट क्रूड में लगभग 10 प्रतिशत की बड़ी तेजी आई थी। इस तरह केवल दो कारोबारी दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में कुल मिलाकर 13 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि यदि मध्य-पूर्व में संघर्ष और गहराता है तथा तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और तेजी से बढ़ सकती हैं।

तेल 120 डॉलर तक पहुंचने की आशंका

कुछ बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान, अमेरिका और इज़रायल के बीच तनाव लंबा चलता है या तेल आपूर्ति मार्गों पर असर पड़ता है तो ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है।

हालांकि यह केवल एक संभावित बाजार अनुमान है। वास्तविक कीमतें वैश्विक मांग, उत्पादन, ओपेक+ की नीतियों और भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करेंगी।

भारत पर क्या पड़ सकता है असर?

भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल आयात करने वाले देशों में शामिल है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

यदि लंबे समय तक कच्चा तेल महंगा रहता है तो इसका असर निम्न क्षेत्रों पर दिखाई दे सकता है—

  • पेट्रोल और डीजल की कीमतें
  • परिवहन लागत
  • महंगाई
  • लॉजिस्टिक्स सेक्टर
  • विमानन उद्योग
  • औद्योगिक उत्पादन लागत

ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से कई वस्तुओं और सेवाओं की लागत भी बढ़ सकती है।

पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर संभावित असर

बाजार विश्लेषकों के अनुसार यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की ऊंची कीमतें लंबे समय तक बनी रहती हैं तो भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।

अनुमानों के अनुसार—

  • दिल्ली में पेट्रोल की कीमत लगभग 95 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 100 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती है।
  • डीजल की कीमत 88 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर लगभग 92 रुपये प्रति लीटर तक जा सकती है।

हालांकि वास्तविक खुदरा कीमतें केंद्र और राज्य सरकारों की कर नीति, तेल विपणन कंपनियों के मूल्य निर्धारण और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर निर्भर करेंगी।

वॉल स्ट्रीट में सीमित उतार-चढ़ाव

अमेरिकी शेयर बाजारों में 2 मार्च को मिश्रित कारोबार देखने को मिला।

नैस्डैक में बढ़त

तकनीकी कंपनियों के शेयरों में खरीदारी देखने को मिली, जिससे नैस्डैक कंपोजिट लगभग 0.36 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुआ।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और बड़ी टेक कंपनियों में निवेशकों की दिलचस्पी बनी रही।

एसएंडपी 500 लगभग सपाट

अमेरिका का व्यापक बाजार सूचकांक एसएंडपी 500 मामूली 0.04 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुआ।

यह संकेत देता है कि निवेशक फिलहाल आर्थिक आंकड़ों के साथ-साथ भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर भी बराबर नजर रख रहे हैं।

डाउ जोंस में हल्की गिरावट

डाउ जोंस इंडस्ट्रियल एवरेज लगभग 73 अंकों की गिरावट के साथ बंद हुआ।

औद्योगिक और पारंपरिक सेक्टरों में सीमित बिकवाली देखने को मिली, जबकि निवेशकों ने सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर भी रुख किया।

भारतीय शेयर बाजार पर पहले ही दिख चुका असर

हालांकि 3 मार्च को होली के कारण भारतीय शेयर बाजार बंद रहे, लेकिन वैश्विक तनाव का असर एक दिन पहले यानी 2 मार्च के कारोबार में स्पष्ट दिखाई दिया।

सेंसेक्स में बड़ी गिरावट

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स लगभग 1,048 अंक यानी करीब 1.3 प्रतिशत की गिरावट के साथ 80,239 के स्तर पर बंद हुआ।

बैंकिंग, आईटी, ऑटो और मेटल सेक्टर के कई प्रमुख शेयरों में दबाव देखने को मिला।

निफ्टी भी फिसला

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक निफ्टी 50 भी लगभग 313 अंकों की गिरावट के साथ 24,866 के स्तर पर बंद हुआ।

विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक संकेतों के अलावा मुनाफावसूली और विदेशी निवेशकों की बिकवाली का भी बाजार पर असर पड़ा।

विदेशी और घरेलू निवेशकों की रणनीति

2 मार्च को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) और घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की गतिविधियों में स्पष्ट अंतर देखने को मिला।

  • विदेशी संस्थागत निवेशकों ने लगभग 3,295 करोड़ रुपये के शेयर बेचे।
  • वहीं घरेलू संस्थागत निवेशकों ने करीब 8,593 करोड़ रुपये की खरीदारी की।

यह दर्शाता है कि घरेलू निवेशक बाजार में गिरावट के दौरान खरीदारी के अवसर तलाश रहे थे।

फरवरी में कैसा रहा निवेश?

फरवरी 2026 के दौरान विदेशी संस्थागत निवेशकों ने कुल मिलाकर लगभग 11,002 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे।

इसी अवधि में घरेलू संस्थागत निवेशकों ने लगभग 17,324 करोड़ रुपये का निवेश किया।

इससे संकेत मिलता है कि फरवरी के दौरान बाजार में निवेशकों का भरोसा अपेक्षाकृत बेहतर बना हुआ था।

जनवरी में तस्वीर थी अलग

जनवरी 2026 में विदेशी निवेशकों का रुख काफी कमजोर रहा था।

उस महीने—

  • FII ने लगभग 41,435 करोड़ रुपये के शेयर बेचे।
  • DII ने करीब 69,220 करोड़ रुपये की खरीदारी की।

घरेलू संस्थागत निवेशकों की मजबूत खरीदारी ने उस दौरान बाजार को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

पाकिस्तान के बाजार में पहले आई थी भारी गिरावट

3 मार्च की हल्की मजबूती से पहले पाकिस्तान के शेयर बाजार में 2 मार्च को बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी।

KSE-30 इंडेक्स लगभग 9.8 प्रतिशत टूटकर 46,326 के स्तर पर बंद हुआ था।

तेज बिकवाली के कारण बाजार में अस्थायी रूप से 45 मिनट के लिए ट्रेडिंग रोकनी पड़ी और लोअर सर्किट लगाया गया। यह दर्शाता है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव का असर केवल बड़े विकसित बाजारों तक सीमित नहीं है, बल्कि उभरते बाजार भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।

आगे किन बातों पर रहेगी निवेशकों की नजर?

आने वाले दिनों में वैश्विक निवेशकों की नजर कई महत्वपूर्ण कारकों पर रहेगी। इनमें मध्य-पूर्व की स्थिति, कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले बदलाव, प्रमुख केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीति, वैश्विक आर्थिक आंकड़े और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां प्रमुख रहेंगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक भू-राजनीतिक तनाव कम नहीं होता, तब तक वैश्विक वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। ऐसे माहौल में निवेशक आमतौर पर जोखिम कम करने, पोर्टफोलियो में विविधता बनाए रखने और आर्थिक संकेतकों पर करीबी नजर रखने की रणनीति अपनाते हैं।